Friday, 28 April 2017

अक्षय तृतीया या आखातीज का सनातन स्वरुप

अक्षय तृतीया या आखातीज का सनातन स्वरुप

साढ़े तीन शुभमुहुर्तों में से एक अक्षय तृतीया या आखातीज है। वर्तमान में यह तिथि जनव्यवहार में भले ही विवाहोत्सव का पर्याय बनकर रह गई है। इसके पीछे मान्यता यह है कि, इस दिन जिनका विवाह होता है उनका सौभाग्य अखंड रहता है। वस्तुतः अक्षय तृतीया आध्यात्मिक एवं भौतिक दोनो ही धरातलों पर पूजनीय मानी गई होकर भारतीय पंचाग की कुछ अतिमहत्वपूर्ण तिथियों में से एक है। इस दिन किए गए किसी भी शुभ कार्य का फल अक्षय होकर मिलनेवाला समझा जाता है। भगवान विष्णु को समर्पित इस दिवस किए गए कर्म प्रलय के समय भी नष्ट नहीं होते। इस दिन विष्णु पूजा अक्षय फल प्राप्ति के लिए की जाती है। शास्त्रों के अनुसार इस तिथि को स्वयंसिद्ध मुहुर्त माना गया है। यह भी मान्यता है कि, गणेशजी ने इसी दिन महाभारत लिखना प्रारंभ किया था।

इस तिथि को अक्षय तृतीया इसलिए भी कहते हैं क्योंकि, इस तिथि को सूर्यास्त के पश्चात पश्चिमी आकाश में एक अद्‌भुत दृश्य उपस्थित होता है। इस समय चंद्रमा और बुध एक साथ रोहिणी नक्षत्र में विद्यमान रहते हैं। रोहिणी चंद्र की सबसे प्रिय पत्नी और बुध उनका पुत्र। इन तीनो का यह विचित्र संयोग त्रेतायुग के आरंभ से लेकर आज तक प्रतिवर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अनवरत रुप से उपस्थित होता आ रहा है। तुलसीदासजी ने इस अनूठे संयोग की बडी सुंदर काव्यात्मक व्याख्या की है। यथा - 'उपमा बहुरि कहउँ जियॅं जोही, जनु बुध, विधु बिच रोहिनि सोही।" वैसे यह विस्मृत सा ही है।

भगवान विष्णु से संबंद्ध इस तिथि से जुडी कुछ मान्यताएं इसप्रकार से हैं - 
1. उत्तरखंड राज्य के बद्रीनारायण मंदिर के पट इसी दिन खुलते हैं और दीपावली के समय भाईदूज के दिन बंद होते हैं।
2. वृंदावन के श्री बांकेबिहारी के मंदिर में केवल इसी दिन श्रीविग्रह के चरण दर्शन होते हैं।
3. पवित्र गंगा नदी इसी दिन पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। इस दिन गंगाजी में डुबकी लगाने से सभी पाप धुल जाते हैं।
4. इस तिथि को मां अन्नपूर्णा का जन्मदिन मानकर उनका पूजन किया जाता है।
5. इसी दिन महाराज युधीष्ठिर को अक्षय पात्र की प्राप्ति हुई थी जिसमें से कभी भोजन समाप्त नहीं होता था।
6. चैत्र और वैशाख में सबसे अधिक पीया जानेवाला गन्ने का रस इस दिन सर्वाधिक पीया जाता है। 
7. महाराष्ट्र में इस मुहुर्त को बुआई का दिवस माना जाता है। आयुर्वेद में बताई हुई औषधी वनस्पतियां इस दिन बोई जाएं तो इन वनस्पतियो का कभी क्षय नहीं होता। एक मान्यता यह भी है कि, इसी कारण भारत में औषधी वनस्पतियों की कमी नहीं है। 
8. यदि इस दिन 1 ग्राम भी सोना खरीदा जाए तो वह सतत बढ़ता है इस मान्यता के कारण इस दिन सैंकडों किलो सोना खरीदा बेचा जाता है।
9. इसी दिन उडीसा में भगवान जगन्नाथजी की रथयात्रा निकाली जाती है।

भगवान विष्णु के तीन अवतार नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम अक्षय तृतीया से जुडे हुए हैं। पुराणों में नर नारायण की कथाएं कई प्रकार से कही गई हैं। हयग्रीव भगवान विष्णु के एक अवतार माने गए हैं और एक असुर का नाम भी हयग्रीव है। इसके बारे में पुराणों में अनेक कथाएं मिलती हैं। 
नर-नारायण महाभारत युग में अर्जुन और कृष्ण के रुप में प्रकट हुए थे। इनके संबंध में भगवान परशुराम ने एक कथा कौरव-पांडवों के बीच मध्यस्थता करते समय बोध लेने के लिए दृष्टांत के रुप में कौरवों से सभा में कही थी - दंभोदभव नामका एक सार्वभौम, बलवान और महारथी राजा बहुत प्राचीन काल में हुआ था। वह प्रतिदिन प्रातः ब्राह्मणों और क्षत्रियों को बुलाकर चतुर्वग में मुझसे कोई श्रेष्ठ योद्धा है क्या? पूछा करता था। कुछ निर्भय ब्राह्मण उसे सजग करने का प्रयत्न करते। परंतु, उसका यह प्रश्न नित्य का ही हो गया था। लेकिन एक आत्मसाक्षात्कारी तपस्वी ने भर राजा को उत्तर दिया - 'हे राजन, संग्राम में हजारों का एकदम सामना करनेवाले दो पुराणश्रेष्ठ हैं और उनके मुकाबले तुम कुछ भी नहीं हो। ये दो पुरुष नर-नारायण होकर गंधमादन पर्वत पर तपस्या कर रहे हैं। यदि तुममें शक्ति हो तो जाकर उनका सामना करो।

राजा के लिए यह वृत्त अह्य होकर वह अपनी सेना लेकर गंधमादन पर्वत पर जा पहुंचा और भिक्षा में युद्ध की मांग की। नर-नारायण ने उत्तर दिया - 'हे राजश्रेष्ठ! इस आश्रम में क्रोध और लोभ फटक भी नहीं सकता, फिर युद्ध किसलिए? और तुझसे प्रतिस्पर्धा करने के लिए शस्त्र और प्रतिस्पर्धी कहां से लाएं? इस प्रकार से उन्होंने सामोपाचार करने का प्रयत्न किया। परंतु, दंभोदभव के हट के आगे असहाय होकर नरसंज्ञक ऋषि ने हाथ में सरकंडे उठाकर दंभोदभव से कहा, चल युद्ध के लिए तैयार हो जा। बोरु तो एक निमित्त था। योगबल से राजा पराजित हो गया। दंभोदभव का निमित्त कर परशुरामजी ने केवल दुर्योधन ही नहीं तो सभी राजाओं को उपदेश दिया था।

तत्‌पश्चात धृतराष्ट्र की ओर मुडकर परशुराम ने उसे समझाते हुए कहा कि, नारायण मुनि का सामर्थ्य तो इससे भी बढ़कर है।   वर्तमान के नर-नारायण और कोई न होकर पार्थ-केशव हैं। 'हे राजन्‌, अर्जुन अजेय है। चराचर का निर्माता, सभी का सत्ताधीश नारायण उसका मित्र है। वज्रदेही हनुमान उसके रथ पर विराजमान है। असंख्य गुणी कुंतीपुत्र को विशिष्ट गुणी जनार्दन का साथ है। यह तुने पहचान लिया हो तो युद्ध का विचार छोड दे। पांडवों का स्नेह संपादन कर। तेरा कल्याण होगा, यह मेरा तुझे आशीर्वाद है।

जरासंध के वध से भारतीय युद्ध का आरंभ होगा यह भावी घटना परशुराम ने भगवान कृष्ण को बतलाई थी। फिर भी युद्ध को टालने की दृष्टि से प्रयत्न आवश्यक थे। विजयश्री किसी को भी मिले उभय पक्षों को हानि होगी ही। अपने शस्त्रों और बाहुबल पर दृढ़ विश्वास होना चाहिए परंतु, दंभ सर्वनाश का कारण बनेगा यही परशुराम को सभा में कहना था। 

Friday, 21 April 2017

सत्ताधीशों का काल विषकन्या

सत्ताधीशों का काल विषकन्या

अपने शत्रु को नष्ट करने के लिए वेदकाल से ही विषकन्याओं का उपयोग सत्ताधारियों द्वारा समय-समय पर भारत ही नहीं तो भारत के बाहर भी किया गया है। इन विषकन्याओं को तैयार करने के लिए जो कि सुंदर हुआ करती थी को बाल्यकाल से ही अल्प मात्रा में थोडा-थोडा विष देकर बडा किया जाता था साथ ही विषैले वृक्ष एवं प्राणियों के संपर्क में रहने का उन्हें अभ्यस्त किया जाता था। उन्हें संगीत एवं नृत्य की शिक्षा के साथ ही छल विद्या की सीख भी दी जाती थी। इनकी सांसे, स्पर्श और पसीना तक विषमय व भयानक परिणामवाला होता था। भारत के बाहर भी मेसोपोटेमिया, इजिप्त, अरब देश और चीन में भी विषकन्याओं का उपयोग अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए किया गया है। भारत एवं बाहर के देशों की लोकथाओं में विषकन्याओं का उल्लेख मिलता है। 

भारत बिहार के संथाल क्षेत्र के आदिवासियों में अस्थाई विषकन्या की नागपंचमी के दिन पूजा करने की प्रथा का पालन किया जाकर उसकी पूजा की जाती है। विष संकट से अभय मांगा जाता है। प्राचीन एवं अर्वाचीन भारत में विषकन्याओं संबंधी उदाहरण आज उपलब्ध हैं। कंस की बहिन पुतना विषकन्या थी। कंस ने उसे वैद्यों के माध्यम से विष का रोज सेवन करवाकर उसका दूध विषयुक्त हो जाए ऐसा किया था। विशाखादत्त के ऐतिहासिक 'मुद्राराक्षस" नाटक में विषकन्या का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इस नाटक के केंद्रबिंदू चाणक्य और चंद्रगुप्त होकर अन्य मुख्य पात्र हैं नंदवंश का मुख्य अमात्य राक्षस और पर्वतक राजा का पुत्र मलयकेतु। सूत्रधार ने नाटक के प्रारंभ में नाटक का सारांश स्पष्ट किया है।

चाणक्य का दांव राक्षस को चंद्रगुप्त का मुख्य अमात्य बनाने का है। परंतु, राक्षस चाणक्य द्वारा नंदवंश के नाश के कारण चाणक्य-चंद्रगुप्त के विरुद्ध होता है और पर्वतक राजा की सहायता कर उनके राज्य का नाश चाहता है और इधर चाणक्य अपने गुप्तचर भागुरायण के माध्यम से उसकी काट करता है। नाटक में चाणक्य और राक्षस के बीच खेले गए दांव-प्रतिदांव गुप्तचरों के माध्यम से खेले गए हैं। राक्षस चंद्रगुप्त को मारने के लिए विष शरीरी विषकन्या को बडी तिकडम से भेजता है। परंतु, चाणक्य उस विषकन्या को पहचान जाता है और बडी चालाकी से उसी विषकन्या को राक्षस के समर्थक पर्वतक के पास भेजकर उसी विषकन्या द्वारा उसको मरवा देता है। सत्ता के लिए चलनेवाले दांवपेंच मुद्राराक्षस में अंत तक चलते रहते हैं। अंततः इस राजनैतिक दांवपेंच में चाणक्य विजयी होता है और राक्षस चंद्रगुप्त का अमात्य होना मान्य करता है।

चाणक्य के कौटिल्य अर्थशास्त्र में गुप्तचरों के संबंध में बडी बारिकी से जानकारी दी गई है। इन जानकारियों पर से हम उस काल में राजनैतिक गुप्तचरी का तंत्र क्या था यह जान सकते हैं। इसमें गुप्तचरों के प्रकारों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। इनमें से एक प्रकार 'रसद" गुप्तचरी का है। ये गुप्तचर अत्याचारी स्वभाव के होकर विषप्रयोग में माहिर होते थे। विषकन्या 'रसद" गुप्तचर मानी जाती थी। इस प्रकार की स्त्री गुप्तचरों को चुनने के लिए उनके सौंदर्य, उनकी बुद्धिमत्ता और बेपरवाही वाली वृत्ति को ध्यान में रखकर ही उन्हें चुना जाता था। विभिन्न प्रकार के गुप्तचरों में विष प्रयोग करनेवाले गुप्तचर, विषकन्या इनकी भरमार होती थी।

विषों की शास्त्रीय जानकारी जिस प्रकार से चाणक्य को थी उसी प्रकार से नंदवंश के तेजतर्राट अमात्य राक्षस को भी थी। वह गुप्तचरों से किस प्रकार कार्य करवाया जाए इस संबंध में विशेषज्ञ था। उसीने चंद्रगुप्त को मारने के लिए विषकन्या भेजी थी। उस काल के राजनीतिज्ञों को विषों का ज्ञान हुआ करता था। सिंहगुप्त के पुत्र वाग्भट के अष्टांग ह्रदय यानी सार्थ वाग्भट वैद्यशास्त्र का ग्रंथराज है। इस ग्रंथ में विषों के संबंध में जानकारी है। चालुक्य वंश का तीसरा सोमेश्वर धुरंधर राज्यकर्ता-विद्वान पंडित था। उसके लिखे मानसोल्लास ग्रंथ में विष प्रयोग का राजनैतिक उद्देश्य से प्रतिपादन किया हुआ है। उसने अपने इस ग्रंथ में विष के तीन प्रकार बतलाते हुए शत्रु को नष्ट करने के लिए विष प्रयोग करना चाहिए यह स्पष्ट कहा है। यह शत्रु जब असावधान हो, गायन, वादन में मग्न हो या जुआ खेल रहा हो तब करना चाहिए। जब वह किसी उत्सव में शामिल हो रहा हो, रानी महल में क्रीडामग्न हो ऐसे समय उसे मोह हो ऐसा वर्तन कर विष प्रयोग कर उसे मार डालना चाहिए। आर्य चाणक्य के काल में जिस प्रकार के गुप्तचर थे वैसे ही सोमेश्वर के काल (11वीं, 12वीं शताब्दी में) में भी थे। 
चाणक्य के अर्थशास्त्र से स्पष्ट होता है कि ये गुप्तचर प्राणों की परवाह न करनेवाले, विभिन्न कलाओं में सिद्ध होकर उन्हें कई भाषाएं भी आती थी। उनमें से कुछ स्त्रियां भी होती थी। पुरुष गुप्तचर भी विष प्रयोग में माहिर होते थे। कौटिल्य के चौथी शताब्दी में रचित अर्थशास्त्र में राजसत्ता, समाजसत्ता, समाज व्यवस्था आदि अनेक विषय आए हुए हैं फिर भी 'विषशास्त्र" में गुप्तचरों के संबंध में उनका उपयोग कैसे करें और राजसत्ता किस प्रकार टिकाए रखें पर भरपूर जानकारी आई हुई है साथ ही विष किस प्रकार से तैयार करें इस पर चर्चा की गई है। रसद गुप्तचरों में महत्वपूर्ण कार्य विषकन्याओं पर सौंपा जाता था। इन विषकन्याओं को बडी विशेषज्ञता के साथ नियुक्त किया जाता था। ये विषकन्याएं अपना काम चुपचाप बडी खूबी के साथ किया करती थी। 

एकाध सुंदर युवती अथवा कुंवारी कन्या को अल्पायु में ढूंढ़कर उसे वैद्य की सलाह से थोडा-थोडा विष इस प्रकार से दिया जाता था कि उसे उसकी आदत लगकर वह उसे पचा सके। इस प्रकार से वह विष उसके पूरे शरीर में भिद जाता था और वह धीरे-धीरे विषकन्या बन जाती थी। चाणक्य ने विषकन्याओं के प्रकार भी बतलाए हुए हैं। विषों के संबंध में जानकारी वेदकालीन आर्यों को भी थी और उस काल में भी विषकन्याओं की निर्मिती, उनका उपयोग सत्ता अपने हाथों में बनाए रखने के लिए किया जाता था यह अथर्ववेद से पता चलता है।

कथासरितसागर ग्रंथ में भी विषकन्याओं का उल्लेख कुछ कथाओं में आया हुआ है। अलेक्जेंडर-सिकंदर के आक्रमण के समय ऍरिस्टॉटल ने उसे विषकन्याओं से सावधानी बरतने की सलाह दी थी। किसी भी अनजान सुंदर सुंदरी से दूरी बनाए रखने और उससे संसर्ग टालने के लिए कहा था। भारत में जीतने के पश्चात एकाद्य राजा किसी सुंदरी को भेंट में दे सकता है। यह सुंदरी विषकन्या हो सकती है और उसके पसीने मात्र से तेरी मृत्यु हो सकती है। विषवैद्यों को उस काल में बडा सम्मान प्राप्त था। 

 कौटिल्य के अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि, विषकन्याओं का उस जमाने में बडा सम्मान था। विषकन्या को किस प्रकार से पहचाने इस संबंध में इन वैद्यों ने अनेक युक्तियों की योजना अपने सत्ताधारियों के संरक्षण के लिए कर रखी थी। इसके लिए राजमहल के दालानों में शुक, सारिका, भारद्वाज, कोकिला, चकोर आदि पक्षियों को पाला जाता था। जैसे ही विषकन्याओं का इन दालानों में प्रवेश होता शुक, भारद्वाज और सारिका ये प्राणी चिल्लाना आरंभ कर देते। चकोर की आंखों का रंग बदल जाता।

विषकन्या का प्रवेश राजा की भोजन व्यवस्थावाले नौकरवर्ग या अधिकारियों में हो गया तो वे भोजन या पेय पदार्थों के माध्यम से विष देने का काम चुपचाप कर देती थी। परंतु, ऐसे समय में राजा की पाकशाला विष वैद्यों के मार्फत अगर देखरेख रख रहे हों तो विषयुक्त भोजन पहचान लिए जाते थे। उदाहरणार्थ विषयुक्त खाद्य पदार्थ अग्नि में डाले गए तो आवाज निकलता, अग्नि की ज्वाला में नीला धुंआ दिखता। घी या तेल में विष हो तो उसमें नीली रेखा दिखाई देती। विषयुक्त पदार्थ अगर पशु-पक्षी खालें तो वे मर जाते।  फल सूख जाते। कपडों में विष हो तो वे काले पड जाते, उनके धागे गलने लगते।

इन विष कन्याओं का उपयोग न केवल प्राचीन एवं मध्यकाल में किया जाता था वरन्‌ आज भी सत्ता स्पर्धा की दौड में हुकुम की रानी जैसा उपयोग इन विषकन्याओं का किया जाता है और ये भी अपने कार्य के प्रति ईमान बरकरार रखे हुए हैं। आज भी व्यक्तिगत कारणों से विष प्रयोग के समाचार पढ़ने में आते ही हैं। राजनीति में भी विषकन्याओं का उपयोग संसार के सभी देश करते हैं परंतु, इस संबंधी समाचार सर्वसामान्य जनता को मालूम नहीं होते। गुप्तचरी सभी देश करते हैं। जिस प्रकार से ये आधुनिक युग के सामर्थ्य को उपयोग में लाते हैं उसी प्रकार से सौंदर्य संपन्न, प्रशिक्षित विषकन्याओं का उपयोग इन कामों के लिए अधिकांश राष्ट्र करते आए हैं और कर भी रहे हैं। सत्ता बनाए रखने के लिए उनकी शरीरमत्ता, बुद्धिमत्ता, सौंदर्य का उपयोग बडी विशेषज्ञता के साथ किया जा रहा है।

आधुनिक विषकन्याएं प्राचीन परंपरा की विषकन्याओं जैसी भले ही ना हों परंतु, आज भी उनकी कृतियां कुछ अधिक भिन्न नहीं होती। गायन, वादन, नृत्य आदि कला क्षेत्र इनके लिए वर्जित नहीं हैं। आजकल अपना कार्य साधने के लिए ये विषकन्याएं अचूक सत्ता केंद्र के आसपास केंद्रित रहती हैं। कोई स्टेनो, तो कोई व्यक्तिगत सहायक बनकर यहां तक कि सत्ताधारी की पत्नी तक बनकर, तो कहीं किसी महत्वपूर्ण विभाग में जिम्मेदार पद पर विराजमान व्यक्ति के इर्दगिर्द या स्वयं ही किसी पद पर नजर आ जाती हैं। इस प्रकार से चाणक्यकालीन ये विषकन्याएं आज भी सत्ताकार्य में महापूरक बनी हुई हैं यह निर्विवादित तथ्य है बस उनके रुप और स्थान कालानुसार बदल गए हैं।

Friday, 14 April 2017

शारदा एक्ट के जनक आर्यसमाजी हरविलास शारदा

 शारदा एक्ट के जनक आर्यसमाजी हरविलास शारदा

भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुए 70 वर्ष होने जाने रहे हैं परंतु, आज भी भारत बालविवाह की कुप्रथा से मुक्त हो नहीं पा रहा है। नगरों में भले ही बालविवाह को कुरीति माना जाता हो और नगरीय संस्कृति में जीनेवाले इसे एक अभिशाप मानते हों फिर भी राजस्थान, बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, आदि के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी धडल्ले से बालविवाह हो रहे हैं। वर्तमान में नगरीय संस्कृति के संपर्क में आ चूके कुछ ग्रामीण समुदाय इस कुरीति से पीछा छुडाने के प्रति जागरुक होते जा रहे हैं फिर भी हालात यह हैं कि, कइयों के लिए तो बालविवाह पीढ़ी दर पीढ़ी चलनेवाला संस्कार है। इस कारण आज भी बालविवाह एक बडी चिंताजनक समस्या बनी हुई है।

  बालविवाह निरोधक अधिनियम 1929 के जन्मदाता समाज सुधारक, शिक्षाविद्‌, न्यायधीश, राजनेता हरविलास शारदा का जन्म अजमेर राजस्थान में 8 जून 1867 को एक आर्यसमाजी परिवार में हुआ था। स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों की उन पर पूरी छाप थी। उन्होंने ही अजमेर में डीएवी स्कूल की स्थापना की थी। वे 1924, 1927 और 1930 में अजमेर मारवाड से केंद्रीय विधान सभा के लिए सदस्य चुने गए थे। उन्होंने ग्यारह वर्षों तक केंद्र में अजमेर का प्रतिनिधित्व किया था। 

1927 में उन्होंने बालविवाह रोकने के लिए केंद्रीय असेम्बली में एक बिल पेश किया था। इसका उद्देश्य बतलाते हुए उन्होंने कहा था यह बाल विधवाओं के अंधकार को दूर करेगा। इस बिल को प्रस्तुत करते समय उन्होंने कहा था बालविवाह से लडके-लडकियों का स्वाभाविक विकास हो नहीं पाता और उनसे उत्पन्न संतानें भी विकारग्रस्त होती हैं। बालविवाह से स्वस्थ संतानोत्पत्ति में बाधा आती है। देश को सुदृढ़ और विकास के पथ पर ले जाने के लिए बालविवाह जैसी कुरीतियों को छोडना अनिवार्य होना चाहिए। यह शारदा बिल सितंबर 1929 को शिमला में पास हुआ और 1 अप्रैल 1930 को पूरे भारत में लागू हो गया।

इसके पूर्व राजा राममोहन राय, केशवचंद्र सेन, महादेव गोविंद रानडे और स्वामी दयानंद सरस्वती के अथक प्रयासों से लडकी का बालविवाह दस वर्ष की आयु के पूर्व हो नहीं सकता का कानून बना दिया गया। इसके पूर्व तो नवजात बच्चों तक के विवाह तय कर दिए जाते थे। 1890 में हुए फूलमणि केस के कारण दूसरा बिल पारित कर आयु बढ़ाकर 12 वर्ष कर दी गई। देवदासी प्रथा का उन्मूलन करनेवाला बिल 1929 में तत्कालीन मद्रास विधानसभा में पास करवानेवाली मुत्तुलक्ष्मी ने 27 मार्च 1928 को ही बालविवाह निषेध का बिल प्रस्तुत किया था परंतु, केंद्रीय सभा में इस संबंध में एक बिल लाया जा रहा है की सूचना देकर उन्हें प्रतीक्षा करने के लिए कहा गया। 19 अप्रैल 1928 को हरविलास शारदाजी ने एक पत्र लिखकर उनसे समर्थन भी मांगा था।

हरविलास शारदा प्रसिद्ध लेखक होने के साथ ही इतिहासकार एवं साहित्यकार भी थे। उनका एक अत्यंत प्रसिद्ध ग्रंथ 1906 में लिखित 'हिंदू सुपरियारिटी" भी है। इस ग्रंथ में उन्होंने सप्रमाण सिद्ध किया था कि, प्राचीनकाल में हिंदू सभ्यता विश्व में सबसे  आगे थी। उनकी कुछ साहित्य रचनाएं इस प्रकार से हैं। 1915 में 'महाराणा कुंभा", 1918 में 'महाराणा सांगा",1921 में 'हम्मीर ऑफ रणथंभौर", 1936 में 'स्पीचेज एंड रायटिंग ऑफ हरविलास शारदा", 1944 में 'शंकराचार्या और दयानंद", लाइफ ऑफ स्वामी विरजानंद सरस्वती, 1945 में 'परोपकारिणी सभा और सत्यार्थ प्रकाश"।

हरविलास शारदा का देहावसान 20 जनवरी 1952 को हो गया। उनके संबंध में भारत कोकिला कही जानेवाली सरोजिनी नायडू ने कहा था कि, सभी भारतीय विशेषकर भारतीय स्त्रियां प्रोफेसर हरविलास शारदा की हमेशा ऋणी रहेंगी जिन्होंने साहस और बहुत परिश्रम से बालविवाह निरोधक कानून को मान्यता दिलाकर अविस्मरणी कार्य किया है।

Thursday, 6 April 2017

"मैकल नेचुरल फाउंडेशन" - भोपाल

मैकल नेचुरल फाउंडेशन एक नॉन-प्रोफिट ऑर्गेनाइजेशन है| यह फाउंडेशन किसानों को रसायन मुक्त खेती करने हेतु प्रोत्साहित करता है व रासायनिक खेती के दुष्परिणामो से अवगत कराता हैऐसे किसान जो कि रसायन मुक्त खेती करते हैं, उनसे मैकल नेचुरल फाउंडेशन खाद्य पदार्थ  क्रय करता हैयह हमारी ओर से उन्हें बढ़ावा है, व उन्हें प्रोत्साहन देता है|
रासायनिक खेती में अनेक प्रकार के रसायनों जैसे यूरिया, NPK - एनपीके (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश), कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है, यह भूमि एवं पूरे पर्यावरण के लिए हानिकारक है| आज अनाज, दलहन, तिलहन, सब्जी, दूध, फल, पानी सभी पर जहरीले रसायनों का साया है| रसायन युक्त भोजन जब हम ग्रहण करते हैं उस समय जहरीले कीटनाशक व अनेक प्रकार के रसायन हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और हमारे शरीर को हानि पहुंचाते हैं, अनेकों प्रकार के रोग हो जाते हैं व रोग प्रतिरोधक क्षमता भी घट जाती है, घट भी गई है| कैंसर का मुख्य कारण भी कीटनाशकों का उपयोग है| कीटनाशकों का जहर पानी में घुलकर जमीन में उतर जाता है और जमीन से होते हुए धीरे-धीरे भूजल में जा मिलता है| इस से भूजल भी जहरीला हो गया है| अत्यधिक रसायन के उपयोग के कारण अब ऐसा समय आ गया है कि कीड़े व इल्लियाँ नहीं मरती, क्यूंकि कीटों व इल्लियों में दवाइयों को पचाने की क्षमता (इम्युनिटी) तैयार हो गई है | हमारी खाद्य श्रंखला में धीरे-धीरे विषैले रसायनों का प्रवेश हो गया है |  
प्राकृतिक खेती :
फसलों को बढ़ने के लिए जो संसाधन चाहिए वह उनकी जड़ों के पास भूमि में और पत्तों के पास के वातावरण में मौजूद होता है| ऊपर से कुछ भी देने की जरुरत नहीं पड़ती| प्राकृतिक खेती में केवल गाय के गोबर व गौमूत्र से ही पूरी खेती की जाती है| किसी भी प्रकार के जहरीले रसायनों एवं रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता| गाय के एक ग्राम गोबर में असंख्य सूक्ष्म जीव है, जो फ़सल के लिए जरुरी १६ तत्वों की पूर्ति करते है| रासायनिक खेती की जगह यदि हम प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देंगे तो यह न केवल मनुष्यजाति बल्कि पुरे पर्यावरण की दृष्टि से लाभदायी होगा | आप स्वस्थ व निरोगी रहेंगे |
मैकल नेचुरल फाउंडेशन का उद्देश्य:
1. किसानों को रसायन मुक्त खेती के लिए प्रोत्साहित करना |
2. किसानों को रासायनिक खेती के दुष्परिणामों से अवगत कराना |
3. जमीन कि उर्वरा शक्ति को बढ़ाना |
4. रासायनिक खाद/ कीटनाशकों के प्रयोग में कमी लाना |
5. माँ नर्मदा के जलग्रहण क्षेत्र को रसायन मुक्त कराना |
मैकल नेचुरल फाउंडेशन के खाद्य पदार्थों का मूल्य किसानों को हानि न हो यह ध्यान में रख कर तय किया जाता है | हमारे मूल्य अन्य आर्गेनिक(जैविक) कंपनियों की तुलना में काफी कम है
मैकल नेचुरल फाउंडेशन में उपलब्ध रसायन मुक्त खाद्य पदार्थ :
1. खड़ी मिर्च – ₹200 प्रति किलों
2. पिसी मिर्च – ₹250 प्रति किलों
3. पूसा बासमती चावल - ₹60 प्रति किलों
4. शरबती गेहूं - ₹35 प्रति किलों
5. छिलका मूंग दाल - ₹100 प्रति किलों
6. मूंगफली दाना - ₹120 प्रति किलों
आगामी पदार्थ :
1. पिसी हल्दी 
2. तुअर दाल 

नोट: खाद्य भण्डारण करते समय अन्न को नीम की पत्तियों सहित टंकियों में एयर टाइट पैक रखें, व टंकी को सीधे फर्श के संपर्क में न रखें |

 - अर्पिता
संपर्क हेतु मेल करें - maikalnatural@gmail.com 
अथवा इसी आर्टिकल के कमेंट सेक्शन में करें|


Monday, 3 April 2017

रामराज्य की धर्मध्वजा का ध्वजदंड ः श्री हनुमान

 रामनवमी - हनुमान जयंती विशेष  -
  रामराज्य की धर्मध्वजा का ध्वजदंड ः श्री हनुमान 
- लेखक  ः शिरीष सप्रे

प्रत्येक के जीवन में बलसंवर्धन का बडा महत्व है। शक्ति के न होने पर जीवन में असफलता ही हाथ आती है। मानव जीवन का साध्य ईश्वर की प्राप्ती को माना गया है और इस साध्य को प्राप्त को करने का साधन है शरीर। इसीलिए शरीर का बलसंपन्न होना अत्यंत आवश्यक है। भारतीय विचारकों के समूह में युवाओं के लिए आदर्श देवता के रुप में सर्वाधिक मान्यता हनुमानजी को है। क्योंकि, यही वह देवता है जिसमें युवकों की स्वभाव विशेषता से मेल खानेवाला गुण है। हनुमान का स्वरुप 'अतुलित बलधामा" का है। शक्ति,पराक्रम, कर्तृत्व का आदर्श हनुमान है। भगवान राम कहते हैं 'कपि से उरण हम नाही" और यह एक वास्तविकता है। सीताजी का शोध हो या समुद्र उडान। लंकादहन से लेकर समुद्र पर पुल का निर्माण हो या संजीवनी का लाना। सभी कार्यों में हनुमानजी के पराक्रम का कोई विकल्प नहीं।

अद्‌भुत शक्ति संपन्न, अद्वितीय पराक्रमी हनुमान की तन - मन के आरोग्य प्राप्ति, संवर्धन के लिए समर्थ रामदास ने भक्ति करने के लिए कहा है। समर्थ रामदास ही नहीं स्वामी विवेकानंद ने भी हनुमानजी के चरित्र को आदर्श माना था। स्वामीजी के अनुसार तो महावीर हनुमान का चरित्र सारे विश्व के लिए आदर्शरुप है। हनुमानजी जितेंद्रिय, बुद्धिमान हैं। गुरु आज्ञा, दास्यभाव, महाशक्ति का आदर्श हैं। सेवाव्रत का आदर्श हैं। इसलिए हनुमानजी पर श्रद्धा रखें। समर्थ के अनुसार अस्खलित ब्रह्मचर्य, एकनिष्ठ स्वामी सेवा और अद्‌भुत पराक्रम इन गुणों से युक्त मारुती के चरित्र को सामने रख लोगों को इष्ट कार्य की सिद्धी हेतू कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए।

हिंदुओं में चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम और सन्यास हैं इनमें से पहले आश्रम के लोगों के सामने समर्थ ने हनुमानजी का ध्येय ही रखा और दूसरे आश्रमवालों के लिए श्रीराम का। समर्थ का यह दृढ़ विश्वास था कि, अविवाहित लोग अस्खलित ब्रह्मचर्य रख और विवाहित लोक अव्यभिचारी एकपत्नीव्रत का पालन कर स्वधर्म स्थापना एवं स्वराज्य स्थापना के पवित्र कार्य के लिए प्रवृत्त होंगे तथा सभी संकटों का सामना कर कार्यसिद्ध होने तक बिना भयभीत हुए आनंद और उत्साह के साथ काम करेंगे। समर्थ रामदास का शक्तिस्त्रोत हर काल में मार्गदर्शक है।

पूरे देश में हनुमानजी के मंदिर विद्यमान हैं और उनमें उनके दो रुप नजर आते हैं। एक है, वीर मारुती का। संतप्त, गदाधारी, द्रोणगिरीधारी पराक्रमी, राक्षसमर्दक रुप। यही रुप युवाओं के सामने होना चाहिए। युवा ऐसा ही होना चाहिए अत्याचारों के विरुद्ध संतप्त होकर खडे होनेवाला। परंतु, यदि यह उद्रेक विवेकपूर्ण नहीं होगा तो 'स्वराज्य" में ही वे आतंकी, नक्सली की भूमिका स्वीकार लेंगे। केवल आवेश या जोश ही काम का नहीं होता वह द्वेष ही पैदा करता है। गुलामी के काल में भले ही वह काम आ जाए परंतु,  स्वातंत्र्यकाल में वह घातक होगा। तब वीर मारुती नहीं दास मारुती ही चाहिए होगा। रामराज्य आने तक वीर और आने के पश्चात दास ऐसे अद्‌भुत समन्वय का नाम है श्रीहनुमान। वीरत्व को दासत्व का जोड है इसलिए हनुमान युवाओं का देवता है और होना भी चाहिए क्योंकि, युवा भी इसी प्रकार के होने चाहिए तभी रामराज्य आ सकेगा।

रामनवमी और हनुमान जयंती का उत्सव पुराने और पौराणिक उत्सव थे परंतु, समर्थ रामदास ने उनमें नई शक्ति भर लोगों में आत्मविश्वास उत्पन्न किया। समर्थ रामदास के पिता सूर्योपासक थे। परंतु, समर्थ ने तत्कालीन लोगों को सूर्योपासना के लिए नहीं  अपितु बाल्यकाल में ही उडान भर सूर्य को निगलने को प्रवृत्त हुए रामदूत मारुती और कोदंडधारी श्रीराम की उपासना करने के लिए कहा। उत्सव के लिए हजारों लोग एकत्रित होते, उस समय श्रीराम और हनुमान चरित्र की महत्वपूर्ण बातें उनकी दृष्टि में ला उन्हें उनका यथाशक्ति अनुसरण करने का उपदेश देने का समर्थ का मुख्य उद्देश्य यही था।

कुछ आलोचकों का यह आक्षेप है कि, समर्थ ने पुरानी ही पौराणिक रामोपासना महाराष्ट्र में आरंभ की इसमें ऐसी कौनसी विशिष्टता है। उनका यह भी कहना है कि, ''तुलसीदासजी का राम और समर्थ का राम अलग था क्या?"" उत्तर यह है कि, तुलसीदासजी का राम और समर्थ का राम एक ही था और वह था वाल्मिकी रामायण का सुप्रसिद्ध महापराक्रमी, रक्षःकुलनिहंता, सुर-बंधविमोचक, कोदंडधारी एकवचनी श्रीराम। इसी प्रकार से मध्वाचार्यजी, रामानंदजी आदि का राम और समर्थ का राम भी एक  ही था। सभी साधुसंतों का राम एक ही है। तब आक्षेपक प्रश्न खडा करते हैं कि, रामोपासना में स्वतंत्रता देने का सामर्थ्य होता तो  उत्तर हिंदुस्थान में तुलसीदासजी की रामोपासना और दक्षिण हिंदुस्थान में मध्वाचार्यजी आदि संतों की रामोपासना को वही मधुर फल क्यों नहीं लगे जो समर्थ रामदास की रामोपासना को लगे। उत्तर बिल्कूल सीधा है विभिन्न महाविद्यालयों में पढ़ाया जानेवाला इतिहास एक ही होता है, परंतु इतिहास के तत्त्व पढ़ानेवाला शिक्षक (प्रोफेसर) जिस वृत्ती, संस्कृति का होता है उसी प्रकार का युवा विद्यार्थी के मानस पर इतिहास का परिणाम होता है।

तुलसीदासजी के रामायण में भी अनेक अलौलिक गुण हैं और उनका परिणाम भी उत्तर हिंदुस्थान में बहुत अच्छा हुआ है। उनके रामचरित्‌मानस ने उत्तर हिंदुस्थान में अप्रतिम कार्य किया है। गोस्वामी तुलसीदासजी की रामोपासना के कारण उत्तर हिंदुस्थान के करोडों लोगों को परधर्म से परावृत्त कर रामोपासना की ओर मोडा, यह कोई छोटा-मोटा काम नहीं। भगवान राम में अनेक उत्तम गुण थे। जिन गुणों पर विशेष बल देकर उत्सवचालक अनुकरण करने के लिए कहेंगे उन्हीं गुणों का अनुकरण करने की बहुजन समाज की प्रवृत्ति होगी।