Tuesday, 28 March 2017

बहुत प्राचीन है गन्ने का इतिहास

बहुत प्राचीन है गन्ने का इतिहास

गन्ने को ऊंख या ईख भी कहते हैं। ईख शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के इक्षु से हुई है। जो मनु के पुत्र महान सूर्यवंशी राजा इक्ष्वाकु (इच्छवाकु) के नाम से हुई है। 'अथर्ववेद" में इक्षु यानी गन्ने का उल्लेख मिलता है। अर्थात्‌ जिसकी मिठास का ज्ञान मात्र कुछ ही वर्षों पूर्व अन्य देशों के लोगों को हुआ उसका आनन्द हम कई हजारों वर्षों से उठा रहे हैं। संस्कृत में गन्ने के मीठे रस को शर्करा कहा गया है। शर्करा से शुगर हुआ और गन्ना अंग्रेजी में शुगरकेन कहलाया। शर्करा से ही वैज्ञानिक नाम सैकेरम उत्पन्न हुआ।

गन्ने से ही गुड बनता है जिसका स्वाद विलक्षण और महत्व पौराणिक एवं औषधीय है। गुड में कैल्शियम, फास्फोरस, वसा तथा प्रोटीन मिलता है। गुड रक्त शुद्धि के गुण से युक्त होकर इसके उपयोग से माताओं को दूध अधिक बनता है। ऋगवेद में गन्ने के साथ गुड का भी उल्लेख मिलता है। इसीसे ज्ञात होता है कि गन्ने का उत्पत्ति स्थान भारतवर्ष है। चरक संहिता में गन्ने के दो प्रकार बतलाए गए हैं। पतले को इक्षु तो मोटे को पौंड्रा। तेरहवीं शताब्दी के अरब यात्री इब्न बतूता ने भी अपने यात्रा वर्णन में गन्ने का उल्लेख किया है। 'आइने अकबरी" में गन्ने से चीनी बनाने की कला का वर्णन के साथ ही स्पिरिट बनाने की कला का भी वर्णन मिलता है। अब्दुल फैजी का कहना है, मोटे गन्ने को चूसा जाता था तो पतले से चीनी बनाई जाती थी। 

प्राचीन बौद्ध साहित्य में भी गन्ने और चीनी का उल्लेख प्रचुर मात्रा में मिलता है। बौद्धों ने इसकी मिठास से सम्मोहित होकर कई धार्मिक नीतिकथाएं इसीको लेकर गढ़ ली। शायद बौद्ध प्रचारक ही गन्ने और चीनी बनाने की कला को इंडोनेशिया और मलेशिया ले गए। हां चीन से अवश्य एक गन्ने की एक जाति हिंदुस्थान आई जिसे चीनिया नाम दिया गया। आज तो गन्ने की अनेक सुधारित-संकरित किस्में लगाई जाती हैं। इन संकरित किस्मों का ही चमत्कार है कि आज भारत गन्ने के उत्पादनकर्ताओं में अग्रणी है।

कहते हैं कि सबसे पहले चीनी बिहार में गंगा किनारे ईसा से लगभग 700 वर्ष पूर्व तैयार हुई जिसे चीन को निर्यात किया गया इसलिए इसका नाम चीनी पडा। 19वीं शताब्दी में इंग्लैंड की एकतिहाई चीनी की मांग की आपूर्ति भारत द्वारा ही की जाती थी। इसके पूर्व 17वीं शताब्दी में डच व्यापारी बंगाल से चीनी विदेशों को भेजा करते थे। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में चीनी उद्योग संकट में था निर्यात के लिए चीनी जावा से मंगाई जाती थी क्योंकि अधिकतर गन्ना गुड बनाने के काम आता था और गन्ने की पैदावर कम थी। ऐसे समय में पंडित मदनमोहन मालवीयजी ने चीनी उद्योग को बचाने के लिए आंदोलन चलाया था।

गन्ने की बेहतर किस्मों को विकसित करने के लिए 1912 में कोयम्बटूर में गन्ना प्रजनन केंद्र अस्तित्व में आया और सबसे पहले गन्ने के वर्गीकरण के जटिल कार्य को अंजाम दिया गया। यहां किए गए प्रयोगों ने क्रांति सी ला दी और चीनी उद्योग का नक्शा ही पलट गया। गन्ने का उत्पादन बढ़ाने में लखनऊ के भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान का भी बडा हाथ रहा जिन्होंने वैज्ञानिक तौरतरीके अपनाकर स्वस्थ बीज और गन्ने की फसल की देखरेख के क्षेत्र में कार्य किया।
ऐसे मिठास से भरे गन्ने में स्वास्थ्य को सुधारने के अनूठे गुणधर्म भी हैं। यह विटामिन, आयरन, मिनरल्स, प्रोटीन तथा ऐंटी ऑक्सीडेंट से भरपूर है। जो इस प्रकार से हैं - विटामिन ए, बी, सी, बी2, बी3, बी4, बी5, बी6, कैल्शियम, कोबाल्ट, क्रोमियम,  मैग्निशियम, फॉस्फोरस के साथ ही पोटेशिय एवं जिंक। इसकी प्राकृतिक शर्करा तत्काल स्फूर्ति प्रदान करती है। इसका रस शरीर में अल्कलाइन वातावरण तैयार करता है। पीलिया रोग में इसके रस का सेवन अत्यंत लाभकारी होता है जो लिवर के संक्रमण को दूर करता है। कब्जियत में आरामदायक है। मुंह की दुर्गंध से बचाता है। दांतो को सडन से बचाता है। इसके रस को अधिकतर नींबू मिलाकर स्वादिष्ट बनाकर पीते हैं जो किडनी और मूत्र रोगों के इंफेक्शन में लाभकारी है। यही लाभ नारियल पानी मिलाकर भी प्राप्त किया जा सकता है। इसमें उपस्थित एंटीऑक्सीडेंट्‌स शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। यह नाखुनों और त्वचा की चमक को  बढ़ाने के साथ रक्तसंचार को भी बढ़ाता है। इससे शरीर में पानी की कमी पूर्ति होती है और योग्य नमी बनी रहती है।

इस अत्यंत प्राचीन मिठास से भरे गुणी व बहुलाभकारी गन्ने को भारत से बाहर विदेशी आक्रमणकारी ले गए और दुनिया भर में फैलाया। ईसा से लगभग तीनसौ वर्ष पूर्व जब आक्रमणकारी सिकंदर भारत से वापिस गया तब लूट के साथ इस मीठे बांस यानी गन्ने को भी लेता गया। जो यूनान के लोगों के लिए एक नायाब तोहफा ही तो था। वे इसके शहद जैसे मीठे रस के कायल हो गए और वहीं से यह पश्चिमी देशों में फैला। 15वीं शताब्दी में कोलबंस जब दुनिया की खोज में निकला तब भारत आया था और इसके मीठे रस से अभिभूत हो इसे जिसे आज हम हैती कहते हैं वहां ले गया वहां से यह मैक्सिको पहुंचा।  

Saturday, 25 March 2017

arpita@shirishsapre.com

Marketing traditionally can be defined as activities which are associated with selling of products or service. But now in recent years it is just not the activity related to buying and selling department of the company, rather now it is playing a major role in building good and strong customer relationship for the producer or seller. Marketing strategy includes various promotional activities which gives advantages in the selling of the services or products. Some of the promotional strategies includes advertisements, teasers, video clips, door to door selling, surveying etc. In this same genre one more strategy is exponentially growing which is termed as Cyber Marketing. A new trend of 21st century or rather internet century which is giving an outstanding results in the field of marketing.

Some 10-15 years ago cyber marketing technique started by static websites. The producer developed a website that wasn’t interactive, it just used to display the information and people accessed only to seek information about the company or the products. Gradually dynamic websites were developed which included some interaction on it. Like enquiry forms were generated, feedback, ratings, suggestion forms were included. This helped the companies to interact more with consumers and also to build a positive relation with them. As any consumer which was unhappy or happy can share the feelings with the service provider or the producer. This strategy increased the faith and trust percentage of the consumer towards the producer.

The next step gave birth to ecommerce. Apart from ecommerce various other techniques were also used in cyber marketing like online advertising, social media, email marketing, Search Engine Optimization etc.

Ecommerce: Online shopping was introduce in which consumers can purchase the products online without moving out of their areas. The services are day by day getting easy to access and are getting transparent too. Very small percentage of fraud cases have been recorded which will still reduce in coming years.

Online advertising: These days every house is equipped with either a smart phone or a desktop/laptop. It is the easiest and economic way to reach every home. Youngsters are more and more attracted with such technique.

Social Media: This is the most effective way to market the product. As people are connected with each other through social media. It is an effective way to encourage and attract the consumers to visit your websites. Social commerce is an effective tool for it, which directs a person to the product website.

Email Marketing: This is a common method used by almost every seller. It is very cost effective and economical. A bunch of email ids are needed for it which we can get very easily through various sources. Database has to be maintained for these email id’s and once collated can be used to shoot mails individually and regularly. Almost everyone today access email service.

Search Engine Optimization: Which is abbreviated as SEO, it is a technique to increase web count for sites. Through this techniques links are built by optimizing keywords, so that search engine can direct a good amount of traffic to the websites. But a problem which arises in using this technique is that it directs all kinds of traffic to website which can include low as well high quality traffic. In case of low quality traffic it becomes burden for the owner as in this race theirs a risk of ignoring high quality traffic.

Some of the features which are helpful in Cyber marketing can be:

Developing websites:

    Which are easy to remember and access
    Which includes attractive and meaningful content
    Which should not be overloaded with data which makes the site bulky and slow
    Which should not be complicated and confusing, having excessive links and sub-links

Targeting Traffic:

Use various methods like SEO to target the audience. Make sure to target the correct set of audience that is high quality audience to visit your page.

Converting audience to customers:

This should be the prime goal of the cyber marketing which can be done by developing attractive features of the product as well as making attractive visuals for it. The website should be presentable which should also include some offers and discounts. Moreover website should be visitor friendly. Process should have minimum steps so that customers can easily order through these websites.

Many websites have been developed for comparing products where you can find different products with different options and you can easily compare them. Such sites also includes rating for the product, testimonials from the customers, feedbacks, suggestions etc. This definitely helps the customers in making up of mind for buying any particular product of his/her choice.

Cyber Marketing is the strategy to be followed in this era, which is growing exponentially and is expected to grow more with an emergence of newer technologies.

- Arpita K

Human invention from Nature’s creation - the Vertical Garden

     November 2016, location Delhi, after heavy smog condition which prevailed for 5-6 days in the city, it was considered to be an alert alarming bell. Problems caused by ignorance, unresponsiveness by the people and administration resulted in polluted air and polluted environment of the city. It’s high time that people should step up along the way towards reducing pollution level. According to World Health Organisation WHO’s last year report half of the world’s 20 most populated cities are in India. People should turn to become more responsible, more nature lover, more Eco-friendly. Nature can destroy and its nature only which can save from destruction. The only solution to problem of pollution, climate change and global warming is, to plant more and more trees. Planting trees and saving trees has become a big task especially in metro cities. Big trees and plants can’t be grown on city paths, streets, flyovers etc. As a result we can only see concrete jungle everywhere.
     Nature lovers still come out with an idea of having vertical garden. Due to reduction in land spaces in the city, vertical garden can be a very intelligent step. We all have studied different types of plants in our junior classes, we know about climbing plants such as money plant. Also we have seen plants growing on mountain rocks, between pebbles. So we can say that these vertical garden is no new concept, it’s already a nature’s gift just we have to do justice with it. Apart from climbing plants like money plant, grapevines, cucumber etc there are several other plants which come in the category of vertical garden. These may or may not be climbers.
    Mr. Patrick Blanc, a botanist by profession is believed to be inventor of the vertical garden, while some say it was professor Stanley Hart who invented this concept. Blanc’s first working project was in 1988 at the museum of science and industry in Paris.
     Vertical garden system allows growing flowers, vegetables, herbs and plants on vertical elevation. It is very useful when ground space or horizontal space is limited. These vertical systems comes in various forms, it can be 2 or 3 tier metallic stands, hung on railings or mounted on walls.

     In these gardens different modular panels are fitted which comprises of irrigation system, a medium for growing and plants. Such system is very useful especially in cities, which has less landscape area for planting. Some of the benefits of vertical gardening are:
  1. Covers up dirty walls and gives a beautiful view.
  2. These plant arrangement and soil have a sound absorption feature, which helps in decreasing voice level.
  3. During rainy season outdoor vertical gardens absorbs water thus help in conserving rain water.
  4. Reduces CO2 level and increases O2 level (normal characteristic of plant), thus help in reducing global warming.
  5. It helps in keeping the room temperature moderate according to the season, thus act as insulation for the building.
  6. Plants purify air thus improves air quality of the building.
  7. Gives healthy habitat to butterflies, birds and insects.
  8. Gives a strong message to society, of being a green building, going eco-friendly.
     Plants which are grown in vertical gardens are: one of the most popular climbers which is known as money plant. Apart from money plant there are several other plants which can be used in indoor and outdoor gardens which includes wedding vine, peace lilies, wax flower, fern etc. Vegetables and spices like tomato, cloves, tulsi, aloevera, cardamom etc. which grow in less space can also be planted.

     Some of the projects of vertical garden are:
Buildings and houses in Delhi are having vertical garden system. Our Environment Ministry building (when seen from inside) have climbers spread all over the building. Some of the streets in Delhi have these vertical metallic panels erected by the side of the road having plants in it. Bengaluru also gets its first vertical garden erected under a flyover.  This step has been taken to curb the pollution level in Bengaluru. This garden has 3500 saplings of 10 different species been planted, having an automated drip irrigation system.  Asia’s very first vertical forest is being built in China’s concrete forest. Nanjing towers will plant 3000 plants comprising trees and shrubs.  This garden will produce nearly 60kg oxygen every day.
Bengaluru Vertical Garden on flyover pillar
     
     Nature has given it’s best to us, human being should act responsibly, we should preserve, conserve and grow more and more trees thus helping in controlling some percentage of pollution in cities.

- Arpita K

Friday, 24 March 2017

आधुनिक महाराष्ट्र के जनक - प्रबोधन पुरुष आचार्य बाळशास्त्री जांभेकर (1812-46)

आधुनिक महाराष्ट्र के जनक -
 प्रबोधन पुरुष आचार्य बाळशास्त्री जांभेकर (1812-46)

अंग्रेजों के प्रभाव के कालखंड में अनेक क्रांतिकारी बदलाव भारतीय समाज के सामाजिक, राजनैतिक और शैक्षणिक क्षेत्र में घटित हुए और अनेक विचारकों - नररत्नों का जन्म भी हुआ। उन्हीं महान नररत्नों में से एक थे बाळशास्त्री जांभेकर जिन्हें आचार्य अत्रे ने 'राष्ट्र जागृति के अग्रदूत" की उपाधि दी थी। वे न केवल आंग्लभाषा के आद्य पत्रकार थे वरन्‌ उन्होंने पश्चिम भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में प्रबोधन आंदोलन की नींव रखी। कई क्षेत्रों में भी वे आद्य रहे जैसेकि, विज्ञान मासिककार, आद्य इतिहास संशोधक, पहले भारतीय प्रोफेसर, क्रमिक पुस्तककर्ता, आदि। 

इनके अलावा लोकमान्य तिलक, आचार्य अत्रे, प्रबोधनकार ठाकरे, ये वो चमकते सितारे हैं जिन्होंने अपने प्रखर, स्पष्ट और ठोस विचारों द्वारा जो सत्य है वह सामने रख आदर्श पत्रकारिता के उदाहरण स्थापित कर 19वी शताब्दी में मराठी समाज मानस के निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया। आचार्य बाळशास्त्री का जन्म कोंकण के पोंभुर्ले नामक स्थान पर हुआ था। बाल्यकाल से एकपाठी होने के साथ ही उनकी धारणा शक्ति अपार होकर लोकोत्तर बुद्धिमत्ता और अभ्यासु प्रौढ़वृत्ती देखकर उनके अध्यापक उन्हें चकित हो प्रेमपूर्वक बालबृहस्पति कहा करते थे।

इस असामान्य बालक के ललाट पर लिखा अपूर्व भाग्योदय उन्हें अंग्रेजी सीखने के लिए संभवतः 1826 में मुंबई ले आया और माध्यम बने उस जमाने में अनेक होनहार लडकों को प्रोत्साहन देकर आगे लानेवाले सदाशिव काशीनाथ ऊर्फ बापू छत्रे। जो उनके पिता गंगाधर शास्त्री का बडा सम्मान करते थे। बाळ जांभेकर दिन में अंग्रेजी पढ़ते और शाम को बापूशास्त्री शुक्ल के यहां कौमुदी पढ़ने के लिए जाते। शास्त्री परिवार के होने कारण पिता के सान्निध्य में घर पर ही वेदपठन, संस्कृत के स्त्रोत पाठ, लघु कौमुदी, पंचमहाकाव्य, रामदास, तुकाराम आदि का अध्ययन 12 वर्ष की आयु तक कर लिया था।

20 फरवरी 1830 को उन्होंने 'बॉम्बे नेटिव्ह एज्युकेशन सोसायटी" के नेटिव्ह सेक्रटरी पद के लिए अर्जी दी थी। अल्पायु होने के कारण पहले उन्हें 'डिप्टी नेटीव्ह सेक्रटरी" और दो वर्ष बाद 1832 में 100 रुपये वेतन पर नेटीव्ह सेक्रेटरी नियुक्त किया गया। विभिन्न भाषाओं में प्रवीणता के कारण 'रॉयल एशियाटिक सोसायटी" को पौरस्य भाषांतर समिति का नेटीव्ह सेक्रेटरी 1831 में चुना गया। स्वदेश पर गर्व की भावना के कारण ज्ञानप्रसार और जनसुधार के एक प्रमुख साधन के रुप में 'दर्पण" नामका वृतपत्र निकालने का संकल्प किया। वैसे इसके 10 वर्ष पूर्व एक पारसी व्यक्ति फर्दुनजी मर्जबानजी ने 'मुंबई समाचार" नामका आद्य गुजराती साप्ताहिक शुरु किया था। परंतु, 'दर्पण" केवल मराठी आद्य वर्तमान पत्र न होकर एतद्देशीय व्यक्ति द्वारा पश्चिम भारत में शुरु किया गया आद्य अंग्रेजी वर्तमान पत्र भी यही था। 'दर्पण" का पहला अंक 6 जनवरी 1832 को प्रकाशित हुआ था। इस पहले अंक में दर्पण का पहला 'प्रॉस्पेक्टस" अथवा प्रस्ताव पुनर्मुद्रित किया गया था जो बडा ही उद्‌बोधक था। पहले 4 महिने पाक्षिक और बाद में यह साप्ताहिक हो गया। इस समाचार पत्र का शुल्क 6 रुपये त्रैमासिक था। सालभर में इसके ग्राहकों की संख्या 300 तक पहुंच गई। उस जमाने के हिसाब से यह प्रशंसनीय ही है।

बाळशास्त्री अप्रतिम हरफन मौला विद्वान थे। वे महाविद्यालय में वाड्‌मय और विज्ञान सीखाते थे इसके साथ ही विधिन विषयों को  पढ़ाने का हुनर किसी यूरोपीयन से कम न था, पाश्चात्य गणित, ज्योतिषादि में भी वे प्रवीण थे। उनके शिष्यों में भारत की राजनीति के पितामह कहलाने वाले दादाभाई नौरोजी भी शामिल थे।

16 वर्ष की आयु से ही ग्रंथ रचना का आरंभ कर दिया और केवल 34 वर्ष की अल्प आयु मर्यादा में विभिन्न सार्वजनिक कार्यों का उत्तरदायित्व निभाते हुए आधुनिक मराठी गद्य रचना के प्रारंभकाल में ग्रंथरचना को जो व्यापक और प्रचंड उपक्रम किया वह उनकी कार्यकुशल प्रतिभा और जनोपकारी जीवननिष्ठा का परिचय देता है। उन्हें 13 भाषाओं का ज्ञान था। फ्रेंच भाषा की निपुणता के कारण फ्रांस के राजा ने उनको सम्मानित किया था। लंदन की 'जिऑग्राफीकल सोसायटी" की मुंबई शाखा के 1840 में विधिवत सदस्य चुने गए थे। 'भारतीय शिलालेख और ताम्रपट" के संबंध में अनेक शोध लिखे। उनमें से 8 'रॉयल एशियाटिक सोसायटी मुंबई" में छपे थे। उस जमाने में इस प्रकार के शोध निबंध लिखने और प्रकाशित करनेवाले वे पहले एतद्देशीय विद्वान थे। इस आधार पर उन्हें 'भारतीय इतिहास-संशोधन का जनक" संबोधित करना उचित ही होगा। 

बडे ही निस्वार्थभाव से आरंभ किया गया 'दर्पण" अंततः 1 जुलाई 1840 में बंद करना पडा। परंतु, इसके पूर्व ही बाळशास्त्री ने 'दिग्दर्शन" नामका मराठी मासिक निकालने का संकल्प किया जो पूरे पश्चिम भारत में इस प्रकार का पहला उपक्रम था। यह मासिक एक प्रकार से मराठी भाषा में सभी प्रकार के विषयों का संग्रह था। इसमें रसायन शास्त्र, भूगोल, इतिहास, पदार्थ विज्ञान, साधारण विद्या, आदि के संबंध में थोडी-थोडी जानकारी दी जाती थी। यह मासिक जनशिक्षा की दृष्टि से बडा उपयोगी तय हुआ था। लेकिन 'दर्पण" की ही तरह यह भी अंततः बंद हो गया।

'दर्पण" खंडित होने के पश्चात बाळशास्त्री के प्रोत्साहन से ही उनके शिष्य और युवा मित्र गोविंद विट्ठल कुंटे ने 24 अक्टूबर 1841 से 'प्रभाकर" नामका पूरी तरह से मराठी साप्ताहिक आरंभ किया और साथ ही एक छापखाना भी प्रारंभ किया। इसी छापखाने से 'हिंदूधर्म रक्षणार्थ" 'उपदेश चंद्रिका" मासिक भी छपने लगा। बाळशास्त्री के मार्गदर्शन में सुंदरपाठ भेदयुक्त 'ज्ञानेश्वरी" का आद्य प्रकाशन भी यहीं हुआ (1845 में)। उनकी इस क्षेत्र में गतिविधियों को देखते हुए उन्हें 'मराठी वृत्तपत्र सृष्टि का जनक" की पदवी दी जा सकती है कितना यथार्थ है यह ज्ञात होता है।

बाळशास्त्री की सर्व कार्यकुशल बुद्धिमत्ता, बहुमुखी प्रतिभा और स्वदेशोन्नति के विषय में अप्रतिहत चिंता सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में व्यक्त हुई है। उस जमाने में बहुजन समाज में धार्मिक अंधश्रद्धा और सामाजिक विपरितता उपस्थित थी परंतु वे उनसे दूर थे। उनका मानना था कि हिंदूधर्म शास्त्र की उदार परंपरानुसार ही समाज में व्याप्त धार्मिक और सामाजिक दोष दूर कर टिकाऊ सुधार क्रमशः अपने ही पिंड से विकसित होना चाहिए। वे स्वयं धार्मिक दृष्टि से आस्तिक और सदाचार संपन्न हिंदूधर्म पर गर्व करनेवाले होकर सामाजिक सुधारों के प्रति प्रगमनशील व्यवहारवादी थे।

ईसाई धर्मप्रचारकों को यहां के लोगों पर द्वेषबुद्धि और स्वार्थपूर्वक किए गए आघातों से वे सम्मत नहीं थे और जब हिंदुओं को स्वधर्म भ्रष्ट करने के उपक्रम जानबूझकर किए गए तो उन्होंने उनका जमकर विरोध किया। इस संबंध में श्रीपत शेषाद्री की शुद्धि प्रकरण पूरे देश में चर्चित हुआ था।
सर नारायणराव चंदावरकर ने 1840 में गौरवोद्गार निकालते हुए उन्हें आद्य समाजसुधारक कहा था। देशोन्नति के लिए कई प्रयत्न उन्होंने स्वयंस्फूर्ति की भावना से किए थे। जिस जमाने में मुंबई पुणे जैसे क्षेत्रों में तक बहुजन समाज निरक्षर, अज्ञ और पिछडा हुआ था प्रातिनिधिक राज्यपद्धति के बीज पडे भी नहीं थे, ऐसे हालात में उन्होंने पूरा बल शैक्षणिक कार्य के अतिरिक्त वृत्तपत्र और व्याख्यानों द्वारा जनजागृति पर दिया। इसी दृष्टि से साप्ताहिक 'दर्पण" और 'दिग्दर्शन" मासिक प्रारंभ किए। एक बार तो एक यूरोपीयन ने उन पर मानहानि का दावा भी लगा दिया था। नियतकालिकों के अतिरिक्त सार्वजनिक ग्रंथवाचनालयों का महत्व भी बाळशास्त्री अच्छी तरह से समझते थे इसलिए उन्होंने कुछ लोगों को प्रोत्साहित कर 1845 में 'बॉम्बे नेटिव्ह जनरल लायब्रेरी' की स्थापना करवाई। यह संस्था लगभग 75 वर्षों तक चली तत्पश्चात इसका रुपांतरण 'पीपुल्स फ्रीरीडिंग" नामक एक मुक्त द्वार जनवाचनालय में हो गया। बाळशास्त्री का एक और जनशिक्षा का प्रयत्न यानी 'नेटिव्ह इम्प्रूव्हमूेंट सोसायटी" की स्थापना। इस एतद्देशीय सुधार मंडल के वे स्वयं अध्यक्ष थे और उनके द्वारा आयोजित सभाओं में तत्कालीन शिक्षित युवा सार्वजनिक हितों के विविध प्रश्नों पर निबंध पढ़कर चर्चा करते थे। उनके परमविख्यात शिष्य डॉ. दादाभाई नौरोजी ने उनका स्मरण करते हुए लिखा था कि, ''उनके कर्तत्व संपन्न, सौजन्यपूर्ण-स्फूर्तिदायक नेतृत्व द्वारा हम विद्यार्थियों का बडा कल्याण हुआ है।""

19वी शताब्दी के तृतिय चरण में शिक्षा, साहित्य, भारतीय इतिहास संशोधन और सार्वजनिक कार्यों के विविध क्षेत्रों में केवल मुंबई ही नहीं प्रत्युत महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक प्रांतों में जिन्होंने नाम कमाया उनमें से अधिकांश पर उनकी शिक्षा और आदर्श का परिणाम हुआ। यहां एक बात का और उल्लेख करना आवश्यक है कि न केवल युवा पीढ़ि बल्कि मुंबई के हिंदू-पारसी, मुस्लिम समाज के नेताओं के भी प्रेम और आदर के पात्र वे थे और सभी विभिन्न सार्वजनिक कार्यों में उनके मार्गदर्शन को स्वीकारते थे। इस पर से यह कहा जा सकता है कि, आचार्य बाळशास्त्री जांभेकर 'पश्चिम भारत के नवयुग प्रवर्तक" और 'आधुनिक महाराष्ट्र के जनक" के रुप में संबोधित किए जाने के पात्र हैं। 

Saturday, 18 March 2017

अति प्राचीनकाल से देवताओं - मनुष्यों को प्रिय है घंटानाद

भारतीय संस्कृति में ओम्‌ को आदिनाद माना जाता है। नादब्रह्म का वह पहला हुंकार है। नादब्रह्म अब घंटानाद के रुप में हमारे कानों में निनाद करता है। प्रभातकाल में मंदिरों से उठनेवाली सुमधुर घंटा ध्वनि हिंदुओं के कानों के लिए सुपरिचित एवं अति प्रिय है। देवपूजन में घंटा या छोटी घंटी का नाद आवश्यक माना गया है। आज के इस भागदौड भरे जीवन में डिंग-डांग या टिं्रग-ट्रिंग के के अतिरिक्त मोबाईल के विभिन्न रिंगटोन के साथ भले ही हमारा अटूट संबंध बन सा गया है के मध्य मंदिरों की काकड-आरती की घनघनाहट अथवा घर के पूजाघर की घंटी की खनखनाहट आज भी हमारे मन को प्रसन्नता से सराबोर कर देती है। मंदिर में घंटानाद करना पुण्यप्रद माना जाता है और पुराणों में इसका माहात्म्य वर्णित है। घंटा सर्ववाद्यमय और देवताओं को प्रिय है।
घंटा धनवाद्य में माना गया है। इसके अनेक प्रकार हैं - कास्यताल (झाल), ताल (मजीरा), जयघंटिकास क्षुद्रघंट (पूजा की घंटी) और क्रम (लटकनेवाला घंट)। अपने अनेक देवताओं का एक आयुध घंटा भी है। अनेक कामनाओं की पूर्ति तथा अरिष्टों की निवृत्ति के लिए विविध मुहुर्तो पर मंदिरों में घंटा चढ़ाने का विधान है। पितृपूजन में भी घंटानाद की विधि है। घंटे के दो प्रकार और भी हैं - वज्रघंटा और गरुडघंटा। वज्रघंटे पर वज्राकृति मूठ रहती है। यह घंटा भौतिक और आध्यात्मिक विश्व की एकता का प्रतीक माना जाता है। गरुड आकार की मूठवाला घंटा सूर्य-अग्नि-विद्युत से रक्षा करता है यह माना जाता है। घंटानाद मंगलमय है। देवता के श्रीविग्रह के स्नान, धूपदान, दीपदान, नैवेद्य-निवेदन, आभूषण दान एवं आरती के समय भी घंटानाद करना चाहिए। पूजन के समय घंटी बजाने या घंटानाद से उत्तम फल की प्राप्ति होती है। यह सब हमारे पूर्वजों के अनुभवों और उनके द्वारा किए गए प्रयोगों का धार्मिक रुप है। घंटानाद वैज्ञानिकों के लिए एक शोध का विषय भी हो सकता है।
पूजन के अतिरिक्त हाथियों के गले में घंटा बांधने की प्रथा का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। रथ, छकडों, बैलों आदि के गले में घंटियां बांधने का विधान कौटिल्य ने किया था जिससे कि उनके चरने का स्थान ज्ञात हो सके और घंटियों की ध्वनि से भयभीत हो वन्य पशुओं से उनकी रक्षा हो सके। भारत की ही भांति यूरोप के देशों में भी घोडों व दूसरे पशुओं के गले में घंटियां बांधने की रीत थी जिससे कि उनके खो जाने पर उन्हें ढूंढ़ने में सरलता हो सके।
हिंदुओं के समान ही बौद्ध, जैन और ईसाई धर्म में भी घंटे का बडा महत्व है। बौद्धों में स्तूपघंटा पवित्र माना जाता है। जैनधर्म की अर्चना पद्धति में घंटा आवश्यक है। परंतु, मुस्लिम धर्म में भर घंटा निषिद्ध है। वाद्यवादन, गायन की शरीअत में मनाही है। यहूदी और पारसी धर्म में घंटे को कोई महत्व प्राप्त नहीं है। ईसाई प्राचीनकाल से घंटे को पवित्र मानते आए हैं। घंटा बनाते समय वे अनेक धार्मिक क्रियाएं करते थे। बन जाने पर घंटे का 'बपतिस्मा" और 'नामकरण" होता था। घंटे पर वे पवित्र मंत्र खुदवाते थे। उनका विश्वास था कि घंटे की ध्वनि से आंधी, बीमारी, अग्निभय दूर हो जाते हैं। पहले यह भी विश्वास किया जाता था कि घंटानाद से मृतक की देह पवित्र हो जाती है और पिशाचादि भाग जाते हैं।
ईसा का जन्म अथवा ईसा का पुनरुत्थान इन सृजन के त्यौहारों पर चर्चबेल ईसा के जन्म की शुभवार्ता बतलाती हैं। ईस्टर की रात्री की घंटा ईसा के पुनरुत्थान की गवाही देते हैं। यह दोनो आनंदोत्सव परंतु, वर्गीकरण भिन्न है। ईसा अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए, वह एक भीषण मृत्यु थी। उस दुख की स्मृति में गुडफ्रायडे से ईस्टर संडे तक चर्च के सभी घंटानाद मौन हो जाते हैं। परंतु, ईस्टर की पूर्व रात्री से प्रार्थना का आरंभ होता है जानबूझकर अंधेरा किया जाता है। ठीक 12 बजे दो दिन के मौन के बाद घंटानाद के सुस्वर कानों पर पडते हैं। मृत्यु के बाद नवजीवन का आनंद। ईस्टर पुननिर्माण का महोत्सव। नाताल-बडे दिन-ईसा का जन्मदिन का त्यौहार तो ईस्टर पुनर्जन्म का महोत्सव। गर्भ का संबंध नाल से तो ईसाइयों का संबंध घंटानाद से होता है। चर्च के विशाल घंटे को देखा और उसके नाद को हम सभी ने सुना भी होगा। चर्च में प्रार्थना समाप्त होने पर घंटा बजाया जाता है। जन्म, पादरी के सामने वचनों और अंगुठियों की अदला-बदली, किसी के मान-सम्मान के समय, युद्ध में जय-पराजय, विदेशी आक्रमण, आग या बाढ़ जैसी किसी प्राकृतिक आपदा की सूचना लोगों को देने के लिए चर्च के घंटे का उपयोग किए जाने रुढ़ि बडी प्राचीन है। इसीके साथ विडंबना यह भी है कि जिनके जन्म-विवाह की सूचना चर्च का घंटा देता है उन्हीं के अंतिम सांस लेने की सूचना देने का उत्तरदायित्व भी यही घंटा निभाहता है।
घंटा कब अस्तित्व में आया इस बारे में कोई निश्चित मत नहीं फिर भी तज्ञ लोगों के मत से घंटे का मूलस्थान एशिया ही है। कुछ विद्वानों के अनुसार यह प्रथा भारत से ही सर्वत्र फैली है। संभवतः दूर तक संदेश देने के लिए और संचार के उत्तम साधन के रुप में यह नाद उपयुक्त ठहरता है इसको ध्यान में लेकर मनुष्य ने घंटे का निर्माण किया होगा। भारत के अतिरिक्त चीन, जापान, म्यांमार, इजिप्त, यूनान, रोम, फ्रांस, रुस, इंग्लैंड आदि में घंटे का प्रयोग प्राचीनकाल से चला आ रहा है। देश विदेश में अनेक भीमकाय घंटे और उनके निर्माण संबंधी रोचक जानकारीयां हैं जिनका रसभरा वर्णन एक अलग लेख का विषय हो सकता है। 

Saturday, 4 March 2017

समर्थ रामदास का महाराष्ट्रधर्म

शिवकालीन महाराष्ट्र में एक महान संत हुए थे समर्थ रामदास। उन्होंने अपने विचार प्रखरतापूर्वक वर्तमान और भविष्य को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत किए थे और अपने उपदेशों से कर्तव्यमूढ़ महाराष्ट्र को कर्तव्य दक्ष किया। ग्रंथराज दासबोध में परमार्थ और व्यवहार, धर्मशास्त्र और राजनीतिशास्त्र का मधुर मिलन कर बहुजन समाज के अंतःकरण स्वराज्य स्थापना की ओर मोडे एवं महाराष्ट्र की जनता को धर्ममूलक विवेक-वैराग्य प्रधान प्रयत्नवाद सीखाया। यह उनका महान कार्य है। जब अन्य संत भक्ति एवं अहिंसा के मार्ग से चलने की सीख दे रहे थे ऐसे समय में समर्थ रामदास ने परिस्थितिनुसार किस प्रकार का व्यवहार करें की सीख दी। उनके विचार किस प्रकार के थे वह इस श्लोक से ज्ञात हो जाएगा -
मना सज्जना तू कडेनेच जावे। न होऊन कोणास दुखवावे।। कुणी दुष्ट अंगास लाविल हात। तया दाखवावा भुजंग प्रयात।। अर्थात्‌ - अपन किसी के आडे ना जाएं, किसी को कष्ट न दें, दुख ना पहुंचाएं। परंतु, अगर कोई दुष्ट हमारे आडे आता है, हम पर आक्रमण करता है तो, शांत न बैठते उसे उचित उत्तर देना चाहिए। बुरे प्रसंग में ठंडे दिमाग से आगे के कदम उठाना चाहिए।
शिवाजी महाराज ने तरुणाई में ही स्वराज्य स्थापना का कार्य किया था तभी समर्थ रामदास ने उन्हें 'राजधर्म और क्षात्रधर्म" के स्फुट प्रकरण में एकाध कुशल राजनीतिज्ञ, अनुभवी कूटनीतिज्ञ के समान स्वराज्य स्थापना के कार्य में उपयोगी पडनेवाला - 'अमर्याद फितेवेखोर। यांचा करावा संहार। युद्ध करावे खबरदार। लोक राजी राखावा।।" अर्थात्‌ ः अनगिनत गद्दार हैं उनका संहार करो। सावधानी से युद्ध करो और जनता को प्रसन्न रखो। इस प्रकार के राजनीतिपरक उपदेश दिए थे। 
शिवाजी महाराज को क्षात्रधर्म का अनुग्रह देने के पश्चात उनको दिए हुए उपदेश में उन्होंने 'मराठा तितुका मेळवावा" (मराठों को एकत्रित करो) का उपदेश दिया था। इस उपदेश का रहस्य यह है कि, मराठे मराठी राज्य के लिए और महाराष्ट्र धर्म के लिए राष्ट्र भावना से और धर्म के प्रति गर्व के भाव से लडें। 'मराठा तितुका मेळवावा" के साथ उन्होंने 'महाराष्ट्र धर्म वाढ़वावा" अर्थात्‌ महाराष्ट्र धर्म को बढ़ाओ के उपदेश का जोड लगाया। इसका कारण स्वराज्य और स्वधर्म युद्ध का जोड मिलकर बहुजन समाज इस युद्ध में सहभागी हों, यह है इस पर से समर्थ रामदास की दूरदर्शिता दिखलाई पडती है। समर्थ रामदास का ध्येय केवल भजनवृद्धि और धर्मस्थापना नहीं था और शिवाजी महाराज का ध्येय केवल म्लेच्छ संहार और स्वराज्य स्थापना ही नहीं था बल्कि धर्मस्थापना और स्वराज्य स्थापना यह एक ही समान ध्येय दोनो का था।
अधिकांश लोग यही समझते हैं कि 'महाराष्ट्र धर्म" शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग समर्थ रामदास ने ही किया है, परंतु यह सच नहीं है। 'महाराष्ट्र धर्म" शब्द का प्रयोग सबसे पहले सरस्वती गंगाधर ने अपने 'गुरु-चरित्र" नामक प्रसिद्ध ग्रंथ में समर्थ रामदास से भी 200 वर्ष पूर्व उपयोग में लाया था। यह ग्रंथ गुरुभक्तिपरक है। सरस्वती गंगाधर की कल्पनानुसार महाराष्ट्रधर्म यानी वेदप्रामाण्य और श्रुतिस्मृतियुक्त आचार प्रधान धर्म। ऐसा इसलिए क्योंकि, सरस्वती गंगाधर के समय बीदर में जो मुसलमान बादशाह था वह औरंगजेब जैसा कट्टर धर्मांध नहीं था और हिंदुओं से द्वेष करनेवाला भी नहीं था। वह श्रुतिस्मृति के अनुसार व्यवहार करनेवाली अपनी प्रजा को यंंत्रणाएं नहीं देता था बल्कि उसका स्वयं का झुकाव श्रुतिस्मृतिप्रणीत वर्णाश्रम धर्म की ओर था। इसलिए संभवतः  सरस्वती गंगाधर के मन में स्वराज्य स्थापना की कल्पना का उदय नहीं हुआ होगा।
उन्होंने महाराष्ट्र धर्म का प्रयोग इस प्रकार किया था - ''ऐसा राव असुता। महाराष्ट्र धर्म वर्तता।। आपला द्वेष तत्वता। न करील की जागां।। (अ. 50ः235) राजधर्म, क्षात्रधर्म, गुरुधर्म, और सेवाधर्म से जिसप्रकार धर्म का बोध होता है (धर्मशास्त्र का इतिहास के अनुसार कर्तव्य ही धर्म है) वैसे ही महाराष्ट्रधर्म से महाराष्ट्र के कर्तव्य का बोध होना स्वाभाविक है। इस प्रकार का अर्थ करने पर महाराष्ट्रधर्म का एक विशिष्ट अर्थ समर्थ के मन में था और महाराष्ट्र का कर्तव्य इस व्यापक अर्थ में उस विशिष्ट अर्थ का अंतर्भाव हो सकता है।
प्रसिद्ध इतिहासकार कै. राजवाडे के विचारानुसार ''श्रुतिस्मृतियुक्त धर्मस्थापनापूर्वक स्वराज्य स्थापना"" इस प्रकार का महाराष्ट्रधर्म समर्थ को अभिप्रेत था यह दिख पडता है। समर्थ ने 'महाराष्ट्रधर्म वाढ़वावा" (महाराष्ट्रधर्म बढ़ाओ) का उपदेश जिस समय छत्रपति शिवाजी को दिया था उस समय उनके मन में वही अर्थ था ऐसा उनके साहित्य में इस संबंध में किए गए विचारों पर से दिख पडता है।
सुप्रसिद्ध रियासतकार का मत भी कुछ इसी प्रकार का है। वे कहते हैं - ''समर्थ रामदास ने 'मराठा तेव्ढ़ा मेळवावा, महाराष्ट्रधर्म वाढ़वावा", का उपदेश दिया था यह प्रसिद्ध है। इस उपदेश पर से ही समर्थ रामदास की योग्यता समझ में आती है। समर्थ के उपदेश में महाराष्ट्रधर्म यानी प्राक्कालीन साधुसंतों द्वारा दिखलाया हुआ प्रकार तो है ही परंतु, उससे भी कुछ अधिक का समावेश उसमें होता था। नहीं तो, 'महाराष्ट्र" का योजन करने का कोई प्रयोजन ही नहीं था। इस शब्द में बहुत अर्थ भरा हुआ है। महाराष्ट्र की रचना, वहां के लोगों का साहस, मूलभूत स्वभाव-गुण विशेष आ गए और प्रयत्न करें तो उनका प्रकट होनेवाला सामर्थ्य आदि बातों का समर्थ रामदास के मानस का अर्थ उपर्युक्त शब्द में व्यक्त होता है।
पूर्व के साधुसंतों के उपदेशों की दिशा केवल वैराग्य की थी। स्वदेश और स्वराष्ट्र के संबंधों में लोगों के कर्तव्य के रुप में कुछ है और उन्हें यह समझा दिए जाना चाहिए यह बातें उन साधुओं के विचारों में नहीं थी। लोगों में एकता निर्मित कर स्वराज्य स्थापना  करें, स्वराज्य की स्थापना के बगैर स्वधर्मोन्नति होगी नहीं, धर्म और राष्ट्र का निकट संबंध है, यह समर्थ के उपदेशों का अर्थ था।  रामदास स्वदेश पर गर्व करनेवाले, दूरदर्शी, समाज और राष्ट्र की उन्नति कर इष्ट कार्य पूर्ण करने के विचारों में निमग्न थे यह दासबोध पर से दिख पडता है .... समर्थ अपनी यात्रा में स्वराज्य की इमारत का साहित्य एकत्रित कर रहे थे। कहां क्या है यह उन्होंने समझ लिया था। महाराष्ट्र के राजनैतिक आंदोलन के मुख्य-मुख्य स्थान, मुख्य-मुख्य घराने और उनकी शक्ति के विषय में गंभीर विचार तय करके उनके बारे में सूचना वह शिवाजी को दिया करते थे। वह वेष से भी और पेशे से भी साधू थे।"" (मराठी रियासत, पूर्वाध पृ. 104,5) उपर्युक्त पर से रियासतकार का भी मत समर्थ रामदास ने जो महाराष्ट्रधर्म महाराज और महाराष्ट्र को सीखाया उसमें स्वधर्म स्थापना और स्वराज्य स्थापना इन दोनो का ही अंतर्भाव होता है।
कै. इतिहासकार राजवाडे 'राधामाधवविलासचंपू" पुस्तक की प्रस्तावना में कहते हैं - ''समर्थ ने शिवाजी को सलाह दी कि, एकजात मराठे सरदार और सिपाही सेवा में रखें। यह इसलिए क्योंकि, स्वराज्य अपना है और उसके लिए जान की बाजी लगाकर भी महाराष्ट्रधर्म को टिकाए रखना है की बुद्धि रखने में प्रत्येक मराठे को गर्व महसूस हो। मराठों को एकत्रित करो और अपने महाराष्ट्र धर्म का संरक्षण-संवर्धन करो का उपदेश समर्थ ने शिवाजी और तत्कालीन मराठों को दिया। समर्थ ने राष्ट्रीयत्व और राष्ट्रभावना जिसे कहते हैं वह उत्पन्न की। कल्पक रामदास और कर्ता शिवाजी। इस महाराष्ट्रधर्म ऊर्फ राष्ट्रभावना के समानधर्म का अवतार मराठों में होने के कारण शिवाजी के पश्चात संभाजी और राजाराम के कार्यकाल में भी स्वामी न होते हुए भी मराठा सरदारों ने औरंगजेब की नाक में दम कर दिया था। यदि यह राष्ट्रभावना न होती तो शिवाजी की मृत्यु के पश्चात थोडे ही दिनों में छत्रपति का बनाया स्वराज्य नष्ट हो जाता।