Wednesday, 24 August 2016

जन्माष्टमी 24 अगस्त कृष्ण भक्त मुस्लिम कवि

जन्माष्टमी 24 अगस्त
कृष्ण भक्त मुस्लिम कवि

साहित्यकारों ने भगवान कृष्ण जो योगीराज भी हैं के विभिन्न रुपों का वर्णन किया है जिनपे वे मोहित हुए थे। कोई उनके बालरुप पर मोहित है तो, कोई उनके सुंदर स्वरुप पर तो, कोई उन्हें महाभारत के सूत्रधार कहता है। कोई उन्हें महान कूटनीतिज्ञ। इस प्रकार से भगवान कृष्ण के अनेकानेक रुपों पर देशी-विदेशी अनेक साहित्यकारों ने अपनी लेखनी चलाकर भारतीय वाङमय को समृद्ध किया है। इनमें भारतीय मुस्लिम कवि भी शामिल हैं जो उन पर भक्ति भाव से मुग्ध हो गए। सम्राट अकबर ने भी श्रीकृष्ण के चरित्र पर लेखन किया है।
गुजरात के एक पठान परिवार में 1892 में जन्में अब्दुल सत्तार भगवान कृष्ण के प्रेम में इतने डूब गए थे कि सत्तारदास बन वे कह उठे,' नात-जात छोडी और तात-मात छोडे, हो गई फजैत मैंने लोक-लाज खोई। प्रेम में प्रभु के मैं तो हो गई दीवानी, कहते 'सत्तारदास" होनी थी सो होई।'' वे स्वयं को मीराबाई और एक गोपी के स्थान पर रखकर कहते थे, 'अब तो मैं प्रभु के प्रेम में दीवानी हो गई हूं।" इस कृष्ण प्रेम के कारण वे न केवल गुजरात बल्कि पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गए। जो कभी अनाथ थे वे इस कृष्ण भक्ति और प्रेम के कारण सनाथ हो गए। 
ये बातें मुगल शासन काल की हैं जब हिंदुओं की जनेऊ उतरवाकर उनसे जबरदस्ती कलमा पढ़वाया जा रहा था। उस समय कृष्ण भक्त मुसलमान कवि 'आदिल" ने लिखा था 'आदिल की पुकार" - 'आदिल सुजान रुप-गुन के निधान कान्ह, बांसुरी बजाय जन तपन बुझाव रे। नंद के किसोर-चित्तचोर मोर पंखवारे! बंसीवारे-सांवरे पियारे, इत आवरे।। 16 वीं शताब्दी के सैयद निजामुद्दीन उर्फ 'मीरमधनायक" कहते हैं ः 'हमारे हरि बिनु और न कोय।"
जन्म से हिंदू परंतु बाद में इस्लाम स्वीकारनेवाले कृष्णभक्त कवि आलम की प्रियतमा शेख भी कवियित्री होकर वह भी कृष्णभक्त थी। दिव्य भाव धारा में डूब शेख कृष्ण वर्णन करती है - जब ते गोपाल मथुरा को सीधारे माई, मधुबन भयौं मधुदानव विषम सौं। 'शेख" कहे सारिका, शिखंडी खंजरीट सुक मिलि के कलेस कीन्हीं कालिंदी कदम सौं। मुस्लिम कवियित्री ताज खां बेगम तो श्रीकृष्ण के जीवन पर इतनी अनुरक्त हो गई थी कि कह बैठी ः हौं तो मुगलानी किंतु हिन्दुवानी हवै रहुंगी मैं (मैं धर्म से मुसलमान हूं तो भी तेरे लिए मेरा धर्म छोडने के लिए तैयार हूं)। अपने व्याकुल प्राणों की पीडा जो उसने इन शब्दों में व्यक्त की है वह हिंदी साहित्य की गरिमा बने हुए हैं ः 'सुनो दिलजानी! मेरे दिल की कहानी, तेरे हाथ हूं बिकानी, बदनामी भी सहूंगी मैं। देव-पूजा ठानी, तजे कलमा-कुरान, मैं नमाज हूं भुलानी तेरे गुनन गहूंगी मैं। .... आशिक-दिवानी बन, श्याम-पद पूजि-पूजि, प्रेम में पगानी राधिकी सी बन जाउंगी।।""कवि मुबारक के उद्‌गार हैं ः हरि हो, हरि हो, हरि हो गति मेरी! नजीर बनारसी (25 नवंबर 1909 से 23 मार्च 1996) ने लिखा है 'नजीर बनारसी के कृष्ण"ः 'मोहन की बांसुरी के, मैं क्या कहूं जतन। .... सब सुनने वाले कह उठे - ''जै जै हरी-हरी।"" ऐसी बजाई कृष्ण कन्हैया ने बांसुरी।। ऐसा कृष्ण प्रेम भरा जीवन पूरे भारत के लिए प्रेरणादायी है और ऐसे कृष्ण भक्ति में लीन कवियों को भला कौन बेगाना कह सकता है। 

Sunday, 14 August 2016

आजादी की लडाई के गुमनाम चेहरे

प्राचीन और अर्वाचीन राष्ट्रों के इतिहास पर से यह दिखलाई पडता है कि, जब एकाध राष्ट्र का उदय होता है अथवा एकाध पराधीन राष्ट्र विदेशी राज्य का जुआं हटाकर स्वतंत्र होता है तब उस राष्ट्र के उदय के लिए जिस प्रकार से स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए समरभूमि पर के देश पर गर्व करनेवाले योद्धाओं का पराक्रम कारणीभूत होता है वैसे ही देश पर गर्व करनेवाले लोगों के चैतन्ययुक्त लेख और  कूटनीतिज्ञों के चतुराईभरे प्रयत्न भी कारणीभूत होते हैं। उदाहरणार्थ, हम यूरोप के इटली देश को विचारार्थ लेंगे - आज से लगभग 150 वर्ष पूर्व इटली एक गुलाम देश था ऑस्ट्रीया का। मैजिनी, गैरीबॉल्डी और काव्हूर इन तीन इटालियन देशभक्तों के अथक प्रयत्नों के कारण इटली स्वतंत्र हुआ। मैजिनी ने अपने जाग्रत करानेवाले लेखों द्वारा इटलीवासियों के मानस को स्वतंत्रता प्राप्ति की ओर मोडा। गैरीबॉल्डी ने अपने बाहुबल से रणक्षेत्र पर विजय प्राप्त की। काव्हूर ने अपनी चतुराई और कूटनीतिज्ञता से यूरोप के देशों से राजनीति कर विक्टर इॅमन्यूएल ने संपूर्ण इटली को स्वतंत्र राज्यपद दिलवाया। कई इतिहासकार इॅमन्यूएल राजा की गणना इटली के राष्ट्रोद्धारकों में करते हैं। उपर्युक्त पर से यह ज्ञात होता है कि बरसों पराधीनता का दंश झेल रहे इटली को स्वतंत्रता प्राप्त होकर रोम उसकी राजधानी बनी। इसके लिए बहुत से विभिन्न देशभक्तों के प्रयत्न काम आए। बहुत कुछ अंशों में कुछ इसी प्रकार से हमारे देश भारत को जो स्वतंत्रता प्राप्त हुई वह अनेकानेक विभूतियों के कठिन प्रयत्नों-संघर्षों का ही फल है। विषय की व्यापकता को देखते हुए इसके थोडे से भाग पर ही हम अपने विचार केंद्रित करेंगे।
आज से 300 से भी अधिक वर्ष पूर्व छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरु समर्थ रामदास ने मंत्र दिया था - 'बहुत लोक मिळवावे। एक विचारे भरावे।" अर्थात्‌ 'बहुत से लोगों को एकत्रित करो और उनमें एक ही विचार भरो।" और वह विचार क्या था - 'धर्मासाठी मरावे, मरोनि अवघ्यांस मारावे। मारिता-मारिता घ्यावे राज्य आपुले।" अर्थात्‌ 'अपने धर्म के लिए मरो। मरते-मरते अपने शत्रुओं का नाश करो और मार-मार कर अपना राज्य वापिस प्राप्त करो।" यही वह मनोविज्ञान था जो स्वतंत्रता प्राप्ति की लडाई में काम आया और भारत की जनता का आक्रोश विभिन्न रुपों में 1857 के कालखंड के स्वतंत्रता संग्राम में फूट पडा था।
1757 में प्लासी की लडाई के पश्चात एक नई शक्ति के रुप में ब्रिटिश शक्ति का उदय हो गया था। इसके पश्चात 1764 में  बक्सर की लडाई के बाद ब्रिटिश शक्ति का आधार और भी अधिक विस्तृत हो गया और इसीके साथ भारतीयों का विरोध भी अंग्रेजों के विरुद्ध शुरु हो गया जिसका विस्फोट भी समय-समय पर प्रकट होता रहा। उदाहरणार्थ सन्यासियों-फकीरों का संघर्ष, जुलाहों और रेशम कारीगरों की क्रांति, अफीम किसानों का विस्फोट, नमक कारीगरों, चकमा, चोआड, भील विद्रोह आदि।
ब्रिटिशों की क्रूर सत्ता जिसने भारतीयों को विपन्न बना दिया था से मुक्ति के लिए भारत की जनता ने 190 वर्षों तक अपना संघर्ष सतत जारी रखा। इस संघर्ष में राजा-रजवाडों से लेकर श्रमिक, सैनिक, सन्यासी, आदिवासियों तथा साम्राज्य के विशिष्टजन तक सभी सम्मिलित थे। इनमें से कई चेहरे आज भूलाबिसरा दिए गए हैं, विस्मृति के गर्त में खो गए हैं। क्योंकि, इतिहास हमेशा बडों को ही याद रखता है। परंतु, इन गुमनाम चेहरों का स्वातंत्र्य समर में एक अति महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 
उदाहरणार्थ ः बुंदेलखंड के 'हरबोले"। जिन्होंने अपने कविताई अस्त्र से आजादी की लडाई की जमीन को सींचा। इन कवि गायकों ने वीर नायकों का यशोगान तो किया ही साथ ही देशद्रोहियों के प्रति तिरस्कार को अपने गायन में अभिव्यक्त किया। वैसे तो 'हरबोले" सुनते ही हम सबको स्वर्गीय सुभद्राकुमारी चौहान की वह प्रसिद्ध कविता जो हम सबने पढ़ी है, गाई है की याद भी बरबस  आ ही गई होगी। 'बुंदेलों हरबोलों के मुख से हमने सुनी कहानी थी खूब लडी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।" आजादी की इस लडाई में 'हरबोलों" द्वारा किए गए लोकजागरण का जो परिणाम सामने आया वह भूलाया नहीं जा सकता। 'हरबोलों" में 'हर" महादेव को कहते हैं और इस पर से अर्थ निकला 'भजन गायक"। परंतु, वे साधारण भजन गायक नहीं थे इन भजनों के माध्यम से वे युद्ध के ओजस्वी वर्णन किया करते थे। इस प्रकार से वे राष्ट्रीय चेतना के गायक हुए। इनके प्रमुख गीतों में 'हर" एक टेक की तरह बार-बार आया करता था इस कारण से सर्वसाधारणजन उन्हें 'हरबोले" कहने लगे।
'हरबोले" यह एक निराला ही वर्ग था जो बिना जात-पात के भेदभाव के एक साथ लोकजागरण के लिए आजादी की पहली लडाई में निकले थे। उनके गीत लोगों में अंगार भर देते थे। 'हरबोले" अपने गीतों द्वारा - मृत्यु से भय काहे का संदेश इस प्रकार से देते थे ः 'मरनैखां का नई डरनै करबो को रार।" ना जियत जान पाबै जौ टोपीवालो।" कुछ भी हो जाए परंतु टोपवाले (यानी अंग्रेज) जीवित न जाने पावें। 'हरबोलों" में स्त्री-पुरुष दोनो ही थे व जनता की लडाई में शामिल थे को अभिव्यक्ति देते हुए एक गीत में स्त्री युद्ध की कथा को इस प्रकार शब्द दिए थे - बांदा लुटो रात को गुंइया। सीलादेवी लरी दौर के संग में सौक लिहरियां। अंगे्रजों के राक्षसी आतंक को इस प्रकार उजागर किया - काटत हांत-पांव रजपूतन, सुनत न कोई बानी। बहुएं-बिटिया पकर लेत हैं, करत रात मनमानी।। 
जब बात बुंदेलखंड की चल ही रही है तो इस क्षेत्र से संबंधित कुछ ऐसे स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों का संक्षिप्त उल्लेख करना लेख के शीर्षक की दृष्टि से उचित ही होगा जो अधिकांश लोगों को ज्ञात नहीं है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में बुंदेलखंड का नेतृत्व  करनेवाले थे राजा मर्दानसिंह और बखतबली। इन दोनो ने मिलकर बुंदेलखंड के जमींदारों और जागीरदारों को क्रांति के लिए प्रेरित किया था। इन दोनो ने अपने 3000 सैनिकों के साथ कोंच के युद्ध में झांसी की रानी और तात्या टोपे के साथ भाग लिया था। पराजय के पश्चात वहां से लौटते समय ग्वालियर के निकट मुरार में जुलाई 1858 में इन दोनो को गिरफ्तार कर दूर लाहौर जेल में भेज दिया गया। स्वतंत्र भारत का सपना संजोए इन दोनो का स्वर्गवास क्रमशः मथुरा और वृंदावन में 22 जुलाई 1879 और 29 सितंबर 1873 को हो गया। मर्दानसिंह की वीरता के गीत आज भी बुंदेलखंड में गाए जाते हैं। 
एक और क्रांतिकारी सागर के बोधनदौआ थे जो राजा बखतबली सेनापति थे। जिन्होंने अंत तक आत्मसमर्पण नहीं किया और वे अज्ञातवास में चले गए। उन पर 1000 रुपये के ईनाम की घोषणा एवं अंग्रेजों के दमनचक्र के बावजूद वे अंत तक हाथ नहीं आए। इसी प्रकार के एक अन्य क्रांतिकारी थे हिंडोरिया दमोह के किशोरसिंह। इन पर अंग्रेजों ने 1000 रुपये का ईनाम जीवित या मृत कैद किए जाने के लिए घोषित किया था। ये भी अज्ञातवास में चले गए थे।
विंध्याचल-सह्याद्री भूभाग के जनजाति के लोगों ने भी हमेशा अंग्रेजों के विरुद्ध अपनी विद्रोहात्मक गतिविधियां सतत जारी रखी। इन्होंने अंग्रेजों को कभी भी चैन की सांस नहीं लेने दी। इनमें से कई क्रांतिकारी जनजातियों की आहुतियां विस्मृति के गर्त में जा चूकी हैं। उनमें म.प्र. के कुछ नाम हैं - नादिरसिंह, चील नायक, सरदार दशरथ, शेख दुल्ला, हिरिया, गोंडाजी दंगलिया, शिवराम पेंडिया, बुंदी सुतका, उचेतसिंह, भागोजी, जसुदा आदि। स्वतंत्रता की इस लडाई में तात्या टोपे से प्रेरित होकर म. प्र. के निमाड का अपनी माटी से प्रेम करनेवाला जिसने भील क्रांति का नेतृत्व किया वह था भीमा नायक। यह बडवानी रियासत के पंचमोहली गांव  का था। भीलों में स्वतंत्रता की चेतना जगानेवाले भीमा नायक का जन्म 1815 में हुआ था। उसकी 500 लोगों की टुकडी में भील-भीलालों के अतिरिक्त मकरानी भी थेे। अंग्रेजों के दमन-अत्याचारों से भीमा नायक और उसके भील सैनिक भयभीत नहीं हुए। भीमा नायक ने अंत तक समझौता नहीं किया। आखिर में अंग्रेजों ने षडयंत्र कर एक गद्दार की सूचना पर उन्हें जंगल में कैद कर लिया। 
निमाड क्षेत्र के ही संेंधवा का एक और स्वाधीनता सेनानी था खान्या नायक। भीलों का उस पर पूर्ण विश्वास था। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के थमने के पश्चात भी उसका संघर्ष जारी रहा। इसको परास्त करने के लिए अंग्रेजों ने षडयंत्र रचा और एक मकरानी रोहीद्दीन के हाथों खाज्या की गोली मारकर हत्या करवा दी। भीमा नायक और खाज्या नायक की समाप्ति के पश्चात बडवानी क्षेत्र के ही भिलाले संघर्ष के लिए आगे बढ़े। सीताराम कंवर और रघुनाथसिंह भिलाला इनके नेतृत्व में भील-भिलाले फिर से संगठित हुए। सीताराम कंवर पर अंग्रेजों ने 500 रुपये का ईनाम घोषित किया था। 1858 में अंग्रेजों से हुई मुठभेड में वे हुतात्मा हुए इनके 75 साथी पकडे गए उन सभी को अंग्रेजों ने फांसी दे दी। इनके पश्चात टांडा-बरुड के रघुनाथसिंह मंडलोई ने कमान संभाली। उनके होतात्म्या के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।  
जनजाति वीरों में एक नाम टंट्या भील का भी है जो अब बहुत कुछ प्रसिद्ध भी हो चूके हैं ने अंगे्रजों के दमन और अत्याचार के प्रतिकार को ज्वलंत अभिव्यक्ति दी। इन पर एक फिल्म का निर्माण भी हो चूका है। इस जननायक टंट्या भील का कार्यक्षेत्र बडा विस्तृत था निमाड-झाबुआ से लेकर बैतुल तक। टंट्या भील ने गांवों और कस्बों तक में दूर-दूर तक फैली अंग्रेजी सत्ता के शोषक  शासन तंत्र को बडी हद तक तहस-नहस कर दिया था। टंट्या भील जहां ब्रिटिश सत्ताधीशों को आतंक का प्रतीक महसूस होता था वहीं वह औरतों-बच्चों-असहायजनों के लिए एक मददगार और रक्षक था इसीलिए वह आमजन की श्रद्धा का पात्र बना। टंट्या भील 4 दिसंबर 1889 को हुतात्मा हुए और 1891 में उन पर केंद्रित पुस्तक अंग्रेजी में आ भी गई। उन पर एक पोवाडा (गीत) मराठी में 1904 में ही आ गया था। इसके अलावा उन पर मराठी में बहुत कुछ सामग्री नाटक, लेखों, कहानियों आदि में उपलब्ध है। परंतु खेद का विषय है कि हुतात्मा टंट्या भील पर हिंदी में कोई विशेष सामग्री नजर नहीं आती हां हाल ही में कुछ काम इस संबंध में हुआ जरुर है।

Tuesday, 2 August 2016

19 वी शताब्दी की मुंबई इतिहास के झरोखे से‏

मुंबई उत्तरी कोंकण का एक भाग है। श्री विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम की माता रेणुका का एक नाम कोंकणा भी है का संबंध इस सागरतटीय कोंकण प्रदेश के नामकरण से हो सकता है। मुंबई प्रांत का वह क्षेत्र जो सांप्रति मुंबई कहलाता है की राजधानी माहिम थी जो पुर्तगालियों के अधिकार में थी। 23 जून 1661 में इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तगाल की राजकन्या इन्फन्टा केथरीन के साथ संपन्न हुआ। इस विवाह में दहेज के रुप में पुर्तगाल ने मुंबई द्वीप चार्ल्स को दिया इस प्रकार मुंबई पर ब्रिटिश साम्राज्य का अधिकार हुआ। तथापि, मुगल और मराठों के सतत होते रहे संघर्षों से तंग आकर और धन की भी आवश्यकता थी इसलिए ब्रिटिश शासन ने इंग्लैंड की ईस्ट इंडिया कंपनी से पचास हजार का ऋण लेकर वार्षिक मात्र दस पौंड के भाडे पर सन्‌ 1668 में मुंबई ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया। सन्‌ 1858 में जब समूचे भारत को ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बनाया गया तो मुंबई का अधिकार पुनः ब्रिटिश सरकार के पास पहुंचा।

1790 में जब गुजरात में अकाल पडा तब गुजरात के छोटे मोटे गांवों से बडी संख्या में पारसी मुंबई आने लगे। सुरत की प्रचंड आग के पश्चात पारसी बडी संख्या में 1837 में मुंबई आ गए। इस मुंबई महानगर पर पारसीयों के बडे उपकार हैं। आधुनिक भारत को पारसीयों की भरपूर देन है। पारसियों ने जिस प्रकार से देश के व्यापार-उद्योग में विकास रचा वैसा ही व्यवसाय के क्षेत्र में भी नाम कमाया। इन्होंने देश को श्रेष्ठ वैज्ञानिक दिए, वैद्यकीय क्षेत्र में बडा काम किया, कानूनतज्ञ दिए, भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में क्रांति घटित करवाई। राजनीति में दादाभाई नौरोजी और मादाम कामा भी पारसी ही थे। पारसीयों का इतिहास देखें तो यह दिख पडेगा कि उन्होंने भारत में कभी भी धर्मांतरण के प्रयत्न नहीं किए। इस समाज की एक विशेषता यह भी है कि यह समाज 'ऊधो का लेना ना माधो का देना" की प्रवृत्ति का होकर शांत, सरल चित्त, ईमानदार और मेहनती रहा है। लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मुंबई के इतिहास में इस शांत समाज पर दो दंगे दर्ज हैं और वह भी हिंदु-पारसी नहीं तो पारसी-मुस्लिम के हैं। (पहला हिंदु-मुस्लिम दंगा 11 अगस्त 1893 को हुआ था) वैसे यह कल्पना आज हमें बडी मजेदार भी लग सकती है परंतु यह सच है।

पहला दंगा 17 अक्टूबर 1851 को हुआ था। उस जमाने में न तो मुंबई पुलिस विभाग बना था ना ही भा.द.वि अस्तित्व में आया था। उन दिनों बैरामजी गांधी नामके एक पारसी सज्जन 'चित्रज्ञान-दर्पण" नामका समाचार पत्र चलाते थे। वे प्रत्येक अंक में किसी विशिष्ट व्यक्ति का चित्र प्रकाशित कर उसका परिचय देते थे। इसी क्रम में एक बार उन्होंने मुहम्मद पैगंबर का चित्र के साथ परिचय प्रकाशित किया। इस्लाम के अनुसार पै. मुहम्मद का चित्र प्रकाशित करना हराम होकर उस अपराध का दंड बडा ही भयंकर होता है। इसकी गांधीजी को शायद कल्पना न हो। 17 अक्टूबर जुम्मे के दिन सुबह दस बजे मुसलमानों की भीड दीन-दीन चिल्लाते हुए मुंबई की जामा मस्जिद से निकल पडी। टोलियों में घूमते दंगाई जहां भी पारसी दिखाई दे उसे पीटते चले गए। जब मामला पुलिस से न सम्हल सका तब सेना को बुलाया गया। वैसे इस दंगे में पुलिस कमिश्नर फ्रेंक साऊटर ने बडी कडाई बरती थी। एक माह तक पारसी मुसलमानों की शत्रुता चलती रही, मारपीट चलती रही। अंत में सरकार के प्रयासों से पारसी तथा मुसलमानों की एक संयुक्त सभा आयोजित की गई जिसमें चित्रज्ञान दर्पण में मुहम्मद साहेब का चित्र प्रकाशित करनेवाले गांधीजी ने क्षमायाचना की और मुंबई के पहले दंगे का अध्याय समाप्त हुआ।"

'मुंबई का दूसरा दंगा भी पारसी और मुसलमानों में ही हुआ था। सन्‌ 1874 में एक पारसी सज्जन रुस्तमजी जालभाई ने आयर्विंग नामक अमरीकी लेखक के कुछ लेखों को अनुवादित कर प्रकाशित किया। इस प्रकाशन में मुहम्मद पैगंबर के संबंध में जो कुछ था वह मुसलमानों की दृष्टि से उनके रसूल का अपमान करनेवाला लेखन था। बस फिर क्या था 13 फरवरी को मुसलमान जामा मस्जिद से निकल पडे और पारसी दिखा कि पिटाई करते चले गए। अरब, पठान, सिंधी मुसलमानों ने पारसियों की सम्पत्ती की लूट मचाई, पारसियों की दो अग्यारियों में भी तोडफोड की। ऐसी अवस्था में प्रशासन को सेना की सहायता लेनी पडी।"

देश में पहला बंद कहां हुआ इसके बारे में तो कुछ अचूक कहना मुश्किल है परंतु, मुंबई महानगर के इतिहास में पहला बंद 7 जून 1832 को घटित करवाने का इतिहास भी पारसियों के नाम पर ही दर्ज है। इस बंद का कारण था कुत्ते मारने के अभियान का अतिरेक। उस जमाने में एक अंग्रेज अधिकारी की मौत कुत्ता काटने से हो गई उसने अपने मृत्युपत्र में व्यवस्था की कि उसकी सारी मालमत्ता सरकारजमा कर उससे आनेवाले ब्याज से कुत्तामार अभियान चलाया जाए। ब्रिटिश शासन ने उसकी इच्छानुसार यह अभियान छेड दिया। इसके लिए उन्होंने कानून बनाया इसके बाद हर साल विज्ञापन प्रत्येक चौराहे पर चिपकाकर और थाली पीटकर जाहिर किया जाता था। फिर सरकारी लोग और कुत्ता मारनेवाले लोग रास्तों पर निकल पडते थे। जहां कुत्ता दिखा मार डालते इसके बदले में उन्हें आठ आने मिलते थे। रोज दो बैलगाडी भर कुत्ते मारे जाने लगे। इसका हिसाब रखना और रोज मरे कुत्तों का निस्तारण करना उनके लिए कष्टदायक हो गया इसलिए नया आदेश निकाला गया कि कुत्ते को मार डालो और उसकी पूंछ सरकार के पास जमा कर अपना ईनाम हासिल करो। परंतु, चालाक लोगों ने कुत्तों को न मारते पूंछ काटकर सरकार के पास जमा कर ईनाम हासिल शुरु कर दिया। पूरे शहर में पूंछ कटे कुत्ते नजर आने लगे इसलिए फिर से आदेश निकाला कि मरा कुत्ता लाओ।

कुत्ता पारसियों में पवित्र माना जाता है इसलिए जब गाडियां भर के कुत्तों के धड पारसियों के घरों पर से निकलते तो वे बडे व्यथित होते। पारसी अंग्रेजों के बडे निकट थे। उन्होंने मुंबई के प्रतिष्ठित लोगों को एकत्रित कर (उनमें सर जमशेदजी जीजीभाई, सेठ मोतीचंद खेमचंद, सेठ देवीदास मनमोहनदास आदि के साथ अनेक पारसी और दक्षिणी महाजन भी शामिल थे) गव्हर्नर के पास  निवेदन देकर विनती की कि नाहक पशुहत्या करने के स्थान पर कुत्तों को कहीं दूर छोड दिया जाए। सरकार ने विनती स्वीकार कर ली, परंतु दूर छोडे गए कुत्ते फिर से अपने स्थानों पर नजर आने लगे। इसलिए श्वानगृह भाडे से लेकर सरकार ने जब भी कोई जहाज मुंबई से बाहर जाता तब उन कुत्तों को उस पर से अन्य देशों में रवाना करना शुरु कर दिया। यह प्रथा कुछ दिन चली।

आखिर शहर में आवारा कुत्ते होंगे कितने? इसलिए जब कुत्ता पकडनेवालों को कुत्ते मिलना कठिन हो गया तो इन लोभियों की नजर पालतू कुत्तों पर पडी। सरकार की ओर से पालतू कुत्तों पर कोई पाबंदी नहीं थी। लेकिन कुत्ता तो कुत्ता ही होता है पालतू हुआ तो क्या मौका मिलते ही सडकों पर आ ही जाता था। इन लोगों ने इन कुत्तों को पकडना प्रारंभ कर दिया। इस पर से झगडे प्रारंभ हो गए, मुकदमेबाजी शुरु हो गई। इसीमें से पालतू कुत्तों के गले में सरकार अधिकृत पट्टे बांधने की कल्पना सामने आई।

पारसी समाज मूलतः दयालू स्वभाव का होता है उसमें से कुत्ता उनके लिए पवित्र प्राणी है। इसलिए इस प्रकार की घटनाओं के प्रतिकार के लिए पारसी युवक सामने आ गए। 'पारसी समाज ने मुंबई में हडताल का आयोजन 7 जून 1832 को किया। क्योंकि, एक दिन पूर्व कुत्ते मारनेवाले लोग पारसियों के घरों में घुसकर कुत्ते पकडकर ले गए इस पर से कुछ गरमागरमी हुई। इसके पश्चात कुछ पारसियों ने तय किया कि बंद का आयोजन कर अंग्रेजों का दाना-पानी बंद कर दिया जाए। सरकारी कार्यालयों को खोलने में अडचनें पैदा की। मुंबई के बाजार बंद कर अंग्रेज सैनिकों के दूध, नाश्ते के सामान की पूर्ति रोक दी। अंगे्रजों के लिए मांस लेकर जा रहे कसाईयों ने पारसियों की सुनने से इंकार कर दिया तब उन्हें मारपीट कर भगा दिया गया और मांस को फैंक दिया। सुप्रीम कोर्ट के जज पर कचरा फैंका गया। सर जमशेदजी जीजीभाई जिनके दान से भायखला का जे.जे हॉस्पिटल बना है ने मध्यस्थता करने की कोशिश की, परंतु सफलता नहीं मिली।

अंत में जब अंगे्रजों ने गोलीबारी की धमकी दी तब पारसी युवक घबराए और भाग निकले। इस बंद में पारसियों द्वारा न तो किसी तरह की जानमाल की हानि की गई ना ही किसी प्रकार की लूटपाट। परंतु, अंग्रेज जरुर उनसे नाराज हो गए। इस प्रकार से मुंबई में पहले बंद का आयोजन कुत्तों के कारण हुआ जो दोपहर दो बजे तक चला।