Sunday, 19 June 2016

क्या भगवान हैं? 3

स्वामी ऐश्वर्यानन्द सरस्वती

अपने शास्त्रों की दृष्टि में भगवान का सर्वसम्मत लक्षण क्या है? वेद-शास्त्रों की दृष्टि से भगवान को चैतन्य के रुप में लक्षित किया गया है। 'चैतन्यस्वरुपः, ज्ञानस्वरुपः, विज्ञानस्वरुपः, चिद्रूपः।" अब प्रश्न यह है कि, चैतन्य शब्द के द्वारा वस्तुतः क्या समझ लिया जाता है? यह भी वेद लक्षण के द्वारा स्पष्ट करते हैं। 'येन रुपं रस गन्धं शब्दान स्पर्शञ्च मैथुनाम्‌। येतेनैव विज्ञानाति किमत्र परिशिष्यते। एतत वैतत।।" यमधर्मराजा नचिकेता को उपदेश देते हुए आत्मा अर्थात्‌ भगवान का लक्षण बताते हैं। जिस तत्त्व की वजह से हम सब लोग अपने आस-पास के सम्पूर्ण जगत्‌ बारे में ज्ञानवान जानकार रहते हैं। वह चैतन्य तत्त्व ही भगवान है। और एक बार यह भगवान का लक्षण स्पष्ट हो जाता है तो फिर हम आगे बढ़ते हैं।

अब प्रश्न यह है - उस लक्षण से युक्त भगवान हैं या नहीं? यही दूसरा प्रश्न है। अब जबकि हमने भगवान का लक्षण स्पष्ट किया है इसलिए हम इस प्रश्न को बदल सकते हैं। अब प्रश्न का स्वरुप क्या होगा? पहला जो प्रश्न था कि भगवान हैं या नहीं? उसके स्थान पर प्रश्न होगा कि चैतन्य है या नहीं? और यदि कोई आप से प्रश्न करे कि चैतन्य है या नहीं? तो आपका उत्तर क्या होगा? आप यही कहेंगे कि 'आप अपने परिवार की चीजों के बारे में जानते हैं या नहीं? आप उन चीजों के बारे में समझते हैं या नहीं? वह व्यक्ति क्या कहेगा? और उसको क्या कहना चाहिए? उसके द्वारा प्रश्न करना ही यह स्पष्ट करता है कि वह सचेत व्यक्ति है। उसके द्वारा प्रश्न किया जाना ही चैतन्य के बिना सम्भव नहीं है इसलिए भगवान हैं या नहीं यह प्रश्न करना ही मूर्खता है। यह तो उस प्रकार पूछना हुआ जैसेकि विद्यारण्य मुनि पञ्चदृशी में कहते हैं 'जिह्वा यें नास्ति वेत्युक्तिः लज्जायैकेवलं यथा।" जैसेकि कोई व्यक्ति पूछता है - मुझे बताइए कि मेरे मुंह में जिह्वा है या नहीं? इसका जिह्वा के बारे में पूछना कैसा विरोधाभासी वक्तव्य है उसी प्रकार चैतन्य के बारे में प्रश्न करना भी विरोधाभासी प्रश्न है। और क्योंकि चैतन्य ही भगवान है, इसलिए भगवान है या नहीं यह प्रश्न भी हास्यापस्द एवं विरोधाभासी है।


इसलिए यदि कोई आपसे भगवान के बारे में साक्ष्य (प्रुफ) मांगे तो इसका साक्ष्य मत देना, बल्कि उसको उल्टा प्रश्न करके भगवान का लक्षण स्पष्ट करना, बस इतना ही पर्याप्त है। फिर वह व्यक्ति ही साक्ष्य नहीं मांगेगा। और यदि भगवान का लक्षण स्पष्ट करने के बाद भी कोई भगवान के बारे में साक्ष्य चाहता है तो केवल यह सिद्ध करता है कि वह व्यक्ति मूर्ख है, उसके अंदर समझने की क्षमता नहीं है। भगवान का लक्षण स्पष्ट करने के बाद भी यदि प्रश्नकर्ता भगवान के बारे में साक्ष्य चाहता है तो यह सिद्ध होता है कि उस व्यक्ति ने लक्षण को ठीक से सुना और समझा नहीं। यतीष्ट व्यक्ति भी ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता। वह भी प्रश्न कर सकता है क्योंकि वह चेतन व्यक्ति है। इसलिए व्यक्ति चाहे वैज्ञानिक हो, यतीष्ट हो, एग्नॉस्टिक हो, उसके मन में भगवान हैं या नहीं? यह प्रश्न इसलिए आ सकता है क्योंकि,उसको भगवान का लक्षण ठीक से बतलाया नहीं गया है।.... क्रमशः

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