Sunday, 19 June 2016

भविष्य-चिंतक वीर सावरकर के सपनों का भारत - 2


सावरकर हिंदुत्ववादी थे किंतु उसकी अपेक्षा अधिक 'सेक्यूलर" भी थे। परंतु उनके सेक्लूरिजम को भी उनके विरोधियों ने विकृत कर जनता के सामने प्रस्तुत किया और उनके अनुयायियों ने भी उसे कभी जनता के सामने ठीक ढ़ंग से प्रस्तुत नहीं किया। 'सेक्यूलिरिजम" यानी शासन की धर्म संबंधी भूमिका। इस संबंध में वीर सावरकरजी की भूमिका इस प्रकार की थी, धर्म से संबंधित विषय पारलौकिक और आध्यात्मिक स्वरुप का माना जाना चाहिए। लौकिक विषयों में धर्म का अधिकार मान्य नहीं होना चाहिए। उनका कहना था - धर्म शब्दनिष्ठा और श्रद्धा का प्रांत है और परलोक उसका विषय; इहलोक यानी कानून, व्यवहार होकर प्रत्यक्षनिष्ठ प्रयोग का क्षेत्र! वहां धर्म नहीं चलेगा। धर्म अलग। कानून अलग। धर्मग्रंथ को बंद कर अगर बुद्धिवाद से विचार किया जाए तो ही ऐहिक जीवन के प्रश्न हल हो सकते हैं। अतः मानव जीवन का ऐहिक और पारलौकिक इस प्रकार का विभाजन कर धर्म को केवल पारलौकिक विषयों तक ही मर्यादित रखना और ऐहिक जीवन के सारे विषय बुद्धिवाद के या उपयुक्ततावाद के हवाले करना इस प्रकार की उनकी सेक्यूरिजम संबंधी भूमिका थी। इहलौकिक जीवन से धर्म को दूर कर उसे केवल पारलौकिक जीवन तक का मर्यादित माने बगैर ऐहिक मानवी जीवन के निर्णय बुद्धि के आधार पर लिए नहीं जा सकेंगे, ऐसा उनका कहना था। 'अरबी संस्कृति का उच्चाटन" इस निबंध में उन्होंने इस संबंध में बिल्कूल सुस्पष्ट विचार प्रस्तुत किए हैं। तुर्कस्थान के कमालपाशा ने इस्लाम को पारलौकिक जीवन तक मर्यादित कर डाला था। ऐहिक जीवन में इस्लाम के हस्तक्षेप का अधिकार गैरकानूनी कर डाला था। राजनीति, सामाजिक नीति, अर्थनीति, शिक्षा, रक्षा, भाषा, कानून आदि सारे ऐहिक विषय उन्होंने शासन के, विधिमंडल के बुद्धिवादी क्षेत्रतले ले लिए थे। ऐहिक क्षेत्र से धर्म का साफ उच्चाटन कर डाला था।


सावरकरजी को भारत में यही भूमिका लेनी थी। भारत का संविधान और कामकाज पूरी तरह से बुद्धिवाद पर आधारित रहेगा; वह वेद, गीता, कुरान, बाइबल इस प्रकार के किसी भी धर्मग्रंथ पर आधारित नहीं रहेगा इस प्रकार की उन्होंने घोषणा ही की हुई थी। धर्मग्रंथ आज कालबाह्य हो गए हैं; आज हम किस प्रकार से रहें; व्यवहार करें यह कहने का अधिकार धर्मग्रंथों को नहीं; धर्मग्रंथों पर आधारित सामाजिक संस्थाओं को खडा करने के दिन गए; आज हमें जो सामाजिक संस्थाएं खडी करनी हैं वे धर्मग्रंथ पर न होकर विज्ञानग्रंथों पर, बुद्धिवाद पर खडी करनी हैं इस प्रकार की उनकी भूमिका थी। सावरकरजी के सेक्यूलरिजम की यह भूमिका हिंदू-मुस्लिम समस्या सहित अनेक राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याओं पर रामबाण उपाय जैसी थी। उन्हें मालूम था कि, संसार की धर्मों संबंधी अधिकांश समस्याएं, धर्म जो मनुष्य के इहलौकिक जीवन मेें प्रभावी होता है से पैदा होती हैं। उदाहरणार्थ सामाजिक विषमता की समस्या को लें तो धर्म ने जीवन के विषय में कही हुई आज्ञाओं में से ही वह पैदा हुई हैं। इहलौकिक जीवन पर के धर्म के अधिकार को ही निकाल लिया जाए तो धर्मप्रणीत सामाजिक विषमता का आधार ही उखड जाता है। मुस्लिमों का स्वतंत्र राष्ट्र यानी इहलौकिक रहनेवाले राजनैतिक क्षेत्र में धर्म का उपयोग। धर्म का विषय परलोक तक का मर्यादित कर दिया जाए तो सारा इहलौकिक मानवी जीवन धर्म के नियंत्रण से मुक्त हो जाता है और धर्मसंबंधी सारी समस्याएं समाप्त हो जाती हैं, इस प्रकार की उनकी भूमिका थी। इस भूमिका के कारण हिंदुओं पर होनेवाला अन्याय भी समाप्त होनेवाला था, मुस्लिमों का प्रश्न भी हल होनेवाला था; धर्म का राजनैतिक आधार भी समाप्त होनेवाला था; सामाजिक सुधार और आधुनिकता का मार्ग भी खुला होनेवाला था। जिसे परलोक में या अध्यात्म में श्रद्धा होगी वह उस विषय तक का मर्यादित अपने धर्म का पालन कर सकेगा। पारलौकिक और आध्यात्मिक अर्थ का धर्म केवल मानसिक और आत्मिक संतुष्टि तक का सीमित होने के कारण उसका किसी भी तरह का दुष्परिणाम समाज पर और राष्ट्र पर नहीं होगा। सेक्यूलरिजम की इस प्रकार की भूमिका रखनेवाले होने के बावजूद सावरकरजी के धर्म संबंधी विचारों के बारे में भ्रांतियां फैलाना, उन पर मिथ्या दोषारोपण करना इस अज्ञान को या जानबूझकर किए जानेवाले भ्रामक प्रचार को क्या कहा जाए?

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