Monday, 20 June 2016

बढ़ता ही जा रहा है नार्सिसिज्म

बढ़ता ही जा रहा है नार्सिसिज्म

नार्सिसिज्म एक प्रकार का मनोविकार, मनोरोग, मनोवैज्ञानिक कुंठा है। नार्सिसिज्म से ग्रस्त व्यक्ति की पहचान यह है कि जो स्वयं के प्रति अत्याधिक लगाव रखता हो, स्वयं के प्यार-आकर्षण में ही इतना डूबा रहता है कि दूसरे के प्रति लापरवाह हो जाता है। आत्मप्रशंसा में दीवानगी की हद तक मग्न रहता हो। इसे हिंदी में अतिआत्ममुग्धता का विकार कह सकते हैं। यह एक पर्सोनिलीटी डिसऑर्डर है। एक मनोवैज्ञानिक डेविड थामस ने तो सन्‌ 2012 में इस बीमारी पर एक किताब 'नार्सिसिज्म-बिहाइंड मास्क" ही लिख दी। वैसे तो यह बीमारी हर एक में कम या अधिक मात्रा में होती है नहीं तो दर्पण का आविष्कार ही क्यों होता? कोई अपनी बुद्धिमत्ता या ज्ञान पर आत्ममुग्ध रहता है तो, किसी को अपने धन-संपत्ति-ऐश्वर्य, शक्ति, शारीरिक सौंदर्य पर आत्ममुग्धता रहती है। जिस प्रकार से प्रकृति में रंगों की विभिन्न छटाएं मौजूद रहती हैं वैसे ही मनुष्य में यह मनोविकार भिन्न-भिन्न रुप में ढ़के-छुपे रुप में मौजूद रहता है। इस संबंध में मराठी की एक कहावत को उद्‌धृत किया जा सकता है - 'मला पाहा आणि फूल वहा।" अर्थात्‌ मुझे देखो और मुझ पर फूल अर्पण करो।

नार्सिसिज्म शब्द का जन्म नार्सिसस से हुआ है। जो एक ग्रीक-रोमन पौराणिक कथा का पात्र है। नार्सिसस एक युवक था जो अतीव सुंदर था। उसका सौंदर्य नारी-स्वरुप था। एक बार उसने अपना रुप एक निर्झर (झरना) के शांत जल में निहारा और स्वयं पर ही मोहित हो गया। उसकी इच्छा स्वयं के सौंदर्य के साथ मिलन की हुई। परंतु, यह तो असंभव था इस कारण वह स्वयं का ही चिंतन करते हुए विरह वेदना से व्याकुल हो मृत्यु को प्राप्त हो गया।

इंग्लिश-हिंदी शब्दकोश में नार्सिसस का अर्थ नरगिस का फूल दिया गया है। यूरोप में नदी किनारे उगनेवाले उन विशिष्ट फूलों को नरगिस कहते हैं जिनका प्रतिबिंब नदी के जल में पडता है। इकबाल ने भी इस नरगिस की अभिशप्तता पर एक शेर लिखा है जो बडा प्रसिद्ध है- ''हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है, बडी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।"" अपने ही प्रतिबिम्ब पर आकर्षित हो उसके साथ विलीननीकरण होने की बेचैनी को 'नार्सिसिज्म" कहते हैं। इस नार्सिसिज्म या नार्सिसिस भाव से पीडित लोग अपनी ही फोटो देखी जाए, अपने से ही संबंधित समाचार पढ़ें, अपनी ही आवाज सुनें इसकी चाह रखनेवाले होते हैं यह नार्सिसिस भाव का ही एक रुप है। लेखकों में यह भाव बडी ही आसानी से दिख पडता है।

वर्तमान में हमारे देश में इस नार्सिसिज्म ने हमें पूरी तरह अपनी जकडन में ले रखा है। हमारे तथाकथित राष्ट्रनिर्माता, धार्मिक बाबागण, समाज चिंतक-विचारक, उद्योगपति, फिल्म अभिनेता और राजनीतिक दल-राजनेताओं से लेकर उनके छुटभैये समर्थक नेतागण तक इस नार्सिसिस भाव से बुरी तरह ग्रस्त हैं। इन छुटभैयों की इस नार्सिसिस भाव से पीडित होने के पश्चात की हरकतें बडी कोफ्त पैदा करती हैं। जो जबरन ही अतिविशिष्ट होने का स्वांग रचते रहते हैं, अलग से सम्मान चाहते हैं। अपना महत्व बढ़ाचढ़ाकर दिखाने की कोशिश करते रहते हैं। इस विकार से बुद्धिजीवी तो विशेष रुप से ग्रस्त रहते हैं। फ्रायड ने इसे खतरनाक मान आत्मरति कहते हुए इसके लक्षण भी दिए हैं जो वर्तमान के सत्ताधीशों में सहज ही नजर आ जाएंगे।

इस भाव के ज्वलंत प्रतीक फिल्म इंडस्ट्रीज में हैं देवआनंद, राजकपूर जिनकी फिल्में हमेशा उनके ही इर्द-गिर्द घूमती रहती थी। वर्तमान में शाहरुख खान इस भाव का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। जो इतने अधिक आत्ममुग्ध हैं कि जरा सी रोकटोक या आलोचना उनका संतुलन बिगाडने के लिए पर्याप्त होती है। यहां तक कि वे मारपीट तक पर उतारु हो जाते हैं। यह भी नार्सिसिज्म का ही एक लक्षण है। हॉलीवुड अभिनेता-अभिनेत्रियां भी इस नार्सिसिज्म से पीडित रहे हैं इसके उदाहरण हैं मार्लिन मुनरो और कैरी ग्रांट इनका इस नार्सिसिस भाव से खेल-खिलाडी भी पीडित हैं। क्रिकेट के खेल में तो विशेष रुप से समय-समय पर जानकार उन्हें आत्ममुग्धता से बचने की सलाह देते रहते हैं। यह नियम विश्व की सभी टीमों पर समान रुप से लागू होता है।

कार्यसिद्धि नहीं व्यक्तिगत प्रसिद्धि की भावना ही चतुर्दिक व्याप्त है। बेमतलब के वक्तव्य केवल इसलिए देना की अपना ही वक्तव्य पढ़ने को मिले, फोटो छपे-दिखे। यह सत्य है कि कार्य वृद्धि के लिए प्रचार आवश्यक है परंतु, कभी तृप्त न होनेवाली आकांक्षाएं जाग जाती हैं तो सारा जोर प्रसिद्धि पर ही लग जाता है। आज राजनेता ही नहीं धार्मिक बाबा तक इसीके पीछे हैं। वर्तमान में रामदेव और आसाराम इस मामले में अग्रणी हैं। धार्मिक नेताओं के तो यह हाल हैं कि यदि आप उनसे मिलने गए और उनके चरण नहीं छूए तो उनकी भृकटियां तन जाती हैं। यह मेरा स्वयं का अनुभव है। वैसे इन चरणछूओं ने पूरे वातावरण को ही गंदला रखा है। ये बडे घातक होते हैं और समझदारों को चाहिए कि वे इनसे बचकर ही रहें। राजनेता तो प्रसिद्धि को इतना अधिक महत्व दे रहे हैं कि उनकी यह सोच विकसित हो गई है कि जितना अधिक प्रचार होगा प्रसिद्धि होगी उतनी अधिक अपनी हवा निर्मित होगी, कार्यकर्ताओं पर निर्भरता कम होगी। हवा बनाने से ही यश प्राप्ति हो जाएगी। किंतु यह धोखा है। मायावती ने उ. प्र. के मुख्यमंत्री रहते मूर्तियों की बाढ़ ला दी थी। मार्क्सवादी इसी नार्सिसिस भाव से पीडित होने के कारण सिंगूर के संकट को पहचान न सके और दोनो ने सत्ता गंवा दी। सन्‌ 2004 में इसी आत्मुग्धता भाव के कारण भाजपा ने फीलगुड और इंडिया शाइनिंग, भारत उदय जैसे नारे बुलंद कर सत्ता गंवा दी और 2009 में भी इसी कारण सत्ता दोबारा हासिल न कर सकी।

अधिक प्रसिद्धि प्रतिस्पर्धा का कारण बनती है जो एक जिद को बढ़ावा देती है, आत्मसंतोष के भाव और प्रभाव को बढ़ाती है। अत्याधिक प्रचार इस भाव को जन्म देता है कि धीरे-धीरे अपना आधार बढ़ाने के स्थान पर बुद्धिमानी का सुगम पथ तो यह है कि जमकर प्रसिद्धि की जाए सभी हथकंडे अपनाकर अपनी इमेज चमकाई जाए। प्रसिद्धि की इच्छा एक बार उत्पन्न हुई की प्रत्यक्ष ठोस काम करने की बजाए सारा जोर प्रसिद्धि पर ही दिया जाने लगता है। नार्सिसिज्म चापलूसी को भी बढ़ावा देता है, जो आगे चलकर घातक सिद्ध होता है। जो लोग महान हुए हैं उन्होंने सफलता अपने परिश्रम से हासिल की थी घटिया हथकंडों को अपनाकर नहीं।

सेल्फी का जो चलन इस समय चरम पर है वह भी इसी नार्सिसिज्म का एक प्रकार है। इसकी अति के चक्कर में कई लोग अपनी जान प्रति दिन गंवा रहे हैं। परंतु, हमारे नेता भी इसी नार्सिसिस भाव से पीडित होने के कारण स्वयं भी सेल्फी खिंचते-खिंचवाते फिर रहे हैं, शासन और मीडिया भी इसीको बढ़ावा देते नजर आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर अपनी सेल्फी पर अधिक से अधिक लाइक्स बटोरना, अपनी नितांत व्यक्तिगत बातों को भी सोशल मीडिया पर शेयर करना, उनके वीडियो बनाकर शेयर और अधिकाधिक लाइक्स बढ़ाने की होड करना, अपना प्रोफाईल बार-बार अपडेट करना इसी बीमारी के लक्षण हैं। जो कितने हानिकारक सिद्ध हो रहे हैं यह मनोवैज्ञानिक बतलाते रहते हैं परंतु लोग हैं कि बाज ही नहीं आ रहे।

इन प्रदूषित भावनाओं की अधिकता ही आज देश के लिए भयंकर घातक सिद्ध हो रही है। धूर्तता या अन्य कोई और हथकंडा अपनाकर किसी भी तरह से प्रसिद्धि प्राप्त करना यही जीवन का मापदंड बन गया है। जो इस तरह की चालाकी से यश, धन-संपत्ि या कोई अच्छा पद पा लेता है तो वह बडा चतुर माना जाता है। चारों ओर फैले इस तरह के वातावरण के कारण लोग निष्ठापूर्वक काम करनेवाले को मूर्ख समझते हैं। इस तरह के चतुर लोग शीघ्रतापूर्वक अपना काम निकाल लेते हैं। परिणाम स्वरुप पूरे समाज में शार्टकट अपनाने की प्रवृत्ति बल पकडने लगती है। जो घातक है। आज येनकेन प्रकरेण शार्टकट अपनाकर कम समय में लक्ष्य प्राप्ति के लिए अधिकांश लोग उतावले हो रहे हैं। लोगों को यह समझना चाहिए कि कोई सा भी कार्य फिर वह राष्ट्रनिर्माण का ही क्यों ना हो शार्टकट से हो नहीं सकता। कम से कम नेतृत्व देनेवाले लोगों को तो भी इस पर विचार करना चाहिए।

चालाकी से कोई महान कार्य हो नहीं सकता। अगर देश के भाग्य निर्धारक ही इस प्रवृत्ति से दूर नहीं होंगे तो सर्वसामान्य प्रेरणा कहां से ग्रहण करेंगे। परंतु, दुर्भाग्यवश हमारे देश में यह नार्सिसिज्म द्रुत गति से बढ़ता ही जा रहा है। यह सभी क्षेत्रों में भयावह रुप से हावी भी होता चला जा रहा है, इसे कदापि सराहनीय नहीं कहा जा सकता यह हर हाल में घातक ही नहीं विनाशकारी भी है। 

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