Saturday, 18 March 2017

अति प्राचीनकाल से देवताओं - मनुष्यों को प्रिय है घंटानाद

भारतीय संस्कृति में ओम्‌ को आदिनाद माना जाता है। नादब्रह्म का वह पहला हुंकार है। नादब्रह्म अब घंटानाद के रुप में हमारे कानों में निनाद करता है। प्रभातकाल में मंदिरों से उठनेवाली सुमधुर घंटा ध्वनि हिंदुओं के कानों के लिए सुपरिचित एवं अति प्रिय है। देवपूजन में घंटा या छोटी घंटी का नाद आवश्यक माना गया है। आज के इस भागदौड भरे जीवन में डिंग-डांग या टिं्रग-ट्रिंग के के अतिरिक्त मोबाईल के विभिन्न रिंगटोन के साथ भले ही हमारा अटूट संबंध बन सा गया है के मध्य मंदिरों की काकड-आरती की घनघनाहट अथवा घर के पूजाघर की घंटी की खनखनाहट आज भी हमारे मन को प्रसन्नता से सराबोर कर देती है। मंदिर में घंटानाद करना पुण्यप्रद माना जाता है और पुराणों में इसका माहात्म्य वर्णित है। घंटा सर्ववाद्यमय और देवताओं को प्रिय है।
घंटा धनवाद्य में माना गया है। इसके अनेक प्रकार हैं - कास्यताल (झाल), ताल (मजीरा), जयघंटिकास क्षुद्रघंट (पूजा की घंटी) और क्रम (लटकनेवाला घंट)। अपने अनेक देवताओं का एक आयुध घंटा भी है। अनेक कामनाओं की पूर्ति तथा अरिष्टों की निवृत्ति के लिए विविध मुहुर्तो पर मंदिरों में घंटा चढ़ाने का विधान है। पितृपूजन में भी घंटानाद की विधि है। घंटे के दो प्रकार और भी हैं - वज्रघंटा और गरुडघंटा। वज्रघंटे पर वज्राकृति मूठ रहती है। यह घंटा भौतिक और आध्यात्मिक विश्व की एकता का प्रतीक माना जाता है। गरुड आकार की मूठवाला घंटा सूर्य-अग्नि-विद्युत से रक्षा करता है यह माना जाता है। घंटानाद मंगलमय है। देवता के श्रीविग्रह के स्नान, धूपदान, दीपदान, नैवेद्य-निवेदन, आभूषण दान एवं आरती के समय भी घंटानाद करना चाहिए। पूजन के समय घंटी बजाने या घंटानाद से उत्तम फल की प्राप्ति होती है। यह सब हमारे पूर्वजों के अनुभवों और उनके द्वारा किए गए प्रयोगों का धार्मिक रुप है। घंटानाद वैज्ञानिकों के लिए एक शोध का विषय भी हो सकता है।
पूजन के अतिरिक्त हाथियों के गले में घंटा बांधने की प्रथा का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। रथ, छकडों, बैलों आदि के गले में घंटियां बांधने का विधान कौटिल्य ने किया था जिससे कि उनके चरने का स्थान ज्ञात हो सके और घंटियों की ध्वनि से भयभीत हो वन्य पशुओं से उनकी रक्षा हो सके। भारत की ही भांति यूरोप के देशों में भी घोडों व दूसरे पशुओं के गले में घंटियां बांधने की रीत थी जिससे कि उनके खो जाने पर उन्हें ढूंढ़ने में सरलता हो सके।
हिंदुओं के समान ही बौद्ध, जैन और ईसाई धर्म में भी घंटे का बडा महत्व है। बौद्धों में स्तूपघंटा पवित्र माना जाता है। जैनधर्म की अर्चना पद्धति में घंटा आवश्यक है। परंतु, मुस्लिम धर्म में भर घंटा निषिद्ध है। वाद्यवादन, गायन की शरीअत में मनाही है। यहूदी और पारसी धर्म में घंटे को कोई महत्व प्राप्त नहीं है। ईसाई प्राचीनकाल से घंटे को पवित्र मानते आए हैं। घंटा बनाते समय वे अनेक धार्मिक क्रियाएं करते थे। बन जाने पर घंटे का 'बपतिस्मा" और 'नामकरण" होता था। घंटे पर वे पवित्र मंत्र खुदवाते थे। उनका विश्वास था कि घंटे की ध्वनि से आंधी, बीमारी, अग्निभय दूर हो जाते हैं। पहले यह भी विश्वास किया जाता था कि घंटानाद से मृतक की देह पवित्र हो जाती है और पिशाचादि भाग जाते हैं।
ईसा का जन्म अथवा ईसा का पुनरुत्थान इन सृजन के त्यौहारों पर चर्चबेल ईसा के जन्म की शुभवार्ता बतलाती हैं। ईस्टर की रात्री की घंटा ईसा के पुनरुत्थान की गवाही देते हैं। यह दोनो आनंदोत्सव परंतु, वर्गीकरण भिन्न है। ईसा अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए, वह एक भीषण मृत्यु थी। उस दुख की स्मृति में गुडफ्रायडे से ईस्टर संडे तक चर्च के सभी घंटानाद मौन हो जाते हैं। परंतु, ईस्टर की पूर्व रात्री से प्रार्थना का आरंभ होता है जानबूझकर अंधेरा किया जाता है। ठीक 12 बजे दो दिन के मौन के बाद घंटानाद के सुस्वर कानों पर पडते हैं। मृत्यु के बाद नवजीवन का आनंद। ईस्टर पुननिर्माण का महोत्सव। नाताल-बडे दिन-ईसा का जन्मदिन का त्यौहार तो ईस्टर पुनर्जन्म का महोत्सव। गर्भ का संबंध नाल से तो ईसाइयों का संबंध घंटानाद से होता है। चर्च के विशाल घंटे को देखा और उसके नाद को हम सभी ने सुना भी होगा। चर्च में प्रार्थना समाप्त होने पर घंटा बजाया जाता है। जन्म, पादरी के सामने वचनों और अंगुठियों की अदला-बदली, किसी के मान-सम्मान के समय, युद्ध में जय-पराजय, विदेशी आक्रमण, आग या बाढ़ जैसी किसी प्राकृतिक आपदा की सूचना लोगों को देने के लिए चर्च के घंटे का उपयोग किए जाने रुढ़ि बडी प्राचीन है। इसीके साथ विडंबना यह भी है कि जिनके जन्म-विवाह की सूचना चर्च का घंटा देता है उन्हीं के अंतिम सांस लेने की सूचना देने का उत्तरदायित्व भी यही घंटा निभाहता है।
घंटा कब अस्तित्व में आया इस बारे में कोई निश्चित मत नहीं फिर भी तज्ञ लोगों के मत से घंटे का मूलस्थान एशिया ही है। कुछ विद्वानों के अनुसार यह प्रथा भारत से ही सर्वत्र फैली है। संभवतः दूर तक संदेश देने के लिए और संचार के उत्तम साधन के रुप में यह नाद उपयुक्त ठहरता है इसको ध्यान में लेकर मनुष्य ने घंटे का निर्माण किया होगा। भारत के अतिरिक्त चीन, जापान, म्यांमार, इजिप्त, यूनान, रोम, फ्रांस, रुस, इंग्लैंड आदि में घंटे का प्रयोग प्राचीनकाल से चला आ रहा है। देश विदेश में अनेक भीमकाय घंटे और उनके निर्माण संबंधी रोचक जानकारीयां हैं जिनका रसभरा वर्णन एक अलग लेख का विषय हो सकता है। 

No comments:

Post a Comment