Sunday, 19 June 2016

क्या भगवान हैं? 6

इसी प्रकार आप जहां पर भी चले जाएं, किसी ना किसी गौण भगवान की कथा सुनेंगे और किसी स्थल पुराण को सुनेंगे। इसका प्रयोजन यह है कि हम इस समृद्ध संस्कृति के साथ जुडे रहें। हमें इस गौण भगवान के बारे में प्रमाण नहीं पूछना चाहिए। गौण भगवान का प्रयोजन हमारी साधना के लिए होता है; अतः गौण भगवान की सत्ता, उपस्थिति के लिए प्रमाण के लिए आग्रह मत करना, क्योंकि वह हमारा मतलब नहीं होना चाहिए। ब्रह्माजी के चार सिर कैसे होंगे? भगवान उन चारों मुखों से बात करते होंगे या एक मुख से? विष्णु भगवान के चार हाथ कैसे काम करेंगे? इत्यादि प्रश्नों से आपका कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा। इन गौण रुपों का उद्देश्य है, साधना के द्वारा अन्तःकरण शुद्धि और पूजा-ध्यान के द्वारा अपनी आन्तरिक उन्नति करना। हमें गौण भगवान को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। उनकी सिद्धी के बिना या दर्शन के बिना भी यह प्रयोजन सिद्धी हो सकती है। अपनी संस्कृति का आधार ही इन गौण भगवानों के ऊपर है। जितने भजन, कीर्तन आदि सम्पूर्ण संगीत, नाट्य-शास्त्र एवं इतिहास-पुराणादि भी गौण भगवान की वजह से ही सम्भव है। अपनी संस्कृति में विभिन्न देवी-देवताओं की कथाओं की वजह से नृत्य-शास्त्र सम्भव है। इतना ही नहीं अपनी फिल्मों के लिए भी यह आवश्यक हैं, कितनी ही ऐसी फिल्में हैं जो इन देवी-देवताओं के चरित्र पर ही आधारित हैं। इसलिए गौण भगवान की सिद्धी एवं दर्शन के लिए मत पूछो बल्कि उनकी पूजा, उपासना, ध्यान आदि के माध्यम से अपने अन्तःकरण को शुद्ध करो और मुख्य भगवान को समझो। यदि आप गौण भगवान को सिद्ध करने में लगे रहोगे कि मैं भगवान शिव के दर्शन पांच मुखों के रुप में करना चाहता हूं, मैं भगवान विष्णु के दर्शन चार हाथों वाले रुप में करना चाहता हूं तो आप पछताओगे। और यदि उसमें ही लगे रहोगे तो आपकी दृष्टि सदैव किसी ना किसी चमत्कार पर ही टिकी रहेगी और यदा-कदा चमत्कार हो भी गया तो आपके मन में संदेह रहेगा कि यह सचमुच का दर्शन है या आपके मन का भ्रम है। हमें गौण भगवान के दर्शन के लिए और उनको सिद्ध करने के लिए प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है, अपितु हमें उनका उपयोग कर्मयोग के लिए पूजा, पाठ, ध्यानादि के लिए करना है। उसके बाद यदि वह मूलभूत प्रश्न जो सबके मन में उत्पन्न होता है, क्या भगवान हैं? उसका उत्तर खोजने के लिए हम मुख्य भगवान की ओर अपनी दृष्टि बढ़ाएंगे। और मुख्य भगवान कौन हैं? अनन्त, असंग, आनन्द, चैतन्य। यदि कोई पूछे कि गौण भगवान कहां हैं, कैसे है? तो उन प्रश्नों के उत्तर में मत उलझना। विष्णुलोक कहां है? है या नहीं? कैसा है? शिवलोक कैसा है? इत्यादि प्रश्नों के उत्तर में मत उलझना, केवल उनके बारे में जो भी पुराणों में कथाएं हैं उनको पढ़कर पूजा आदि का आनन्द उठाते रहो और फिर मुख्य भगवान को समझने का प्रयत्न करो। वर्तमान समाज के साथ समस्या यह है कि सब लोग गौण भगवान के बारे में प्रमाण चाहते हैं, उनको सिद्ध करने के लिए कहते हैं। और जो भी गौण भगवान की सिद्धि में जाएगा वह समस्याएं खडी करेगा। अतः गौण भगवान की पूजा-उपासना करो और मुख्य भगवान को समझने का प्रयत्न करो। यही है वैदिक दृष्टि। (समाप्त)

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