Saturday, 4 March 2017

समर्थ रामदास का महाराष्ट्रधर्म

शिवकालीन महाराष्ट्र में एक महान संत हुए थे समर्थ रामदास। उन्होंने अपने विचार प्रखरतापूर्वक वर्तमान और भविष्य को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत किए थे और अपने उपदेशों से कर्तव्यमूढ़ महाराष्ट्र को कर्तव्य दक्ष किया। ग्रंथराज दासबोध में परमार्थ और व्यवहार, धर्मशास्त्र और राजनीतिशास्त्र का मधुर मिलन कर बहुजन समाज के अंतःकरण स्वराज्य स्थापना की ओर मोडे एवं महाराष्ट्र की जनता को धर्ममूलक विवेक-वैराग्य प्रधान प्रयत्नवाद सीखाया। यह उनका महान कार्य है। जब अन्य संत भक्ति एवं अहिंसा के मार्ग से चलने की सीख दे रहे थे ऐसे समय में समर्थ रामदास ने परिस्थितिनुसार किस प्रकार का व्यवहार करें की सीख दी। उनके विचार किस प्रकार के थे वह इस श्लोक से ज्ञात हो जाएगा -
मना सज्जना तू कडेनेच जावे। न होऊन कोणास दुखवावे।। कुणी दुष्ट अंगास लाविल हात। तया दाखवावा भुजंग प्रयात।। अर्थात्‌ - अपन किसी के आडे ना जाएं, किसी को कष्ट न दें, दुख ना पहुंचाएं। परंतु, अगर कोई दुष्ट हमारे आडे आता है, हम पर आक्रमण करता है तो, शांत न बैठते उसे उचित उत्तर देना चाहिए। बुरे प्रसंग में ठंडे दिमाग से आगे के कदम उठाना चाहिए।
शिवाजी महाराज ने तरुणाई में ही स्वराज्य स्थापना का कार्य किया था तभी समर्थ रामदास ने उन्हें 'राजधर्म और क्षात्रधर्म" के स्फुट प्रकरण में एकाध कुशल राजनीतिज्ञ, अनुभवी कूटनीतिज्ञ के समान स्वराज्य स्थापना के कार्य में उपयोगी पडनेवाला - 'अमर्याद फितेवेखोर। यांचा करावा संहार। युद्ध करावे खबरदार। लोक राजी राखावा।।" अर्थात्‌ ः अनगिनत गद्दार हैं उनका संहार करो। सावधानी से युद्ध करो और जनता को प्रसन्न रखो। इस प्रकार के राजनीतिपरक उपदेश दिए थे। 
शिवाजी महाराज को क्षात्रधर्म का अनुग्रह देने के पश्चात उनको दिए हुए उपदेश में उन्होंने 'मराठा तितुका मेळवावा" (मराठों को एकत्रित करो) का उपदेश दिया था। इस उपदेश का रहस्य यह है कि, मराठे मराठी राज्य के लिए और महाराष्ट्र धर्म के लिए राष्ट्र भावना से और धर्म के प्रति गर्व के भाव से लडें। 'मराठा तितुका मेळवावा" के साथ उन्होंने 'महाराष्ट्र धर्म वाढ़वावा" अर्थात्‌ महाराष्ट्र धर्म को बढ़ाओ के उपदेश का जोड लगाया। इसका कारण स्वराज्य और स्वधर्म युद्ध का जोड मिलकर बहुजन समाज इस युद्ध में सहभागी हों, यह है इस पर से समर्थ रामदास की दूरदर्शिता दिखलाई पडती है। समर्थ रामदास का ध्येय केवल भजनवृद्धि और धर्मस्थापना नहीं था और शिवाजी महाराज का ध्येय केवल म्लेच्छ संहार और स्वराज्य स्थापना ही नहीं था बल्कि धर्मस्थापना और स्वराज्य स्थापना यह एक ही समान ध्येय दोनो का था।
अधिकांश लोग यही समझते हैं कि 'महाराष्ट्र धर्म" शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग समर्थ रामदास ने ही किया है, परंतु यह सच नहीं है। 'महाराष्ट्र धर्म" शब्द का प्रयोग सबसे पहले सरस्वती गंगाधर ने अपने 'गुरु-चरित्र" नामक प्रसिद्ध ग्रंथ में समर्थ रामदास से भी 200 वर्ष पूर्व उपयोग में लाया था। यह ग्रंथ गुरुभक्तिपरक है। सरस्वती गंगाधर की कल्पनानुसार महाराष्ट्रधर्म यानी वेदप्रामाण्य और श्रुतिस्मृतियुक्त आचार प्रधान धर्म। ऐसा इसलिए क्योंकि, सरस्वती गंगाधर के समय बीदर में जो मुसलमान बादशाह था वह औरंगजेब जैसा कट्टर धर्मांध नहीं था और हिंदुओं से द्वेष करनेवाला भी नहीं था। वह श्रुतिस्मृति के अनुसार व्यवहार करनेवाली अपनी प्रजा को यंंत्रणाएं नहीं देता था बल्कि उसका स्वयं का झुकाव श्रुतिस्मृतिप्रणीत वर्णाश्रम धर्म की ओर था। इसलिए संभवतः  सरस्वती गंगाधर के मन में स्वराज्य स्थापना की कल्पना का उदय नहीं हुआ होगा।
उन्होंने महाराष्ट्र धर्म का प्रयोग इस प्रकार किया था - ''ऐसा राव असुता। महाराष्ट्र धर्म वर्तता।। आपला द्वेष तत्वता। न करील की जागां।। (अ. 50ः235) राजधर्म, क्षात्रधर्म, गुरुधर्म, और सेवाधर्म से जिसप्रकार धर्म का बोध होता है (धर्मशास्त्र का इतिहास के अनुसार कर्तव्य ही धर्म है) वैसे ही महाराष्ट्रधर्म से महाराष्ट्र के कर्तव्य का बोध होना स्वाभाविक है। इस प्रकार का अर्थ करने पर महाराष्ट्रधर्म का एक विशिष्ट अर्थ समर्थ के मन में था और महाराष्ट्र का कर्तव्य इस व्यापक अर्थ में उस विशिष्ट अर्थ का अंतर्भाव हो सकता है।
प्रसिद्ध इतिहासकार कै. राजवाडे के विचारानुसार ''श्रुतिस्मृतियुक्त धर्मस्थापनापूर्वक स्वराज्य स्थापना"" इस प्रकार का महाराष्ट्रधर्म समर्थ को अभिप्रेत था यह दिख पडता है। समर्थ ने 'महाराष्ट्रधर्म वाढ़वावा" (महाराष्ट्रधर्म बढ़ाओ) का उपदेश जिस समय छत्रपति शिवाजी को दिया था उस समय उनके मन में वही अर्थ था ऐसा उनके साहित्य में इस संबंध में किए गए विचारों पर से दिख पडता है।
सुप्रसिद्ध रियासतकार का मत भी कुछ इसी प्रकार का है। वे कहते हैं - ''समर्थ रामदास ने 'मराठा तेव्ढ़ा मेळवावा, महाराष्ट्रधर्म वाढ़वावा", का उपदेश दिया था यह प्रसिद्ध है। इस उपदेश पर से ही समर्थ रामदास की योग्यता समझ में आती है। समर्थ के उपदेश में महाराष्ट्रधर्म यानी प्राक्कालीन साधुसंतों द्वारा दिखलाया हुआ प्रकार तो है ही परंतु, उससे भी कुछ अधिक का समावेश उसमें होता था। नहीं तो, 'महाराष्ट्र" का योजन करने का कोई प्रयोजन ही नहीं था। इस शब्द में बहुत अर्थ भरा हुआ है। महाराष्ट्र की रचना, वहां के लोगों का साहस, मूलभूत स्वभाव-गुण विशेष आ गए और प्रयत्न करें तो उनका प्रकट होनेवाला सामर्थ्य आदि बातों का समर्थ रामदास के मानस का अर्थ उपर्युक्त शब्द में व्यक्त होता है।
पूर्व के साधुसंतों के उपदेशों की दिशा केवल वैराग्य की थी। स्वदेश और स्वराष्ट्र के संबंधों में लोगों के कर्तव्य के रुप में कुछ है और उन्हें यह समझा दिए जाना चाहिए यह बातें उन साधुओं के विचारों में नहीं थी। लोगों में एकता निर्मित कर स्वराज्य स्थापना  करें, स्वराज्य की स्थापना के बगैर स्वधर्मोन्नति होगी नहीं, धर्म और राष्ट्र का निकट संबंध है, यह समर्थ के उपदेशों का अर्थ था।  रामदास स्वदेश पर गर्व करनेवाले, दूरदर्शी, समाज और राष्ट्र की उन्नति कर इष्ट कार्य पूर्ण करने के विचारों में निमग्न थे यह दासबोध पर से दिख पडता है .... समर्थ अपनी यात्रा में स्वराज्य की इमारत का साहित्य एकत्रित कर रहे थे। कहां क्या है यह उन्होंने समझ लिया था। महाराष्ट्र के राजनैतिक आंदोलन के मुख्य-मुख्य स्थान, मुख्य-मुख्य घराने और उनकी शक्ति के विषय में गंभीर विचार तय करके उनके बारे में सूचना वह शिवाजी को दिया करते थे। वह वेष से भी और पेशे से भी साधू थे।"" (मराठी रियासत, पूर्वाध पृ. 104,5) उपर्युक्त पर से रियासतकार का भी मत समर्थ रामदास ने जो महाराष्ट्रधर्म महाराज और महाराष्ट्र को सीखाया उसमें स्वधर्म स्थापना और स्वराज्य स्थापना इन दोनो का ही अंतर्भाव होता है।
कै. इतिहासकार राजवाडे 'राधामाधवविलासचंपू" पुस्तक की प्रस्तावना में कहते हैं - ''समर्थ ने शिवाजी को सलाह दी कि, एकजात मराठे सरदार और सिपाही सेवा में रखें। यह इसलिए क्योंकि, स्वराज्य अपना है और उसके लिए जान की बाजी लगाकर भी महाराष्ट्रधर्म को टिकाए रखना है की बुद्धि रखने में प्रत्येक मराठे को गर्व महसूस हो। मराठों को एकत्रित करो और अपने महाराष्ट्र धर्म का संरक्षण-संवर्धन करो का उपदेश समर्थ ने शिवाजी और तत्कालीन मराठों को दिया। समर्थ ने राष्ट्रीयत्व और राष्ट्रभावना जिसे कहते हैं वह उत्पन्न की। कल्पक रामदास और कर्ता शिवाजी। इस महाराष्ट्रधर्म ऊर्फ राष्ट्रभावना के समानधर्म का अवतार मराठों में होने के कारण शिवाजी के पश्चात संभाजी और राजाराम के कार्यकाल में भी स्वामी न होते हुए भी मराठा सरदारों ने औरंगजेब की नाक में दम कर दिया था। यदि यह राष्ट्रभावना न होती तो शिवाजी की मृत्यु के पश्चात थोडे ही दिनों में छत्रपति का बनाया स्वराज्य नष्ट हो जाता।

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