Tuesday, 28 March 2017

बहुत प्राचीन है गन्ने का इतिहास

बहुत प्राचीन है गन्ने का इतिहास

गन्ने को ऊंख या ईख भी कहते हैं। ईख शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के इक्षु से हुई है। जो मनु के पुत्र महान सूर्यवंशी राजा इक्ष्वाकु (इच्छवाकु) के नाम से हुई है। 'अथर्ववेद" में इक्षु यानी गन्ने का उल्लेख मिलता है। अर्थात्‌ जिसकी मिठास का ज्ञान मात्र कुछ ही वर्षों पूर्व अन्य देशों के लोगों को हुआ उसका आनन्द हम कई हजारों वर्षों से उठा रहे हैं। संस्कृत में गन्ने के मीठे रस को शर्करा कहा गया है। शर्करा से शुगर हुआ और गन्ना अंग्रेजी में शुगरकेन कहलाया। शर्करा से ही वैज्ञानिक नाम सैकेरम उत्पन्न हुआ।

गन्ने से ही गुड बनता है जिसका स्वाद विलक्षण और महत्व पौराणिक एवं औषधीय है। गुड में कैल्शियम, फास्फोरस, वसा तथा प्रोटीन मिलता है। गुड रक्त शुद्धि के गुण से युक्त होकर इसके उपयोग से माताओं को दूध अधिक बनता है। ऋगवेद में गन्ने के साथ गुड का भी उल्लेख मिलता है। इसीसे ज्ञात होता है कि गन्ने का उत्पत्ति स्थान भारतवर्ष है। चरक संहिता में गन्ने के दो प्रकार बतलाए गए हैं। पतले को इक्षु तो मोटे को पौंड्रा। तेरहवीं शताब्दी के अरब यात्री इब्न बतूता ने भी अपने यात्रा वर्णन में गन्ने का उल्लेख किया है। 'आइने अकबरी" में गन्ने से चीनी बनाने की कला का वर्णन के साथ ही स्पिरिट बनाने की कला का भी वर्णन मिलता है। अब्दुल फैजी का कहना है, मोटे गन्ने को चूसा जाता था तो पतले से चीनी बनाई जाती थी। 

प्राचीन बौद्ध साहित्य में भी गन्ने और चीनी का उल्लेख प्रचुर मात्रा में मिलता है। बौद्धों ने इसकी मिठास से सम्मोहित होकर कई धार्मिक नीतिकथाएं इसीको लेकर गढ़ ली। शायद बौद्ध प्रचारक ही गन्ने और चीनी बनाने की कला को इंडोनेशिया और मलेशिया ले गए। हां चीन से अवश्य एक गन्ने की एक जाति हिंदुस्थान आई जिसे चीनिया नाम दिया गया। आज तो गन्ने की अनेक सुधारित-संकरित किस्में लगाई जाती हैं। इन संकरित किस्मों का ही चमत्कार है कि आज भारत गन्ने के उत्पादनकर्ताओं में अग्रणी है।

कहते हैं कि सबसे पहले चीनी बिहार में गंगा किनारे ईसा से लगभग 700 वर्ष पूर्व तैयार हुई जिसे चीन को निर्यात किया गया इसलिए इसका नाम चीनी पडा। 19वीं शताब्दी में इंग्लैंड की एकतिहाई चीनी की मांग की आपूर्ति भारत द्वारा ही की जाती थी। इसके पूर्व 17वीं शताब्दी में डच व्यापारी बंगाल से चीनी विदेशों को भेजा करते थे। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में चीनी उद्योग संकट में था निर्यात के लिए चीनी जावा से मंगाई जाती थी क्योंकि अधिकतर गन्ना गुड बनाने के काम आता था और गन्ने की पैदावर कम थी। ऐसे समय में पंडित मदनमोहन मालवीयजी ने चीनी उद्योग को बचाने के लिए आंदोलन चलाया था।

गन्ने की बेहतर किस्मों को विकसित करने के लिए 1912 में कोयम्बटूर में गन्ना प्रजनन केंद्र अस्तित्व में आया और सबसे पहले गन्ने के वर्गीकरण के जटिल कार्य को अंजाम दिया गया। यहां किए गए प्रयोगों ने क्रांति सी ला दी और चीनी उद्योग का नक्शा ही पलट गया। गन्ने का उत्पादन बढ़ाने में लखनऊ के भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान का भी बडा हाथ रहा जिन्होंने वैज्ञानिक तौरतरीके अपनाकर स्वस्थ बीज और गन्ने की फसल की देखरेख के क्षेत्र में कार्य किया।
ऐसे मिठास से भरे गन्ने में स्वास्थ्य को सुधारने के अनूठे गुणधर्म भी हैं। यह विटामिन, आयरन, मिनरल्स, प्रोटीन तथा ऐंटी ऑक्सीडेंट से भरपूर है। जो इस प्रकार से हैं - विटामिन ए, बी, सी, बी2, बी3, बी4, बी5, बी6, कैल्शियम, कोबाल्ट, क्रोमियम,  मैग्निशियम, फॉस्फोरस के साथ ही पोटेशिय एवं जिंक। इसकी प्राकृतिक शर्करा तत्काल स्फूर्ति प्रदान करती है। इसका रस शरीर में अल्कलाइन वातावरण तैयार करता है। पीलिया रोग में इसके रस का सेवन अत्यंत लाभकारी होता है जो लिवर के संक्रमण को दूर करता है। कब्जियत में आरामदायक है। मुंह की दुर्गंध से बचाता है। दांतो को सडन से बचाता है। इसके रस को अधिकतर नींबू मिलाकर स्वादिष्ट बनाकर पीते हैं जो किडनी और मूत्र रोगों के इंफेक्शन में लाभकारी है। यही लाभ नारियल पानी मिलाकर भी प्राप्त किया जा सकता है। इसमें उपस्थित एंटीऑक्सीडेंट्‌स शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। यह नाखुनों और त्वचा की चमक को  बढ़ाने के साथ रक्तसंचार को भी बढ़ाता है। इससे शरीर में पानी की कमी पूर्ति होती है और योग्य नमी बनी रहती है।

इस अत्यंत प्राचीन मिठास से भरे गुणी व बहुलाभकारी गन्ने को भारत से बाहर विदेशी आक्रमणकारी ले गए और दुनिया भर में फैलाया। ईसा से लगभग तीनसौ वर्ष पूर्व जब आक्रमणकारी सिकंदर भारत से वापिस गया तब लूट के साथ इस मीठे बांस यानी गन्ने को भी लेता गया। जो यूनान के लोगों के लिए एक नायाब तोहफा ही तो था। वे इसके शहद जैसे मीठे रस के कायल हो गए और वहीं से यह पश्चिमी देशों में फैला। 15वीं शताब्दी में कोलबंस जब दुनिया की खोज में निकला तब भारत आया था और इसके मीठे रस से अभिभूत हो इसे जिसे आज हम हैती कहते हैं वहां ले गया वहां से यह मैक्सिको पहुंचा।  

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