Saturday, 30 December 2017

रानी पद्मावती की कथा कल्पना है या वास्तविकता भाग 2 - शिरीष सप्रे

रानी पद्मावती की कथा कल्पना है या वास्तविकता  भाग 2  -  शिरीष सप्रे


जोधपूर का महगोत नेणसी ने राजपूतों के बारे में जानकारी दी है (1606)। इस ग्रंथ को ख्यात कहते हैं। थोडी बहुत बखर, कुछ शकावली इस प्रकार का इस ग्रंथ का स्वरुप है। पद्मिनी के संबंध में वह इतना ही कहता है कि, 'रतनसिंह पद्मिनी प्रकरण में अलाउद्दीन से लडा और मारा गया"। नेणसी ने जनश्रुतिओं पर जोर दिया। उसे वंशावली भी ठीक से मालूम नहीं थी। एक बार वह रतनसिंह को समरसिंह का पुत्र कहता है तो, एक बार अजयसिंह का। अंत में तो एक बार उसने रतनसिंह को लक्ष्मणसिंह का भाई कहा है। लक्ष्मणसिंह की शाखा सिसोदिया। रतनसिंह की रावल। अजयसिंह लक्ष्मणसिंह का छोटा लडका, यह बातें उसे मालूम ही नहीं ऐसा दिखता है। इस कारण नेणसी के पद्मिनी संबंधी विधानों को महत्व नहीं दिया जा सकता।

फरिश्ता भारत का सर्वश्रेष्ठ मुस्लिम इतिहासकार। उसने 1610 के आसपास भारत की मुस्लिम सत्ता का इतिहास लिखा। चितौड की घेराबंदी के संबंध में वह कहता है ः  चितौड गढ़ का किला छः महीने की घेराबंदी के बाद खिलजी ने 1303 में जीत लिया और अपने बडे लडके खिज्रखान को उसका अधिकारी नियुक्त किया। फरिश्ता ने पद्मिनी की मांग चितौड गढ़ जीतने के बाद की बतलाई है। फरिश्ता कहता है 'इस दरमियान(1304) अलाउद्दीन की कैद से चितौड का राजा राम रतनसेन बडी विलक्षण रीति से भाग निकला। विस्तार भयावश आगे की कहानी में न जाते हुए हम केवल इतना बतलाते हैं कि, फरिश्ते के वर्णन में अनेक गलतियां समकालीन शिलालेखों के आधार पर बतलाई जा सकती हैं। अलाउद्दीन ने खिज्रखान को चितौड की सुबेदारी से हटा दिया। वह काल राजा रतनसेन कैद से निकल भागने के बाद का मतलब 1304-5 का था यह सूचित करता है।

परंतु, चितौड के तट से लगी एक कब्र पर सन्‌ 1310 का लेख है। उसमें अलाउद्दीन खिलजी का उल्लेख है। तब तक तो भी अलाउद्दीन ने चितौड रतनसेन के भांजे को नहीं दिया था। 1311-12 की घटनाओं का वर्णन करते हुए स्वयं फरिश्ता कहता है कि, देवगिरी पर चडाई करना चितौड से आसान था परंतु, मलिक काफूर खिज्रखान का द्वेष करता था इस कारण उसने यह मुहिम खिज्रखान को देने की अपेक्षा स्वयं जाना तय किया। इस पर से भी यह स्पष्ट होता है कि 1311-12 तक चितौड पर खिज्रखान बाप की तरफ से  शासन चलाता था। 

फरिश्ता को रतनसेन की पत्नी का नाम मालूम नहीं था। राजा रतनसिंह की औरतों में एक पद्मिनी थी, ऐसा वह कहता है। यहां पद्मिनी  नाम एक स्त्री का ना होकर एक जाति की स्त्री का है इस प्रकार से सूचित किया हुआ है। अच्छा एक बात ओर यहां रत्नसेन को छुडाने की तरकीब किसकी? तो रत्नसेन की लडकी की पद्मिनी की नहीं। एक बात और पद्मिनी के सौंदर्य की प्रसिद्धी अलाउद्दीन के कानों पर चितौड की घेराबंदी के समय गई क्या? नहीं। फरिश्ता के मतानुसार चितौड पर विजय के बाद रतनसेन कैद होकर दिल्ली आया और कुछ समय पश्चात अलाउद्दीन को पद्यिनी की हकीकत मालूम हुई।

अकबर के मंत्री अबुलफजल का आईने अकबरी ग्रंथ बडा प्रसिद्ध है। यह लगभग 1560 के आसपास लिखा गया था। इसमें लिखते समय अबुलफजल ने विशेष चिकित्सा नहीं की है। उसने पुराने गं्रथकारों द्वारा जो दर्ज कर रखा गया है वही लिखा है और स्पष्ट रुप से आख्यायिकाओं पर से अपनी हकीकत सजाई है। वह कहता है अलाउद्दीन ने तीन बार चितौड की घेराबंदी की थी। परंतु, अलाउद्दीन के साथ रहे खुसरो की सूचनानुसार घेरा एक ही बार डाला गया था और वह भी छः महीने में समाप्त हो गया था। अबुलफजल ने थोडे बहुत अंतर से 'पद्मावत" काव्य की ही कथा दी हुई है। 

'पद्मावत" काव्य -

पद्मिनी की आख्यायिका के स्त्रोत की खोज करते-करते हमने टॉड (1820), नेणसी (1660) और फरिश्ता (1610) और अबुल फजल द्वारा दी हुई जानकारियों में कितना अंतर है इसको देखा। राजपूतों की सहमती से अलाउद्दीन ने पद्मिनी का चेहरा आईने में देेखा यह बात केवल टॉड कहता है और इस बात को ही भारतभर में प्रसिद्धि मिली। पद्मावत काव्य में इस प्रसंग का उल्लेख इस तरीके से नहीं आता। पद्मावत महाकाव्य अलाहबाद प्रांत के जायस गांव के सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा अवधी हिंदी भाषा में लिखा गया था। काव्य का आशय आध्यात्मिक होकर उसे कथानक में गूंथा गया है ऐसा सामान्यतः समझा जाता है।

 पद्मवात का सारांश इस प्रकार से है -

पद्मावती अत्यंत सुंदर होकर सिंहल द्वीप के राजा गंधर्वसेन और रानी चंपावती की पुत्री थी और उसके पास हीरामन नामका तोता था। तोता एक दिन पिंजरे से उड गया। उसे एक शिकारी ने पकड लिया और एक ब्राह्मण को बेच दिया। ब्राह्मण ने  उसे राजा रतनसेन को बेच दिया। राजा रतनसेन की पटरानी नागमती ने हीरामन से पूछा ः क्या मुझसे बढ़कर सुंदर कोई अन्य स्त्री इस संसार में है? इस पर तोते ने पद्मावती के अप्रतिम सौंदर्य की स्तुती की। राजा तोते को लेकर सिंहल द्वीप गया वहां तोते ने पद्मावती को  राजा के बारे में जानकारी दी। वे दोनो एक दूसरे पर अनुरक्त हो गए। उन दोनों का विवाह हो गया और राजा पद्मावती को लेकर चितौड वापिस आ गया।

राजा रतनसेन के दरबार में राघव चैतन्य नामका मंत्रतंत्र विद्या का जानकार था। उसने मंत्र विद्या के बल पर द्वितीया का चंद्र दिखलाकर आज द्वितीया है कहा। परंतु, दूसरे दिन द्वितीया का चंद्र उदित हुआ और मांत्रिक झूठा सिद्ध हुआ। उसे देश निकाला दे दिया गया। पद्मावती ने उसे समझाईश देने के लिए बुलाया। इस निमित्त उसे पद्मावती के दर्शन हुए और उसके मन पर पद्मावती के सौंदर्य का गहरा परिणाम हुआ। वह तत्काल अलाउद्दीन खिलजी के पास गया और उसके सामने पद्मिनी के सौंदर्य का वर्णन किया। अब अलाउद्दीन के मन में पद्मावती को हासिल करने की इच्छा जाग उठी और उसने रतनसेन के पास दूत भेज पद्मावती की मांग की जो रतनसेन द्वारा नकार दी गई। अलाउद्दीन बडी भारी सेना लेकर चितौड पर चढ़ दौडा। आठ साल की घेराबंदी के बाद भी वह चितौड ना जीत सका। इतने में वायव्य से दिल्ली पर आक्रमण की संभावना के कारण उसने रतनसेन को संदेश भेजा कि उसे पद्मावती नहीं केवल आपकी मित्रता चाहिए।

यह सुन रतनसेन ने अलाउद्दीन का स्वागत किया। आदरातिथ्य और भोज के पश्चात वे दोनो शतरंज खेलने बैठे। खेल किस प्रकार से चल रहा है यह देखने कुतुहलवश पद्मावती ने झरोखे से झांक कर देखा (राजपूतों द्वारा यह शर्त कबूल किए जाने का कोई उल्लेख नहीं) उसका प्रतिबिंब सामने के आईने में दिखा। वर्णनानुसार वही पद्मावती होनी चाहिए यह राघव चैतन्य ने उसे बतलाया। दूसरे दिन रतनसेन उसे छोडने प्रवेशद्वार तक आया। वहीं अलाउद्दीन ने दगा कर रतनसेन को कैद कर लिया और उसे ले दिल्ली आ गया। आगे की कथा कि किस प्रकार पद्मावती गोरा और बादल द्वारा की गई युक्ति से रतनसेन को छुडा लाई व लडाई में गोरा सहित अनेक राजपूत खेत रहे सुप्रसिद्ध है। फिर से अलाउद्दीन ने आक्रमण किया परंतु, कोई फायदा नहीं हुआ अलाउद्दीन के हाथ केवल पद्मिनी की राख ही लगी।

ऐसी अन्य आख्यायिकाएं भी हैं जैसे कुंभलगढ़ प्रशस्ती, इसामी का 'फुतूहस्सलातीन" जियाउद्दीन बरनी का 1357 में लिखा 'तारीखे फिरोजशाही" में ः 'चितौड घेरे के संबंध में कहता है, 'अलाउद्दीन अपनी सेना लेकर दिल्ली से निकला। उसने चितौड पर हमला किया। उसने चितौड को घेर लिया और थोडे ही समय में जीत लिया। इसके बाद वह दिल्ली लौट गया।" अमीर खुसरो जो चितौड पर चढ़ाई के समय अलाउद्दीन के साथ था के 'देवलरानी" काव्यग्रंथ में चितौड मुहिम का संक्षिप्त उल्लेख है इसमें पद्मावती का उल्लेख नहीं। यह सब विस्तारभयावश हम नहीं दे रहे हैं।

सारांश यह है कि, पद्मिनी या पद्मावती की कथा को विशुद्ध इतिहास में रत्तीभर भी आधार नहीं है। अलाउद्दीन ने चित्तौड को घेरा डाला और अंतिम हमले के समय चितौड का राणा रतनसिंह अलाउद्दीन के पास आश्रयार्थ आया। परंतु, राजपूतों ने लक्षमणसिंह सिसोदिया के नेतृत्वतले सामना कर अपने प्राणों की आहुति दी और राजपूत रमणियों ने जौहर कर सतीत्व स्वीकारा। रतनसिंह का क्या हुआ यह मालूम नहीं। परंतु, लक्ष्मणसिंह के पोते राणा हमीर ने आगे जाकर पच्चीस वर्षों पश्चात चितौड जीतकर सिसोदियांओ के वंश की शुरुआत की। इतिहास के आईने में प्रचंड ज्वालाओं में जलता चितौड ही दिखता है एवं दंतकथाओं के दर्पण की पद्मावती की कथा कल्पित है सत्य नहीं। (यह लेख संशोधक श्री सेतुमाधवराव पगडी की पुस्तक 'भारतीय मुसलमान शोध आणि (और) बोध" के लेख 'चितौड की पद्मिनी कल्पित या सत्य? पर आधारित है)

रानी पद्मावती की कथा कल्पना है या वास्तविकता भाग 1 - शिरीष सप्रे

रानी पद्मावती की कथा कल्पना है या वास्तविकता  भाग 1  -  शिरीष सप्रे

लगता है संजय लीला भंसाली अनैतिहासिक एवं विवादास्पद फिल्में बनाने में महारत हासिल कर एक विश्व रिकॉर्ड बनाना चाहते हैं। इसीलिए लगातार बेसिरपैर की विवादास्पद फिल्में एक के बाद एक बनाए चले जा रहे हैं और मनोरंजन के नाम पर चाहे जो फिल्माए जा रहे हैं। इस कडी में बाजीराव मस्तानी के बाद अब उनकी नई फिल्म है पद्मावती जिसका चौतरफा विरोध हो रहा है और इस कारण इस फिल्म का प्रदर्शन खटाई में पड गया है। बाजीराव मस्तानी में भी उन्होंने अनेक अनैतिहासिक एवं बेसिरपैर की घटनाएं फिल्माई थी इसी कडी में आशुतोष गोवारिकर की फिल्म जोधा अकबर भी आती है। परंतु, इनका जैसा होना चाहिए वैसा व्यापक विरोध न होने के कारण  संजय लीला की हिम्मत जरा कुछ ज्यादह ही खुल गई और नतीजा सामने है कि फिल्म का देशव्यापी विरोध हो रहा है और फिल्म के प्रदर्शन की तारिख टलती चली जा रही है। मशहूर गीतकार और शायर जावेद अख्तर भी पद्मावती की कहानी को ऐतिहासिक नहीं अपितु नकली मानते हैं और एक टीव्ही डिबेट का हवाला देते हुए जावेद अख्तर ने कहा कि, 'पद्मावती की रचना और अलाउद्दीन खिलजी के समय में काफी फर्क था। जायसी ने जिस वक्त इसे लिखा और खिलजी के शासनकाल में करीब 200-250 साल का फर्क था। इतने साल में जब तक कि जायसी ने पद्मावती नहीं लिखी, कहीं रानी पद्मावती का जिक्र ही नहीं है। जावेद अख्तर ने कहा, 'उस दौर (अलाउद्दीन के) में इतिहास बहुत लिखा गया। उस जमाने के सारे रिकॉर्ड भी मौजूद हैं, लेकिन कहीं पद्मावती का नाम नहीं है।....   तथ्य है कि जोधाबाई अकबर की पत्नी नहीं थी।(नया इंडिया 12 नवंबर 2017, भोपाल)

19वीं शताब्दी के प्रारंभ में जब कर्नल टॉड जो राजस्थान में पोलिटिकल एजेंट के रुप में कार्य कर रहा था के कानों पर पद्मिनी की कहानी आई और जैसी उसने सुनी पढ़ी वैसी उसने प्रस्तुत कर दी और यह कथा ऐतिहासिक दृष्टि से सत्य होनी चाहिए ऐसा मान लिया गया। परंतु जैसे-जैसे राजस्थान के इतिहास का अधिकाधिक संशोधन होने लगा वैसे-वैसे टॉड के ग्रंथ ऍनल्स ऑफ राजस्थान की कमियां नजरों में आने लगी। टॉड का ग्रंथ मतलब इतिहास और दंतकथाओं का मिश्रण है यह अभ्यासकों के ध्यान में आने लगा। टॉड ने जो कथा भाटों द्वारा उसे बतलाई गई वह उसने लिख ली। वह संक्षेप में इस प्रकार से है-

सन्‌ 1274 में लक्ष्मणसिंह चितौड की गद्दी पर बैठा। वह आयु में कम होने के कारण उसका काका भीमसिंह राजकाज चलाता था। भीमसिंह ने सिंहल द्वीप के राजा हमीरसिंह चौहान की कन्या पद्मिनी से विवाह किया। पद्मिनी के लावण्य पर मोहित हो अलाउद्दीन ने चितौड पर आक्रमण कर दिया परंतु, आक्रमण यशस्वी ना हो सका। इस कारण 'मुझे पद्मिनी का चेहरा दर्पण में देखने को मिलेगा तो भी पर्याप्त होगा, मैं चितौड छोडकर चला जाऊंगा" इस प्रकार का संदेश उसने भीमसिंह को भेजा। राजपूतों ने यह मान्य कर लिया। अलाउद्दीन अपने चुनिंदा सेवकों के साथ किले में गया उसने दर्पण में चेहरा देखा और वापिस लौट गया। उसे प्रवेशद्वार तक छोडने गए भीमसिंह को उसने कैद कर लिया। उसे छुडवाने के लिए पद्मिनी ने युक्ति की। 'मैं तुम्हारे अंतःपुर में आने के लिए तैयार हूं, परंतु उसके पूर्व मुझे भीमसिंह से अंतिम भेंट की अनुमति होनी चाहिए", ऐसा उसने अलाउद्दीन को संदेश भेजा। अलाउद्दीन ने अनुमति दे दी। पद्मिनी ने सात सौ पालकियां तैयार की और प्रत्येक पालकी में एक वीर राजपूत बैठा। इस दल का नेतृत्व पद्मिनी का काका गोरा और चचेरा भाई बादल के पास था। उन्होंने पराकाष्ठा की लडाई करके भीमसिंह को छुडा लिया। अलाउद्दीन ने पुनः चितौड पर हमला कर दिया। अपन टिक नहीं सकते यह देख पद्मिनी और अन्य राजपूत महिलाओं ने जौहर कर लिया तथा राजपूत वीर अलाउद्दीन की सेना पर टूट पडे व लडते-लडते हुतात्मा हो गए।

सन्‌ 1460 का महाराणा कुंभा के काल का एक शिलालेख उपलब्ध हुआ है। इसके अलावा समकालीन 'एकलिंगमहात्म्य" के 'राजवर्णन" अध्याय में भी लक्ष्मणसिंह की जानकारी आई हुई है। लक्ष्मणसिंह चितौड की राजगद्दी पर विराजमान हुआ परंतु, आयु में कम  होेने के कारण उसका काका भीमसिंह राजकाज देखता था, ऐसा टॉड का कहना है। वास्तविकता देखें तो लक्ष्मणसिंह चितौड की गद्दी पर कभी भी नहीं था। मेवाड के गेहलोत वंश मेंं रणसिंह कर्ण राजा था। उसका पुत्र क्षेमसिंह चितौड पर राज्य करने लगा। उसके वंशज चितौड के रावल कहे जाने लगे। क्षेमसिंह का भाई राहप के पास सिसोदे गांव की सरदारी थी। इस कारण गेहलोतों की इस शाखा को सिसोदिया कहा जाने लगा। चितौड की ज्येष्ठ रावल शाखा के रतनसिंह (1302-3) के काल में ही अलाउद्दीन खिलजी ने चितौड के किले पर आक्रमण किया था। इधर इस काल में गेहलोतों की कनिष्ठ शाखा सिसोदे में राज्य कर रही थी। रतनसिंह का समकालीन था लक्ष्मणसिंह। सिसोदियाओं के इन राजाओं को राणा कहते थे। लक्ष्मणसिंह चितौड की ज्येष्ठ शाखा के रावलों के रतनसिंह की सहायता के लिए दौडकर गया और अलाउद्दीन के साथ लडते हुए अपने सातों पुत्रों सहित मारा गया।

अब टॉड की गलती देखें। चितौड के रावल रतनसिंह हैं, लक्ष्मणसिंह नहीं। लक्ष्मणसिंह चितौड की गद्दी पर बैठा। परंतु, वह छोटा होने के कारण उसका काका भीमसिंह राजकाज चलाता था ऐसा टॉड कहता है और पद्मिनी भीमसिंह की पत्नी, ऐसा भी वह कहता है। वास्तविकता देखें भीमसिंह लक्ष्मणसिंह का दादा। अलाउद्दीन खिलजी के घेरे के समय लक्ष्मणसिंह को सात पुत्र थे। यह एकलिंग महात्म्य में भी कहा गया है।

पद्मिनी की आख्यायिका

टॉड, जोधपूर के सत्रहवीं शताब्दी के इतिहासकार नेणसी, मुसलमान इतिहासकार फरिश्ता (1610) और अकबर का चरित्रकार अबुलफजल इन सबने पद्मिनी की जनश्रुति सीधे-सीधे मलिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत (सन्‌1440) इस कपोलकल्पित हिंदी काव्य पर से ली है। और इसमें सबने अपनी-अपनी इच्छानुसार बदलाव भी किया है। उदाहरणार्थः अलाउद्दीन द्वारा दर्पण में पद्मिनी का चेहरा देखने का प्रसंग लें। राजपूतों ने इस बात को मान्यता दी, ऐसा टॉड कहता है। परंतु, मूल काव्य 'पद्मावत" में मजकूर इस प्रकार से है-

चितौड किले में रतनसिंह ने अलाउद्दीन का स्वागत किया, उसकी सेवा में दास-दासियां उपस्थित थे। परंतु, पद्मिनी उसे नजर नहीं आई। भोजनोपरांत रतनसिंह और अलाउद्दीन शतरंज खेलने बैठे। अलाउद्दीन ने अपने पास दर्पण रखा था। ऊपर झरोखे से पद्मिनी खेल देखने के लिए झांकेगी और उसका प्रतिबिंब दिखेगा ऐसी उसकी अपेक्षा थी। संयोगवश हुआ भी ऐसा ही। दासियों के कहने पर से कुतूहलवश पद्मिनी ने झरोखे का परदा हटाकर नीचे देखा। वह प्रतिबिंब अलाउद्दीन को दिखा। परंतु, वही पद्मिनी है इसकी विश्वनीयता अलाउद्दीन को नहीं थी। अंत में राघव चैतन्य नामक अपने सलाहकार से उसका वर्णन किया। वर्णनानुसार वही पद्मिनी होना चाहिए ऐसा राघवचैतन्य ने उसे बतलाया।

अर्थात्‌ राजपूतों ने पद्मिनी (या पद्मावती) का चेहरा दर्पण में देखने की अनुमति दी यह काव्य पर से भी सिद्ध नहीं होता। इतिहास बाबद बात करना ही व्यर्थ है।........

Friday, 22 December 2017

क्रिसमस - विश्व के विभिन्न देशों में - शिरीष सप्रे

क्रिसमस - विश्व के विभिन्न देशों में
शिरीष सप्रे

क्रिसमस एक ऐसा पर्व है जो सारी दुनिया में बडी धूमधाम से मनाया जाता है। क्रिसमस या बडा दिन का प्राचीन नाम 'यूल-टाइड" है और इस धार्मिक पर्व को मनाने की रीतियां हर स्थान पर भिन्न-भिन्न है। इस पर्व का महत्व इसलिए है क्योंकि, ईसा का जन्म दिन इसी दिन मनाया जाता है। प्राचीन काल में बडा दिन मनाने के लिए जो शीतकालीन उत्सव अपनाए गए थे उनमें बहुत से तो ईसाई धर्म के आरम्भिक कालीन रोमवासियों के जीवन से संबद्ध थे। रोमवासी 'सैटरनेलिया" नामका एक बडा पर्व 17 से 25 दिसंबर तक मनाया करते थे। इस उत्सव के दौरान दास मुक्त कर दिए जाते थे। ये दास फिर एक नकली राजा चुनकर हंसी-ठट्ठा करते थे। इस उत्सव के पश्चात एक गुडियों का उत्सव 'सिगिलेरिया" मनाया जाता था। उसके अंतर्गत एक मेला आयोजित किया जाता था। जिसमें बच्चों को भेंट में खिलौने दिए जाते थे। इन ऐतिहासिक उत्सवों के पश्चात जो विकास हुआ उसके अंतर्गत 25 दिसंबर का उत्सव मनाया जाने लगा। इसका आरम्भ शायद सम्राट आरिलियन ने अपने पारसी उपास्य सूर्य देवता मिथिरास के सम्मान किया था। इस उत्सव को अविजयी सूर्य का जन्मदिन कहा गया और इसी दिन से दिन बडे होना माना गया।

रोम व ग्रीसवासी अपने त्यौहारों में सदा हरी रहनेवाली झाडी हाली का प्रयोग करते थे इसका उद्देश्य इस विश्वास के साथ किया जाता था कि, यह दुष्टात्माओं से बचाएगी। मिस्टलेटो नामक पौधा समकालीन पंडितों द्वारा पवित्र माना जाता था। दंतकथाओं के अनुसार एक पवित्र वृक्ष से काटकर कांटों का हार बनाया जाता था। इस संदर्भ में बेरियां ईसा के रक्त से लाल हो जाती थी। प्राचीन ईसाई हाली को 'गुणी शाखा" या 'ईसा का कांटा" कहते थे। इस प्राचीन रीति की पहले चर्च ने निंदा की, फलतः इटली में इसका कम प्रचलन है। फ्रांस में यह कभी लोकप्रिय नहीं हुआ तथा छठी शताब्दी में स्पेन की चर्च काउन्सिल ने इस पर पाबंदी लगा दी। इंग्लैंड एवं जर्मनी ने इन प्रतिबंधों की परवाह नहीं की। अब तक इन देशों में यह प्राचीन रीति बडी सफलतापूर्वक धूमधाम से मनाई जाती है।

स्केन्डियन देशों में बडा दिन बडे विशाल समारोह से मनाया जाता है और कहीं इतने विशाल स्तर पर यह नहीं मनाया जाता। स्वीडन में यह 13 दिसंबर को ल्युशिया दिवस से शुरु होता है। इस दिन प्रकाश की रानी का भोज मनाया जाता है। स्टाकहोम में ल्युशिया तथा उनके अनुचरों के सम्मान में रात में जलती मशालों का जुलूस निकाला जाता है। समारोह का अंत टाउनहाल में एक भोज के बाद होता है। ल्युशिया दिवस का समारोह स्वीडन से अन्य देशों में भी गया। अमेरिका जहां स्केन्डेेवियायी देशों के बहुत से लोग रहते हैं, में यह उत्सव मनाया जाता है।

जैसे-जैसे बडा दिन निकट आता जाता है राजधानी की सडकें 'परिलोक" बन जाती हैं। बडे दिन के प्रतीकों से युक्त प्रकाशित मालाएं जहां-तहां इमारतों से लटकी नजर आती हैं। बडे दिन की रात्रि को डेनमार्क एवं नार्वे के चर्च विशेष प्रार्थना के लिए लोगों से भर जाते हैं। प्रार्थना के बाद चर्च की घंटियां मधुर ध्वनि से बडे दिन के आगमन की शुभ सूचना देती हैं। समस्त स्केन्डियन देशों की बडे दिन की रात्रि को सान्ताक्लास का आगमन होता है। इसी दिन शाम को भेंट-पार्सल खोले जाते हैं। स्वीडन में दिन निकलने से पूर्व बडे दिन की प्रार्थनाएं शुरु होती हैं। चर्च में सैंकडों मोमबत्तियां जलाकर प्रकाश किया जाता है। 

जर्मनी में बडा दिन सारे त्यौहारों एवं उत्सवों में शानदार माना जाता है। बडे दिन से पूर्व यानी 24 दिसंबर की शाम की बच्चे-बुढ़े सभी उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं। एक छोटी सी घंटी की मधुर ध्वनि के साथ शाम को पिता घर के एकत्रित सदस्यों के सामने क्रिसमस कमरे का द्वार खोलते हैं। कमरे के बीच में एक क्रिसमस का पेड जिसमें सुंदर शीशे की गेंदें होती हैं, नकली चमकीले तारों से युक्त होता है। पेड में नारंगियां, सेब, सुनहरे मेवे, खिलौने तथा मिठाइयां लगी होती हैं। मोमबत्ती प्रकाश से चमकते पेड के इर्दगिर्द परिवार एकत्रित होता है। बच्चे यह तय ही नहीं कर पाते कि पेड को निहारें कि भेंट के पार्सल खोलें। पिता सेंट ल्युक की गास्पेल से प्रार्थना पढ़ते हैं और फिर पूरा परिवार 'साइलेंट नाइट, होली नाइट" का प्राचीन और प्रिय समवेत गान गाते हैं। इस गान के द्वारा वे पृथ्वी पर शांति एवं मनुष्यों में सद्‌भाव की कामना करते हैं।

अमेरिका में 25 दिसंबर से कुछ पूर्व और कुछ दिन बाद तक खुशी और मस्ती का वातावरण रहता है। अमरिकी इसे 'क्रिसमस" स्प्रिट"कहते हैं। दुकानें आकर्षक भेंटों से भरी रहती हैं। भेंटों के बोझ से दबे ग्राहक इस दुकान से उस दुकान तक दौडते रहते हैं। क्रिसमस का सान्ताक्लास गली के कौने में अपनी घंटियां बजाता हुआ असहायों की सहायतार्थ निमंत्रण देता रहता है। छोट-छोटे बच्चे सान्ताक्लास के कानों में अपनी इच्छाएं जाहिर करते हैं। हर जगह पर लाल चेहरेवाला, मुस्कराता, बर्फ की तरह सफेद गुलमच्छोंवाला तथा लाल कपडे पहना बूढ़ा दयालुता का ऐसा प्रतीक माना जाता है जो वर्ष में एक बार बच्चों के लिए प्रसन्नता का तथा बडों के लिए ह्रदय को सांत्वना प्रदान करनेवाली यादों का अवसर लाता है। 

बहुत लंबे समय से अमेरिकी बडे दिन को ऐसे मनाते आए हैं जो उनकी विविध संस्कृतियों-रीतियों का यथेष्ट परिचय देता है। प्राचीन स्पेनियों के कीमती प्रदर्शन एवं जर्मनों के कलात्मक प्रदर्शन का विचित्र अभूतपूर्व सामंजस्य इस अवसर पर अमेरिका में मिलता है। दक्षिण पूर्वी क्षेत्रों में, जहां बहुत से अमेरिकी, स्पेनी, मैक्सिकी और अमेरिकी इंडियनों की संतानें हैं, रीतियां बदल जाती हैं। प्राचीन इंडियन और आधुनिक क्रिश्चियन रीतियां परस्पर मिल जाती हैं तथा कबीली उत्सव संबंधी नृत्यों के बाद आधी रात में कैथोलिक चर्च में प्रार्थना होती है। गलियां फूलों की खुशबु से महकने लगती हैं। बल्बों तथा बहुरंगी मोमबत्तियों के प्रकाश बहुत से घरों के सामने इंद्रधनुषी छटा बिखेरने लगते हैं। 

Friday, 1 December 2017

हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 4 भाग 2 - 'ऊँ" शिरीष सप्रे

हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 4   भाग 2 - 'ऊँ"
शिरीष सप्रे

यदि भारतवासियों को अपने अध्यात्म का एक ही प्रतीक विश्व के सामने प्रस्तुत करना हो तो वह है 'स्वस्तिक" और उसके नाभिस्थल में 'ऊँ" को दर्शाना चाहिए। यह 'ऊँ" केवल शब्द नहीं है। शब्द के रुप में उसे लिखा भी नहीं जाता 'ऊँ" चित्र है। निशब्द की यात्रा में शब्द छूट जाता है और चित्र उभर आता है। वैदिक वाड़्‌मय सदृश्य धर्मशास्त्र, पुराण और आगम साहित्य में भी ओंाकार की महिमा सर्वत्र पाई जाती है। इसी प्रकार बौद्ध और जैन संप्रदाय में भी सर्वत्र ओम के प्रति श्रद्धा अभिव्यक्त की गई है। 'ऊँ" ही ब्रह्म है। 'ऊँ" ही प्रत्यक्ष जगत है। 'ऊँ" ही इसकी अनुकृति है। पद्मासन में बैठकर इसका जाप करने से मन को एकाग्रता और शांति प्राप्त होती है। वैज्ञानिकों और ज्योतिषियों का कथन है कि, ओम के पाठ में दांत, नाक, जीभ सबका प्रयोग होता है जिसके कारण हार्मोनल स्त्राव कम होता है तथा ग्रंथि स्त्राव को कम करके यह शब्द कई रोगों से रक्षा और कुंडलिनी को जागृत करता है।

जैसाकि पूर्व में ही कहा गया है कि, 'ऊँ" के तीन खंड हैं 'अ", 'उ", 'म"। संस्कृत से निषपन्न सभी भाषाओं का प्रथम स्वर 'अ" है। 'अ" आश्चर्य का द्योतक है। जब कोई व्यक्ति बोलते-बोलते अटक जाता है तो वह 'अ", 'अ" ही का उच्चारण करता है। आनंद के समय भी 'अ" की ही ध्वनि निकालता है। 'अ" से पूर्व कोई भी वर्ण होठो से नहीं निकल सकता। यदि किसी वर्ण से 'अ" का लोप कर दिया जाए तो वह वर्ण से सीधा व्यंजन बन जाता है। इसलिए ओम का प्रथम स्वर 'अ" को मानना भाषा के संपूर्ण रचना तंत्र को 'ओम" से संबद्द करना है। सृष्टी के आरंभ में जब ईश्वर ने ऋषियों के ह्रदयों में वेद प्रकाशित किए तो हर एक शब्द से संबंधित उनके निश्चित अर्थ ऋखियों ने ध्यानावस्था में प्राप्त किए। 'ऊँ" बोलने से शरीर के विभिन्न भागों में कंपन होते हैं जैसेकि 'अ" शरीर के निचले हिस्से (पेट), 'उ" से मध्य भाग (छाती) और 'म" से शरीर के ऊपरी हिस्से (मस्तिष्क) में कंपन होता है।

जब पाणिनी ने शिव का डमरु नाद सुना तो उसके नाद मेें उन्हें चौदह सूत्र सुनाई दिए। सारे सूत्रों का शिरोमणि 'अ" बना और इस  'अ" के हटते ही शब्द की पूर्णता को लंगडी खानी पडती है। 'अ" की पहले की हद को स्वीकारने के कारण ही श्रमण परंपरा ने अपने धर्मचक्र प्रवर्तकों को अर्हत या अरिहंत कहना उचित माना। वे तीर्थंकर की विरुदावली गाते समय प्रारंभ 'णमो अरिहंताणां" से करते हैं।  'ऊँ" का 'अ" श्रमण परंपरा के अनुसार अरिहंत का वाचक है। इसलिए 'ऊँ" अर्हत मनीषा का मूल प्रतीक है। संपूर्ण ओम' में 'ऊ" ही ऐसा स्वर है जिसके उच्चारण से शरीर के सारे अवयव प्रभावित और स्पंदित होते हैं।

यदि कोई व्यक्ति मानसिक तनाव से घिर जाए तो उससे मुक्ति पाने के लिए 'ऊँ" का जोर-जोर से उच्चार करे। 'ऊँ" का उच्चारण इस प्रकार करें मानो वह सिंहनाद कर रहा हो। यह प्रयोग आश्चर्यचकित कर देनेवाला है। शरीर पसीना पसीना होने लगेगा। जब 'ऊँ" 'ऊँ" करते थककर चूर हो जाएं तो शांत हो जाइए। पहले कुछ क्षणों तक तो बोलें पश्चात शांत हो पडे रहें। 'ऊँ" का यह वेदना मुक्ति के लिए किया जानेवाला मंत्रयोग है, ध्यान का एक मार्ग है। यह प्रक्रिया एक नवीनता देगी। आप शरीर और मन को स्वस्थ पाएंगे। विज्ञान ने भी 'ऊँ" के उच्चारण और उसके लाभ को प्रमाणित किया है। यह धीमी, सामान्य और पूरी सांस को छोडने में सहायता करता है। यह हमारे श्वसन तंत्र को विश्राम देता है और नियंत्रित करता है। मन-मस्तिष्क को शांत करने में भी लाभप्रद है। 'ऊँ" के मंत्र से शरीर और मन को एकाग्र करने में सहायता मिलती है। ह्रदय की धडकन और रक्त संचार व्यवस्थित होता है। इसका उच्चारण करनेवाला और इसे सुननेवाला दोनो ही लाभांवित होते हैं। प्राणायम में भी 'ऊँ" का बहुत महत्व है। आजकल डॉक्टर भी अपने रोगियों को प्राणायाम करने की सलाह देते हैं।


'ऊँ" का अंतिम वर्ण 'म" है। 'म" व्यंजन का अंतिम सोपान है, जो 'अ" से आरंभ हुआ 'ऊ" की ऊंचाइयों को छुआ और 'म" तक पहुंचा। उसमें मंजिल पा ली। 'अ" से 'म" की यात्रा 'ओम" की यात्रा है और 'ऊँ" से कभी पृथक नहीं हो सकता। परमात्मा 'ऊँ' में ही समाया हुआ है। ब्रह्म बीज है यह। 'ऊँ" से ही हैं धर्म प्रवर्तकों की रश्मियां। 'ऊँ" सबसे विराट है। 'ऊँ" से विराट हुआ नहीं जा सकता। इसलिए जो 'ऊँ" हो गया वह 'अरिहंत" हो गया, 'ओम" होना ही 'हरिओम" होना है। 'ऊँ" से ही यात्रा शुरु होती है और 'ऊँ" पर ही समाप्त होती है। जो 'ऊँ" अक्षर रुपी ब्रह्म का उच्चारण करते हुए शरीर को त्यागता है वह परमगति को प्राप्त करता है। 'ऊँ" ब्रह्मांड का नाद है और मनुष्य के अंतर में स्थित ईश्वर का प्रतीक है। ''ऊँ"कार (ऐहिक वैसे ही पारमार्थिक) उभय वैभव प्राप्त करवा देनेवाला एक अपूर्व मंत्र है। संसार और परमार्थ दोनो को जोडनेवाला यह पुल है।"

Saturday, 25 November 2017

इत्र इतिहास के आइने में अर्पिता सप्रे

इत्र इतिहास के आइने में   
अर्पिता सप्रे

विश्व को इत्र निर्मिती भारत ने ही सीखाई है। भारत में इत्र का इतिहास उतना ही पुराना है जितने कि वेद। सत्रहवीं शताब्दकी के अंत तक यूरोप में इत्र का निर्माण तक शुरु नहीं हुआ था। इसके बाद ही यूरोप में इत्र बनाने के प्रयास हुए। रानी नूरजहां ने ही पहली बार गुलाब के इत्र का निर्माण करवाया। जिसका नाम 'इत्र-ए-जहांगीर" रखा और इसके लिए फ्रांस से निपुण कारीगरों को बुलवाया। ये कारीगर आकर कन्नौज में बस गए और कन्नौज इत्र की राजधानी में तब्दील हो गया। संभवतः इस इत्र की निर्मिती सन्‌ 1612 ई. में अपने विवाह के अवसर पर की थी। भारत, फ्रांस और इटली में आरंभ हुआ यह इत्र का व्यवसाय बाद में पूरे विश्व में फैल गया।

फूलों का सिरमौर, सौंदर्य और प्रेम का प्रतीक गुलाब से संगीत, शिल्प, कथाएं, कविताएं, साहित्य सभाएं सभी महक रही हैं। गुलाब का इन सभी में मनोहारी एवं सुंदर चित्रण, वर्णन है। कोई सा भी धार्मिक उत्सव हो या समारोह सभी में गुलाब की उपस्थिति अनिवार्य सी ही है। ऐसे इस गुलाब का अस्तित्व अति प्राचीन है। वैज्ञानिकों द्वारा किए शोधों से यह ज्ञात हुआ है कि आज से ढ़ाई करोड वर्ष पूर्व से इस विश्व में गुलाब विद्यमान है। सुमेरियन राजा सारगोन प्रथम सबसे पहले गुलाब टर्की से अपने देश मंें लाया। पारसियों के धार्मिक ग्रंथ अवेस्ता में धार्मिक प्रतीक के रुप में गुलाब का जिक्र मिलता है। हजारों वर्ष पुराने चीनी साम्राज्य में भी गुलाब को ऊंचा स्थान प्राप्त था।

चीन में गुलाब से इत्र तैयार किया जाता था।लेकिन इसका उपयोग कुछ ही लोगों तक सीमित था। रोम निवासी ई. पू. से ही गुलाब के बारे में जानते थे और गुलाब के प्रशंसक थे। रोमनिवासी केवल घरों की शोभा बढ़ाने के लिए ही नहीं बल्कि अपने बिस्तरों और स्नानघरों में भी गुलाब की पंखुडियों का प्रयोग करते थे। महिलाएं अपनी सौंदर्य वृद्धि के लिए नहाने के पानी में गुलाब की पंखुडियों और कलियों का उपयोग करती थी। रोम में पर्व या उत्सव के लिए काफी गुलाब लगते थे इसके लिए गुलाब के बगीचे इटली में ही नहीं अपितु गर्म जलवायु वाले प्रदेश इजिप्ट में भी फैले हुए थे। जहां से गुलाब के फूल नावों द्वारा लाए जाते थे। रोमन सम्राट नीरो को गुलाब के फूल इतने प्रिय थे कि उसके महल में गुलाब की पंखुडियां बिखरी पडी रहती थी। रानी के बिस्तर और रजाइयों में पंखुडियां भरी रहती थी।

तेरहवीं शताब्दी में फूलों की मांग इतनी बढ़ गई कि फूल उत्पादकों को रविवार की भी छुट्टी नहीं मिलती थी। इस समय गुलाब को स्वर्गदूत समझा जाता था। जो बालकों के लिए ईश्वर का आशीर्वाद लेकर आता था। इसलिए यह निर्णय लिया गया कि चर्च का निमार्ण उस स्थान पर किया जाए जहां गुलाब हो। बारहवीं शताब्दी में क्रुसेडर्स (धार्मिक योद्धा) द्वारा गुलाब को सेंट्रल और उत्तरी यूरोप में लाया गया। सोलहवीं शताब्दी तक गुलाबों के उद्यान लगाना एक फैशन हो गया। वानस्पतिक शौक के लिए गुलाब की विभिन्न किस्में बगीचों में लगाई जाने लगी। इस काल में गुलाब शोभा की वस्तु ना होकर उत्सुकता का विषय हो गई। लोग गुलाब की सूखी टहनियों (पत्तियों) से भरी थैली अपने शरीर पर लटकाते थे। ऐसा वे बुरी आत्माओं से बचने के लिए करते थे।

चीन में गुलाब की खेती एक आदर्श और सफल व्यवसाय था। यूरोपवासी गुलाब उत्पादन से 1789 तक अनभिज्ञ ही थे। यूनानी कवि गुलाब के गुणगान गाते थे। प्राचीन यूनान में हर जगह पर गुलाब की खेती होती थी। यूनानी उपनिवेशकों ने सीसली और अफ्रीका का गुलाब से परिचय कराया। गुलाब से जुडी हुई अनेक कथाएं हैं। सन्‌ 1580 में एशिया माइनर के पीले गुलाब की किस्म यूरोप पहुंची। इन दिनों यूरोप में लाल और सफेद गुलाब बहुतप्रिय थे। सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और सत्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में हॉलैंड यूरोप का प्रमुख गुलाब उत्पादक केंद्र था। गुलाब के इतिहास में वर्ष 1804 एक प्रमुख वर्ष है। इस वर्ष सम्राट नेपोलियन प्रथम की रानी जासफीन ने माइल माइसन में गुलाब का सुंदर बगीचा लगाया। इस उद्यान में अपने समय के सभी गुलाब उपलब्ध थे।

भारत में गुलाब बागवानी बहुत बाद में शुरु हुई। वैसे हिमालय में जंगली गुलाब अपनेआप उगते थे। संस्कृत में गुलाब को स्थल कमल, अति मंजुल, तरुणपुष्प आदि नामों से संबोधित किया गया है। मुगलकाल में भारत में गुलाब का प्रचलन काफी बढ़ गया। मुगल सम्राटों को गुलाब बहुत प्रिय थे। उन्होंने गुलाबों के बडे-बडे उद्यान लगाए। नूरजहां को गुलाब से विशेष प्रेम था। वह गुलाब से भरे सरोवर में स्नान किया करती थी। मध्यकालीन कवियों ने अपने कवित्व की माला में गुलाब को पिरोया। भारत के गुलाब के इत्र का अपना एक अलग ही महत्व है। ऐतिहासिक काल में राजा-महाराजा ही केवल इत्र का प्रतिदिन उपयोग कर सकते थे। गुलाब के इत्र और गुलाब पानी का उपयोग करना मुगल सम्राटों की ही बपौती थी। तब फूलों का अर्क या तेल निकालकर, चंदन के तेल में मिलाकर ही इत्र बनाए जाते थे। 

नए जमाने में इत्र इस तरीके से नहीं बनाया जाता अब न तो इसमें फूलों का तेल होता है, न चंदन का तेल। इन्हें सुगंधि मिश्रण या इंडस्ट्रियल परफ्यूम कहना उचित होगा। इनकी माफिक कीमतों के कारण तीज-त्यौहारों में आम आदमी भी इनका उपयोग कर सकते हैं। पुराने जमाने से कन्नौज इत्र के लिए प्रसिद्ध है। ये इत्र महंगे होने के कारण इन असली इत्रों की कीमत चुकाना केवल अमीर लोगों के बस की ही बात है। इस कारण हमारे यहां नियमित रुप से इत्र लगाने की प्रथा नहीं है। वर्तमान में विदेशी परफ्यूम्स, स्प्रे, सेंट कॉलोन आदि चलन में हैं। एक समय में सम्राट हर्षवर्धन की राजधानी रही कन्नौज के इत्र का स्थान विश्व भर में प्रमुख था। दिल्ली, लखनऊ और पटियाला के इत्र भी प्रसिद्ध रहे हैं। भारत में आज भी उत्तरप्रदेश का स्थान इत्र उत्पादन में प्रमुख है। देव अर्चना से आरंभ हुआ इत्र का प्रयोग पहले औषधी के रुप में और बाद में नारियों के श्रंगार का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया। गुलाब के अलावा गेंदा, मेहंदी और मिट्टी का इत्र विशेष रुप से प्रसिद्ध है। मिट्टी के इत्र का इतिहास चार हजार साल पुराना है। कहा जाता है कि मिट्टी के इत्र की खुशबू से विचलित दिमाग शांत हो जाता है।

परंतु, करोडों के इस व्यवसाय की सुगंधित शीशियों में कैद सुगंध का आनंद कुछ लोग उठा नहीं सकते उनके उन पर इसका विपरीत प्रभाव पडता है। इत्रों के प्रति होनेवाली प्रतिक्रिया को पहले एलर्जी नाम दिया गया था लेकिन अब चिकित्सा विज्ञानी इसे रसायन संवेदशीलता कहते हैं। वैसे इस पर भी कोई सहमति हो नहीं पाई है कि इन रासायनिक इत्रों से दर्द किस प्रकार का होता है। कुछ रोगियों ने हर्जाने के मुकदमें जीते भी हैं। कुछ चिकित्सक इस विषय में विशेषज्ञता हासिल कर रहे हैं। सार्वजनिक स्थानों पर इत्र के उपयोग पर प्रतिबंध की मांग का इत्र उद्योग विरोध करता है। देखें आगे जाकर क्या होता है।

Sunday, 19 November 2017

हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 4 भाग 1 - 'ऊँ" शिरीष सप्रे

हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 4   भाग 1 - 'ऊँ"
शिरीष सप्रे

भारतीय संस्कृति में पूजा पद्धति का अपना महत्व है। पूजन-अर्चन में भगवान का स्मरण किया जाता है। पूजा पद्धति में प्रतीकों का  प्रयोग होता है। यह प्रतीक हमारी भारतीय संस्कृति की अनमोल निधि ही हैं, श्री, ओम, रुद्राक्ष, माला, शंख, स्वस्तिक, घंटा, कुश आदि। वास्तव में इन प्रतीकों एवं चिन्हों के बिना हमारी पूजा-अर्चना निष्फल सी जान पडती है। नारियल, कमल, चंदन, रोली, पान, आग्रलकडी, अक्षत-कुंकुम, मंगल कलश और कलावा, आदि भी पूजा पद्धति के आवश्यक भाग हैं। यह प्रतीक भारतीयों को अपनी विचारयात्रा में प्राप्त हुए रत्न हैं, जो तत्त्व रुप में हैं। दैवीय गुणसंपदाओं से युक्त भारतीय संस्कृति जो जड की अपेक्षा चैतन्य और क्षण की अपेक्षा चिरंतन का विचार करनेवाली संस्कृति है द्वारा निर्मित प्रतीक उसका वैभव हैं। जो इंद्रियों को गोचर हैं, उनकी मन में प्रतिमा तैयार होती है जो भव्य, दिव्य है और उनका पूजन प्रतीकों की सहायता से करना पडता है।

ऐसा ही अलौकिक सांस्कृतिक प्रतीक है 'ऊँ"कार। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक देशभर में मिलनेवाला सभी धर्म-संप्रदायों को शिरोधार्य और वंदनीय लगनेवाला आध्यात्मिक एकता का एकमेव रुप यानी 'ऊँ"कार। निरक्षर हो या साक्षर, वैदिक हो या अवैदिक यह सभी को प्रिय है। यह धर्मग्रंथों का सार है। ओंकार ऐसा सनातन प्रतीक है, जिसमें ऋत और सत्य दोनो का समावेश है और ऋत एवं सत्य शब्दों की ऐसी व्याप्ति है कि इनसे बाहर कुछ बचता ही नहीं। जहां-जहां ओंकार है, वहां हिंदू धर्म है। (जिसमें सनातन धर्म, सिक्ख, जैन, बौद्धों का भी समावेश है) योगी, मंत्रविद्या के उपासक, सिद्ध और साधक इन सभीको साधना की सफलता प्राप्त करवा देनेवाला 'ऊँ"कार' ईश्वरस्वरुप है।

श्री 'मां" के अनुसार 'ओम इज द सिग्नेचर ऑफ द लॉर्ड" अर्थात्‌ 'ऊँ"कार विधाता का हस्ताक्षर है। 'ऊँ" किसी एक धर्म विशेष का शब्द नहीं है यह ब्रह्मांड में सदा गूंजते रहनेवाला शब्द है। हिंदुओं के सभी मंत्रों-भजन में यह शामिल रहता है। यहूदी और ईसाई भी इसीके के जैसे एक शब्द 'आमेन" का प्रयोग करते हैं। मुस्लिम इसको 'आमीन" कहकर याद करते हैं। हिंदूधर्म के अंतर्गत आनेवाले बौद्ध इसका 'ओं मणिपद्मे हूं" कहकर प्रयोग करते हैं। सिख धर्म भी इसके गुण गाता है।

'ऊँ"कार का बडप्पन बतलानेवाली अनेक आख्यायिकाएं उपनिषद में मिलती हैं। मांडूक्योपनिषद का विशिष्ट मत है कि, ओंकार परम ब्रह्म का मुख्य वाचक नाम है। यद्यपि वास्तव में परम ब्रह्म का कोई वाचक नाम नहीं होता। क्योंकि, वह वाणि का विषय ही नहीं है। श्रुति भी यही कहती है। यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहु परमां गतिम्‌।। किन्तु उसकी व्याख्या के लिए शब्द के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय भी तो हमारे पास नहीं है। अतः उस अगम्य स्वरुप को बुद्धिगम्य बनाने के लिए उसका कोई कल्पित नाम रखना ही पडेगा। नाम ऐसा हो जो उसके समग्र स्वरुप को अपने अंदर समेट सके, यह सोचकर उसे ओम नाम दिया गया है। ध्यान बिंदु उपनिषद में साधना क्रम में दर्शाया है कि प्रणव को (ऊँ) धनुष, आत्मा को बाण और ब्रह्म को लक्ष्य बनाकर अप्रमादी होकर पूरी तन्मयता से लक्ष्य का संधान करना चाहिए। छांदोग्य उपनिषद की एक कथा के अनुसार मृत्यु ने देवताओं का पीछा करना शुरु किया। देवता घबरा गए। भयभीत और भ्रांत देवता वेद विद्या के आवरण के पीछे छुप गए। परंतु, मृत्यु की दृष्टि से छुप ना सके। भागते-भागते वे 'ऊँ"कार के पास आश्रय के लिए गए। वहां मृत्यु ठिठक गई और पीछे मुड गई।'ऊँ"कार  ने देवताओं को अजर-अमर कर दिया। 

ओम्‌" यानी 'ऊँ" मात्र शब्द न होकर संपर्ण जीवन की अभिव्यक्ति है। शायद ही कोई हो जो 'ऊँ" से परिचित ना हो। इसका उच्चारण कोई मूक भी कर सकता है। यह वेद का भी पूर्ववर्ती है। वेदाध्ययन से पूर्व 'ऊँ"कार का उच्चारण आवश्यक बतलाया गया है। सारे वेद इसीकी घोषणा करते हैं। ओम ब्रह्म का पर्याय है। यह एकाक्षर ब्रह्म का वाचक है। ओंकार ही प्रणव है। सारे तप इसीकी बात करते हैं। ओम के तीन वर्ण अ, ऊ, म त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं। और इन्हीं वर्णों का प्रतीक बना है शिवजी का त्रिशूल। ओम का आरंभ 'अ " से यानी आदिनाथ से और समापन 'म" यानी भगवान महावीर से होता है। इस 'ऊँ" का पूर्ण या अपभ्रंश विश्व में हम कहीं भी चले जाएं तो भी मिल ही जाएगा। 'ओम" के बिना हर धर्म अधूरा है। हिंदूधर्म का यह पवित्र चिन्ह जो 'अ, ऊ, म" से बना है वह ओंकार है। यह सभी मंत्रों का मुकुट है, हिंदूधर्म का प्रमुख चिन्ह है।

श्रीमद्‌भगवतगीता में भी 'ऊँ" के महत्व को कई बार रेखांकित किया गया है। 'ऊँ" के बिना तो कोई पूजा पूर्ण ही नहीं होती। गीता में भगवान ने अपने श्रीमुख से कहा है कि अंतकाल में ओंकार इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण और मेरा स्मरण करते हुए जो देह को छोडता है, उसे परमगति प्राप्त होती है। 'बिंदु युक्त ओंकार का योगीजन नित्य ध्यान करते हैं। यह ओंकार कामनाओं की पूर्ति करनेवाला और मोक्ष देनेवाला है। ऐसे ओंकार को नमस्कार।" यह ओंकार के ध्यान मंत्र का भाव है। ओंकार गणेश का भी प्रतीक है। ओंकार सब मंत्रों का नायक है। सृष्टि की शक्तियों की त्रिपुटी में 'अ "ईश्वर का, 'उ" मूल प्रकृति का और 'म" माया शक्ति का वाचक है।

पाणिनी ने ओंकार के अठराह अर्थ विदित किए हैं। पतंजली ने ओंकार के लिए प्रणव शब्द योजित किया है। प्रणव ईश्वर के लिए उच्चारित किया हुआ स्तुतिपरक शब्द है। एक प्रकार से यह तीन अक्षरों का लघु मंत्र ही है और इसके जाप से संपूर्ण विश्व की सभी दिव्य शक्तियों का स्मरण किया ऐसा हो जाता है। गुरु नानक ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की है 'इक ओंकार सतनाम" परम सत्य का नाम तो एक ही है। चैतन्य और आनंद सच्चिदानंद के सत्य से ही जुडे हुए हैं। सत का सीधा संबंध आत्म-अस्तित्व और परमात्म-संपदा है। ओंकार के अ इस अक्षर के उच्चारण के लिए होंठ खुलते हैं। इससे सृष्टि के निर्माात ब्रह्मा का स्मरण होता है। उ के उच्चारण के लिए होठों का आकार सुराही जैसा हो जाता है उस सुराही के गोलाकार स्वरुप से सृष्टि के पालनहार विष्णु का स्मरण हो आता है और सृष्टि के चक्र का प्रारंभ होता है। म के उच्चारण के समय होंठ बंद हो जाते हैं। यह सृष्टि के लय का प्रतीक है इससे सृष्टि के संहारक शिव का स्मरण होता है। इस प्रका ओम्‌-कार यह परमतत्व प्रदर्शक चिन्ह है।

'ऊँ"कार का मनःपूर्वक चिंतन और मुख से जप ब्रह्म विद्या के द्वार हैं। विनोबा भावे कहते हैं 'व्यक्त संसार और अव्यक्त ब्रह्म इनको जोडनेवाला धागा यानी 'ऊँ"कार। पांडिचेरी की श्री मां के आत्मकथनानुसार  'जब मैं फ्रांस में थी तब हिमालय से आए हुए एक विरक्त मुझसे मिले। सबसे पहले उन्होंने जीवन में मुझे 'ऊँ"कार सुनाया। इस अपरिचित उच्चारण से मेरा मानस झंकृत हो गया, मैं रोमांचित हो गई, इंद्रिय थरथरा गए। उस क्षण से मैं स्वयं  'ऊँ"कारमय हो गई। बोस्टन कनेक्टिकट की एक महिला वैज्ञानिक ने 'ऊँ" पर शोध करने के पश्चात एक बहुत ही रोचक तथ्य पाया। 'ऊँ" की आवृत्ति और अपनी ही धुरी के चारों ओर पृथ्वी के घूर्णन की आवृत्ति के समान है।


दैनिक जीवन में, ग्रंथों और पारायणों पर्वों में उसी प्रकार शुभ कार्यों के आरंभ और अंत में एक शांति मंत्र का जाप करते हैं। वह इस प्रकार से है - 'ओम्‌ शांतिः शांतिः शांतिः"। वैदिक ऋषि 'ऊँ"कार को शांति का वैकल्पिक पद मानते हैं। काम-क्रोध-मोह में शांति आत्मा का परमशुद्ध रुप है। 'ऊँ"कार उसका नमन है। इस शांति पाठ में जीवन की धारक और तारक ऐसी तीन शक्तियों का स्तवन तीन मात्राओं में किया गया है। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक अभ्युदय से संबंधित ऐसी यह तीन शक्तियां कौनसी? तो वे हैं, सरस्वती, लक्ष्मी और श्रीशक्ति। 'ऊँ"कार के कारण इन शक्तियों का आवाहन होता है। 

Saturday, 18 November 2017

रहस्मयी दीपक - रश्मि

रहस्मयी दीपक
रश्मि

वैसे तो कोई भी दीपक सामान्यतः कुछ ही घंटों तक जल सकता है परंतु कुछ ऐसे भी दीपकों का उल्लेख मिलता है जो सैंकडों वर्षों से जल रहे थे और उत्खनन के दौरान जलते हुए ही मिले मिले थे। परंतु, लोगों की छेडछाड के कारण वे बुझ गए। ये दीपक आज भी अबूझ पहेली बने हुए हैं। देखते हैं भविष्य में इनके रहस्य पर से कब परदा उठता है।

चौथी शताब्दी में पैदा हुए ईसाई संत अगस्टाईन ने एक ऐसे दीपक का उल्लेख किया है जो एक मंदिर के खुले प्रांगण में सतत जलता रहता था और किसी भी आंधी, तूफान या वर्षा का उस पर कोई प्रभाव नहीं पडता था। 1550 ई. में इटली के निसिदा टापू में कुछ किसानों को उत्खनन में एक ऐसा दीपक मिला था, जो कांच के बर्तन में बंद था और उसमें से तेज रोशनी निकल रही थी और यह एक हजार वर्ष से जल रहा था। प्रसिद्ध इतिहासकार लिसेटर्स ने भी पिछले 500 से भी अधिक वर्षों से निरंतर जल रहे एक दीपक का वर्णन किया है जो चांदी और सोने से बनाया हुआ था तथा मिट्टी के एक बर्तन में बंद था। यह दीपक एक मकबरे के उत्खनन के दौरान मिला था। सन्‌ 1840 ई. में स्पेन के कोरदोबा नामक स्थान पर रोमन परिवार का एक मकबरा मिला था जिसमें परिवार के सभी सदस्य दफन थे। साथ में एक दीपक भी था पिछले हजारों वर्षों से जल रहा था।


यह अभी भी रहस्य ही बना हुआ है कि ये दीपक आखिर इतने लंबे समय तक किस प्रकार जलते रहे। इस बारे में वैज्ञानिकों ने अनेक अनुमान लगाए लेकिन कोई भी अनुमान तर्क की कसौटी पर खरा उतर नहीं पाया है। (संकलन)

Saturday, 11 November 2017

बाह्याचार विरोधी संत कबीर - शिरीष सप्रे

बाह्याचार विरोधी संत कबीर
शिरीष सप्रे

भारत के धार्मिक एवं दार्शनिक इतिहास के पन्नों में महामनस्वी कपिल, कणाद, बुद्ध महावीर आदि कुछ नाम अंकित हैं, जिन्होंने परम्परा की परवाह अधिक ना कर सत्य के अनुसंधान एवं मानवता पर अपने ध्यान केंद्रित किए थे। इस क्रम में संत कबीर का नाम अनूठा है। अंधविश्वास, गलत रुढ़ियों, मानवता विरोधी विचारधाराओं तथा अज्ञान पर जितनी निर्भयता से करारी चोट कबीरदासजी ने की उतनी किसी ने नहीं की।

कबीर के युग में भी ढ़ोंग, बाह्याचार, कृत्रिमता और साम्प्रदायिकता बढ़ चूकी थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में इन सबका खंडन किया। साम्प्रायिक पाखंडी विचारों और बाह्यचार की अधिकता ने उनमें वितृष्णा भर दी। सारी दुनिया जानती है कि कबीर के विचारों से कई लोग घबराते हैं, कारण है उनके अपने विचारों की दुर्बलता। यह सत्य है कि चोर को चांदनी अच्छी नहीं लगती। परंतु, सत्य का अपलाप भी तो संभव नहीं। कबीर के विचारों एवं सिद्धांतों को गूढ़, अगम्य, आदि कहकर जनता को उनसे दूर करने के प्रयत्न भी किए गए। परंतु, उनके विचारों की धारा को रोका ना जा सका बल्कि लोगों के मन में कुतुहल उत्पन्न हो गया और वे उनकी ओर मुडे। अंधकार कभी सूर्योदय को रोक सका है क्या? कबीर की तो सारी बातें तर्काधारित थी। सत्य की तो सदा विजय ही होती है।

कबीर हिंदू-मुस्लिम दोनों में के ही बाह्याचारों के घोर विरोधी थे। संत कबीर का सारा आग्रह धर्म, मजहब के बाहरी प्रतीकों की अपेक्षा आत्मशुद्धि और आचरण शुद्धि पर है। चरित्रबल ही आत्मबल है। देह मन के आधार पर व्यक्ति किसी भी धर्म या मजहब के अनेकानेक भेदों में पडकर गलतियां करता है। धर्म-मत की विभिन्नताओं का आधार भी बाह्याचार है। आत्मिक आचार, मर्म तो सबका एक ही है। चाहे मनुष्य हो या उनके मजहब, धर्म या मत। विधि-निषेध ही एक दूसरे को अलगाते हैं। कल्पित वर्ण एवं जाति के आधार पर मनुष्य-मनुष्य के बीच में ऊंच-नीच तथा छूत की भावना और मोक्ष एवं सत्य पर किसी कल्पित ईश्वरीय मत का एकाधिकार ये दो धारणाएं मानव समाज के लिए विष हैं। इन दोनों धारणाओं पर संत कबीर का करारा प्रहार है। मनुष्य-मनुष्य में जातिगत कोई भेद नहीं, यदि भेद है तो वह है आचार-विचार एवं रहन-सहन का। कोई भी व्यक्ति इनको सुधार कर महान हो सकता है। मोक्ष एवं सत्य पर किसी भी मत का एकाधिकार नहीं। मोक्षपथ के बिचौलिए सांप्रदायिक दलाल हटा देना चाहिए।
 
मोटे रुप में जिसप्रकार पहने हुए बाहरी वस्त्रों की भिन्नता में कपडों की डिजाईन, रंगो, आकार-प्रकार की भिन्नता कई प्रकार की हैं पर उन पहने हुए कपडों की भिन्नता के नीचे चमडी की भिन्नताएं, अपेक्षतया कम होती हैं और चमडी के नीचे की देह के अंदर मानसिक वृत्तियों में चमडी की भिन्नताओं से कम भिन्नता होंगी। रोना, हंसना, प्यार, घृणा के मूल भावों में सब एक समान हैं। बस उन्हें प्रकट करने के हाव-भाव, स्थान-स्थिति की भिन्नता से पृथक हो सकते हैं और अंततः आत्मिक स्तर पर सब एक अभिन्न धरातल पर आ खडे होते हैं। इसी आंतरिक धरातल पर चारित्रिक-शुद्धि पर बल देने से जातीय-मजहबी विभिन्नताएं समाप्त हो जाती हैं। क्योंकि, दोनों हिंदुओं और मुसलमानों ने अपना-अपना साहब और उसकी कल्पना भिन्न-भिन्न बना रखी है-

'न जाने तेरा साहब कैसा है। मस्जिद भीतर मुल्ला पुकारे, क्या तेरा साहिब बहिरा है? चिउंटी के पग नेवर बाजे, सो भी साहब सुनता है। पंडित होय के आसन मारै, लंबी माला जपता है। अंतर तेर कपट-कतरनी, सो भी साहब लखता है।" इन धार्मिक पद्धतियों का विरोधाभास और विडंबनाएं दिखाकर कबीर दोनों की सामाजिक-आर्थिक विभेदात्मक विडबंनाएं दिखाते हैं - 

'सतवंदी को गजी मिलै नहिं, वैश्या पहिरै खासा है। जेहि घर साधु भीख न पावे, भडुआ खान बतासा है।" इस एक ही पद में धर्माचारों के साथ सामाजिक व्यवहारों  को जोडने की मंशा से कबीर के अभिप्रेत पर सहज ही पहुंचा जा सकता है। ऐसे समाज और व्यक्तियों के सोच व्यवहार, बर्ताव के भ्रष्ट आचरणों पर कबीर को सख्त आपत्तियां हैं। व्यक्तियों की भांति समूचे समाज के चरित्र व्यवहार को कबीर नकारते हैं एवं मानवीय सद्‌ व नेक बर्तावों की जरुरत को महत्व देते हैं।

कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे उनका जो भी ज्ञान था वह अनुभवजन्य था उसके दर्शन निम्न दोहों में होते हैं-

"तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आंखों की देखी।' उनका यह दोहा तो बहुत ही प्रसिद्ध एवं हितकारी है- निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाये। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।। अन्य बहुउपयोगी दोहे हैं -  जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय। जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय।। लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट। पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट।। गुरु महिमा गान के समय हमेशा जिस दोहे का उद्धहरण दिया जाता है वह कबीर का ही है- गुरु गोविंद दोउ खडे काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।। कटु भाषा बोलनेवालों को यह दोहा सुनाया जाता है- ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोये। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय।। समय की पाबंदी के लिए यह दोहा है- काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।। अंत में यह दोहा- सांई इतना दीजिये, जामे कुटुंब समाये। मैं भी भूखा ना रहूं, साधू ना भूखा जाये।। 

Thursday, 9 November 2017

मिजाज बिगाड रहा है शोर - शिरीष सप्रे

मिजाज बिगाड रहा है शोर
शिरीष सप्रे

सभी स्थानों पर यह कैसा शोर-गुल और कोलाहल? कहीं टी. व्ही. का शोर तो, कहीं लाउड स्पीकर की तेज आवाज, मोटर गाडियों, कल-कारखानों की तेज आवाजें। घरों में गृहिणियों द्वारा चलाए जानेवाली मिक्सियों की ध्वनि। दो मिनिट शांति से बैठ भी ना सकें और मोबाईल या टेलीफोन की घंटी। अचानक ही साइलेंसर विहिन दोपहियों की तेज आवाजें भी गाहेबेगाहे सुनने में आ ही जाती हैं। हवाई जहाज की आवाज, ट्रेन की आवाजें। लगता है जैसे सभी जबरदस्त ध्वनि प्रदूषण फैलाने में जोर शोर से लगे हुए हैं बिना किसी ऐसे एहसास कि इसके क्या दुष्परिणाम होंगे। शोर कम करना शायद हम लोग सीखे ही नहीं हैं। लाडस्पीकर पर जोर-जोर से भजन सुने, गाए बगैर हमें मजा ही नहीं आता। इसी कडी में जोर शोर से लडना भी शामिल है।

लेकिन,शायद आप जानते ही न हों कि यह शोर कितना हानिकारक है? लगता है हमें शोरगुल की आदत सी ही पड गई है और जाने-अनजाने हम सब इसकी गिरफ्त में जकडे हुए हैं। हम इस शोर को अपने जीवन का स्वाभाविक अंग मान बैठे हैं। यहां तक कि हमें इस विचार से राहत मिलती है कि शोर मतबल हमारे आसपास कोई है। इसलिए कि, पडौसी का रोता बच्चा, पास की किसी बिल्डिंग में चलती ड्रिलिंग मशीन का शोर, फेरीवाले की आवाज, यातायात की ध्वनियां ये सब हमारी चेतना को मारती हैं। हम में से अधिकतर यह जानते ही नहीं हैं कि, शोर हमारे मस्तिष्क में वहीं दर्ज होता है जहां भय, आक्रमण और सुरक्षा के केंद्र हैं और अंततः हमारी चेतना को कमजोर बनाते हैं। पर्यावरणवादियों के अनुसार आनेवाले समय में ध्वनि प्रदूषण विकासशील देशों में बीमारियों का सबसे बडा कारण होगा।
विश्व में सर्वाधिक शोरगुल में लिप्त हम भारतीय लगता है कि, इस भयानक स्थिति के संबंध में जरा भी चिंतित नहीं हैं। औद्योगिक शोर भी एक बहुत बडा खतरा है। लेकिन अफसोस है कि कारखानों में उत्पन्न शोर को नियंत्रित करने की कोई कोशिश नहीं की जाती है जिसके कारण औद्योगिक पेशे से जुडे श्रमिकों में बहरेपन के प्रकरण मुंबई और चेन्नई में किए गए अध्ययनों के दौरान देखने में आए हैं। संगीत के शौकिनो के लिए भी ध्वनि प्रदूषण के कारण कठिनाइयां खडी हो सकती हैं। यदि वे लगातार चार घंटे तक रॉक संगीत सभा को सुनें। लेकिन इन ध्वनि प्रदूषणकर्ताओं पर किसी तरह की निषेधात्मक कार्यवाही होते नजर नहीं आती। अंतर राष्ट्रीय मापकों के अनुसार ध्वनि प्रदूषण से बच्चों को बचाने के लिए छोटे बच्चों के स्कूल ऐसे स्थान पर होने चाहिएं जहां ध्वनि का स्तर केवल 20-25 डेसिबल हो मगर दुर्भाग्य से ऐसा होता नहीं है और बचपन से ही उनकी श्रवण क्षमता पर असर पडने लगता है।

एक सर्वेक्षण के अनुसार हर समुदाय का अपना एक शोर का वातावरण होता है। सामाजिक रुप से भी देखा गया है कि समृद्ध और शिक्षित वर्ग के लोग अपेक्षाकृत कम शोर करते हैं। वास्तव में किसी प्रकार के निवारक उपाय न होने के कारण भारत के शहर पश्चिमी देशों की अपेक्षा कहीं अधिक ध्वनि प्रदूषित हैं। मुंबई के कुछ क्षेत्रों ने तो सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए हैं। वहां के कई लोग गंभीर रुप से प्रभावित हो रहे हैं। वास्तव में हम भारतीय मूलतः शोर मचानेवाले लोगों में ही हैं और इस मामले में असंवेदनशील हैं। योरोप में तो मल्टी स्टोरिड बिल्डिंगों में देर रात नहाने पर एक तरह के अघोषित कर्फ्यू का पालन किया जाता है ताकि नल से गिरते पानी की आवाज से पड़ौसी परेशान न हों। जबकि हमारे यहां तो मंदिरों-मस्जिदों में चलनेवाले लाउडस्पीकर युद्ध के कारण साम्प्रदायिक दंगे तक भडकने की बातें सामने आई हैं।

अब हम यह जान लें कि शोर क्या है? जो ध्वनियां सुनने में अप्रिय लगती हैं वे शोर या कोलाहल हैं। चिकित्सा विज्ञानियों ने भी अप्रिय ध्वनि को शोर कहा है। शोर या ध्वनि प्रदूषण को इस प्रकार भी परिभाषित किया जा सकता है कि, जो श्रोताओं को अरुचिकर लगे। एक पुरानी कहावत के अनुसार किसी प्रकार की ध्वनि या तो संगीत है या फिर शोर। यूं भी कह सकते हैं कि, जो ध्वनि कर्णप्रिय है, सहज है, वह संगीत है और जो कर्कश है, कष्टदाई है, वह शोर है। शोर के बारे में यही कहा जा सकता है कि यह एक खिजानेवाली चीज है जो जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। अपने सबसे बुरे रुप में यह एकाग्रता को भंग करके, उत्पादकता में कमी लाती है। यह अवसाद, तनाव और बहरेपन का कारण भी है। लेकिन खेद है कि ध्वनि प्रदूषण पर हमारी चेतना जागृत नहीं है। ध्वनि प्रदूषण का एक प्रमुख कारण कारों का हॉर्न बजाना भी है जिसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव अस्पतालों पर पडता है।


अब चूंकि, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने भी पर्यावरण अधिनियम में सुधार कर लिया है जिसके अंतर्गत अब हवा की गुणवत्ता और ध्वनि प्रदूषण के मानकों के उल्लंघन के लिए लोगों पर मुकदमा चलाया जा सकता है। अगर ध्वनि प्रदूषण के मुद्दे पर जनआंदोलन शुरु हो जाएं तो मौन क्षेत्रों (साइलेंस जोन्स) को कडाई से लागू करके नियमों का उल्लंघन करनेवालों पर दंड किए जा सकेंगे। वर्तमान में हर स्थान पर ध्वनि का तीव्रता तेज गति से बढ़ती जा रही है। अगर इसी रफ्तार से बढ़नेवाले ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित नहीं किया गया तो आनेवाले वर्षों में बहरों की संख्या में अत्याधिक वृद्धि दिखेगी। अब सबकुछ सरकार पर छोडने के स्थान पर शोर कम करने के लिए हमें भी सहयोग देना चाहिए।

Friday, 3 November 2017

हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 3 - श्री शिरीष सप्रे

हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 3 - श्री  - शिरीष सप्रे

भारतोद्‌भव धर्मों (सनातनी, जैन, बौद्ध, सिख) एवं संस्कृति में 'श्री" का प्रयोग सर्वव्यापक है। संज्ञा के रुप में 'श्री" का अर्थ हुआ प्रकाश, चमक, कांति, वैभव या शान, सुंदरता, गौरव, या परमेश्वर का गुणगान, आदरणीय और श्रीमान, समृद्धता, समृद्धि आदि। विशेषण के रुप में भी 'श्री" का प्रयोग किया जाता है ः योग्य, शुभ, दीप्तीमान, उज्जवल, अतिउत्तम। किसी व्यक्ति के नाम के सम्मुख पहले श्री लिखा जाता है। अर्थात्‌ यह व्यक्ति श्री से युक्त हो। श्रीहत ना हो। श्री शुभकामना का एक संक्षिप्त रुप है। किसी भी कार्य को आरंभ करने के पूर्व श्री लिखना यश और शुभ लक्षणों का सूचक माना जाता है। विभिन्न मतों में श्री का एक ही अर्थ ग्रहण किया जाता है और वह है शोभा, सुंदरता और समृद्धि से युक्त होना। सौंदर्य रुप में भी श्री का प्रतिकार्थ ग्रहणीय है। धर्म, अर्थ एवं काम का त्रिवर्ग है 'श्री"।

श्री देवी लक्ष्मी का एक नाम है साथ ही वह देवी सरस्वती के लिए भी प्रयोग में लाया जाता है। श्री का अर्थ समृद्धि के देवता गणेशजी से भी लिया जाता है। अनेक देवी-देवताओं का आदरपूर्वक उल्लेख करते समय श्री उपयोग में लाया जाता है जैसेकि, श्रीदुर्गा, श्रीराम,श्रीकृष्ण। विभिन्न भारतीय भाषाओं में श्री लिखने के विविध प्रकार हैं। परंतु,  संस्कृत, हिंदी, मराठी, भोजपूरी, नेपाली में श्री समान रुप से उपयोग में लाया जाता है। श्री का प्रयोग हमारी संस्कृति में इतना व्यापक है कि एक शास्त्रीय राग जो कि पुरुष राग है का नाम ही रागश्री है। अन्य राग हैं धनश्री, बागेश्री, मालाश्री, जयंतश्री, आदि। कुछ नगरों के नामों में भी श्री प्रयोग में लाया जाता है। जैसेकि, श्रीनगर, श्री गंगानगर, श्रीपेरम्बदूर, श्रीकाकुलम, श्री जयवर्धनपूर श्रीलंका की प्रशासनिक राजधानी, इंडोनेशिया के सुमात्रा का एक राज्य की राजधानी श्रीविजय आदि।

पंजाबी में प्रयुक्त किया जानेवाला अभिवादन सूचक शब्द है सत श्री अकाल जो भारतीय सेना के रणनादों में से एक है और भारतीय चलचित्रों में भी सर्वाधिक चित्रित किया गया है। सत श्री अकाल का अर्थ है - सत यानी सत्य, श्री एक सम्मानसूचक शब्द और अकाल का अर्थ है समय से रहित यानी ईश्वर अर्थात्‌ ईश्वर ही सत्य है। धार्मिक ग्रंथों के साथ भी श्री शब्द उपयोग में लाया जाता है जैसेकि, श्री गुरुग्रंथ साहिब, श्री रामचरित्‌मानस आदि। ओम श्री गणपतये नमः से पूर्वकाल में शिक्षा प्रारंभ की जाती थी। दोष या बाधा निवारण के लिए श्री यंत्र उपयोग में लाया जाता है।

हमारी संस्कृति के सामाजिक शिष्टाचारों में श्री शब्द का प्रयोग श्री, श्रीमान और श्रीमति शब्दों में भी हुआ है जिनका बडा महत्व है।  आमतौर पर श्री और श्रीमान शब्द पुरुषों के साथ लगाए जाते हैं और श्रीमति महिलाओं के लिए। परंपरानुसार श्री और श्रीमान तो पुरुष विवाहित हो या अविवाहित दोनो के लिए ही प्रयुक्त होता है परंतु, श्रीमति केवल विवाहित महिलाओं के लिए ही प्रयुक्त होता है और अविवाहिता के लिए सुश्री शब्द लगाना प्रचलन में है। श्रीमान या श्रीमत संज्ञा भगवान विष्णु को लगाई जाती है। श्री स्त्रीवाची शब्द है और लेख के प्रारंभ में ही हमने श्री के जो अर्थ बतलाए हुए हैं वे सब श्री में ही समाहित हैं अतः सारा संसार ही श्री का आश्रय लेता है। श्री के साथ रहने के कारण ही भगवान विष्णु को श्रीमान कहा गया है। इसीलिए श्रीमत्‌ हुए। भावार्थ यह है कि, कण कण में ईश्वर व्याप्त है। श्री तो स्वयंभू हैं। श्री का जन्म संस्कृत की 'श्रि" धातु से हुआ है जिसमें धारण करना, शरण लेना जैसे भाव हैं। स्त्री ही वह शक्ति है जो सबकुछ धारण करती है, जो सृष्टि के मूल में है इसलिए उसे श्री कहा गया है। 'श्री" शब्द  वैभव, कीर्ति, यश का द्योतक है। यह शब्द शोभा, सौंदर्य, गौरव, कांति व चमक को दर्शाता है। शुभपत्रों का आरंभ 'श्री" शब्द से ही होता है। 

वेदों में श्री का उल्लेख पर्याप्त मिलता है। अथर्ववेद में श्री का उल्लेख पृथ्वी माता के रुप में है। ऋगवेद में श्री शब्द को लक्ष्मीजी का रुप दिया गया है। यजुर्वेद में श्री व लक्ष्मीजी दोनो को विष्णु देवता की पत्नी का दर्जा दिया गया है। समस्त उत्सव, मांगलिक पर्वों में श्री का उच्चारण किया जाता है। तंत्र-मंत्र माननेवाले इसे आंतरिक समृद्धि, सौंदर्य तथा उन्नति के रुप में मान्यता देते हैं।

ऋगवेद में श्री का उल्लेख 'श्री सूक्त" के रुप में मिलता है। जिसे 'श्री" और 'लक्ष्मी" से संबोधित किया गया है। इस सूक्त का पाठ धन-धान्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्ति के लिए किया जाता है। इसमें लक्ष्मी के सत्तर नाम हैं। इसमें वे हिरण्यवर्णा तो हैं ही लेकिन आदि ऋषि ने भूदेवी, ज्वलंती, हरिणी, मनोज्ञा और लक्ष्मी कहकर उनकी स्तुति की गई है। अर्थात्‌ वे धरती की देवी हैं, दीपमयी हैं, दुख हरनेवाली, हरेक के दुख-सुख को जाननेवाली और स्वजनों के उद्धार का उपाय सोचनेवाली हैं। लक्ष्मी का यही सच्चा स्वरुप है।  हिंदूधर्म में षोडशोपचार पूजा करते समय पुरुष सूक्त के समान ही श्री सूक्त भी कहा जाता है। ऋगवेद में श्री का अर्थ सौंदर्य है। ऋगवेद काल में भी श्री का तात्पर्य महत्व, प्रतिष्ठा और समृद्धि से था। शतपथ ब्राह्मण में श्री का मूर्त रुप भी सामने आया है। इसकी एक कथा में प्रजापति की 'श्री" उसके तापस द्वारा प्रकट की गई है, जो स्वर्ग की देवी की भांति दैदीप्यमान हो गई। यहां सौंदर्य की अमूर्त भावना दिव्य मूर्ति के रुप में परिणत हो गई। 'श्री" का प्रतीकार्थ हम ग्रहण करें और 'श्री" अनुरुप बनें, तभी श्री का प्रयोग सार्थक होगा।


श्री प्राप्ति की पौराणिक कथा यों हैं कि महर्षि दुर्वासा के शाप से श्रीहीन हो चूके इंद्रादि देवताओं से विष्णु ने सागर मंथन का परामर्श किया महकच्छप की आधारीत शिला, मंदराचल पर्वत की मथनी, वासुकी नाग की रस्सी। मथनी के एक ओर देवता, दूसरी ओर दानव। सागर मंथन हुआ। अन्य बहुमूल्य वस्तुओं के साथ श्री भी बाहर आई। श्रीयुक्त होकर देवराज इंद्र फिर स्वर्ग के सिंहासन पर बैठे।

Sunday, 29 October 2017

अद्वितीय है नमक

अद्वितीय है नमक
शिरीष सप्रे

नमक हमारे प्रतिदिन के आहार का एक अविभाज्य अंग है। नमक के बगैर तो हमारे भोजन की कल्पना भी हमारे लिए मुश्किल सी ही है, भोजन स्वादहीन सा ही जो हो जाता है। यह हमारे जीवन पद्धति का अविभाज्य भाग सा ही है। विभिन्न गुणधर्मोंवाले नमक के कई प्रकार और अलग-अलग स्वाद हैं। नमक को लेकर कई हिंदी फिल्मों का नामकरण भीहुआ है जैसे नमक हलाल, नमक हराम तो, मुंशी प्रेमचंद जैसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार ने इस नमक को लेकर 'नमक का दरोगा" जैसी अमर कथा की रचना की है। गांधीजी का नमक सत्याग्रह भी प्रसिद्ध है। जिसके कारण गांधीजी दुनिया की नजरों में आए और इस आंदोलन को यूरोप-अमेरिका की प्रेस ने भी भरपूर कवरेज दी थी। मशहूर टाइम पत्रिका ने इसे दुनिया के दस सबसे बडे आंदोलनों में शामिल किया है। टाइम का कहना है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम को इस आंदोलन से मजबूती मिली।

आज हमें आश्चर्य होगा किंतु इस साधारण से लगनेवाले नमक को लेकर 12 फीट (3.7मी.) ऊंची और लगभग 2300 कि.मी. लंबी एक बागड भारत में ब्रिटिशों ने खडी की थी, नमक की तस्करी को रोकने के लिए। जो उनकी इनलैंड कस्टम लाइन का एक भाग थी। 1803 में ब्रिटिशों द्वारा भारत से नमक की तस्करी को रोकने और उसके यातायात पर कर लगाने के लिए तत्कालीन पंजाब (मुलतान, वर्तमान में पाकिस्तान का हिस्सा) से लेकर ओरिसा के सोनापूर गांव तक यह इनलैंड कस्टम लाइन खडी की गई थी। कुल 4000 कि.मी. लंबी यह कस्टम लाइन यानी भारतीयों के अधिकारों और मुक्त व्यापार नीति पर लगाया गया प्रचंड ऐसा मूर्त रुप था। उस जमाने में इस बागड की तुलना चीन की दीवार से की गई थी। नमक की चोरी करनेवाले तस्करों को रोकने के लिए ब्रिटिशों ने यह लाइन विकसित की थी। 1872 तक इनलैंड कस्टम विभाग में कस्टम अधिकारी, जमादार और गश्त लगाने वाले सामान्य रक्षक जैसे लगभग 14000 के आसपास लोग इस कस्टम लाइन की सुरक्षा के लिए तैनात किए गए थे। 1879 में नमक के अंतरदेशीय आयात-निर्यात पर कर लगाया गया। जो सन्‌ 1946 तक चालू था। इसी नमक के कानून को तोडने के लिए गांधीजी ने उनकी विश्वप्रसिद्ध दांडी यात्रा निकाली थी। 

प्रतिदिन की रसोई के लिए उपयोग में आनेवाले इस नमक का भी एक बडा इतिहास है जो बडा ही रोचक भी है। नमक का शोध मानव संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण क्रांतिकारी टप्पा माना जाता है। आश्चर्य होगा परंतु, इसको लेकर युद्ध तक हुए हैं, नमक की खोज के लिए अनेक अभियान भी हुए हैं। महाकवि होमर ने तो इसे 'डिव्हाईन सबस्टन्स" के रुप में गौरवान्वित किया हुआ है। बीसवी शताब्दी के प्रारंभ तक और आधुनिक भूगर्भशास्त्र द्वारा सिद्ध किए जाने तक तो पृथ्वी पर सर्वत्र नमक है यह ज्ञात ही नहीं था। भूगर्भशास्त्र और रसायन शास्त्र दोनो में ही नमक का महत्व अग्रक्रम पर रहा है। सॅलरी यानी वेतन शब्द साल्ट यानी नमक पर से ही रुढ़ हुआ है। इस नमक ने खाद्य संस्कृति तो निर्मित की ही साथ ही मनुष्य के स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने में अपना सहयोग दिया है। धार्मिक कार्यों में भी नमक का महत्व है। तांत्रिक विधियों में भी नमक को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। धीरे-धीरे जिसका नमक खाया उसे धोखा देना नैतिक अपराध माना जाने लगा। 

मानव जीवन के लिए अमूल्य और उपकारी ऐसे नमक का शोध कोली समाज ने लगाया। सर्वप्रथम यह शोध कच्छ में लगा। कच्छ कारण साल्ट डेजर्ट के नाम से जाना जाता है। फिर धीरे-धीरे जहां अनुकूल किनारे और वातावरण था वहां नमक की खेती का उद्योग फैलने लगा। कोली समाज के जो परिवार नमक की खेती की ओर बढ़े उन्हीं में से आगरी समाज का उदय हुआ। कोली और आगरी मूलतः एक ही समाज के घटक। इनकी एकता बतलानेवाली पुराणकथा इस प्रकार है - अगस्त्य ऋषि के आंगले और मांगले ऐसे दो पुत्र थे और इनसे क्रमशः आगरी और कोली समाज का जन्म हुआ।

कच्छ के रण में लगभग 4 फीट गहराई तक नमक है और मीलों तक मिट्टी या जमीन दिखलाई नहीं पडती। नमक के कारण यहां की हवा भी शुष्क है। सीमा सुरक्षा बल के जवानों ने आने-जाने के लिए नमक को बीच में से काटकर एक सडक का निर्माण किया है। एक और अद्‌भुत विशेषता इस स्थान पर देखने को मिलती है। वह है सामान्यतः दूर की वस्तुएं छोटी दिखलाई पडती हैं किंतु इस रेगिस्थान में दूर स्थित छोटीसी झाडी बहुत बडा पेड दिखाई पडता है। परंतु, जैसे-जैसे हम उसके निकट पहुंचते हैं वह झाडी छोटी दिखलाई लगने लगती है। रेगिस्थानी क्षेत्र होने के कारण बालू भरी आंधियां चलना स्वाभाविक है। जब यहां तेज हवाएं चलती हैं तो जैसे मधुर संगीत सुनाई देता है। प्रकृति की इन आश्चर्यजनक घटनाओं को देखकर किसी महान शक्ति के अस्तित्व में कोई संदेह नहीं रह जाता। भारत में प्रकृति की अनेक ऐसी अनेक अमूल्य धरोहरें हैं।

Thursday, 19 October 2017

पर्वों का पर्व महापर्व है - दीपावली

पर्वों का पर्व महापर्व है - दीपावली
शिरीष सप्रे

उत्साह का पर्व है दीपावली, 'तमसोमा ज्योतिर्गमय" की भावना से जुडा हुआ 'प्रकाश पर्व" है 'दीपावली"। इस पावन मंत्र को लेकर आनेवाले कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्र्योदशी से लेकर शुक्ल पक्ष की दूज तक का पंचदिवसीय समय दीपावली के नाम से पुकारा जाता है। दीपों की कतार को प्रज्वलित करने का, जगमगाने का पर्व है दीपावली। वात्सायन कामसूत्र के अनुसार 'यक्षरात्रि" तथा राज मार्तंड के आधार पर 'सुखरात्रि" कहते हैं। निर्णय सिंधु काल तत्व विवेचन के अनुसार यह पर्व चतुर्दशी, अमावस्या और कार्तिक प्रतिपदा इन तीन दिनों तक मनाया जानेवाला कौमुदी उत्सव के नाम से प्रसिद्ध है।

प्राचीन संस्कृति को जीवित रखने के लिए हम दीपावली का पर्व हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाते हैं। वस्तुतः दीपावली का उत्सव पांच दिनों तक, पांच कृत्यों के साथ मनाया जाता है और पांचों दिन अपनेआप मेंं स्वतंत्र पर्व की हैसियत रखते हैं। यथा धनतेरस अर्थात्‌ धन-पूजा, नरक चतुर्दशी यानी नरकासुर पर विष्णु की विजय का उत्सव, लक्ष्मी पूजा 'श्री" का आवाहन पर्व, द्यूत दिवस अर्थात्‌ भाईदूज नाम से बहन-भाई के प्रेम का आदान-प्रदान का उत्सव। इसे यम द्वितीय भी कहते हैं। इन पांच दिनों में दीपदान, बलिपूजा, गाय-बैलों की पूजा, गोवर्धन पूजा, नव वस्त्र धारण करना, द्यूत क्रीडा, माला बांधना आदि कृत्य किए जाते हैं।
लक्ष्मी पूजन के समय, विशेषकर व्यापारी वर्ग 'शुभ", 'लाभ" अवश्य लिखता है। भारतीय संस्कृति का प्रतीक चिन्ह है 'स्वस्तिक"। इसे भी लक्ष्मी पूजन के समय अंकित करते हैं। 'शुभ",'लाभ" शब्दों में व्यापक अर्थ तथा सामाजिक भावनाएं छिपी हुई हैं। शुभ से तात्पर्य है कल्याणकारी। ऐसे कार्य जिनसे अधिकाधिक लोगों का कल्याण हो, मानवीय गरिमा तथा प्रतिष्ठा के अनुकूल हो। लाभ शब्द भौतिक उपलब्धियों का परिचायक है। यह समृद्धि में निरंतर वृद्धि का संदेश देता है। इस शब्द को अंकित कर हर आनेवाले की समृद्धि, वृद्धि की कामना के साथ मानो हम अपनी समृद्धि और उसकी वृद्धि की कामना रखते हैं। परस्पर लाभ के प्रयासों से सामाजिक बंधन सुदृढ़ होते हैं एवं उन्हें गतिशीलता मिलती है। जब तक हम एक दूसरे के लिए उपयोगी और लाभकारी नहीं होंगे, तब तक व्यवहारिक रुप से हम एक दूसरे के संबंधों का निर्वाह करने में भी असमर्थ रहते हैं।
इसके अलावा पर्वों का यह समूह अनेक महामानवों भगवान राम, कृष्ण, महाप्रतापी-दानवीर राजा बलि, धर्मराज युधिष्ठिर, भगवान बुद्ध, महावीर, सम्राट अशोक, सम्राट विक्रमादित्य और आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती एवं वेदांत के प्रचारक स्वामी रामतीर्थ आदि की पावन स्मृति को अपने भीतर संजोए बैठा है। कार्तिक अमावस्या के ही दिन सिखों के छठे गुरु हरगोविंदसिंहजी बादशाह जहांगीर की कैद से छूटकर अमृतसर वापिस आए थे। विख्यात स्वर्णमंदिर का निर्माण भी दीपावली के ही दिन प्रारंभ हुआ था।
यह पर्व मूलतः दीपोत्सव 'श्री" अथवा लक्ष्मी का आवाहन पर्व है। आद्यशक्ति, अच्युतप्रिया भगवती लक्ष्मी के पूजन का पर्व है। समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में लक्ष्मी रुपी रत्न भी एक था। इस रत्न का प्रादुर्भाव कार्तिक की अमावस्या को हुआ था। तभी से यह तिथि लक्ष्मी पूजन का पर्व बन गया। लक्ष्मी की चर्चा ऋग्वेद में सबसे पहले हुई है। 'श्री" धन की देवी है तथा भगवान विष्णु की पत्नी है। जब हरि ने बावन रुप धारण किया तो लक्ष्मी कमल के रुप में अवतरित हुई। जब विष्णु परशुराम के रुप में आए तो 'लक्ष्मी" 'धरनी" कहलाई। राम के साथ सीता तो कृष्ण के साथ रुक्मिणी बनकर वे सदैव विष्णु की पत्नी बनती चली आई हैं।
लक्ष्मी का जो वर्तमान स्वरुप, जनता में व्याप्त है उसके अनुसार वे कमल पर विराजती हैं उनके हाथ में कमल है, उल्लू उनका वाहन है और वे धन संपदा की अधिष्ठात्री देवी हैं। लक्ष्मी केवल समृद्धि की देवी नहीं हैं। लक्ष्मी का भारतीय वाड्‌ग्‌मय में सर्वप्रथम उल्लेख हमें ऋग्वेद में प्राप्त होता है और उससे ज्ञात होता है कि उस समय लक्ष्मी का अर्थ अत्यंत व्यापक रुप में ग्रहण किया गया था। ऋग्वेद के 'श्री" सूक्त में लक्ष्मी के सत्तर नाम दिए गए हैं। जिन्हें पांच स्वरुप में बांटा गया है। ये हैं स्वरुपसूचक, श्री विग्रहपरक, पतिप्रेमप्रदर्शक, वैभवप्रतिपादक और भक्ताभिलाषक। इन नामों की परिधि बडी विशाल है। उनका प्राचीनतम नाम 'श्री" है इस संदर्भ में विद्वानों की यह मान्यता है कि 'श्री" शब्द का संदर्भ ऋगवेद में सौभाग्य के रुप में आया तथा कालांतर में अथर्वेद में उसका नारी के रुप में मानवीकरण हो गया। 'श्री" सूक्त में 15 मंत्र हैं। श्री सूक्त के अनुसार लक्ष्मी पद्‌मासना है, पद्‌मालया है, कमल में ही निवास करती है। कमल सौम्यता, समृद्धि एवं सौंदर्य तीनों का ही प्रतीक है और लक्ष्मी के साथ कमल का घनिष्ठ संबंध है।
ऋग्वेद की लक्ष्मी की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि वह केवल धन की ही देवी नहीं थी, वह राष्ट्र की सौंदर्य और समृद्धि दोनो की अधिष्ठात्री देवी थी। ऋग्वेद के प्रथम सूक्त के अनुसार, हिरण्यवर्णा हरिणां सुवर्णा रजतस्त्रजां। चन्द्रां हिरण्यमयी लक्ष्मीं जात वेदो म आवह।। अर्थात्‌ तपे हुए सोने के समान कांतिवाली, मनोहर रुपवाली, सोने तथा चांदी के आभूषणों से शोभित, सूर्य के समान प्रकाशवाली पर चंद्रमा के समान शीतल किरणों से प्रभाववाली सुवर्णांगिना लक्ष्मी का हम आवाहन करते हैं। लक्ष्मी के स्वभाव में धन का गर्व और तेज है तो साथ ही ऋग्वेद के एक अन्य सूक्त में उनके ह्रदय में माता की उदारता, शांति भावना भी दर्शाई गई है। सूक्तकार ने धन ऐश्वर्य के साथ-साथ दानवृत्ति के समन्वय को प्रस्तुत किया है। ऋग्वेदोक्त लक्ष्मी की करुणा असीम बतलाई गई है। ऋग्वेदिक लक्ष्मी मंगलकारी और पूर्णकामा है और उर्वरता की देवी है।
पर्वों का पर्व महापर्व है - दीपावली
शिरीष सप्रे
उत्साह का पर्व है दीपावली, 'तमसोमा ज्योतिर्गमय" की भावना से जुडा हुआ 'प्रकाश पर्व" है 'दीपावली"। इस पावन मंत्र को लेकर आनेवाले कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्र्योदशी से लेकर शुक्ल पक्ष की दूज तक का पंचदिवसीय समय दीपावली के नाम से पुकारा जाता है। दीपों की कतार को प्रज्वलित करने का, जगमगाने का पर्व है दीपावली। वात्सायन कामसूत्र के अनुसार 'यक्षरात्रि" तथा राज मार्तंड के आधार पर 'सुखरात्रि" कहते हैं। निर्णय सिंधु काल तत्व विवेचन के अनुसार यह पर्व चतुर्दशी, अमावस्या और कार्तिक प्रतिपदा इन तीन दिनों तक मनाया जानेवाला कौमुदी उत्सव के नाम से प्रसिद्ध है।
प्राचीन संस्कृति को जीवित रखने के लिए हम दीपावली का पर्व हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाते हैं। वस्तुतः दीपावली का उत्सव पांच दिनों तक, पांच कृत्यों के साथ मनाया जाता है और पांचों दिन अपनेआप मेंं स्वतंत्र पर्व की हैसियत रखते हैं। यथा धनतेरस अर्थात्‌ धन-पूजा, नरक चतुर्दशी यानी नरकासुर पर विष्णु की विजय का उत्सव, लक्ष्मी पूजा 'श्री" का आवाहन पर्व, द्यूत दिवस अर्थात्‌ भाईदूज नाम से बहन-भाई के प्रेम का आदान-प्रदान का उत्सव। इसे यम द्वितीय भी कहते हैं। इन पांच दिनों में दीपदान, बलिपूजा, गाय-बैलों की पूजा, गोवर्धन पूजा, नव वस्त्र धारण करना, द्यूत क्रीडा, माला बांधना आदि कृत्य किए जाते हैं।
लक्ष्मी पूजन के समय, विशेषकर व्यापारी वर्ग 'शुभ", 'लाभ" अवश्य लिखता है। भारतीय संस्कृति का प्रतीक चिन्ह है 'स्वस्तिक"। इसे भी लक्ष्मी पूजन के समय अंकित करते हैं। 'शुभ",'लाभ" शब्दों में व्यापक अर्थ तथा सामाजिक भावनाएं छिपी हुई हैं। शुभ से तात्पर्य है कल्याणकारी। ऐसे कार्य जिनसे अधिकाधिक लोगों का कल्याण हो, मानवीय गरिमा तथा प्रतिष्ठा के अनुकूल हो। लाभ शब्द भौतिक उपलब्धियों का परिचायक है। यह समृद्धि में निरंतर वृद्धि का संदेश देता है। इस शब्द को अंकित कर हर आनेवाले की समृद्धि, वृद्धि की कामना के साथ मानो हम अपनी समृद्धि और उसकी वृद्धि की कामना रखते हैं। परस्पर लाभ के प्रयासों से सामाजिक बंधन सुदृढ़ होते हैं एवं उन्हें गतिशीलता मिलती है। जब तक हम एक दूसरे के लिए उपयोगी और लाभकारी नहीं होंगे, तब तक व्यवहारिक रुप से हम एक दूसरे के संबंधों का निर्वाह करने में भी असमर्थ रहते हैं।
इसके अलावा पर्वों का यह समूह अनेक महामानवों भगवान राम, कृष्ण, महाप्रतापी-दानवीर राजा बलि, धर्मराज युधिष्ठिर, भगवान बुद्ध, महावीर, सम्राट अशोक, सम्राट विक्रमादित्य और आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती एवं वेदांत के प्रचारक स्वामी रामतीर्थ आदि की पावन स्मृति को अपने भीतर संजोए बैठा है। कार्तिक अमावस्या के ही दिन सिखों के छठे गुरु हरगोविंदसिंहजी बादशाह जहांगीर की कैद से छूटकर अमृतसर वापिस आए थे। विख्यात स्वर्णमंदिर का निर्माण भी दीपावली के ही दिन प्रारंभ हुआ था।
यह पर्व मूलतः दीपोत्सव 'श्री" अथवा लक्ष्मी का आवाहन पर्व है। आद्यशक्ति, अच्युतप्रिया भगवती लक्ष्मी के पूजन का पर्व है। समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में लक्ष्मी रुपी रत्न भी एक था। इस रत्न का प्रादुर्भाव कार्तिक की अमावस्या को हुआ था। तभी से यह तिथि लक्ष्मी पूजन का पर्व बन गया। लक्ष्मी की चर्चा ऋग्वेद में सबसे पहले हुई है। 'श्री" धन की देवी है तथा भगवान विष्णु की पत्नी है। जब हरि ने बावन रुप धारण किया तो लक्ष्मी कमल के रुप में अवतरित हुई। जब विष्णु परशुराम के रुप में आए तो 'लक्ष्मी" 'धरनी" कहलाई। राम के साथ सीता तो कृष्ण के साथ रुक्मिणी बनकर वे सदैव विष्णु की पत्नी बनती चली आई हैं।
लक्ष्मी का जो वर्तमान स्वरुप, जनता में व्याप्त है उसके अनुसार वे कमल पर विराजती हैं उनके हाथ में कमल है, उल्लू उनका वाहन है और वे धन संपदा की अधिष्ठात्री देवी हैं। लक्ष्मी केवल समृद्धि की देवी नहीं हैं। लक्ष्मी का भारतीय वाड्‌ग्‌मय में सर्वप्रथम उल्लेख हमें ऋग्वेद में प्राप्त होता है और उससे ज्ञात होता है कि उस समय लक्ष्मी का अर्थ अत्यंत व्यापक रुप में ग्रहण किया गया था। ऋग्वेद के 'श्री" सूक्त में लक्ष्मी के सत्तर नाम दिए गए हैं। जिन्हें पांच स्वरुप में बांटा गया है। ये हैं स्वरुपसूचक, श्री विग्रहपरक, पतिप्रेमप्रदर्शक, वैभवप्रतिपादक और भक्ताभिलाषक। इन नामों की परिधि बडी विशाल है। उनका प्राचीनतम नाम 'श्री" है इस संदर्भ में विद्वानों की यह मान्यता है कि 'श्री" शब्द का संदर्भ ऋगवेद में सौभाग्य के रुप में आया तथा कालांतर में अथर्वेद में उसका नारी के रुप में मानवीकरण हो गया। 'श्री" सूक्त में 15 मंत्र हैं। श्री सूक्त के अनुसार लक्ष्मी पद्‌मासना है, पद्‌मालया है, कमल में ही निवास करती है। कमल सौम्यता, समृद्धि एवं सौंदर्य तीनों का ही प्रतीक है और लक्ष्मी के साथ कमल का घनिष्ठ संबंध है।
ऋग्वेद की लक्ष्मी की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि वह केवल धन की ही देवी नहीं थी, वह राष्ट्र की सौंदर्य और समृद्धि दोनो की अधिष्ठात्री देवी थी। ऋग्वेद के प्रथम सूक्त के अनुसार, हिरण्यवर्णा हरिणां सुवर्णा रजतस्त्रजां। चन्द्रां हिरण्यमयी लक्ष्मीं जात वेदो म आवह।। अर्थात्‌ तपे हुए सोने के समान कांतिवाली, मनोहर रुपवाली, सोने तथा चांदी के आभूषणों से शोभित, सूर्य के समान प्रकाशवाली पर चंद्रमा के समान शीतल किरणों से प्रभाववाली सुवर्णांगिना लक्ष्मी का हम आवाहन करते हैं। लक्ष्मी के स्वभाव में धन का गर्व और तेज है तो साथ ही ऋग्वेद के एक अन्य सूक्त में उनके ह्रदय में माता की उदारता, शांति भावना भी दर्शाई गई है। सूक्तकार ने धन ऐश्वर्य के साथ-साथ दानवृत्ति के समन्वय को प्रस्तुत किया है। ऋग्वेदोक्त लक्ष्मी की करुणा असीम बतलाई गई है। ऋग्वेदिक लक्ष्मी मंगलकारी और पूर्णकामा है और उर्वरता की देवी है।

Saturday, 7 October 2017

प्राचीन भारतीय अस्त्र-शस्त्र

प्राचीन भारतीय अस्त्र-शस्त्र
शिरीष सप्रे

हमारे पूर्वज विज्ञाननिष्ठ, बुद्धिवादी थे जो विभिन्न अस्त्र-शस्त्र के निर्माणकर्ता-अनुसंधानकर्ता भी थे। वस्तुतः हम शक्ति के उपासक रहे हैं। भले ही अभी हम यह भूला बैठे हैं। हमारे यहां तो शस्त्र पूजन की परंपरा ही है और विजयादशमी यानी दशहरे पर हम शस्त्र पूजन करते भी हैं। यदि हम गंभीरता से ध्यान देंगे तो पाएंगे कि हमारे सभी देवी-देवता किसी ना किसी अस्त्र-शस्त्र के साथ होते हैं और उनकी पहचान उनके अस्त्र-शस्त्रों से ही होती भी है। जैसेकि, हनुमानजी गदा के साथ, भगवान परशुरामजी की तो पहचान ही परशु से होती है जो उन्हें शिवजी ने प्रदान किया था। भगवान राम की तो कल्पना ही बिना धनुष-बाण के कठिन सी ही है और इधर भगवान कृष्ण तो कहलाते ही सुदर्शनधारी हैं। चक्र भगवान विष्णु के हाथों में भी हमेशा ही रहता है। अन्य प्रमुख देवी-देवताओं की ओर देखें तो पाएंगे कि, इंद्र-वज्र, देवी दुर्गा-शूल, अन्य देवी-देवता भी किसी ना किसी अस्त्र-शस्त्र के साथ ही हमें नजर आएंगे।
प्राचीन भारत के हमारे पूर्वज जो आर्य कहलाते हैं। आर्य का अर्थ ही होता है ः श्रेष्ठ। वे न केवल धर्म-अध्यात्म के क्षेत्र में वरन्‌ अस्त्र-शस्त्र संचालन में भी कुशल और नवनवीन अस्त्र-शस्त्रों के अनुसंधान में भी अग्रणी थे। हमारे प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों के संचालन और उनकी प्रहारक, संहारक क्षमता की एक झलक हम रामायण-महाभारत इन धारावाहिकों में देख भी चूके हैं। कुछ प्रसिद्ध नाम देखिए- ब्रह्मास्त्र, नारायणास्त्र, पाशुपत, आदि। ब्रहास्त्र की काट तो ब्रह्मास्त्र ही है। महाभारत काल में पाशुपत केवल अर्जुन के पास ही था और यह अखिल विश्व का नाश कर सकता है। नारायणास्त्र भी पाशुपत के समान ही विकराल अस्त्र है इसका कोई प्रतिकार नहीं कर सकता था और इसका प्रतिकार केवल नम्रतापूर्वक आत्म समर्पण है।
उपर्युक्त नामों पर से ही यह ध्यान में आ गया होगा कि, अस्त्र उसे कहते हैं जिसे मंत्रों द्वारा दूर फैंकते हैं। शस्त्र घातक आयुध हैं जिनके प्रहार से मृत्यु हो सकती है। इन्हें ही अधिक उपयोग में लाया जाता है। अस्त्रों को दो विभागों में बांटा गया है, वे आयुध जो मंत्रों द्वारा संचालित होते हैं, देवी होते हैं और प्रत्येक अस्त्र पर विभिन्न देवी-देवता का अधिकार होता है। इनका संचालन मंत्र-तंत्र द्वारा होता है। वस्तुतः इन्हें दिव्य अथवा मांत्रिक कहा जा सकता है। इनमें से कुछ का वर्णन हम ऊपर कर ही चूके हैं।
कुछ अस्त्र-शस्त्र ऐसे भी हैं जिनका वर्णन प्राचीन संस्कृत गं्रथों में भी मिलता है। शक्ति ः यह लंबाई में गजभर होती है, उसका मुंह सिंह के समान होता है। उसमें बडी तेज जीभ और पंजे होते हैं और रंग नीला होता है तथा छोटी-छोटी घंटियां लगी रहता हैं। इसे फेंकने के लिए दोनो हाथों को उपयोग में लाया जाता है। तोमर ः लोहे का बना होकर बाण रुप में होता है। इसका मुंह लोहे का बना होकर सांप की तरह होता है और धड लकडी का बना होता है। नीचे की ओर पंख लगाए जाते हैं जिससे यह सरलतापूर्वक उड सके। प्रायः यह डेढ़ गज लंबा होकर लाल रंग का होता है।
पाश ः यह दो प्रकार के होते हैं- वरुण पाश और साधारण पाश। ये इस्पात के महीन तारों को बंटकर बनाए जाते हैं। इनका एक सिरा त्रिकोणवत्‌ होता है। नीचे जस्ते की गोलिया लगी होती हैं। कहीं-कहीं इसका दूसरा वर्णन भी है। यह पांच गज का होता है और सन, रुई, घास या चमडे के तार से बनता है। इन तारों को बटकर इसे बनाते हैं। यमराज का पाश तो प्रसिद्ध ही है। ऋषि ः यह सर्वसाधारण शस्त्र है परंतु है बडा प्राचीन। कोई इसे तलवार का रुप भी बताते हैं। गदा ः इसका हाथ पतला और नीचे का हिस्सा वजनदार होता है। इसकी लंबाई जमीन से छाती तक होती है। इसका वजन बीस मन का होता है। हनुमानजी और भगवान के कृष्ण के बडे भ्राता बलराम गदा युद्ध में प्रवीण होकर भीम और दुर्योधन उन्हीं के शिष्य थे। महाभारत के जरासंध और शल्य भी गदायुद्ध में पारंगत थे। गदा भगवान विष्णु के साथ हमेशा होती है। मुशल ः यह गदा के समान होता है और दूर से फेंककर मारा जाता है।
मुदगर ः इसे साधारणतया एक हाथ से उठाते हैं। राक्षसों में यह बहुत प्रसिद्ध था। वज्र-कुलिश व अशनि ः इसके ऊपर के तीन भाग तिरछे-टेढ़े बने होते हैं। बीच का हिस्सा पतला होता है। पर हाथ बडा वजनदार होता है। यह इंद्र का प्रमुख हथियार है जैसाकि पूर्व में ही उल्लेखित किया जा चूका है। वज्र से जुडी महर्षी दधिचि की स्वंय की हड्डियों के दान की कथा भी जुडी हुई है। त्रिशूल ः इसके तीन सिर होते हैं। शिवजी का त्रिशूल तो प्रसिद्ध ही है। शूल ः इसका एक सिरा नुकीला तेज होता है। इसका भेद शरीर में होते ही प्राण पखेरु उड जाते हैं। कुंटा ः यह भाला है। पट्टिश ः यह एक प्रकार का कुल्हाडा ही है। शंकु बर्छी ः यह भाला है। परिघि ः इसके एक रुप में लोहे की मूठ है। दूसरे रुप में एक लोहे की छडी भी होती है और तीसरे रुप के सिरे पर वजनदार मुंह बना होता है। भिन्दिपाल ः यह लोहे का बना होता है। इसे हाथ से फेंकते हैं। इसके भीतर से भी बाण फेंकते हैं। नाराच ः यह एक प्रकार का बाण है। खड्‌ग ः यह बलिदान का शस्त्र है और दुर्गा चंडी के सामने विराजमान रहता है। चन्द्रहास ः यह टेढ़ी तलवार के समान वक्र कृपाण है।

अन्य प्रमुख अस्त्र-शस्त्र हैं असि-तलवार, धनुष्य-बाण आदि जो स्वयं में स्वतंत्र रुप से लेख के विषय हैं इसलिए इन पर हम नहीं लिख रहे हैं। इसके अतिरिक्त अन्य अस्त्र-शस्त्र भी हैं जिनका वर्णन लेख की सीमा को देखते हुए यहां नहीं किया जा रहा है।