Tuesday, 2 August 2016

19 वी शताब्दी की मुंबई इतिहास के झरोखे से‏

मुंबई उत्तरी कोंकण का एक भाग है। श्री विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम की माता रेणुका का एक नाम कोंकणा भी है का संबंध इस सागरतटीय कोंकण प्रदेश के नामकरण से हो सकता है। मुंबई प्रांत का वह क्षेत्र जो सांप्रति मुंबई कहलाता है की राजधानी माहिम थी जो पुर्तगालियों के अधिकार में थी। 23 जून 1661 में इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तगाल की राजकन्या इन्फन्टा केथरीन के साथ संपन्न हुआ। इस विवाह में दहेज के रुप में पुर्तगाल ने मुंबई द्वीप चार्ल्स को दिया इस प्रकार मुंबई पर ब्रिटिश साम्राज्य का अधिकार हुआ। तथापि, मुगल और मराठों के सतत होते रहे संघर्षों से तंग आकर और धन की भी आवश्यकता थी इसलिए ब्रिटिश शासन ने इंग्लैंड की ईस्ट इंडिया कंपनी से पचास हजार का ऋण लेकर वार्षिक मात्र दस पौंड के भाडे पर सन्‌ 1668 में मुंबई ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया। सन्‌ 1858 में जब समूचे भारत को ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बनाया गया तो मुंबई का अधिकार पुनः ब्रिटिश सरकार के पास पहुंचा।

1790 में जब गुजरात में अकाल पडा तब गुजरात के छोटे मोटे गांवों से बडी संख्या में पारसी मुंबई आने लगे। सुरत की प्रचंड आग के पश्चात पारसी बडी संख्या में 1837 में मुंबई आ गए। इस मुंबई महानगर पर पारसीयों के बडे उपकार हैं। आधुनिक भारत को पारसीयों की भरपूर देन है। पारसियों ने जिस प्रकार से देश के व्यापार-उद्योग में विकास रचा वैसा ही व्यवसाय के क्षेत्र में भी नाम कमाया। इन्होंने देश को श्रेष्ठ वैज्ञानिक दिए, वैद्यकीय क्षेत्र में बडा काम किया, कानूनतज्ञ दिए, भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में क्रांति घटित करवाई। राजनीति में दादाभाई नौरोजी और मादाम कामा भी पारसी ही थे। पारसीयों का इतिहास देखें तो यह दिख पडेगा कि उन्होंने भारत में कभी भी धर्मांतरण के प्रयत्न नहीं किए। इस समाज की एक विशेषता यह भी है कि यह समाज 'ऊधो का लेना ना माधो का देना" की प्रवृत्ति का होकर शांत, सरल चित्त, ईमानदार और मेहनती रहा है। लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मुंबई के इतिहास में इस शांत समाज पर दो दंगे दर्ज हैं और वह भी हिंदु-पारसी नहीं तो पारसी-मुस्लिम के हैं। (पहला हिंदु-मुस्लिम दंगा 11 अगस्त 1893 को हुआ था) वैसे यह कल्पना आज हमें बडी मजेदार भी लग सकती है परंतु यह सच है।

पहला दंगा 17 अक्टूबर 1851 को हुआ था। उस जमाने में न तो मुंबई पुलिस विभाग बना था ना ही भा.द.वि अस्तित्व में आया था। उन दिनों बैरामजी गांधी नामके एक पारसी सज्जन 'चित्रज्ञान-दर्पण" नामका समाचार पत्र चलाते थे। वे प्रत्येक अंक में किसी विशिष्ट व्यक्ति का चित्र प्रकाशित कर उसका परिचय देते थे। इसी क्रम में एक बार उन्होंने मुहम्मद पैगंबर का चित्र के साथ परिचय प्रकाशित किया। इस्लाम के अनुसार पै. मुहम्मद का चित्र प्रकाशित करना हराम होकर उस अपराध का दंड बडा ही भयंकर होता है। इसकी गांधीजी को शायद कल्पना न हो। 17 अक्टूबर जुम्मे के दिन सुबह दस बजे मुसलमानों की भीड दीन-दीन चिल्लाते हुए मुंबई की जामा मस्जिद से निकल पडी। टोलियों में घूमते दंगाई जहां भी पारसी दिखाई दे उसे पीटते चले गए। जब मामला पुलिस से न सम्हल सका तब सेना को बुलाया गया। वैसे इस दंगे में पुलिस कमिश्नर फ्रेंक साऊटर ने बडी कडाई बरती थी। एक माह तक पारसी मुसलमानों की शत्रुता चलती रही, मारपीट चलती रही। अंत में सरकार के प्रयासों से पारसी तथा मुसलमानों की एक संयुक्त सभा आयोजित की गई जिसमें चित्रज्ञान दर्पण में मुहम्मद साहेब का चित्र प्रकाशित करनेवाले गांधीजी ने क्षमायाचना की और मुंबई के पहले दंगे का अध्याय समाप्त हुआ।"

'मुंबई का दूसरा दंगा भी पारसी और मुसलमानों में ही हुआ था। सन्‌ 1874 में एक पारसी सज्जन रुस्तमजी जालभाई ने आयर्विंग नामक अमरीकी लेखक के कुछ लेखों को अनुवादित कर प्रकाशित किया। इस प्रकाशन में मुहम्मद पैगंबर के संबंध में जो कुछ था वह मुसलमानों की दृष्टि से उनके रसूल का अपमान करनेवाला लेखन था। बस फिर क्या था 13 फरवरी को मुसलमान जामा मस्जिद से निकल पडे और पारसी दिखा कि पिटाई करते चले गए। अरब, पठान, सिंधी मुसलमानों ने पारसियों की सम्पत्ती की लूट मचाई, पारसियों की दो अग्यारियों में भी तोडफोड की। ऐसी अवस्था में प्रशासन को सेना की सहायता लेनी पडी।"

देश में पहला बंद कहां हुआ इसके बारे में तो कुछ अचूक कहना मुश्किल है परंतु, मुंबई महानगर के इतिहास में पहला बंद 7 जून 1832 को घटित करवाने का इतिहास भी पारसियों के नाम पर ही दर्ज है। इस बंद का कारण था कुत्ते मारने के अभियान का अतिरेक। उस जमाने में एक अंग्रेज अधिकारी की मौत कुत्ता काटने से हो गई उसने अपने मृत्युपत्र में व्यवस्था की कि उसकी सारी मालमत्ता सरकारजमा कर उससे आनेवाले ब्याज से कुत्तामार अभियान चलाया जाए। ब्रिटिश शासन ने उसकी इच्छानुसार यह अभियान छेड दिया। इसके लिए उन्होंने कानून बनाया इसके बाद हर साल विज्ञापन प्रत्येक चौराहे पर चिपकाकर और थाली पीटकर जाहिर किया जाता था। फिर सरकारी लोग और कुत्ता मारनेवाले लोग रास्तों पर निकल पडते थे। जहां कुत्ता दिखा मार डालते इसके बदले में उन्हें आठ आने मिलते थे। रोज दो बैलगाडी भर कुत्ते मारे जाने लगे। इसका हिसाब रखना और रोज मरे कुत्तों का निस्तारण करना उनके लिए कष्टदायक हो गया इसलिए नया आदेश निकाला गया कि कुत्ते को मार डालो और उसकी पूंछ सरकार के पास जमा कर अपना ईनाम हासिल करो। परंतु, चालाक लोगों ने कुत्तों को न मारते पूंछ काटकर सरकार के पास जमा कर ईनाम हासिल शुरु कर दिया। पूरे शहर में पूंछ कटे कुत्ते नजर आने लगे इसलिए फिर से आदेश निकाला कि मरा कुत्ता लाओ।

कुत्ता पारसियों में पवित्र माना जाता है इसलिए जब गाडियां भर के कुत्तों के धड पारसियों के घरों पर से निकलते तो वे बडे व्यथित होते। पारसी अंग्रेजों के बडे निकट थे। उन्होंने मुंबई के प्रतिष्ठित लोगों को एकत्रित कर (उनमें सर जमशेदजी जीजीभाई, सेठ मोतीचंद खेमचंद, सेठ देवीदास मनमोहनदास आदि के साथ अनेक पारसी और दक्षिणी महाजन भी शामिल थे) गव्हर्नर के पास  निवेदन देकर विनती की कि नाहक पशुहत्या करने के स्थान पर कुत्तों को कहीं दूर छोड दिया जाए। सरकार ने विनती स्वीकार कर ली, परंतु दूर छोडे गए कुत्ते फिर से अपने स्थानों पर नजर आने लगे। इसलिए श्वानगृह भाडे से लेकर सरकार ने जब भी कोई जहाज मुंबई से बाहर जाता तब उन कुत्तों को उस पर से अन्य देशों में रवाना करना शुरु कर दिया। यह प्रथा कुछ दिन चली।

आखिर शहर में आवारा कुत्ते होंगे कितने? इसलिए जब कुत्ता पकडनेवालों को कुत्ते मिलना कठिन हो गया तो इन लोभियों की नजर पालतू कुत्तों पर पडी। सरकार की ओर से पालतू कुत्तों पर कोई पाबंदी नहीं थी। लेकिन कुत्ता तो कुत्ता ही होता है पालतू हुआ तो क्या मौका मिलते ही सडकों पर आ ही जाता था। इन लोगों ने इन कुत्तों को पकडना प्रारंभ कर दिया। इस पर से झगडे प्रारंभ हो गए, मुकदमेबाजी शुरु हो गई। इसीमें से पालतू कुत्तों के गले में सरकार अधिकृत पट्टे बांधने की कल्पना सामने आई।

पारसी समाज मूलतः दयालू स्वभाव का होता है उसमें से कुत्ता उनके लिए पवित्र प्राणी है। इसलिए इस प्रकार की घटनाओं के प्रतिकार के लिए पारसी युवक सामने आ गए। 'पारसी समाज ने मुंबई में हडताल का आयोजन 7 जून 1832 को किया। क्योंकि, एक दिन पूर्व कुत्ते मारनेवाले लोग पारसियों के घरों में घुसकर कुत्ते पकडकर ले गए इस पर से कुछ गरमागरमी हुई। इसके पश्चात कुछ पारसियों ने तय किया कि बंद का आयोजन कर अंग्रेजों का दाना-पानी बंद कर दिया जाए। सरकारी कार्यालयों को खोलने में अडचनें पैदा की। मुंबई के बाजार बंद कर अंग्रेज सैनिकों के दूध, नाश्ते के सामान की पूर्ति रोक दी। अंगे्रजों के लिए मांस लेकर जा रहे कसाईयों ने पारसियों की सुनने से इंकार कर दिया तब उन्हें मारपीट कर भगा दिया गया और मांस को फैंक दिया। सुप्रीम कोर्ट के जज पर कचरा फैंका गया। सर जमशेदजी जीजीभाई जिनके दान से भायखला का जे.जे हॉस्पिटल बना है ने मध्यस्थता करने की कोशिश की, परंतु सफलता नहीं मिली।

अंत में जब अंगे्रजों ने गोलीबारी की धमकी दी तब पारसी युवक घबराए और भाग निकले। इस बंद में पारसियों द्वारा न तो किसी तरह की जानमाल की हानि की गई ना ही किसी प्रकार की लूटपाट। परंतु, अंग्रेज जरुर उनसे नाराज हो गए। इस प्रकार से मुंबई में पहले बंद का आयोजन कुत्तों के कारण हुआ जो दोपहर दो बजे तक चला।

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