Sunday, 19 June 2016

क्या भगवान हैं? 5

स्वामी ऐश्वर्यानन्द सरस्वती

अतः प्रथम भगवान के लक्षण के बारे में बात करें। क्या है भगवान का लक्षण? चैतन्य ही भगवान है। दूसरा प्रश्न है - भगवान के लिए साक्ष्य क्या है? हमारा उत्तर होगा - आपका हर अनुभव चैतन्य की वजह से सम्भव है, इसलिए आपका हर अनुभव भगवान की सत्ता अस्तित्व का प्रमाण है। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं - 'उत्क्रायन्तं स्थितिवापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्‌। विमुढ़ा नानुपश्यान्ति पश्यान्तिज्ञानचक्षुषः। व्यक्ति की हर क्रिया, हर अनुभव सम्भव है क्योंकि वह व्यक्ति चेतन है, क्योंकि वह व्यक्ति चैतन्य से युक्त है, और फिर भी यदि कोई ऐसा प्रश्न करता है। इसलिए भगवान कहते हैं - 'विमूढ़ानानुपश्यन्ति पश्यन्तिज्ञानचक्षुषः।" जिस व्यक्ति ने ठीक से शास्त्रों का अध्ययन किया है और भगवान के वास्तविक लक्षण को ठीक से समझ लिया है उसको कोई सन्देह नहीं रहेगा, वह समझेगा कि हर क्षण भगवान के सान्निध्य में है, इतना ही नहीं वह समझेगा कि वह भगवान से एक पल के लिए भी दूर नहीं है। इस प्रकार भगवान का लक्षण और भगवान का प्रमाण हमारे लिए स्पष्ट हुआ।


अब इस प्रश्न का ही थोडा विस्तार करके हम विचार करते हैं। यदि भगवान का लक्षण चैतन्य किया जाता है और चैतन्य का हम ऐसा लक्षण करते हैं कि जिस तत्त्व के द्वारा सबकुछ अनुभव किया जाता है वह चैतन्य है, तो आप यह बताइए कि उस चैतन्य का वस्तुतः क्या स्वभाव है? अर्थात्‌ उस चैतन्य का स्वरुप क्या है? यह अन्तिम प्रश्न है। अतः लक्षण-प्रमाण और स्वरुप का विचार होना चाहिए।


अब इस चैतन्य स्वभाव के बारे में जो कि हमारे लिए बहुत ही स्पष्ट है, वैज्ञानिक बहुत भ्रमित हैं। विज्ञान चैतन्य के तथ्य के बारे में जानता नहीं है। आज भी यह जानने के लिए 'रिसर्च" चलते रहते हैं कि चैतन्य के अन्दर कौनसा ऐसा तत्त्व है, जिसकी वजह से व्यक्ति का शरीर जीवित एवं सचेत रहता है। भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रयोग किए जा रहे हैं, अनेक भिन्न-भिन्न प्रक्रियाएं की जा रही हैं, और वे आपस में एक दूसरे के विरोधी परिणाम देती हैं, इसलिए 'रिसर्च" की यह प्रक्रिया और पेचीदी होती जा रही है। अब यह विषय इतना चिन्ता का विषय बन गया है कि कोई इसके बारे में उत्साहित नहीं है और हर वैज्ञानिक शाखा यही कहती है कि यह विषय हमारी शाखा के अन्दर नहीं आता है। कोई भी वैज्ञानिक अपनी शाखा के अन्दर इस विषय को लेना नहीं चाहता, चाहे वह विद्युत विषयक विज्ञान हो, स्नायु विज्ञान हो, भूगर्भ विज्ञान हो, चैतन्य के बारे में कुछ भी नहीं जानते। केवल जब वे चैतन्य के स्वरुप स्वभाव को जानेंगे तब वे भगवान के स्वभाव स्वरुप को जान सकेंगे।

दूसरी ओर अपने शास्त्र चैतन्य के स्वरुप के बारे में बताते हैं। अपने शास्त्रों के अनुसार चैतन्य पूर्णतः दृश्य जगत से भिन्न है, अर्थात्‌ यह न तो मैटर और न ही एनर्जी है। क्योंकि, एनर्जी भी मैटर का ही एक हिस्सा है। चैतन्य को प्रायः वैज्ञानिक लोग अंग्रेजी में स्पिरिट्‌ कहते हैं। उनके लिए दो ही शब्द हैं (मैटर और स्पिरिट्‌) । हम स्पिरिट्‌ शब्द का प्रयोग करना नहीं चाहेंगे। हम उसी तत्त्व को चैतन्य कहते हैं। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं - 'यस्यात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपिचोऱ्तमः। अतोऽस्मिलोके वेदेच प्रतितःपुरुषोत्तमः।। मैं वह तत्त्व हूं जो मैटर और एनर्जी से भिन्न है। वह तत्त्व जो हम सब के द्वारा सर्वदा अनुभव किया जाता है, जिसको शुद्ध चैतन्य कहते हैं, वही भगवान है। और यह चैतन्य रुप भगवान हर शरीर के अन्दर है। यह चैतन्य सम्पूर्ण जगत को चलानेवाले नियमों की अवधि के परे है। जो भी रासायनिक और भौतिक कानून या विधि हैं, जो कि भौतिक जगत का भाग हैं वे इस चैतन्य को प्रभावित नहीं कर सकते। वहीं असंग, सर्वव्यापी, अनुभवातीत, सर्वोत्कृष्ट चैतन्य भगवान हैं - (असंड़्‌गोऽमपुरुषः श्रुति.) इतना ही नहीं जो भौतिक वस्तु है वह एवं देश काल इस चैतन्य से नियंत्रित हैं। बाकि सभी वस्तुएं देश एवं काल के वश में हैं परंतु चैतन्य देश एवं काल के वश में नहीं हैं। इसलिए शास्त्र चैतन्य को 'अनन्त चैतन्य" कहता है। यह असंग अनन्त चैतन्य, जो कि देश और काल के वश में नहीं है और हम सब के अन्दर है, वही भगवान है। 'ईश्वरसर्वभूतानां ह्रद्देशेऽजुर्नतिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानियन्त्रारुढ़ानिमायचा गी।" जैसे अदृश्य बिजली के द्वारा दृश्य पंखे को चलाया जाता है उसी प्रकार अदृश्य चैतन्य के द्वारा इस स्थूल एवं सूक्ष्म शरीर को चलाया जाता है। मैंने यह नहीं कहा कि चैतन्य बिजली है, इसको ठीक से समझ लीजिए। यह केवल दृष्टांत है, जैसेकि बिजली दिखाई नहीं देती उसी प्रकार यह चैतन्य दिखाई नहीं देता, किन्तु हर क्षण हमारे अनुभव का विषय होता है। यह अनन्त, असंग, आनन्द चैतन्य ही भगवान है, जिसकी सत्ता, अस्तित्व के बारे में कोई भी समझदार व्यक्ति सन्देह नहीं कर सकता। और इस आनन्द, असंग, अनन्त भगवान को समझना ही हर मनुष्य के जीवन का लक्ष्य होता है। इसको ही ईश्वर दर्शन, ईश्वर प्राप्ति कहा जाता है, जो शास्त्रों में मनुष्य जीवन का लक्ष्य रुप से प्रस्तुत किया है।... क्रमशः

No comments:

Post a Comment