Monday, 3 April 2017

रामराज्य की धर्मध्वजा का ध्वजदंड ः श्री हनुमान

 रामनवमी - हनुमान जयंती विशेष  -
  रामराज्य की धर्मध्वजा का ध्वजदंड ः श्री हनुमान 
- लेखक  ः शिरीष सप्रे

प्रत्येक के जीवन में बलसंवर्धन का बडा महत्व है। शक्ति के न होने पर जीवन में असफलता ही हाथ आती है। मानव जीवन का साध्य ईश्वर की प्राप्ती को माना गया है और इस साध्य को प्राप्त को करने का साधन है शरीर। इसीलिए शरीर का बलसंपन्न होना अत्यंत आवश्यक है। भारतीय विचारकों के समूह में युवाओं के लिए आदर्श देवता के रुप में सर्वाधिक मान्यता हनुमानजी को है। क्योंकि, यही वह देवता है जिसमें युवकों की स्वभाव विशेषता से मेल खानेवाला गुण है। हनुमान का स्वरुप 'अतुलित बलधामा" का है। शक्ति,पराक्रम, कर्तृत्व का आदर्श हनुमान है। भगवान राम कहते हैं 'कपि से उरण हम नाही" और यह एक वास्तविकता है। सीताजी का शोध हो या समुद्र उडान। लंकादहन से लेकर समुद्र पर पुल का निर्माण हो या संजीवनी का लाना। सभी कार्यों में हनुमानजी के पराक्रम का कोई विकल्प नहीं।

अद्‌भुत शक्ति संपन्न, अद्वितीय पराक्रमी हनुमान की तन - मन के आरोग्य प्राप्ति, संवर्धन के लिए समर्थ रामदास ने भक्ति करने के लिए कहा है। समर्थ रामदास ही नहीं स्वामी विवेकानंद ने भी हनुमानजी के चरित्र को आदर्श माना था। स्वामीजी के अनुसार तो महावीर हनुमान का चरित्र सारे विश्व के लिए आदर्शरुप है। हनुमानजी जितेंद्रिय, बुद्धिमान हैं। गुरु आज्ञा, दास्यभाव, महाशक्ति का आदर्श हैं। सेवाव्रत का आदर्श हैं। इसलिए हनुमानजी पर श्रद्धा रखें। समर्थ के अनुसार अस्खलित ब्रह्मचर्य, एकनिष्ठ स्वामी सेवा और अद्‌भुत पराक्रम इन गुणों से युक्त मारुती के चरित्र को सामने रख लोगों को इष्ट कार्य की सिद्धी हेतू कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए।

हिंदुओं में चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम और सन्यास हैं इनमें से पहले आश्रम के लोगों के सामने समर्थ ने हनुमानजी का ध्येय ही रखा और दूसरे आश्रमवालों के लिए श्रीराम का। समर्थ का यह दृढ़ विश्वास था कि, अविवाहित लोग अस्खलित ब्रह्मचर्य रख और विवाहित लोक अव्यभिचारी एकपत्नीव्रत का पालन कर स्वधर्म स्थापना एवं स्वराज्य स्थापना के पवित्र कार्य के लिए प्रवृत्त होंगे तथा सभी संकटों का सामना कर कार्यसिद्ध होने तक बिना भयभीत हुए आनंद और उत्साह के साथ काम करेंगे। समर्थ रामदास का शक्तिस्त्रोत हर काल में मार्गदर्शक है।

पूरे देश में हनुमानजी के मंदिर विद्यमान हैं और उनमें उनके दो रुप नजर आते हैं। एक है, वीर मारुती का। संतप्त, गदाधारी, द्रोणगिरीधारी पराक्रमी, राक्षसमर्दक रुप। यही रुप युवाओं के सामने होना चाहिए। युवा ऐसा ही होना चाहिए अत्याचारों के विरुद्ध संतप्त होकर खडे होनेवाला। परंतु, यदि यह उद्रेक विवेकपूर्ण नहीं होगा तो 'स्वराज्य" में ही वे आतंकी, नक्सली की भूमिका स्वीकार लेंगे। केवल आवेश या जोश ही काम का नहीं होता वह द्वेष ही पैदा करता है। गुलामी के काल में भले ही वह काम आ जाए परंतु,  स्वातंत्र्यकाल में वह घातक होगा। तब वीर मारुती नहीं दास मारुती ही चाहिए होगा। रामराज्य आने तक वीर और आने के पश्चात दास ऐसे अद्‌भुत समन्वय का नाम है श्रीहनुमान। वीरत्व को दासत्व का जोड है इसलिए हनुमान युवाओं का देवता है और होना भी चाहिए क्योंकि, युवा भी इसी प्रकार के होने चाहिए तभी रामराज्य आ सकेगा।

रामनवमी और हनुमान जयंती का उत्सव पुराने और पौराणिक उत्सव थे परंतु, समर्थ रामदास ने उनमें नई शक्ति भर लोगों में आत्मविश्वास उत्पन्न किया। समर्थ रामदास के पिता सूर्योपासक थे। परंतु, समर्थ ने तत्कालीन लोगों को सूर्योपासना के लिए नहीं  अपितु बाल्यकाल में ही उडान भर सूर्य को निगलने को प्रवृत्त हुए रामदूत मारुती और कोदंडधारी श्रीराम की उपासना करने के लिए कहा। उत्सव के लिए हजारों लोग एकत्रित होते, उस समय श्रीराम और हनुमान चरित्र की महत्वपूर्ण बातें उनकी दृष्टि में ला उन्हें उनका यथाशक्ति अनुसरण करने का उपदेश देने का समर्थ का मुख्य उद्देश्य यही था।

कुछ आलोचकों का यह आक्षेप है कि, समर्थ ने पुरानी ही पौराणिक रामोपासना महाराष्ट्र में आरंभ की इसमें ऐसी कौनसी विशिष्टता है। उनका यह भी कहना है कि, ''तुलसीदासजी का राम और समर्थ का राम अलग था क्या?"" उत्तर यह है कि, तुलसीदासजी का राम और समर्थ का राम एक ही था और वह था वाल्मिकी रामायण का सुप्रसिद्ध महापराक्रमी, रक्षःकुलनिहंता, सुर-बंधविमोचक, कोदंडधारी एकवचनी श्रीराम। इसी प्रकार से मध्वाचार्यजी, रामानंदजी आदि का राम और समर्थ का राम भी एक  ही था। सभी साधुसंतों का राम एक ही है। तब आक्षेपक प्रश्न खडा करते हैं कि, रामोपासना में स्वतंत्रता देने का सामर्थ्य होता तो  उत्तर हिंदुस्थान में तुलसीदासजी की रामोपासना और दक्षिण हिंदुस्थान में मध्वाचार्यजी आदि संतों की रामोपासना को वही मधुर फल क्यों नहीं लगे जो समर्थ रामदास की रामोपासना को लगे। उत्तर बिल्कूल सीधा है विभिन्न महाविद्यालयों में पढ़ाया जानेवाला इतिहास एक ही होता है, परंतु इतिहास के तत्त्व पढ़ानेवाला शिक्षक (प्रोफेसर) जिस वृत्ती, संस्कृति का होता है उसी प्रकार का युवा विद्यार्थी के मानस पर इतिहास का परिणाम होता है।

तुलसीदासजी के रामायण में भी अनेक अलौलिक गुण हैं और उनका परिणाम भी उत्तर हिंदुस्थान में बहुत अच्छा हुआ है। उनके रामचरित्‌मानस ने उत्तर हिंदुस्थान में अप्रतिम कार्य किया है। गोस्वामी तुलसीदासजी की रामोपासना के कारण उत्तर हिंदुस्थान के करोडों लोगों को परधर्म से परावृत्त कर रामोपासना की ओर मोडा, यह कोई छोटा-मोटा काम नहीं। भगवान राम में अनेक उत्तम गुण थे। जिन गुणों पर विशेष बल देकर उत्सवचालक अनुकरण करने के लिए कहेंगे उन्हीं गुणों का अनुकरण करने की बहुजन समाज की प्रवृत्ति होगी।  

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