Friday, 28 April 2017

अक्षय तृतीया या आखातीज का सनातन स्वरुप

अक्षय तृतीया या आखातीज का सनातन स्वरुप

साढ़े तीन शुभमुहुर्तों में से एक अक्षय तृतीया या आखातीज है। वर्तमान में यह तिथि जनव्यवहार में भले ही विवाहोत्सव का पर्याय बनकर रह गई है। इसके पीछे मान्यता यह है कि, इस दिन जिनका विवाह होता है उनका सौभाग्य अखंड रहता है। वस्तुतः अक्षय तृतीया आध्यात्मिक एवं भौतिक दोनो ही धरातलों पर पूजनीय मानी गई होकर भारतीय पंचाग की कुछ अतिमहत्वपूर्ण तिथियों में से एक है। इस दिन किए गए किसी भी शुभ कार्य का फल अक्षय होकर मिलनेवाला समझा जाता है। भगवान विष्णु को समर्पित इस दिवस किए गए कर्म प्रलय के समय भी नष्ट नहीं होते। इस दिन विष्णु पूजा अक्षय फल प्राप्ति के लिए की जाती है। शास्त्रों के अनुसार इस तिथि को स्वयंसिद्ध मुहुर्त माना गया है। यह भी मान्यता है कि, गणेशजी ने इसी दिन महाभारत लिखना प्रारंभ किया था।

इस तिथि को अक्षय तृतीया इसलिए भी कहते हैं क्योंकि, इस तिथि को सूर्यास्त के पश्चात पश्चिमी आकाश में एक अद्‌भुत दृश्य उपस्थित होता है। इस समय चंद्रमा और बुध एक साथ रोहिणी नक्षत्र में विद्यमान रहते हैं। रोहिणी चंद्र की सबसे प्रिय पत्नी और बुध उनका पुत्र। इन तीनो का यह विचित्र संयोग त्रेतायुग के आरंभ से लेकर आज तक प्रतिवर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अनवरत रुप से उपस्थित होता आ रहा है। तुलसीदासजी ने इस अनूठे संयोग की बडी सुंदर काव्यात्मक व्याख्या की है। यथा - 'उपमा बहुरि कहउँ जियॅं जोही, जनु बुध, विधु बिच रोहिनि सोही।" वैसे यह विस्मृत सा ही है।

भगवान विष्णु से संबंद्ध इस तिथि से जुडी कुछ मान्यताएं इसप्रकार से हैं - 
1. उत्तरखंड राज्य के बद्रीनारायण मंदिर के पट इसी दिन खुलते हैं और दीपावली के समय भाईदूज के दिन बंद होते हैं।
2. वृंदावन के श्री बांकेबिहारी के मंदिर में केवल इसी दिन श्रीविग्रह के चरण दर्शन होते हैं।
3. पवित्र गंगा नदी इसी दिन पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। इस दिन गंगाजी में डुबकी लगाने से सभी पाप धुल जाते हैं।
4. इस तिथि को मां अन्नपूर्णा का जन्मदिन मानकर उनका पूजन किया जाता है।
5. इसी दिन महाराज युधीष्ठिर को अक्षय पात्र की प्राप्ति हुई थी जिसमें से कभी भोजन समाप्त नहीं होता था।
6. चैत्र और वैशाख में सबसे अधिक पीया जानेवाला गन्ने का रस इस दिन सर्वाधिक पीया जाता है। 
7. महाराष्ट्र में इस मुहुर्त को बुआई का दिवस माना जाता है। आयुर्वेद में बताई हुई औषधी वनस्पतियां इस दिन बोई जाएं तो इन वनस्पतियो का कभी क्षय नहीं होता। एक मान्यता यह भी है कि, इसी कारण भारत में औषधी वनस्पतियों की कमी नहीं है। 
8. यदि इस दिन 1 ग्राम भी सोना खरीदा जाए तो वह सतत बढ़ता है इस मान्यता के कारण इस दिन सैंकडों किलो सोना खरीदा बेचा जाता है।
9. इसी दिन उडीसा में भगवान जगन्नाथजी की रथयात्रा निकाली जाती है।

भगवान विष्णु के तीन अवतार नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम अक्षय तृतीया से जुडे हुए हैं। पुराणों में नर नारायण की कथाएं कई प्रकार से कही गई हैं। हयग्रीव भगवान विष्णु के एक अवतार माने गए हैं और एक असुर का नाम भी हयग्रीव है। इसके बारे में पुराणों में अनेक कथाएं मिलती हैं। 
नर-नारायण महाभारत युग में अर्जुन और कृष्ण के रुप में प्रकट हुए थे। इनके संबंध में भगवान परशुराम ने एक कथा कौरव-पांडवों के बीच मध्यस्थता करते समय बोध लेने के लिए दृष्टांत के रुप में कौरवों से सभा में कही थी - दंभोदभव नामका एक सार्वभौम, बलवान और महारथी राजा बहुत प्राचीन काल में हुआ था। वह प्रतिदिन प्रातः ब्राह्मणों और क्षत्रियों को बुलाकर चतुर्वग में मुझसे कोई श्रेष्ठ योद्धा है क्या? पूछा करता था। कुछ निर्भय ब्राह्मण उसे सजग करने का प्रयत्न करते। परंतु, उसका यह प्रश्न नित्य का ही हो गया था। लेकिन एक आत्मसाक्षात्कारी तपस्वी ने भर राजा को उत्तर दिया - 'हे राजन, संग्राम में हजारों का एकदम सामना करनेवाले दो पुराणश्रेष्ठ हैं और उनके मुकाबले तुम कुछ भी नहीं हो। ये दो पुरुष नर-नारायण होकर गंधमादन पर्वत पर तपस्या कर रहे हैं। यदि तुममें शक्ति हो तो जाकर उनका सामना करो।

राजा के लिए यह वृत्त अह्य होकर वह अपनी सेना लेकर गंधमादन पर्वत पर जा पहुंचा और भिक्षा में युद्ध की मांग की। नर-नारायण ने उत्तर दिया - 'हे राजश्रेष्ठ! इस आश्रम में क्रोध और लोभ फटक भी नहीं सकता, फिर युद्ध किसलिए? और तुझसे प्रतिस्पर्धा करने के लिए शस्त्र और प्रतिस्पर्धी कहां से लाएं? इस प्रकार से उन्होंने सामोपाचार करने का प्रयत्न किया। परंतु, दंभोदभव के हट के आगे असहाय होकर नरसंज्ञक ऋषि ने हाथ में सरकंडे उठाकर दंभोदभव से कहा, चल युद्ध के लिए तैयार हो जा। बोरु तो एक निमित्त था। योगबल से राजा पराजित हो गया। दंभोदभव का निमित्त कर परशुरामजी ने केवल दुर्योधन ही नहीं तो सभी राजाओं को उपदेश दिया था।

तत्‌पश्चात धृतराष्ट्र की ओर मुडकर परशुराम ने उसे समझाते हुए कहा कि, नारायण मुनि का सामर्थ्य तो इससे भी बढ़कर है।   वर्तमान के नर-नारायण और कोई न होकर पार्थ-केशव हैं। 'हे राजन्‌, अर्जुन अजेय है। चराचर का निर्माता, सभी का सत्ताधीश नारायण उसका मित्र है। वज्रदेही हनुमान उसके रथ पर विराजमान है। असंख्य गुणी कुंतीपुत्र को विशिष्ट गुणी जनार्दन का साथ है। यह तुने पहचान लिया हो तो युद्ध का विचार छोड दे। पांडवों का स्नेह संपादन कर। तेरा कल्याण होगा, यह मेरा तुझे आशीर्वाद है।

जरासंध के वध से भारतीय युद्ध का आरंभ होगा यह भावी घटना परशुराम ने भगवान कृष्ण को बतलाई थी। फिर भी युद्ध को टालने की दृष्टि से प्रयत्न आवश्यक थे। विजयश्री किसी को भी मिले उभय पक्षों को हानि होगी ही। अपने शस्त्रों और बाहुबल पर दृढ़ विश्वास होना चाहिए परंतु, दंभ सर्वनाश का कारण बनेगा यही परशुराम को सभा में कहना था। 

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