Monday, 20 June 2016

बढ़ता ही जा रहा है नार्सिसिज्म

बढ़ता ही जा रहा है नार्सिसिज्म

नार्सिसिज्म एक प्रकार का मनोविकार, मनोरोग, मनोवैज्ञानिक कुंठा है। नार्सिसिज्म से ग्रस्त व्यक्ति की पहचान यह है कि जो स्वयं के प्रति अत्याधिक लगाव रखता हो, स्वयं के प्यार-आकर्षण में ही इतना डूबा रहता है कि दूसरे के प्रति लापरवाह हो जाता है। आत्मप्रशंसा में दीवानगी की हद तक मग्न रहता हो। इसे हिंदी में अतिआत्ममुग्धता का विकार कह सकते हैं। यह एक पर्सोनिलीटी डिसऑर्डर है। एक मनोवैज्ञानिक डेविड थामस ने तो सन्‌ 2012 में इस बीमारी पर एक किताब 'नार्सिसिज्म-बिहाइंड मास्क" ही लिख दी। वैसे तो यह बीमारी हर एक में कम या अधिक मात्रा में होती है नहीं तो दर्पण का आविष्कार ही क्यों होता? कोई अपनी बुद्धिमत्ता या ज्ञान पर आत्ममुग्ध रहता है तो, किसी को अपने धन-संपत्ति-ऐश्वर्य, शक्ति, शारीरिक सौंदर्य पर आत्ममुग्धता रहती है। जिस प्रकार से प्रकृति में रंगों की विभिन्न छटाएं मौजूद रहती हैं वैसे ही मनुष्य में यह मनोविकार भिन्न-भिन्न रुप में ढ़के-छुपे रुप में मौजूद रहता है। इस संबंध में मराठी की एक कहावत को उद्‌धृत किया जा सकता है - 'मला पाहा आणि फूल वहा।" अर्थात्‌ मुझे देखो और मुझ पर फूल अर्पण करो।

नार्सिसिज्म शब्द का जन्म नार्सिसस से हुआ है। जो एक ग्रीक-रोमन पौराणिक कथा का पात्र है। नार्सिसस एक युवक था जो अतीव सुंदर था। उसका सौंदर्य नारी-स्वरुप था। एक बार उसने अपना रुप एक निर्झर (झरना) के शांत जल में निहारा और स्वयं पर ही मोहित हो गया। उसकी इच्छा स्वयं के सौंदर्य के साथ मिलन की हुई। परंतु, यह तो असंभव था इस कारण वह स्वयं का ही चिंतन करते हुए विरह वेदना से व्याकुल हो मृत्यु को प्राप्त हो गया।

इंग्लिश-हिंदी शब्दकोश में नार्सिसस का अर्थ नरगिस का फूल दिया गया है। यूरोप में नदी किनारे उगनेवाले उन विशिष्ट फूलों को नरगिस कहते हैं जिनका प्रतिबिंब नदी के जल में पडता है। इकबाल ने भी इस नरगिस की अभिशप्तता पर एक शेर लिखा है जो बडा प्रसिद्ध है- ''हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है, बडी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।"" अपने ही प्रतिबिम्ब पर आकर्षित हो उसके साथ विलीननीकरण होने की बेचैनी को 'नार्सिसिज्म" कहते हैं। इस नार्सिसिज्म या नार्सिसिस भाव से पीडित लोग अपनी ही फोटो देखी जाए, अपने से ही संबंधित समाचार पढ़ें, अपनी ही आवाज सुनें इसकी चाह रखनेवाले होते हैं यह नार्सिसिस भाव का ही एक रुप है। लेखकों में यह भाव बडी ही आसानी से दिख पडता है।

वर्तमान में हमारे देश में इस नार्सिसिज्म ने हमें पूरी तरह अपनी जकडन में ले रखा है। हमारे तथाकथित राष्ट्रनिर्माता, धार्मिक बाबागण, समाज चिंतक-विचारक, उद्योगपति, फिल्म अभिनेता और राजनीतिक दल-राजनेताओं से लेकर उनके छुटभैये समर्थक नेतागण तक इस नार्सिसिस भाव से बुरी तरह ग्रस्त हैं। इन छुटभैयों की इस नार्सिसिस भाव से पीडित होने के पश्चात की हरकतें बडी कोफ्त पैदा करती हैं। जो जबरन ही अतिविशिष्ट होने का स्वांग रचते रहते हैं, अलग से सम्मान चाहते हैं। अपना महत्व बढ़ाचढ़ाकर दिखाने की कोशिश करते रहते हैं। इस विकार से बुद्धिजीवी तो विशेष रुप से ग्रस्त रहते हैं। फ्रायड ने इसे खतरनाक मान आत्मरति कहते हुए इसके लक्षण भी दिए हैं जो वर्तमान के सत्ताधीशों में सहज ही नजर आ जाएंगे।

इस भाव के ज्वलंत प्रतीक फिल्म इंडस्ट्रीज में हैं देवआनंद, राजकपूर जिनकी फिल्में हमेशा उनके ही इर्द-गिर्द घूमती रहती थी। वर्तमान में शाहरुख खान इस भाव का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। जो इतने अधिक आत्ममुग्ध हैं कि जरा सी रोकटोक या आलोचना उनका संतुलन बिगाडने के लिए पर्याप्त होती है। यहां तक कि वे मारपीट तक पर उतारु हो जाते हैं। यह भी नार्सिसिज्म का ही एक लक्षण है। हॉलीवुड अभिनेता-अभिनेत्रियां भी इस नार्सिसिज्म से पीडित रहे हैं इसके उदाहरण हैं मार्लिन मुनरो और कैरी ग्रांट इनका इस नार्सिसिस भाव से खेल-खिलाडी भी पीडित हैं। क्रिकेट के खेल में तो विशेष रुप से समय-समय पर जानकार उन्हें आत्ममुग्धता से बचने की सलाह देते रहते हैं। यह नियम विश्व की सभी टीमों पर समान रुप से लागू होता है।

कार्यसिद्धि नहीं व्यक्तिगत प्रसिद्धि की भावना ही चतुर्दिक व्याप्त है। बेमतलब के वक्तव्य केवल इसलिए देना की अपना ही वक्तव्य पढ़ने को मिले, फोटो छपे-दिखे। यह सत्य है कि कार्य वृद्धि के लिए प्रचार आवश्यक है परंतु, कभी तृप्त न होनेवाली आकांक्षाएं जाग जाती हैं तो सारा जोर प्रसिद्धि पर ही लग जाता है। आज राजनेता ही नहीं धार्मिक बाबा तक इसीके पीछे हैं। वर्तमान में रामदेव और आसाराम इस मामले में अग्रणी हैं। धार्मिक नेताओं के तो यह हाल हैं कि यदि आप उनसे मिलने गए और उनके चरण नहीं छूए तो उनकी भृकटियां तन जाती हैं। यह मेरा स्वयं का अनुभव है। वैसे इन चरणछूओं ने पूरे वातावरण को ही गंदला रखा है। ये बडे घातक होते हैं और समझदारों को चाहिए कि वे इनसे बचकर ही रहें। राजनेता तो प्रसिद्धि को इतना अधिक महत्व दे रहे हैं कि उनकी यह सोच विकसित हो गई है कि जितना अधिक प्रचार होगा प्रसिद्धि होगी उतनी अधिक अपनी हवा निर्मित होगी, कार्यकर्ताओं पर निर्भरता कम होगी। हवा बनाने से ही यश प्राप्ति हो जाएगी। किंतु यह धोखा है। मायावती ने उ. प्र. के मुख्यमंत्री रहते मूर्तियों की बाढ़ ला दी थी। मार्क्सवादी इसी नार्सिसिस भाव से पीडित होने के कारण सिंगूर के संकट को पहचान न सके और दोनो ने सत्ता गंवा दी। सन्‌ 2004 में इसी आत्मुग्धता भाव के कारण भाजपा ने फीलगुड और इंडिया शाइनिंग, भारत उदय जैसे नारे बुलंद कर सत्ता गंवा दी और 2009 में भी इसी कारण सत्ता दोबारा हासिल न कर सकी।

अधिक प्रसिद्धि प्रतिस्पर्धा का कारण बनती है जो एक जिद को बढ़ावा देती है, आत्मसंतोष के भाव और प्रभाव को बढ़ाती है। अत्याधिक प्रचार इस भाव को जन्म देता है कि धीरे-धीरे अपना आधार बढ़ाने के स्थान पर बुद्धिमानी का सुगम पथ तो यह है कि जमकर प्रसिद्धि की जाए सभी हथकंडे अपनाकर अपनी इमेज चमकाई जाए। प्रसिद्धि की इच्छा एक बार उत्पन्न हुई की प्रत्यक्ष ठोस काम करने की बजाए सारा जोर प्रसिद्धि पर ही दिया जाने लगता है। नार्सिसिज्म चापलूसी को भी बढ़ावा देता है, जो आगे चलकर घातक सिद्ध होता है। जो लोग महान हुए हैं उन्होंने सफलता अपने परिश्रम से हासिल की थी घटिया हथकंडों को अपनाकर नहीं।

सेल्फी का जो चलन इस समय चरम पर है वह भी इसी नार्सिसिज्म का एक प्रकार है। इसकी अति के चक्कर में कई लोग अपनी जान प्रति दिन गंवा रहे हैं। परंतु, हमारे नेता भी इसी नार्सिसिस भाव से पीडित होने के कारण स्वयं भी सेल्फी खिंचते-खिंचवाते फिर रहे हैं, शासन और मीडिया भी इसीको बढ़ावा देते नजर आ रहे हैं। सोशल मीडिया पर अपनी सेल्फी पर अधिक से अधिक लाइक्स बटोरना, अपनी नितांत व्यक्तिगत बातों को भी सोशल मीडिया पर शेयर करना, उनके वीडियो बनाकर शेयर और अधिकाधिक लाइक्स बढ़ाने की होड करना, अपना प्रोफाईल बार-बार अपडेट करना इसी बीमारी के लक्षण हैं। जो कितने हानिकारक सिद्ध हो रहे हैं यह मनोवैज्ञानिक बतलाते रहते हैं परंतु लोग हैं कि बाज ही नहीं आ रहे।

इन प्रदूषित भावनाओं की अधिकता ही आज देश के लिए भयंकर घातक सिद्ध हो रही है। धूर्तता या अन्य कोई और हथकंडा अपनाकर किसी भी तरह से प्रसिद्धि प्राप्त करना यही जीवन का मापदंड बन गया है। जो इस तरह की चालाकी से यश, धन-संपत्ि या कोई अच्छा पद पा लेता है तो वह बडा चतुर माना जाता है। चारों ओर फैले इस तरह के वातावरण के कारण लोग निष्ठापूर्वक काम करनेवाले को मूर्ख समझते हैं। इस तरह के चतुर लोग शीघ्रतापूर्वक अपना काम निकाल लेते हैं। परिणाम स्वरुप पूरे समाज में शार्टकट अपनाने की प्रवृत्ति बल पकडने लगती है। जो घातक है। आज येनकेन प्रकरेण शार्टकट अपनाकर कम समय में लक्ष्य प्राप्ति के लिए अधिकांश लोग उतावले हो रहे हैं। लोगों को यह समझना चाहिए कि कोई सा भी कार्य फिर वह राष्ट्रनिर्माण का ही क्यों ना हो शार्टकट से हो नहीं सकता। कम से कम नेतृत्व देनेवाले लोगों को तो भी इस पर विचार करना चाहिए।

चालाकी से कोई महान कार्य हो नहीं सकता। अगर देश के भाग्य निर्धारक ही इस प्रवृत्ति से दूर नहीं होंगे तो सर्वसामान्य प्रेरणा कहां से ग्रहण करेंगे। परंतु, दुर्भाग्यवश हमारे देश में यह नार्सिसिज्म द्रुत गति से बढ़ता ही जा रहा है। यह सभी क्षेत्रों में भयावह रुप से हावी भी होता चला जा रहा है, इसे कदापि सराहनीय नहीं कहा जा सकता यह हर हाल में घातक ही नहीं विनाशकारी भी है। 

Embrace needy with your skin: Donate Skin


Skin donation or skin banking is a new concept these days, which no one has ever heard and is aware about it. Some years ago there were awareness campaigns for eye donation and donation of other body parts. Slowly people understood the fact and now people are not reluctant to it. Now this is the era of skin donation.
Women are the major burn victims, as they work in kitchen and while cooking food often they get burn wounds. Apart from this, cases like acid attacks, dowry attacks etc prevails in society. There are many such skin wounds for which replacement with new skin is the only way. Burn wound is the most catastrophic wound of all. In these situations, the only way of retrieving is substitution of other skin. For these reasons skin donation is required.
Skin banking is a process in which skin is removed from donor’s body and then tested. If the skin is found suitable, it is packed and stored for reuse.
Donations can be made while living as well as after death. Donors can be anyone above 16years of age and who is not suffering from any big disease like AIDS, Skin cancer, Hepatitis B etc.
As per eye donation, after death it should be procured within 2hrs of death but in case of skin donation it can be taken up to 24hrs of death. Usually skin is taken off (which is called skin harvesting) from thighs and back. In this way donor also remains unaffected of it. There are total 8 layers of skin, out of which only 1/8th is taken off, which is upper layer of the skin. Moreover, after removing skin from a healthy body, skin cells can grow new skin in some span of time.
The first skin bank was established in USA around 1950. Skin donation can be done in hospitals wherever there are burn units.
According to an article which I read recently in a newspaper, Indore city is leading in donating body parts. It feels great when we read such news, after spreading awareness in this area now people should be made aware of skin donation. Awareness campaigns should be held in which society should be guided to donate skin and that too through proper channel. This will be helpful for so many people who are in need of it. Women NGO’s should come forward and work in this area by which more and more female can get profit out of it.
Today skin donors are very less as compared to the burn patients. The time has come when we should get aware of this technique and without hesitating, through proper channel we should move forward and help the needy people, in living their life like a normal person.

- Arpita K

CYBER MARKETING: A NEW ERA IN MARKETING

ARPITA@SHIRISHSAPRE.COM


Marketing traditionally can be defined as activities which are associated with selling of products or service. But now in recent years it is just not the activity related to buying and selling department of the company, rather now it is playing a major role in building good and strong customer relationship for the producer or seller. Marketing strategy includes various promotional activities which gives advantages in the selling of the services or products. Some of the promotional strategies includes advertisements, teasers, video clips, door to door selling, surveying etc. In this same genre one more strategy is exponentially growing which is termed as Cyber Marketing. A new trend of 21st century or rather internet century which is giving an outstanding results in the field of marketing.

Some 10-15 years ago cyber marketing technique started by static websites. The producer developed a website that wasn’t interactive, it just used to display the information and people accessed only to seek information about the company or the products. Gradually dynamic websites were developed which included some interaction on it. Like enquiry forms were generated, feedback, ratings, suggestion forms were included. This helped the companies to interact more with consumers and also to build a positive relation with them. As any consumer which was unhappy or happy can share the feelings with the service provider or the producer. This strategy increased the faith and trust percentage of the consumer towards the producer.

The next step gave birth to ecommerce. Apart from ecommerce various other techniques were also used in cyber marketing like online advertising, social media, email marketing, Search Engine Optimization etc.

Ecommerce: Online shopping was introduce in which consumers can purchase the products online without moving out of their areas. The services are day by day getting easy to access and are getting transparent too. Very small percentage of fraud cases have been recorded which will still reduce in coming years.

Online advertising: These days every house is equipped with either a smart phone or a desktop/laptop. It is the easiest and economic way to reach every home. Youngsters are more and more attracted with such technique.

Social Media: This is the most effective way to market the product. As people are connected with each other through social media. It is an effective way to encourage and attract the consumers to visit your websites. Social commerce is an effective tool for it, which directs a person to the product website.

Email Marketing: This is a common method used by almost every seller. It is very cost effective and economical. A bunch of email ids are needed for it which we can get very easily through various sources. Database has to be maintained for these email id’s and once collated can be used to shoot mails individually and regularly. Almost everyone today access email service.

Search Engine Optimization: Which is abbreviated as SEO, it is a technique to increase web count for sites. Through this techniques links are built by optimizing keywords, so that search engine can direct a good amount of traffic to the websites. But a problem which arises in using this technique is that it directs all kinds of traffic to website which can include low as well high quality traffic. In case of low quality traffic it becomes burden for the owner as in this race theirs a risk of ignoring high quality traffic.

Some of the features which are helpful in Cyber marketing can be:

Developing websites:

Which are easy to remember and access
Which includes attractive and meaningful content
Which should not be overloaded with data which makes the site bulky and slow
Which should not be complicated and confusing, having excessive links and sub-links
Targeting Traffic:

Use various methods like SEO to target the audience. Make sure to target the correct set of audience that is high quality audience to visit your page.

Converting audience to customers:

This should be the prime goal of the cyber marketing which can be done by developing attractive features of the product as well as making attractive visuals for it. The website should be presentable which should also include some offers and discounts. Moreover website should be visitor friendly. Process should have minimum steps so that customers can easily order through these websites.

Many websites have been developed for comparing products where you can find different products with different options and you can easily compare them. Such sites also includes rating for the product, testimonials from the customers, feedbacks, suggestions etc. This definitely helps the customers in making up of mind for buying any particular product of his/her choice.

Cyber Marketing is the strategy to be followed in this era, which is growing exponentially and is expected to grow more with an emergence of newer technologies.



- Arpita

OUR JOURNEY THROUGH AIM FOR SEVA

Our Journey through AIM for Seva


Swami Aishwaryanand Sarasvati,

Regional Coordinator, Madhya Pradesh


I remember the day at Arsh Vidya Gurukulam, Anaikatti, when Pujya Swamiji called all of us disciples and said, "I have decided that we Sanyasis should also do some Seva work. So we will start an organisation which is more like a movement, and which will be an all India trust. For the past 40 years I have been teaching Vedanta and giving public talks all over the and created many teachers like you. All of you are teaching Vedanta in India and abroad. Now I want all of you who are willing to do Seva activities near your centre to come forward."


That day after lunch I thought over Pujya Swamiji's words and decided that since Pujya Swamiji himself desires that all of us, his deciples, should do some Seva, I should start some Seva activity in M.P. so with the help of my Vedants student, I started organizing medical camp for tribal people. It went on for more than two years.Then,one Shri Bhanu Pratapsingh Thakur came forward and donated a piece of land for me to build an ashram near Indore.Pujya Swamiji said,"Very good. Now you can build a small Ashram there".I returned to Indore and started talking to people to get their support tor the project.It was at this time that Swamini Tattvavidyanandaji from Lucknow and Dr. Terry Papneja from Toronto invited me to meet them in Jabalpur.Dr.Papneja was very happy to meet me and asked me,"Swamiji, why don't you start a hostel some where in M.P.? We will support you totally,don't worry." I consulted Pujya Swamiji about starting a hostel near Indore, and Swamiji immediately said that it was a good idea and asked ,me to go ahead. Finally,on10 June 2005 we started the work. On 20 December 2005, Pujya Swamiji and Shri Balaram Jaskad, the Governor of M.P.,inaugurated the building. That was first Free Student Home in M.P. and today, we have 10 of them running, with two more under construction.


In the early days, I used to wonder why I ever started this Seva work. The students created so many problems,and neither did the staff understand the vision of AIM for seva. Despite the initial difficulties, I continued my work. I also started visiting the tribal villages and met a number of people who were struggling with poverty and lack of basic amenities. Then I realized the truth of Pujya Swamiji's concern for Hindu Dharma. I Understood that if we,his disciples,did not take up this work as a priority,nobody would do it. And if we let time pass, it meight be too late. I resolved, then and there, that I would give my time & effort to AIM for Seva. Today, when I visit any village, there will be at least 100 people with me. The many ears of visiting & meeting with the tribal people taugh me one thing : that our traditional Indian culture is still vibrant & alive within them.


I would like to share an intresting incident. Onc I was in a tribal village iln Mandal Dist.M.P. We stayed overnight in that particular village. Next morning I wanted to take a bath and get refreshed, but there was no bathroom, so we went to a small river nearby to bathe. Later,we saw some of the people of the village preparing alcohol from flowers. I had never seen this before and was curious as to how they distilled liquor from the flowers. One of the three men who were working explained their process. He opened the lid from a drum where the liquor was stored and offered me a drink. They did not know that sadhus do not drink liquor but they wanted to a honour a guest. And their way of honoring a guest was to offer something they valued. This time it was liquor. The man said, "Whenever a guest comes we have to offer them something we have, whatever it may be." I was so impressed and touched by their attitude of honoring their guests, 'atithyasatkar'. However I declined their generous offer and explained that a sadhu does not drink,but that I would visit their homes and eat with them. They were very happy to share their hospitality,especially with a sadhu. Whenever a guest comes to their village, they are so happy and hospitable.


In the course my travels to the many villages, I learned that many of them had not gone to school or had any formal education. Most of them were daily wages earners, but they did not want theire childern to follow their lifestyle. They wanted to educat their children and give them a better future. Some of our students are from such backgrounds. When they return home to the villages during their vacation, our students teach the people of the village whatever they had learned at the Student Home. The children from the tribal villages are very bright,with a lot of potential. They are good in sports, studies, music amd arts. One very beautiful attitude they have is they are eager to help,to do Seva. They do not have opportunities in their homes to develop their talent, nor are their talents appreciated by their parents and elders.

Today, our students are doing very well in their studies and sports.This year,four of our students enrolled in thebest engineering college in Indore. In April,59 students appeared for the 10th standard board exams and all of them passed successfully. They are all so bright and hardworkong, regardless of the grade in which  they are studying. They are eager to succeed. Their parents are proud of their childrn's performance. They are also very appreciative and thank our  organisation for the Seva. 

I feel that AIM for Seva's focus is the people who need Seva the most. We reach the neediest people and that is the best anyone can do in one's life. It is so satisfying. I believe that there is no other organisation in our country that works so selflessly for people in need. I am very proud and happy to be a part of AIM for Seva.

खिलेगा कमल का फूल

बैठ गया हाथी, उडती नहीं है धुल
साइकिल हुई पंचर, टायर गए खुल
झाड़ू भी टूट गई, जाओ उसे भूल
पंजा भी लटक कर, गया है झूल
अब देश में खिलेगा कमल का फूल

ankit sharma

सब एक समान हैं

बादशाह शाहजहॉं को जब पता चला कि नगर में एक धनाढ्य ब्राह्मण रहता है, तो उसने उसका धन हडप कर राजकोष में जमा करने की सोची। उसने ब्राह्मण को बुलाकर कहा - ''आपकी विद्वता की नगर में बहुत चर्चा हो रही है। मेरे मन में बार-बार एक प्रश्न उठता है। क्या आप उसका समाधान करेंगे? ब्राह्मण ने कहा- ''मैं कोशिश करुंगा।"" बादशाह ने कहा- ''यदि आप मेरा समाधान न कर सके तो, मैं समझूंगा कि आप ढ़ोंगी हैं और तब मुझे आपके खिलाफ कार्यवाही करने के लिए मजबूर होना पडेगा। प्रश्न यह है कि, हमारे देश में इतने धर्म हैं। बताइए इनमें से कौनसा धर्म सबसे श्रेष्ठ है?""


ब्राह्मण समझ गया कि, बादशाह की नियत ठीक नहीं है। इसलिए युक्ति से काम लिया जाए। ब्राह्मण बोला- ''महाराज इसे समझाने के लिए मैं आपको एक कहानी सुनाता हूं। 'एक राजा के पांच बेटे थे और उसके पास पांच बहुमूल्य हीरे थे। वह उन हीरों को उनको देना चाहता था। किंतु उसके मन में डर था कि बच्चे उनका मूल्य नहीं समझते हुए उन्हें कहीं इधर-उधर डाल ना दें। इसलिए उसने पांचों को बुलाकर कहा मेरे पास पांच हीरे हैं, किंतु उनमें से एक अधिक मूल्यवान है और चार कम मूल्यवान हैं। उसने फिर उन बच्चों को एक-एक बुलाकर कहा- देखो, यह अधिक मूल्यवान हीरा है और यह मैं तुम्हें दे रहा हूं। यह बात तुम अपने तक ही सीमित रखना, किसीको बताना नहीं।""


अतः सब बच्चों को लगा कि पिताजी ने अधिक मूल्यवान हीरा मुझे ही दिया है। कुछ क्षण मौन रहकर ब्राह्मण आगे बोला- धर्म भी उन हीरों के समान है। कोई धर्म बडा नहीं होता। हर धर्म का एक मालिक होता है और धर्म का लक्ष्य भी एक होता है, किंतु उन राजकुमारों के समान हर एक अपने धर्म को श्रेष्ठ मानता है। भगवान ने हर एक को धर्म में रुची जागृत करने के लिए, धर्मिता व्यक्तियों में बढ़ाने के लिए अनेक तत्त्वों का उन-उन धर्मों में उल्लेख किया हुआ है। (धर्म का मुख्य लक्ष्य होता है मूल्यानुरुप जीवन जीना) जैसे एक ही परमात्मा अनंत रुपों में अभिव्यक्त होता है। जैसे एक ही अग्नि या वायु अव्यक्त रुप में सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त होती है, उनमें कोई भेद नहीं है, परंतु वही अग्नि किसी आधार वस्तु में व्यक्त होकर जलने लगती है या वही वायु व्यक्त होकर विभिन्न वस्तुओं के संयोग से उन्हीं के अनुरुप बहती है।

 


वैसे ही परमात्मा सबमें समभाव में व्याप्त है। कोई धर्म किसी अन्य धर्म से हीन नहीं है। अपने-अपन स्वरुप में सबकी महत्ता है-सबकी सार्थकता है। "" बादशाह ब्राह्मण के इस उत्तर से संतुष्ट हुआ और उसे ससम्मान विदा कर दिया।


स्वामी ऐश्वर्यानंद सरस्वती, इंदौर ।
AIM for SEVA

Sunday, 19 June 2016

क्या भगवान हैं? 6

इसी प्रकार आप जहां पर भी चले जाएं, किसी ना किसी गौण भगवान की कथा सुनेंगे और किसी स्थल पुराण को सुनेंगे। इसका प्रयोजन यह है कि हम इस समृद्ध संस्कृति के साथ जुडे रहें। हमें इस गौण भगवान के बारे में प्रमाण नहीं पूछना चाहिए। गौण भगवान का प्रयोजन हमारी साधना के लिए होता है; अतः गौण भगवान की सत्ता, उपस्थिति के लिए प्रमाण के लिए आग्रह मत करना, क्योंकि वह हमारा मतलब नहीं होना चाहिए। ब्रह्माजी के चार सिर कैसे होंगे? भगवान उन चारों मुखों से बात करते होंगे या एक मुख से? विष्णु भगवान के चार हाथ कैसे काम करेंगे? इत्यादि प्रश्नों से आपका कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा। इन गौण रुपों का उद्देश्य है, साधना के द्वारा अन्तःकरण शुद्धि और पूजा-ध्यान के द्वारा अपनी आन्तरिक उन्नति करना। हमें गौण भगवान को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। उनकी सिद्धी के बिना या दर्शन के बिना भी यह प्रयोजन सिद्धी हो सकती है। अपनी संस्कृति का आधार ही इन गौण भगवानों के ऊपर है। जितने भजन, कीर्तन आदि सम्पूर्ण संगीत, नाट्य-शास्त्र एवं इतिहास-पुराणादि भी गौण भगवान की वजह से ही सम्भव है। अपनी संस्कृति में विभिन्न देवी-देवताओं की कथाओं की वजह से नृत्य-शास्त्र सम्भव है। इतना ही नहीं अपनी फिल्मों के लिए भी यह आवश्यक हैं, कितनी ही ऐसी फिल्में हैं जो इन देवी-देवताओं के चरित्र पर ही आधारित हैं। इसलिए गौण भगवान की सिद्धी एवं दर्शन के लिए मत पूछो बल्कि उनकी पूजा, उपासना, ध्यान आदि के माध्यम से अपने अन्तःकरण को शुद्ध करो और मुख्य भगवान को समझो। यदि आप गौण भगवान को सिद्ध करने में लगे रहोगे कि मैं भगवान शिव के दर्शन पांच मुखों के रुप में करना चाहता हूं, मैं भगवान विष्णु के दर्शन चार हाथों वाले रुप में करना चाहता हूं तो आप पछताओगे। और यदि उसमें ही लगे रहोगे तो आपकी दृष्टि सदैव किसी ना किसी चमत्कार पर ही टिकी रहेगी और यदा-कदा चमत्कार हो भी गया तो आपके मन में संदेह रहेगा कि यह सचमुच का दर्शन है या आपके मन का भ्रम है। हमें गौण भगवान के दर्शन के लिए और उनको सिद्ध करने के लिए प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है, अपितु हमें उनका उपयोग कर्मयोग के लिए पूजा, पाठ, ध्यानादि के लिए करना है। उसके बाद यदि वह मूलभूत प्रश्न जो सबके मन में उत्पन्न होता है, क्या भगवान हैं? उसका उत्तर खोजने के लिए हम मुख्य भगवान की ओर अपनी दृष्टि बढ़ाएंगे। और मुख्य भगवान कौन हैं? अनन्त, असंग, आनन्द, चैतन्य। यदि कोई पूछे कि गौण भगवान कहां हैं, कैसे है? तो उन प्रश्नों के उत्तर में मत उलझना। विष्णुलोक कहां है? है या नहीं? कैसा है? शिवलोक कैसा है? इत्यादि प्रश्नों के उत्तर में मत उलझना, केवल उनके बारे में जो भी पुराणों में कथाएं हैं उनको पढ़कर पूजा आदि का आनन्द उठाते रहो और फिर मुख्य भगवान को समझने का प्रयत्न करो। वर्तमान समाज के साथ समस्या यह है कि सब लोग गौण भगवान के बारे में प्रमाण चाहते हैं, उनको सिद्ध करने के लिए कहते हैं। और जो भी गौण भगवान की सिद्धि में जाएगा वह समस्याएं खडी करेगा। अतः गौण भगवान की पूजा-उपासना करो और मुख्य भगवान को समझने का प्रयत्न करो। यही है वैदिक दृष्टि। (समाप्त)

क्या भगवान हैं? 5

स्वामी ऐश्वर्यानन्द सरस्वती

अतः प्रथम भगवान के लक्षण के बारे में बात करें। क्या है भगवान का लक्षण? चैतन्य ही भगवान है। दूसरा प्रश्न है - भगवान के लिए साक्ष्य क्या है? हमारा उत्तर होगा - आपका हर अनुभव चैतन्य की वजह से सम्भव है, इसलिए आपका हर अनुभव भगवान की सत्ता अस्तित्व का प्रमाण है। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं - 'उत्क्रायन्तं स्थितिवापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्‌। विमुढ़ा नानुपश्यान्ति पश्यान्तिज्ञानचक्षुषः। व्यक्ति की हर क्रिया, हर अनुभव सम्भव है क्योंकि वह व्यक्ति चेतन है, क्योंकि वह व्यक्ति चैतन्य से युक्त है, और फिर भी यदि कोई ऐसा प्रश्न करता है। इसलिए भगवान कहते हैं - 'विमूढ़ानानुपश्यन्ति पश्यन्तिज्ञानचक्षुषः।" जिस व्यक्ति ने ठीक से शास्त्रों का अध्ययन किया है और भगवान के वास्तविक लक्षण को ठीक से समझ लिया है उसको कोई सन्देह नहीं रहेगा, वह समझेगा कि हर क्षण भगवान के सान्निध्य में है, इतना ही नहीं वह समझेगा कि वह भगवान से एक पल के लिए भी दूर नहीं है। इस प्रकार भगवान का लक्षण और भगवान का प्रमाण हमारे लिए स्पष्ट हुआ।


अब इस प्रश्न का ही थोडा विस्तार करके हम विचार करते हैं। यदि भगवान का लक्षण चैतन्य किया जाता है और चैतन्य का हम ऐसा लक्षण करते हैं कि जिस तत्त्व के द्वारा सबकुछ अनुभव किया जाता है वह चैतन्य है, तो आप यह बताइए कि उस चैतन्य का वस्तुतः क्या स्वभाव है? अर्थात्‌ उस चैतन्य का स्वरुप क्या है? यह अन्तिम प्रश्न है। अतः लक्षण-प्रमाण और स्वरुप का विचार होना चाहिए।


अब इस चैतन्य स्वभाव के बारे में जो कि हमारे लिए बहुत ही स्पष्ट है, वैज्ञानिक बहुत भ्रमित हैं। विज्ञान चैतन्य के तथ्य के बारे में जानता नहीं है। आज भी यह जानने के लिए 'रिसर्च" चलते रहते हैं कि चैतन्य के अन्दर कौनसा ऐसा तत्त्व है, जिसकी वजह से व्यक्ति का शरीर जीवित एवं सचेत रहता है। भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रयोग किए जा रहे हैं, अनेक भिन्न-भिन्न प्रक्रियाएं की जा रही हैं, और वे आपस में एक दूसरे के विरोधी परिणाम देती हैं, इसलिए 'रिसर्च" की यह प्रक्रिया और पेचीदी होती जा रही है। अब यह विषय इतना चिन्ता का विषय बन गया है कि कोई इसके बारे में उत्साहित नहीं है और हर वैज्ञानिक शाखा यही कहती है कि यह विषय हमारी शाखा के अन्दर नहीं आता है। कोई भी वैज्ञानिक अपनी शाखा के अन्दर इस विषय को लेना नहीं चाहता, चाहे वह विद्युत विषयक विज्ञान हो, स्नायु विज्ञान हो, भूगर्भ विज्ञान हो, चैतन्य के बारे में कुछ भी नहीं जानते। केवल जब वे चैतन्य के स्वरुप स्वभाव को जानेंगे तब वे भगवान के स्वभाव स्वरुप को जान सकेंगे।

दूसरी ओर अपने शास्त्र चैतन्य के स्वरुप के बारे में बताते हैं। अपने शास्त्रों के अनुसार चैतन्य पूर्णतः दृश्य जगत से भिन्न है, अर्थात्‌ यह न तो मैटर और न ही एनर्जी है। क्योंकि, एनर्जी भी मैटर का ही एक हिस्सा है। चैतन्य को प्रायः वैज्ञानिक लोग अंग्रेजी में स्पिरिट्‌ कहते हैं। उनके लिए दो ही शब्द हैं (मैटर और स्पिरिट्‌) । हम स्पिरिट्‌ शब्द का प्रयोग करना नहीं चाहेंगे। हम उसी तत्त्व को चैतन्य कहते हैं। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं - 'यस्यात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपिचोऱ्तमः। अतोऽस्मिलोके वेदेच प्रतितःपुरुषोत्तमः।। मैं वह तत्त्व हूं जो मैटर और एनर्जी से भिन्न है। वह तत्त्व जो हम सब के द्वारा सर्वदा अनुभव किया जाता है, जिसको शुद्ध चैतन्य कहते हैं, वही भगवान है। और यह चैतन्य रुप भगवान हर शरीर के अन्दर है। यह चैतन्य सम्पूर्ण जगत को चलानेवाले नियमों की अवधि के परे है। जो भी रासायनिक और भौतिक कानून या विधि हैं, जो कि भौतिक जगत का भाग हैं वे इस चैतन्य को प्रभावित नहीं कर सकते। वहीं असंग, सर्वव्यापी, अनुभवातीत, सर्वोत्कृष्ट चैतन्य भगवान हैं - (असंड़्‌गोऽमपुरुषः श्रुति.) इतना ही नहीं जो भौतिक वस्तु है वह एवं देश काल इस चैतन्य से नियंत्रित हैं। बाकि सभी वस्तुएं देश एवं काल के वश में हैं परंतु चैतन्य देश एवं काल के वश में नहीं हैं। इसलिए शास्त्र चैतन्य को 'अनन्त चैतन्य" कहता है। यह असंग अनन्त चैतन्य, जो कि देश और काल के वश में नहीं है और हम सब के अन्दर है, वही भगवान है। 'ईश्वरसर्वभूतानां ह्रद्देशेऽजुर्नतिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानियन्त्रारुढ़ानिमायचा गी।" जैसे अदृश्य बिजली के द्वारा दृश्य पंखे को चलाया जाता है उसी प्रकार अदृश्य चैतन्य के द्वारा इस स्थूल एवं सूक्ष्म शरीर को चलाया जाता है। मैंने यह नहीं कहा कि चैतन्य बिजली है, इसको ठीक से समझ लीजिए। यह केवल दृष्टांत है, जैसेकि बिजली दिखाई नहीं देती उसी प्रकार यह चैतन्य दिखाई नहीं देता, किन्तु हर क्षण हमारे अनुभव का विषय होता है। यह अनन्त, असंग, आनन्द चैतन्य ही भगवान है, जिसकी सत्ता, अस्तित्व के बारे में कोई भी समझदार व्यक्ति सन्देह नहीं कर सकता। और इस आनन्द, असंग, अनन्त भगवान को समझना ही हर मनुष्य के जीवन का लक्ष्य होता है। इसको ही ईश्वर दर्शन, ईश्वर प्राप्ति कहा जाता है, जो शास्त्रों में मनुष्य जीवन का लक्ष्य रुप से प्रस्तुत किया है।... क्रमशः

क्या भगवान हैं? 4

स्वामी ऐश्वर्यानन्द सरस्वती

अतः प्रथम भगवान के लक्षण के बारे में बात करें। क्या है भगवान का लक्षण? चैतन्य ही भगवान है। दूसरा प्रश्न है - भगवान के लिए साक्ष्य क्या है? हमारा उत्तर होगा - आपका हर अनुभव चैतन्य की वजह से सम्भव है, इसलिए आपका हर अनुभव भगवान की सत्ता अस्तित्व का प्रमाण है। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं - 'उत्क्रायन्तं स्थितिवापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्‌। विमुढ़ा नानुपश्यान्ति पश्यान्तिज्ञानचक्षुषः। व्यक्ति की हर क्रिया, हर अनुभव सम्भव है क्योंकि वह व्यक्ति चेतन है, क्योंकि वह व्यक्ति चैतन्य से युक्त है, और फिर भी यदि कोई ऐसा प्रश्न करता है। इसलिए भगवान कहते हैं - 'विमूढ़ानानुपश्यन्ति पश्यन्तिज्ञानचक्षुषः।" जिस व्यक्ति ने ठीक से शास्त्रों का अध्ययन किया है और भगवान के वास्तविक लक्षण को ठीक से समझ लिया है उसको कोई सन्देह नहीं रहेगा, वह समझेगा कि हर क्षण भगवान के सान्निध्य में है, इतना ही नहीं वह समझेगा कि वह भगवान से एक पल के लिए भी दूर नहीं है। इस प्रकार भगवान का लक्षण और भगवान का प्रमाण हमारे लिए स्पष्ट हुआ।


अब इस प्रश्न का ही थोडा विस्तार करके हम विचार करते हैं। यदि भगवान का लक्षण चैतन्य किया जाता है और चैतन्य का हम ऐसा लक्षण करते हैं कि जिस तत्त्व के द्वारा सबकुछ अनुभव किया जाता है वह चैतन्य है, तो आप यह बताइए कि उस चैतन्य का वस्तुतः क्या स्वभाव है? अर्थात्‌ उस चैतन्य का स्वरुप क्या है? यह अन्तिम प्रश्न है। अतः लक्षण-प्रमाण और स्वरुप का विचार होना चाहिए।


अब इस चैतन्य स्वभाव के बारे में जो कि हमारे लिए बहुत ही स्पष्ट है, वैज्ञानिक बहुत भ्रमित हैं। विज्ञान चैतन्य के तथ्य के बारे में जानता नहीं है। आज भी यह जानने के लिए 'रिसर्च" चलते रहते हैं कि चैतन्य के अन्दर कौनसा ऐसा तत्त्व है, जिसकी वजह से व्यक्ति का शरीर जीवित एवं सचेत रहता है। भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रयोग किए जा रहे हैं, अनेक भिन्न-भिन्न प्रक्रियाएं की जा रही हैं, और वे आपस में एक दूसरे के विरोधी परिणाम देती हैं, इसलिए 'रिसर्च" की यह प्रक्रिया और पेचीदी होती जा रही है। अब यह विषय इतना चिन्ता का विषय बन गया है कि कोई इसके बारे में उत्साहित नहीं है और हर वैज्ञानिक शाखा यही कहती है कि यह विषय हमारी शाखा के अन्दर नहीं आता है। कोई भी वैज्ञानिक अपनी शाखा के अन्दर इस विषय को लेना नहीं चाहता, चाहे वह विद्युत विषयक विज्ञान हो, स्नायु विज्ञान हो, भूगर्भ विज्ञान हो, चैतन्य के बारे में कुछ भी नहीं जानते। केवल जब वे चैतन्य के स्वरुप स्वभाव को जानेंगे तब वे भगवान के स्वभाव स्वरुप को जान सकेंगे।

दूसरी ओर अपने शास्त्र चैतन्य के स्वरुप के बारे में बताते हैं। अपने शास्त्रों के अनुसार चैतन्य पूर्णतः दृश्य जगत से भिन्न है, अर्थात्‌ यह न तो मैटर और न ही एनर्जी है। क्योंकि, एनर्जी भी मैटर का ही एक हिस्सा है। चैतन्य को प्रायः वैज्ञानिक लोग अंग्रेजी में स्पिरिट्‌ कहते हैं। उनके लिए दो ही शब्द हैं (मैटर और स्पिरिट्‌) । हम स्पिरिट्‌ शब्द का प्रयोग करना नहीं चाहेंगे। हम उसी तत्त्व को चैतन्य कहते हैं। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं - 'यस्यात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपिचोऱ्तमः। अतोऽस्मिलोके वेदेच प्रतितःपुरुषोत्तमः।। मैं वह तत्त्व हूं जो मैटर और एनर्जी से भिन्न है। वह तत्त्व जो हम सब के द्वारा सर्वदा अनुभव किया जाता है, जिसको शुद्ध चैतन्य कहते हैं, वही भगवान है। और यह चैतन्य रुप भगवान हर शरीर के अन्दर है। यह चैतन्य सम्पूर्ण जगत को चलानेवाले नियमों की अवधि के परे है। जो भी रासायनिक और भौतिक कानून या विधि हैं, जो कि भौतिक जगत का भाग हैं वे इस चैतन्य को प्रभावित नहीं कर सकते। वहीं असंग, सर्वव्यापी, अनुभवातीत, सर्वोत्कृष्ट चैतन्य भगवान हैं - (असंड़्‌गोऽमपुरुषः श्रुति.) इतना ही नहीं जो भौतिक वस्तु है वह एवं देश काल इस चैतन्य से नियंत्रित हैं। बाकि सभी वस्तुएं देश एवं काल के वश में हैं परंतु चैतन्य देश एवं काल के वश में नहीं हैं। इसलिए शास्त्र चैतन्य को 'अनन्त चैतन्य" कहता है। यह असंग अनन्त चैतन्य, जो कि देश और काल के वश में नहीं है और हम सब के अन्दर है, वही भगवान है। 'ईश्वरसर्वभूतानां ह्रद्देशेऽजुर्नतिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानियन्त्रारुढ़ानिमायचा गी।" जैसे अदृश्य बिजली के द्वारा दृश्य पंखे को चलाया जाता है उसी प्रकार अदृश्य चैतन्य के द्वारा इस स्थूल एवं सूक्ष्म शरीर को चलाया जाता है। मैंने यह नहीं कहा कि चैतन्य बिजली है, इसको ठीक से समझ लीजिए। यह केवल दृष्टांत है, जैसेकि बिजली दिखाई नहीं देती उसी प्रकार यह चैतन्य दिखाई नहीं देता, किन्तु हर क्षण हमारे अनुभव का विषय होता है। यह अनन्त, असंग, आनन्द चैतन्य ही भगवान है, जिसकी सत्ता, अस्तित्व के बारे में कोई भी समझदार व्यक्ति सन्देह नहीं कर सकता। और इस आनन्द, असंग, अनन्त भगवान को समझना ही हर मनुष्य के जीवन का लक्ष्य होता है। इसको ही ईश्वर दर्शन, ईश्वर प्राप्ति कहा जाता है, जो शास्त्रों में मनुष्य जीवन का लक्ष्य रुप से प्रस्तुत किया है।... क्रमशः

क्या भगवान हैं? 3

स्वामी ऐश्वर्यानन्द सरस्वती

अपने शास्त्रों की दृष्टि में भगवान का सर्वसम्मत लक्षण क्या है? वेद-शास्त्रों की दृष्टि से भगवान को चैतन्य के रुप में लक्षित किया गया है। 'चैतन्यस्वरुपः, ज्ञानस्वरुपः, विज्ञानस्वरुपः, चिद्रूपः।" अब प्रश्न यह है कि, चैतन्य शब्द के द्वारा वस्तुतः क्या समझ लिया जाता है? यह भी वेद लक्षण के द्वारा स्पष्ट करते हैं। 'येन रुपं रस गन्धं शब्दान स्पर्शञ्च मैथुनाम्‌। येतेनैव विज्ञानाति किमत्र परिशिष्यते। एतत वैतत।।" यमधर्मराजा नचिकेता को उपदेश देते हुए आत्मा अर्थात्‌ भगवान का लक्षण बताते हैं। जिस तत्त्व की वजह से हम सब लोग अपने आस-पास के सम्पूर्ण जगत्‌ बारे में ज्ञानवान जानकार रहते हैं। वह चैतन्य तत्त्व ही भगवान है। और एक बार यह भगवान का लक्षण स्पष्ट हो जाता है तो फिर हम आगे बढ़ते हैं।

अब प्रश्न यह है - उस लक्षण से युक्त भगवान हैं या नहीं? यही दूसरा प्रश्न है। अब जबकि हमने भगवान का लक्षण स्पष्ट किया है इसलिए हम इस प्रश्न को बदल सकते हैं। अब प्रश्न का स्वरुप क्या होगा? पहला जो प्रश्न था कि भगवान हैं या नहीं? उसके स्थान पर प्रश्न होगा कि चैतन्य है या नहीं? और यदि कोई आप से प्रश्न करे कि चैतन्य है या नहीं? तो आपका उत्तर क्या होगा? आप यही कहेंगे कि 'आप अपने परिवार की चीजों के बारे में जानते हैं या नहीं? आप उन चीजों के बारे में समझते हैं या नहीं? वह व्यक्ति क्या कहेगा? और उसको क्या कहना चाहिए? उसके द्वारा प्रश्न करना ही यह स्पष्ट करता है कि वह सचेत व्यक्ति है। उसके द्वारा प्रश्न किया जाना ही चैतन्य के बिना सम्भव नहीं है इसलिए भगवान हैं या नहीं यह प्रश्न करना ही मूर्खता है। यह तो उस प्रकार पूछना हुआ जैसेकि विद्यारण्य मुनि पञ्चदृशी में कहते हैं 'जिह्वा यें नास्ति वेत्युक्तिः लज्जायैकेवलं यथा।" जैसेकि कोई व्यक्ति पूछता है - मुझे बताइए कि मेरे मुंह में जिह्वा है या नहीं? इसका जिह्वा के बारे में पूछना कैसा विरोधाभासी वक्तव्य है उसी प्रकार चैतन्य के बारे में प्रश्न करना भी विरोधाभासी प्रश्न है। और क्योंकि चैतन्य ही भगवान है, इसलिए भगवान है या नहीं यह प्रश्न भी हास्यापस्द एवं विरोधाभासी है।


इसलिए यदि कोई आपसे भगवान के बारे में साक्ष्य (प्रुफ) मांगे तो इसका साक्ष्य मत देना, बल्कि उसको उल्टा प्रश्न करके भगवान का लक्षण स्पष्ट करना, बस इतना ही पर्याप्त है। फिर वह व्यक्ति ही साक्ष्य नहीं मांगेगा। और यदि भगवान का लक्षण स्पष्ट करने के बाद भी कोई भगवान के बारे में साक्ष्य चाहता है तो केवल यह सिद्ध करता है कि वह व्यक्ति मूर्ख है, उसके अंदर समझने की क्षमता नहीं है। भगवान का लक्षण स्पष्ट करने के बाद भी यदि प्रश्नकर्ता भगवान के बारे में साक्ष्य चाहता है तो यह सिद्ध होता है कि उस व्यक्ति ने लक्षण को ठीक से सुना और समझा नहीं। यतीष्ट व्यक्ति भी ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता। वह भी प्रश्न कर सकता है क्योंकि वह चेतन व्यक्ति है। इसलिए व्यक्ति चाहे वैज्ञानिक हो, यतीष्ट हो, एग्नॉस्टिक हो, उसके मन में भगवान हैं या नहीं? यह प्रश्न इसलिए आ सकता है क्योंकि,उसको भगवान का लक्षण ठीक से बतलाया नहीं गया है।.... क्रमशः

क्या भगवान हैं? - 2

स्वामी ऐश्वर्यानन्द सरस्वती


अब प्रश्न यह है कि अपना वैदिक सम्प्रदाय इस प्रश्न को किस प्रकार सुलझा सकता है? यदि आप किसी परंपरागत आचार्य को पूछेंगे कि भगवान हैं क्या? या भगवान के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए आपके पास कोई सबूत है क्या? तो, उनकी ओर से क्या उत्तर मिलेगा? परंपरागत आचार्य इस प्रश्न का उत्तर नहीं देंगे। इतना ही नहीं वे प्रश्नकर्ता को ही दूसरा प्रश्न पूछेंगे। कौनसा प्रश्न पूछेगें? वे पूछेंगे ''जब आप प्रश्न करते हो कि भगवान हैं या नहीं? भगवान की सत्ता है या नहीं? तो, आप भगवान शब्द से क्या समझते हो?

क्योंकि, भगवान शब्द बहुत से लोगों के द्वारा बहुत बार प्रयुक्त किया जाता है और हर एक का भगवान का अर्थ अलग-अलग होता है। अतः जब आपने भगवान के बारे में प्रश्न किया है तो हमें कैसे मालूम होगा कि आपका भगवान शब्द से क्या तात्पर्य है? क्योंकि, जब हम भगवान के बारे में बताना प्रारंभ करेंगे तो हमारी दृष्टि से जिस प्रकार का भगवान शब्द का अर्थ हम समझते हैं तद्‌नरुप ही उत्तर देंगे और आप अपने दृष्टिकोण से, आपके किसी विशिष्ट अर्थ के अनुसार भगवान को समझना चाहेंगे और दोनो के बीच कोई तालमेल नहीं होगा। बल्कि भ्रांति ही बढ़ती जाएगी और संवाद अंतराल बढ़ता जाएगा। अतः आपको भी कोई प्रश्न करे कि क्या भगवान है? तो, उत्तर मत दीजिए, बल्कि प्रतिप्रश्न कीजिए कि 'भगवान" शब्द से आप क्या जानना चाहते हो? और यदि भगवान शब्द का लक्षण या अर्थ स्पष्ट नहीं किया गया और प्रश्न का उत्तर देना प्रारंभ किया तो, अधिक भ्रम उत्पन्न होगा। इसलिए अपनी परंपरा के अनुसार कहा जाता है ''लक्ष्णप्रमाणाभ्यां वस्तुसिद्धिः""। बिना लक्षण स्पष्ट किए उस वस्तु को सिद्ध मत करो। किसी वस्तु का लक्षण स्पष्ट किए बिना उसी वस्तु को सिद्ध करने का प्रयत्न संवाद अंतराल बढ़ाएगा। यह मेरा अनुभव है।


कुछ वर्ष पूर्व की घटना है। मैंने मेरे एक विद्यार्थी को दूसरे कमरे में रखे हुए फलों की टोकरी में से एक सन्तरा लाने के लिए कहा। क्योंकि, मैं किसी व्यक्ति को प्रसाद रुप में देना चाहता था। वह विद्यार्थी अंदर जाकर आता है और कहता है, स्वामीजी अंदर संतरा नहीं है, क्या मैं कोई दूसरा फल ला सकता हूं? फिर मैंने कहा नहीं! मैंने स्वयं संतरा अंदर रखा है, मुझे पक्का मालूम है कि संतरा वहां है, अतः संतरा ही लाओ, मुझे दूसरा फल नहीं चाहिए। फिर वह विद्यार्थी अंदर जाकर खाली हाथ वापस आता है और कहता है स्वामीजी मैंने अच्छी तरह से देखा, वहां संतरा है ही नहीं। फिर क्या करें, मैं उसी व्यक्ति से बात करते रहना चाहता था, उठना नहीं चाहता था, फिर भी उठना पडा। मैं अंदर गया तो देखा, टोकरी में सबसे ऊपर संतरा है। मैंने संतरा हाथ में लिया और आकर उस (शिष्य परमानंद) विद्यार्थी से कहा यह क्या है? क्या यह संतरा नहीं है? सबके ऊपर ही यह फल था। फिर वह विद्यार्थी कहता है - स्वामीजी यह संतरा नहीं है। अब तो मुझे और भी आश्चर्य हुआ, और साथ ही मैं उलझन में भी पड गया। क्योंकि, इतना बडा संतरा है और वह भी नागपूरी संतरा है, फिर भी यह कहता है कि यह संतरा नहीं है! फिर मैंने उससे कहा तो, फिर यह कौनसा फल है? वह कहता है स्वामीजी यह 'कमला फल" है, यह 'नारंगी" है। उस विद्यार्थी की दृष्टि से संतरा और नारंगी अलग-अलग है। वह संतरा हरे रंग वाला मानता है और नारंगी पीले रंगवाला मानता है।


अब आप बताइए! क्या वहां पर संतरा है या नहीं? आप क्या कहोगे? आप समझदार हो तो इस प्रश्न का उत्तर मत दीजिए। क्योंकि, उस विद्यार्थी की दृष्टि से संतरा नहीं है, बल्कि नारंगी है और मेरी दृष्टि से (क्योंकि, मैं नारंगी शब्द नहीं जानता हूं इसलिए) संतरा है और नारंगी नहीं है। (आप लोग पर्याप्त भ्रमित हुए होंगे) यह सब भ्रम हो जाता है। यदि हम किसी वस्तु का लक्षण स्पष्ट किए बिना उसको सिद्ध करने जाएं तो और भगवान के बारे में भी यही होता जा रहा है। संतरे के बारे में जो भ्रम था वहां प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा दोनो के लिए वह फल सिद्ध तो था ही, उस वस्तु की सिद्धी के बारे में कोई भ्रम नहीं था। भ्रम केवल उस फल के लक्षण के बारे में था। इसलिए यदि किसी परंपरागत आचार्य को प्रश्न पूछा जाए तो, वे भगवान के बारे में बताने के पहले कहेंगे कि हम सर्वप्रथम भगवान का लक्षण स्पष्ट करते हैं कि कैसे भगवान को आप जानना चाहते हैं। अर्थात्‌ आप भगवान शब्द से क्या समझते हैं, यह मुझे स्पष्ट हो जाए तो, उसका उत्तर दूंगा। फिर भगवान के बारे में दोनो का लक्षण एक मत हो जाएगा और इस भगवान को सिद्ध कर सकेंगे। एक बार लक्षण स्पष्ट हो जाए फिर समस्या को सुलझाना आसान हो जाता है।...क्रमशः

क्या भगवान हैं? 1

स्वामी ऐश्वर्यानन्द सरस्वती


भगवान की पूजा सब धर्मों के अनुसार, मुख्य रुप से हिंदूधर्मानुसार हर व्यक्ति को प्रतिदिन करना चाहिए। हमारे लिए कुछ पर्व विशेष होते हैं, उस पर्व पर ईश्वर पूजा विस्तार से की जाती है। इस प्रकार ईश्वर पूजा भक्त के लिए स्वाभाविक हो जाती है। जब हम नियमित रुप से पूजा करते हैं तो कभी-कभी हमारे मन में वह मूलभूत संदेह आ जाता है कि 'भगवान है या नहीं?" किसी भी विचारवान व्यक्ति के मन में यह संदेह आ सकता है कि 'मैं नियमित रुप से भगवान की पूजा करता हूं, परंतु क्या सचमुच भगवान है?" और जब भी ऐसा संदेह मन में आता है तो हमें बडा दुःख होता है। क्योंकि, हमें भगवान के बारे में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए। किंतु, पूर्ण श्रद्धा के होते हुए भी विचारवानों के मन में यह संदेह जागृत होना स्वाभाविक है। और यदि हम अपने आप इस प्रकार के संदेहों को जागृत नहीं करेंगे तो भी दूसरे लोग हैं जो आपके मन में संदेह उत्पन्न कर सकते हैं।


यदि कोई आप से पूछे कि 'क्या भगवान सचमुच है? क्या हमें अंधश्रद्धा से युक्त होकर या किसी के प्रश्न को अनदेखा करते हुए यह मानना चाहिए कि भगवान हैं या हमारे पास भगवान के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए कोई सबूत है? कोई प्रमाण या ठोस उत्तर है? वैज्ञानिक प्रमाण हो या धार्मिक प्रमाण हो अथवा तार्किक प्रमाण हो, क्या कोई ऐसा प्रमाण हमारे पास है? यद्यपि हम स्वयं इस प्रश्न को उत्पन्न करें फिर भी यदि कोई दूसरा व्यक्ति हम से पूछे तो, हम क्या उत्तर देंगे?


इस प्रश्न के ऊपर बहुत से लोग विचार करते हैं, क्योंकि यह प्रश्न केवल अपने हिंदू धर्म में ही है ऐसी बात नहीं है। मुस्लिम हों या ईसाई या हिंदू हों सब लोग भगवान को मानते हैं, इसलिए सब इस प्रश्न पर विचार करते हैं। (यद्यपि बहुत से लोगों ने इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास किया है। किंतु, इस विषय में वे लोग एवं अन्य लोग उलझते ही जा रहे हैं, अर्थात्‌ यह प्रश्न क्लिष्ट होता जा रहा है।


कुछ दिनों पहले मैंने एक इंग्लिश लेखक की पुस्तक पढ़ी। वह व्यवसाय से स्ट्रक्चरल इंजीनिअर होकर उसने धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया हुआ है। उसने एक पुस्तक लिखी 'बियांड रिजनेबल डाऊट्‌स" पूरी पुस्तक में वह इसी विषय पर लिखता है और उस पुस्तक को पढ़कर मुझे बहुत से डाऊट आए, जो कि पहले से दोगुने हो गए।.....क्रमशः

SAREE, A FANCY DRESS?

On the occasion of Shiv ratri when I came to office in a traditional wear saree, I remember a funny instance happened with me few years back when I was in USA. I was new to the place and was still in a habit of wearing traditional clothing on any Indian festival. Although I did notice that there was no festivity in the air, nothing special about those festivals when I was in California or in Virginia or any other place in USA. Even on Holi everyone was going to work, the colony was empty after 10am, kids were off to school and it was more like pin drop silence in communities. Once on such an Indian festival I decided to wear saree. I had to go to grocery store for something urgent so I went in saree itself. I noticed Americans glare and people looking at me, some in praise, some in hatred and some were looking just out of curiosity. People in America are very cautious about their looks and expression especially when there is anyone from a foreign country and in their native cloths or getup. There could be two reasons for that, law which makes it easy for everyone to keep their dignity and freedom of expression without getting insulted or bullied and the second more genuine reason, they think everyone is a human and it doesn’t matter how they dress up, they have right to express themselves and we should respect everyone’s space. Now this later fact comes from within, no one can implant this notion in anyone, it has to come from inside to respect the humanity and everyone’s space. So well I went inside the grocery shop, collected whatever I wanted in my trolley and stayed in line for the payment. All these big talks and laws are for adults right? How could you force a baby? Guess not.  While I was waiting in queue, a young kid with her mother was also standing in line and was looking at me with a big surprised or confused look rather on her face. After sometime when she could not figure out what’s wrong with this woman (me :O)), she asked her mother innocently, Mommy what is she wearing? Is she going to a fancy dress?? I could not stop myself smiling on her innocency, but her mother got red faced, totally in an apologetic mode, she feared I might just sue her over the racial comment her little kid made. She whispered something in her kids ear to satisfy her curiosity and pointed out at me and said “isn’t she looking pretty honey?” and came to me and said” you are looking beautiful” . I said thanks but I could read her fear. It’s very common in usa for people to ignore these kind of situations to avoid getting sued over these things. The law there makes everyone so strong that they do not take anything wrong or bad from others. In a way it’s good to maintain the standard of the country, but sometimes it feels like it takes the fun away from life. When I came back to India, I couldn’t stop myself from making fun of this thing and mostly used “I’ll sue you” in almost every situation with friends. But the reality is, that law what makes people of America respect everyone from any country, any ethnicity or any religion. To avoid many bullies and situations like this, we should have these kinds of laws in country. It’s a human tendency to look at whatever is different from the crowd, when foreigners visit India, we also can’t stop ourselves from looking at them, may be a harmless glare but we do. If we also have any law of this kind we could have forced those people from bulling foreigners on our land, who have bad intentions.

भविष्य-चिंतक वीर सावरकर के सपनों का भारत - 2


सावरकर हिंदुत्ववादी थे किंतु उसकी अपेक्षा अधिक 'सेक्यूलर" भी थे। परंतु उनके सेक्लूरिजम को भी उनके विरोधियों ने विकृत कर जनता के सामने प्रस्तुत किया और उनके अनुयायियों ने भी उसे कभी जनता के सामने ठीक ढ़ंग से प्रस्तुत नहीं किया। 'सेक्यूलिरिजम" यानी शासन की धर्म संबंधी भूमिका। इस संबंध में वीर सावरकरजी की भूमिका इस प्रकार की थी, धर्म से संबंधित विषय पारलौकिक और आध्यात्मिक स्वरुप का माना जाना चाहिए। लौकिक विषयों में धर्म का अधिकार मान्य नहीं होना चाहिए। उनका कहना था - धर्म शब्दनिष्ठा और श्रद्धा का प्रांत है और परलोक उसका विषय; इहलोक यानी कानून, व्यवहार होकर प्रत्यक्षनिष्ठ प्रयोग का क्षेत्र! वहां धर्म नहीं चलेगा। धर्म अलग। कानून अलग। धर्मग्रंथ को बंद कर अगर बुद्धिवाद से विचार किया जाए तो ही ऐहिक जीवन के प्रश्न हल हो सकते हैं। अतः मानव जीवन का ऐहिक और पारलौकिक इस प्रकार का विभाजन कर धर्म को केवल पारलौकिक विषयों तक ही मर्यादित रखना और ऐहिक जीवन के सारे विषय बुद्धिवाद के या उपयुक्ततावाद के हवाले करना इस प्रकार की उनकी सेक्यूरिजम संबंधी भूमिका थी। इहलौकिक जीवन से धर्म को दूर कर उसे केवल पारलौकिक जीवन तक का मर्यादित माने बगैर ऐहिक मानवी जीवन के निर्णय बुद्धि के आधार पर लिए नहीं जा सकेंगे, ऐसा उनका कहना था। 'अरबी संस्कृति का उच्चाटन" इस निबंध में उन्होंने इस संबंध में बिल्कूल सुस्पष्ट विचार प्रस्तुत किए हैं। तुर्कस्थान के कमालपाशा ने इस्लाम को पारलौकिक जीवन तक मर्यादित कर डाला था। ऐहिक जीवन में इस्लाम के हस्तक्षेप का अधिकार गैरकानूनी कर डाला था। राजनीति, सामाजिक नीति, अर्थनीति, शिक्षा, रक्षा, भाषा, कानून आदि सारे ऐहिक विषय उन्होंने शासन के, विधिमंडल के बुद्धिवादी क्षेत्रतले ले लिए थे। ऐहिक क्षेत्र से धर्म का साफ उच्चाटन कर डाला था।


सावरकरजी को भारत में यही भूमिका लेनी थी। भारत का संविधान और कामकाज पूरी तरह से बुद्धिवाद पर आधारित रहेगा; वह वेद, गीता, कुरान, बाइबल इस प्रकार के किसी भी धर्मग्रंथ पर आधारित नहीं रहेगा इस प्रकार की उन्होंने घोषणा ही की हुई थी। धर्मग्रंथ आज कालबाह्य हो गए हैं; आज हम किस प्रकार से रहें; व्यवहार करें यह कहने का अधिकार धर्मग्रंथों को नहीं; धर्मग्रंथों पर आधारित सामाजिक संस्थाओं को खडा करने के दिन गए; आज हमें जो सामाजिक संस्थाएं खडी करनी हैं वे धर्मग्रंथ पर न होकर विज्ञानग्रंथों पर, बुद्धिवाद पर खडी करनी हैं इस प्रकार की उनकी भूमिका थी। सावरकरजी के सेक्यूलरिजम की यह भूमिका हिंदू-मुस्लिम समस्या सहित अनेक राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याओं पर रामबाण उपाय जैसी थी। उन्हें मालूम था कि, संसार की धर्मों संबंधी अधिकांश समस्याएं, धर्म जो मनुष्य के इहलौकिक जीवन मेें प्रभावी होता है से पैदा होती हैं। उदाहरणार्थ सामाजिक विषमता की समस्या को लें तो धर्म ने जीवन के विषय में कही हुई आज्ञाओं में से ही वह पैदा हुई हैं। इहलौकिक जीवन पर के धर्म के अधिकार को ही निकाल लिया जाए तो धर्मप्रणीत सामाजिक विषमता का आधार ही उखड जाता है। मुस्लिमों का स्वतंत्र राष्ट्र यानी इहलौकिक रहनेवाले राजनैतिक क्षेत्र में धर्म का उपयोग। धर्म का विषय परलोक तक का मर्यादित कर दिया जाए तो सारा इहलौकिक मानवी जीवन धर्म के नियंत्रण से मुक्त हो जाता है और धर्मसंबंधी सारी समस्याएं समाप्त हो जाती हैं, इस प्रकार की उनकी भूमिका थी। इस भूमिका के कारण हिंदुओं पर होनेवाला अन्याय भी समाप्त होनेवाला था, मुस्लिमों का प्रश्न भी हल होनेवाला था; धर्म का राजनैतिक आधार भी समाप्त होनेवाला था; सामाजिक सुधार और आधुनिकता का मार्ग भी खुला होनेवाला था। जिसे परलोक में या अध्यात्म में श्रद्धा होगी वह उस विषय तक का मर्यादित अपने धर्म का पालन कर सकेगा। पारलौकिक और आध्यात्मिक अर्थ का धर्म केवल मानसिक और आत्मिक संतुष्टि तक का सीमित होने के कारण उसका किसी भी तरह का दुष्परिणाम समाज पर और राष्ट्र पर नहीं होगा। सेक्यूलरिजम की इस प्रकार की भूमिका रखनेवाले होने के बावजूद सावरकरजी के धर्म संबंधी विचारों के बारे में भ्रांतियां फैलाना, उन पर मिथ्या दोषारोपण करना इस अज्ञान को या जानबूझकर किए जानेवाले भ्रामक प्रचार को क्या कहा जाए?

भविष्य-चिंतक वीर सावरकर के सपनों का भारत 1

भविष्य-चिंतक वीर सावरकर के सपनों का भारत


हिंदूराष्ट्र के उद्‌गाता वीर सावरकर न केवल एक महान हिंदूसंगठक थे, जिन्होंने अंडमान के कारागार में ही शुद्धि यज्ञ का सूत्रपात किया था अपितु, एक महान साहित्यकार भी थे, जिन्होंने कालकोठरी में ही रहते 'कमला" जैसे महाकाव्य का सृजन किया था, मुंबई मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद से 1938 में 'लेखनियां तोडो और बंदूक हाथ में लो" का क्रांतिकारी वक्तव्य देकर खलबली मचा दी थी। वे क्रांतिमंत्र के उद्‌गाता, जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में क्रांतिकारी रहे; जिनका कहना था प्रत्येक क्रांति एक प्रयोग होता है, विज्ञाननिष्ठ, तर्कसिद्ध सर्वकालिक हिंदुत्व के प्रवक्ता, द्रष्टा-भविष्यचिंतक भी थे। अंडमान के तट को दूर से देखते ही, जहां उन्हें दो कालापानी का दंड भुगतने के लिए लाया जा रहा था, उनके मन में विचार उठे थे अरे! यह तो हिंदुस्थान के समुद्र का पूर्व की ओर का द्वार ही है, जहां भविष्य में भारतीय नौ-सेना का एक बलिष्ठ सैनिकी अड्डा स्थापित होगा, जो पूर्व की ओर से होनेवाले किसी भी आक्रमण का प्रथम प्रत्याघात कर देश की रक्षा करेगा। उनका यह स्वप्न सुन कारागार के अधीक्षक ने उपहास करने के लिए उनसे कहा - 'यह देखो सावरकर, इस अंडमान के तुम्हारे भावी जलदुर्ग के योद्धा इधर-उधर पहरा दे रहे हैं। देखो!" सावरकरजी ने इस पर हंसकर कहा, 'यह तुम्हें और मुझे कदाचित्‌ दिख न सकेंगे परंतु, अपने बच्चे बहुधा यहां आएंगे।" वीर सावरकर का यह स्वप्न सिद्ध हुआ। वे द्रष्टा ठहरे। 10 मई 1973 को लोकसभा में रक्षामंत्री ने पोर्टब्लेअर पर नौ-सेना का अग्रगामी अड्डा स्थापित करने के सरकार के निर्णय की घोषणा की।


वीर सावरकर के हिंदुत्व-हिंदूराष्ट्रवाद को संकुचित समझनेवाले समझते रहें परंतु, उनका हिंदुत्व ग्रंथ जो 1921 के अंत और 1922 के प्रारंभ में गुप्तरुप से लिखकर अंडमान के कारागार से बाहर भेजा गया था वह 1923 में 'मराठा" इस सार्थ नाम से प्रकाशित हुआ था। और 1925 के प्रारंभ में हिंदूमहासभा के बेलगांव अधिवेशन में डॉ. मुंजे, लाला लाजपतराय, लाला हंसराज, बॅ. जयकर, तात्यासाहेब केलकर, बाबू राजेन्द्रप्रसाद जैसे बडे-बडे नेता उपस्थित थे में सावरकरजी द्वारा इस ग्रंथ में 'हिंदुत्व" की दी गई व्याख्या बतलाई गई थी। इस 'हिंदुत्व" ग्रंथ को जो कोई भी पढ़ेगा वह निःशंक होकर स्वीकारेगा कि सावरकरजी का हिंदुत्वाभिमान अंधधर्मांधता न होकर सांस्कृतिक स्वाभिमान था। हिंद्वेत्तर धर्मांधों को मुंहतोड उत्तर देनेवाला स्वाभिमानभरा संकल्प था। परंतु, जो बिना पढ़े ही उन्हेें और हिंदुत्ववादियों को धर्मांध और सांप्रदायिक ठहराना चाहते हैं। उन्हें अब क्या कहें?


'हिंदूराष्ट्र" की कल्पना को संकुचित कहनेवालों को उनके द्वारा दिया गया उत्तर था - हिंदूराष्ट्र की कल्पना संकुचित नहीं। क्योंकि, यदि इस प्रकार से कहा गया तो हिंदीराष्ट्र की कल्पना भी मानवता की विशाल कल्पना के सामने संकुचित ही ठहरेगी।


वीरसावरकर भी हिंदूराष्ट्र का सपना देखा करते थे का उल्लेख कर हिंदुत्ववादियों का उपहास कर हिंदुत्व एवं हिंदुत्ववादियों के प्रति अनर्गल प्रलाप करनेवाले जिन्हें परंपरागत रुप से ही 'हिंदुत्वद्वेष" प्राप्त हुआ है वस्तुतः जानते ही नहीं कि वीर सावरकर अपने सपने के भारत के बारे में क्या विचार रखते थे। वीर सावरकर के शब्दों में ही - ''मेरे सपनों का भारत एक लोकतंत्रीय राज्य है, जिसमें सभी रुप धर्मों और मत-मतांतरों के अनुगामियों के साथ पूर्ण समानता का व्यवहार किया जाएगा। किसीको दूसरे पर आधिपत्य जमाने का अवसर न रहेगा। जब तक कोई व्यक्ति हिंदुओं की इस पुण्यभूमि तथा मातृभूमि हिंदुस्थान को एक राज्य मानकर इसके प्रति अपने दायित्वों का निष्ठा सहित पालन करेगा, जो आसिंधु-सिंधु पर्यंत विस्तीर्ण है, एक ओर अविभाज्य है तब तक उसे नागरिकता के पूर्ण अधिकार प्राप्त होंगे। हिंदू एक जातिविहीन और संगठित आधुनिक राष्ट्र का रुप ग्रहण करेंगे। विज्ञान और टैक्नोलोजी को बढ़ावा मिलेगा, जिसमें सभी भूमि राज्य की होगी और कोई भी जमींदार न होगा। सभी महत्वपूर्ण उद्योगों का राष्ट्रीयकरण होगा तथा भारत खाद्यान्न, वस्त्र और प्रतिरक्षा की दृष्टि से पूर्णतः आत्मनिर्भर होगा। मेरे स्वप्नों के भारत का वसुधैव कुटुम्बकम के महान आदर्श में विश्वास होगा। सैनिक दृष्टि से सबल अखंड हिंदुस्थान की विदेश नीति होगी तटस्थता और शान्ति की। शक्तिशाली और अखंड हिंदुस्थान ही विश्व में स्थाई शान्ति और समृद्धि की दिशा में प्रभावी योगदान दे सकता है।""


हिंदुत्व पर होनेवाले आक्रमणों एवं कुप्रचार से तथा गिरती नैतिकता देखकर निराश होनेवाले हिंदुत्ववादियों के लिए सावरकरजी के ये वचन निश्चय ही गौर करने लायक होकर उनके लिए सम्बल प्रदान करनेवाले हैं - ''स्वतंत्रता के 18 वर्ष (वर्तमान में 66) उपरान्त भी हम लोगों को निराश, हताश, विक्षुब्ध और नैतिकता से गिरता हुआ देख रहे हैं। आज जनसाधारण जो पेट की रोटी और अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं, बडी योजनाओं ने उनको तनिक भी प्रभावित नहीं किया है। किन्तु इतने पर भी एक क्षण के लिए भी यह सोचना कि यह देश खंड-खंडित हो जाएगा, पागलपन ही होगा। एक ऐसा देश जिसने चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, शालिवाहन, चाणक्य और शिवाजी जैसे महान राजनीतिज्ञों को गोदी में खिलाया है, वह कभी भी राजनैतिक दृष्टि से दिवालिया नहीं हो सकता। सहस्त्रों वर्षों के इतिहास में हिन्दुस्थान पर जब-जब संकट के घन घहराए हैं तब ही किसी-न-किसी महापुरुष ने इसका नेतृत्व कर राष्ट्र को सम्बल दिया है। जैसा अतीत में हुआ है भविष्य में भी ऐसे लोग होते रहेंगे जो देश का दिशा निर्देशन करेंगे, इसकी सेवा के लिए ही जिएंगे और मरेंगे।""


जिस प्रकार से उनके 'हिंदुत्व" के प्रति अनेक भ्रांतियां व्याप्त हैं उसी प्रकार से उनकी धर्म संबंधी भूमिका, मान्यताओं के बारे में भी अनेकानेक भ्रांतियां फैली हुई हैं। धर्म संबंधी उनके विचार थे - ''क्या धर्म अर्थात्‌ पारिमार्थिक चर्चा द्वैत, अद्वैत का वाद-विवाद या चेतन-अचेतन की खोज है? या केवल भावना है जो व्यक्ति शून्य हो? नहीं विशेष रुप से हमारा धर्म महान होने से हम धर्म को ही राष्ट्र कहते हैं। हमारा इतिहास ही धर्म है। इतना ही नहीं परंतु हमारा दैनिक व्यवहार जो इतिहास समाज और राष्ट्र को पुष्ट करता है वही हमारा धर्म है। धर्म की यह परिभाषा निधर्मी स्टालिन से कम्युनिस्टों को भी माननी पडी थी। धर्म की इस परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि कोई भी व्यक्ति धर्मातीत रह ही नहीं सकता। अमरीका का राष्ट्रपति बाइबल हाथ में लिए बिना राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण नहीं कर सकता; इंग्लैंड का सम्राट यदि प्रोटेस्टन्ट न हो तो उसे राज्य पद से त्यागपत्र देना पडता है। यदि छोटे से छोटे पाश्चात्य देश में भी हम गए तो हमें यही दिखाई देगा कि यह राष्ट्र किसी-न-किसी धर्म का अनुयायी होगा। हम हिन्दू हैं और हमने दुनिया देखी है? देश इतिहास और व्यवहार के विशुद्ध न्यायपूर्ण बरताव को ही हम धर्म कहते हैं। इसलिए धर्म में महान शक्ति होती है। हम, हमारा देश, इतिहास और व्यवहार हिंदुस्थान के वैभव को बढ़ानेवाला है। इस प्रकार व्यक्तिगत और सामाजिक भावनाओं में व्याप्त प्रेरणा को ही हम धर्म कहते हैं। धर्म की इस परिभाषा से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हिंदुस्थान का धर्म हिंदू है।""


इस हिंदूधर्म को और अधिक विस्तृत रुप से समझने के पूर्व उनके द्वारा दी गई हिंदू की परिभाषा जो उनकी प्रतिभा दर्शाती है को समझना अनिवार्य है। उनकी व्याख्या के अनुसार 'आसिंधु-सिंधु-पर्यन्ता, यस्य भारतभूमिका। पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिंदुरिति स्मृतः।।" सिंधुस्थान ही जिनकी केवल पितृभूमि ही नहीं तो पुण्यभूमि भी है वह हिंदू। सावरकरजी की 'हिंदू" शब्द की यह व्याख्या अतिव्याप्ति और अव्याप्ति इन दोनो ही प्रकार के दोषों से मुक्त है। इस व्याख्या के अनुसार वैदिक धर्मानुयायी, सिक्ख और भारतीय बौद्ध, जैन, लिंगायत, नास्तिक, ब्राह्मोसमाजी, गिरीजन, वनवासी आदि का समावेश 'हिंदू" में होता है। चीनी बौद्धों का समावेश हिंदुओं में नहीं होता। क्योंकि, हिंदुस्थान उनकी पुण्यभूमि होने पर भी पितृभूमि नहीं है।


'हिंदूधर्म" यह नाम किसी एक विशिष्ट धर्म अथवा पंथ विशेष का न होकर जिन अनेक धर्मों और पंथों की यह भारतभूमि ही पितृभू और पुण्यभू है उन सारों का समावेश करनेवाले धर्मसंघों का हिंदूधर्म सामुदायिक अभिधान है। बहुसंख्य हिंदुओं के धर्म को सनातन धर्म अथवा श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त धर्म अथवा वैदिक धर्म इस प्राचीन एवं मान्य संज्ञाओं से संबोधित किया जाता है। अन्य हिंदुओं के धर्मों को उनके उनके मान्य नामों से जैसे सिक्ख धर्म अथवा आर्यधर्म अथवा जैन धर्म अथवा बौद्ध धर्म संबोधित किया जा सकता है। जब इन सारे धर्मों को एकत्रित नाम देने की आवश्यकता होगी तब हिंदूधर्म यह व्यापक नाम देना उचित होगा। इसके कारण अर्थहानि तो होगी ही नहीं, परंतु वह अचूक और निःसंदिग्ध जरुर होगी और अपने छोटे समाज के संदेह और बडे समाज का क्रोध दूर कर अपने समान वंश और समान संस्कृति दर्शानेवाले अपने प्राचीन ध्वज तले पुनः एक बार सभी हिंदुओं के एकत्रित करेगा। इसी प्रकार से हमारे यहां एक ही धर्म पुस्तक न होने का लाभ बतलाते हुए सावरकरजी इस संबंध में अपने विचार प्रकट करते हुए कहा इससे अपना धर्मविकास थमा नहीं। हमारे धर्मतत्त्व भी किसी पुस्तक के दो पुट्ठों में समा नहीं सकते। इस विश्व के दो पुट्ठों में जितना सत्य और ज्ञान विस्तृत फैला हुआ है उतनी हमारी धर्म पुस्तक विस्तृत होगी। अंत में उनका कहना था कुछ भी हो तो भी बुद्धिवाद की दृष्टि से देखा जाए तो कुल मिलाकर सभी धर्मों में ग्राह्यतम धर्म यदि कोई हो सकता है तो वह है हिंदूधर्म।


युवा जागरुक हों - राजनीति के प्रति

युवा जागरुक हों - राजनीति के प्रति

वर्तमान में सोशल साईट फेसबुक की लोकप्रियता चरम पर है विशेषकर युवाओं में। मैं भी शौकिया तौर पर फेसबुक से जुडी हुई हूं। मुझे उस समय बडा दुख एवं कष्ट होता है जब मैं कई युवाओं के प्रोफाईल में यह पढ़ती हूं कि 'आय हेट पॉलिटिक्स, आय हेट पॉलिटिशियन्स", लगभग यही उत्तर या इससे मिलता-जुलता उत्तर युवाओं से साधारण चर्चा के दौरान भी सुनने को मिलता है। वैसे इस स्थिति के लिए बहुत हद तक राजनीतिज्ञ ही जिम्मेदार हैं जिन्होंने अपने आचरण एवं वक्तव्यों से समाज एवं विशेषकर युवाओं में उनके प्रति आक्रोश भर दिया है। परंतु इसका हल राजनीति और राजनेताओं से घृणा व्यक्त करने मात्र में तो निश्चय ही नहीं है।


शायद ये युवा नहीं जानते कि राजनीति सामूहिक निर्णय की प्रक्रिया का एक नाम है। ये वो निर्णय होते हैं जो हर व्यक्ति के जीवन के हर पहलू का स्पर्श करते हैं। किसी व्यक्ति के पैदा होने से मरने तक का जीवन राजनीति से प्रभावित होता है, संचालित होता है। बच्चा बडा होने पर किस प्रकार की शिक्षा ग्रहण करेगा, किस प्रकार के रोजगार उसके लिए उपलब्ध होंगे, उसे किस प्रकार की स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होंगी, आदि सब कुछ राजनीति ही तो तय करती है।लेकिन आश्चर्य है कि राजनीति व राजनेताओं से घृणा के विचार वे ही युवा सबसे अधिक प्रकट कर रहे हैं जो या तो उच्च शिक्षित हैं या इंजीनियरिंग-मेनेजमेंट जैसी उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। और यही वह वर्ग है जिसको सबसे अधिक विचारवान होना चाहिए है,जिसमें कुछ कर गुजरने का जज्बा होना चाहिए।


परंतु, इन युवाओं में से अधिकांशतः के पास विचार है तो मात्र शिक्षा प्राप्ति के बाद अच्छी नौकरी का वह भी हो सके तो किसी मल्टीनेशनल का। ये युवा पूरी तरह से पैकेज संस्कृति, कारपोरेट संस्कृति (corporate culture) से प्रभावित हैं और देश के सामने उपस्थित ज्वलंत समस्याओं से जानबूझकर अनजान बन रहे हैं, आंखें मूंदे रखना चाहते हैं और सारी समस्याओं का जिम्मेदार नेताओं को ठहराकर उन पर ठिकरा फोडकर बरी हो जाना चाहते हैं।


इस प्रकार के युवाओं को देखकर लगता है कि लॉर्ड मैकाले ने जो सपना देखा था कि, मेरी शिक्षा नीति से इस देश में ऐसे लोग पैदा होंगे जिनके पास आत्मसम्मान नामकी चीज नहीं होगी, वे अपनी भाषा-संस्कृति से विमुख होंगे। वे मात्र कारिंदे होंगे, नौकर होंगे, गुलाम होंगे। वह अब जाकर पौने दो सौ सालों बाद साकार होते दिख रहा है। ये युवा मात्र कारपोरेट क्षेत्र की अच्छी नौकरी का ख्वाब संजो रहे हैं, भले ही अपमानित होना पडे परंतु विदेश में जाकर बसना चाहते हैं।


वर्तमान में जो दुर्दशा राजनीति की हो गई है उसका सबसे बडा कारण हमारा राजनैतिक रुप से जागरुक न होना है। 'कोई भी नृप हो हमें कां चिंता" की मनोवृत्ति ने आज राजनेताओं को बेलगाम बना दिया है। यदि हम जागरुक होते तो इस कहावत का महत्व समझते 'घोडा क्यों अडा, रोटी क्यों जली, क्योंकि फेरा ना गया"। ना फेरने का ही नतीजा है कि राजनीति में अब वंशवाद भी घुसा चला जा रहा है जो आगे चलकर नई समस्याएं पैदा करेगा।


युवा राजनीति से घृणा करने की बजाए राजनैतिक रुप से जागृत हों, राजनीति के प्रति गंभीर दृष्टिकोण अपनाएं इसलिए सुप्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो (plato) का यह वचन उद्‌धृत है -


राजनीति में हिस्सा नहीं लेने का यह खामियाजा भुगतना पडता है कि आपको घटिया लोगों के हाथों शासित होना पडता है।


अर्पिता कार्तिक

SUBWAY NIGHTMARE

IN NEW YORK AND OTHER METROPOLITAN CITIES IN USA, SUB WAY TRAINS ARE VERY MUCH IN USE FOR DAILY COMMUTERS. IT’S LIKE LOCAL TRAINS IN MUMBAI, YOU CAN CATCH IT ALMOST EVERY FEW MINS TO EVERY STATION IN MUMBAI. A VERY CONVENIENT AND FAST WAY TO REACH TO YOUR DESTINATION IN WORKING DAYS IN SUCH BIG AND BUSY CITIES. WELL IT’S CONVENIENT FOR SURE BUT IN NEW YORK CITY, SUB WAY STATIONS ARE A BIT SCARY TOO. THERE IS A CITY CALLED QUEENS, WHICH IS A HUB OF BLACK PEOPLE AND HIGH ON CRIME RATE. ONCE WHEN I WAS NEW IN AMERICA, I WAS VISITING NEW YORK WITH A FRIEND. I WAS VERY EXCITED TO TRAVEL IN SUBWAY. ALL THOSE STATIONS WERE UNDERGROUND OF COURSE AND WERE KIND OF CREEPY. IT WAS MY FIRST TIME IN ANYTHING LIKE THAT, A SUPERFAST UNDERGROUND TRAIN. WE SPENT WHOLE DAY ROAMING IN NEW YORK CITY AND MANHATTAN, TAKING EYE FEASTS ON PEOPLE, FASHION, GORGEOUS SURROUNDINGS AND TALL BUILDINGS.

WELL EVERYTHING MUST COME TO AN END SO FINALLY WE DECIDED TO GO BACK HOME. IT WAS DARK ALREADY; WE WENT INSIDE A SUBWAY STATION, TOOK OUR TRAVEL CARD AND WAITED FOR OUR FAST RAIN TO CATCH. IT WAS QUITE AND DARK INSIDE, YOU COULD HARDLY SEE ANYONE. WELL FINALLY A TRAIN CAME; SOME PEOPLE GOT OUT AND WENT TO THEIR DESTINATIONS. NO ONE LOOKS ANY OTHER PERSON THERE IN EYES. I HEARD IT’S JUST NOT RIGHT TO LOOK INTO ANYONE’S EYE THERE; ESPECIALLY BLACK PEOPLE DON’T LIKE IT. AND WELL THEY WERE NOTORIOUS TO PULL THEIR GUNS ON ANY SMALL FEUD. WE BOTH WERE VERY CAUTIOUS AND A BIT SCARED. FINALLY OUR TRAIN CAME. DOORS GOT OPEN FOR LIKE 30 SECONDS OR SO AND THEN THEY GOT CLOSED AND TRAIN WENT AWAY. OH TO MY HORROR, I WAS SO MUCH ENGROSSED IN MY THOUGHTS THAT MY FRIEND GOT ON TRAIN AND I LEFT ON STATION. WHEN TRAIN STARTED FROM STATION, I SNAPPED OUT OF IT AND SAW MY TRAIN GOING AND MY FRIEND SCREAMING FROM INSIDE, WHICH OF COURSE I COULD NOT HEAR. I COULD NOT UNDERSTAND FOR A MOMENT WHAT SHOULD I DO NOW. IT WAS A NEW COUNTRY, NEW PEOPLE AND A NEW SYSTEM FOR ME. AND TO MY HORROR, THERE WAS NO ONE ON THE STATION, IT WAS ALL DARK. THERE WERE NO NETWORK SIGNALS TO MY MOBILE, AND WAS NO PUBLIC TELEPHONE AS WELL. AND I KNEW IF I GO OUTSIDE THEN I CAN’T COME BACK ON SAME CARD INSIDE, AND THE WORST PART, MY PURSE WAS WITH MY FRIEND. SO THERE I WAS WITH NO MONEY, NO PHONE AND NO ONE ON THE STATION.

I KEPT REPEATING TO MYSELF DON’T BE SCARED. I SAT ON A BENCH AND WAITED FOR THE TRAIN TO COME. ALL OF A SUDDEN I SAW A BLACK HIPPY GUY COMING FROM THE DARK. HE SAW ME AND I SUDDENLY REMEMBERED TO NOT LOOK HIM INTO HIS EYES. HE WAS KIND OF COMING TOWARDS ME OR ATLEAST I THOUGHT SO, AS HE WAS COMING CLOSER AND MY HEART BEATS WERE INCREASING, MY MIND STOPPED WORKING AT ALL. AND THEN I HEARD A TRAIN COMING. I JUMPED UP AND WENT TOWARDS THE TRACK RIGHT AWAY. AS SOON AS THE TRAIN CAME, MANY PEOPLE CAME OUTSIDE; I GRABBED THE OPPORTUNITY TO TALK TO A FEMALE. A WORKING WOMAN FROM THAILAND CAME OUT AND WAS GOING OUT OF THE STATION; I WENT TO HER AND TOLD HER MY STORY. SHE WAS SO GENUINE; SHE OFFERED TO STAY WITH ME TILL MY FRIEND GETS BACK TO ME. I FELT SO MUCH RELIEF. THE NEXT TRAIN CAME BACK FROM THE OTHER SIDE AND SO MY FRIEND IN IT. FINALLY I GOT OUT OF MY SUBWAY NIGHTMARE AND SAFELY HOME. I LATER REALIZED, THAT METRO STATION WHERE I WAS STUCK, WAS QUEENS.

THE BEST PART WAS THAT STRANGER, WHO DID NOT EVEN KNOW ME, AND WAS GETTING LATE FOR HER HOME, BUT STILL STAYED FOR ME. DO WE LEARN SOMETHING FROM THIS? I DID. I WISH WE COULD BRING THAT HOSPITALITY IN OUR COUNTRY WHEN PEOPLE COME TO INDIA FROM AROUND THE WORLD TO VISIT US. BUT UNFORTUNATELY I HEARD A LOT OF HORRIFIC EXPERIENCES AND STORIES ABOUT INDIAN AND THEIR BEHAVIOR WITH FOREIGNER VISITORS. WE DO SAY “ATITHI DEVO BHAV” BUT ONLY ON BOOKS.

NEELAM

Crash on the busiest bridge of DC

We do get influenced by the way western countries do things and their fashion and their language. But sometimes I feel like we don’t really try to learn good things from them. Me being in USA for 8-9 years, made me realize that it’s not what we see from India. America has more to offer than glamour if we keep our mind open and bring home the good. I am in India now but I still remember that accident which I had on the busiest bridge in Washington during the commute hour. Traffic is similar everywhere in the world during the commute hours. I was living in Virginia which is pretty close to the Capital Washington.

 

Once I planned to go to New Jersey to visit my friend and packed my bags and headed towards the freeway which goes through Washington. In my excitement I totally forgot that it’s a working day and the time was also somewhat commute time. Well I packed my easel and started driving my car towards Washington with Jagjit singh’s  gazals on full volume. After only few minutes of travel I reached to the busiest bridge in America over Potomac river which connects Virginia to Washington.

 

I was driving on 65-70 per mile which is a general speed posted on most of the routs there. Bridge was full with cars bumper to bumper. Everyone was in a hurry to get to the metro station or to the office on time. All of a sudden cars in front of me slowed down drastically. I had to put the brakes really hard but did it in time. But the driver behind me was not really aware of this change and forgot to put the brakes and bumped into my car and in turn I bumped into a car in front of me, that car in front of it and that car in front of that. In all 4 cars were hit. All of a sudden the flow of traffic came to halt in the middle of that bridge. People started honking out of frustration. I thought its gonna be a long process as we have in India, people shouting, the drivers involved in accident will be abusing each other, then police will come taking its own sweet time.

 

But to my surprise, even before I got out of my car, cops were there all over the place and started clearing the traffic as soon as they arrived at the scene by telling us to move our cars to the side. I was really impressed by the time of response. It is said the time of response in America is 2 mins for cops or for any emergency service as well as fire fighters. And I saw it happening and could not believe my eyes.


It was like being in a Hollywood movie, lights and cops and a helicopter and drama. I was actually loving it, I should admit. Well so finally a cop started talking to me and he clearly asked me to stay in the car. He asked me if I was okay and also asked all included in the accidents to exchange their insurance information. All was calmly done. When the cop asked me to leave after the formalities, I was a bit muddled so asked him how to go back. He very nicely led my car in his police car and dropped me to a recognized freeway so I could continue from there on my own.I never had in any accidental situation which was so smooth.

 

It was one of a kind experience and we should also learn a thing from them. Not all western things are bad. Being in USA for almost 9 years taught me this one thing for sure, everyone and every place have something good to offer, we should focus on the good rather than the bad.  

Neelam solanki

मेरी इस वर्ष की पूर्वोत्तर की यात्रा - 2

मेरी इस वर्ष की पूर्वोत्तर की यात्रा - 2


पूर्व वर्षों की भांति ही इस वर्ष भी पू. स्वामी दयानंदजी के आशीर्वाद एवं अनुमति से मैंने मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम की यात्रा की जो मेरे लिए अविस्मरणीय ठहरी।


9 मई 2013 को मैं गुवाहाटी पहुंंचा और 10 मई को वहां से मेघालय। 13 मई दोपहर को अ.भा. वनवासी कल्याण आश्रम के उपाध्यक्ष श्री कृपासिंगप्रसाद के साथ मैं अगरतला (त्रिपुरा) पहुंचा और 14 मई को उदयपुर स्थित मॉं त्रिपुरेश्वरी मंदिर की ओर हमने प्रस्थान किया। मॉं के अभिभूत कर देनेवाले दर्शन एवं आशीर्वाद के पश्चात हम कुमारघाट की ओर चल पडे जहां पू. स्वामीजी के डिवोटी श्रीमति डॉ. इंदुकृष्णन और उनके पारिवारिक मित्रों द्वारा वनवासी कल्याण आश्रम को दान किया हुआ छात्रावास भवन है। यह छात्रवास सन् 2011 से कार्यरत होकर 40 आदिवासी लडकियां वहां रह रही हैं। अगले दिन वहां से हम कंचनपुर और वहां से निर्वासित रियांग जनजाति के शरणार्थी शिविर में पहुंचे जो आशापाडा और नरसिंगपाडा नाम से जाना जाकर त्रिपुरा-मिजोरम की सीमा पर स्थित है।


आशापाडा में रियांग जनजाति के लोगों ने हमारा पारंपरिक पद्धति से बडा ही भावभीना स्वागत किया। हम सैंकडों लोगों से मिले। जैसाकि मैंने अपने पिछले वर्ष के वृतांत में लिखा था 45,000 हजार से अधिक लोग इन दो शरणार्थी शिविरों में पिछले 16 वर्षों से रह रहे हैं। पिछले वर्ष हम वहां से हमारे 'एम फॉर सेवा"  म.प्र. के छात्रावासों में 10 लडकों और 15 लडकियों को लाए थे। सभी छात्र-छात्राओं के अभिभावकों और संबंधियों ने मुझसे पृथक से मिलने की इच्छा प्रकट की। मैं आप लोगों को अपनी प्रसन्नता में सहभागी बनाकर बहुत आनंद का अनुभव कर रहा हूं कि अभिभावकों ने अपने बच्चों की शिक्षा एवं परवरिश जो 'एम फॉर सेवा" द्वारा बहुत ही उत्कृष्टतापूर्वक निःशुल्क की जा रही है के प्रति कृतज्ञता व प्रसन्नता प्रकट की। उन्होंने पू. स्वामी दयानंदजी को प्रणाम करते हुए  कृतज्ञता प्रकट की कि उन्होंने 'एम फॉर सेवा" जैसा संगठन प्रारंभ किया। उन्होंने अपने अन्य बच्चों को भी 'एम फॉर सेवा" के छात्रावासों  में ले जाएंगे क्या पूछा! ''हम नहीं जानते कि हम मिजोरम स्थित अपने घरों को वापिस जा पाएंगे कि नहीं? हम भयभीत हैं कि हमारे बच्चे कहीं बिना शिक्षा ग्रहण किए ही बडे तो नहीं हो जाएंगे? हमें स्कूलों की सुविधा प्राप्त नहीं है। यहां ईसाई मिशनरीज द्वारा स्कूल संचालित किए जा रहे हैं परंतु, उसके लिए हमें रु. 500/- प्रति मास व्यय करने होंगे जो वहन करने की हमारी क्षमता नहीं है, साथ ही वे हम पर दबाव बनाते हैं कि हम उनकी प्रार्थना में आएं और वे हमारी जीवन पद्धति की भी आलोचना करते हैं। हम हमारी प्रथाओं, संस्कृति को छोडना नहीं चाहते। हमारे बच्चे हमें बतलाते हैं कि 'एम फॉर सेवा" के लोग हमसे प्रेम करते हैं, हमारी संस्कृति-प्रथाओं को मान्यता देते हैं तथा उनके पालन के लिए हमें प्रोत्साहित करते हैं। हमारे बच्चे हमें दूरभाष पर बतलाते हैं कि पू. स्वामीजी और अन्य लोग हमसे हमारी प्रथाओं और परिवार के सदस्यों के बारे में पूछताछ करते रहते है। आज से पूर्व पिछले 16 वर्षों में किसीने यहां तक कि सरकार तक ने यह नहीं किया। अतः हम चाहते हैं कि आप हमारे शिविरों से और अधिक बच्चों को अपने साथ ले जाएं।""


दिनांक 15 को हमने कंचनपुर से मिजोरम के लिए प्रस्थान किया। यह यात्रा हमारी आँखें खोल देनेवाली थी। कंचनपुर (उत्तरी त्रिपुरा) से राजीवनगर (मिजोरम) मार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग क्र.44 होकर दूरी 150 कि.मी. है। हम प्रातः 9 बजे कंचनपुर से निकलकर राजीवनगर संध्या 6 बजे पहुंचे। कोई मार्ग ना होकर वह क्षेत्र पूरी तरह से पहाडी है उन पहाडियों को जमपूई कहते हैं। मार्ग में हमें ह्मुनपूई, वांघमू, बेहलियांगछिप, बंगालबारी, थांगसंग, साबूआल,फूलडींगसेइ, कावनूइ और कावंपूइ उत्तर (यह त्रिपुरा का अंतिम गांव है) गांवों को पार करना पडा । यहां हमारी कार को त्रिपुरा पुलिस ने रोका और बाद में मिजोरम पुलिस ने। यहां त्रिपुरा और मिजोरम दोनो राज्यों की पुलिस ने जिस प्रकार से हवाई अड्डों और बंदरगाहों पर आप्रवासियों के अधिकृत दस्तावेजों की जांच की जाती है उस प्रक्रिया से हमें राजीवनगर पहुंचने के पूर्व गुजारा (जबकि हमने मिजोरम जाने के लिए 15 दिन पूर्व ही अनुमति ले ली थी)।


राजीवनगर पहुंचने के पूर्व मार्ग में हमें खांटलंग, अमसूरीमुख और किल्द गांव लगे। जैसे ही हमने राजीवनगर में प्रवेश किया, वहां के ग्राम प्रमुख (मुखिया) ने हमसे कहा यह समय मिजोरम में आने के लिए उचित नहीं क्योंकि इन दिनों यहां बहुत कुछ हो रहा है। हमारे द्वारा पूछताछ करने पर उसने कहा, ''पिछले 15 दिनों में यहां के 4 गांवों के 5 लोगों का अपहरण कर लिया गया है और 2 लोग मारे जा चूके हैं। एक व्यकि की मृत देह अभी तक यहीं इस गांव में पडी हुई है। कल पुलिस औपचारिक कार्यवाही के लिए आनेवाली थी परंतु अभी तक आई नहीं है। उसके बगैर हम अंतिम संस्कार भी नहीं कर सकते। मानलो कि हमने अंतिम संस्कार की विधि निपटा ली और उन्हें पता चल गया तो, हम सब जेल की सलाखों के पीछे होंगे। यहां तक कि हम उनके मृत शरीर को छू भी नहीं सकते,भले ही वह व्यक्ति हमारा संबंधी ही क्यों ना हो।""


इसीमें बहुत समय बीत गया उसके बाद वे हमें पहाड पर स्थित भगवान बुद्ध के मंदिर में ले गए और रात वहीं बीताने के लिए कहा और हमें यह कह कर चले गए कि हम अब अगले दिन सुबह आएंगे।


मिजोरम में तीन जनजातियां हैं - मिजू, रियांग और चकमा। उनमें से 85% मिजू, 6% रियांग और चकमा 9% हैं। मिजू पूरी तरह से यानी 100%  धर्मांतरित हो ईसाई बन चूके हैं। 40% रियांग हिंदू होकर 60% ईसाई बन चूके हैं। परंतु, चकमा भर दृढ़ बुद्धधर्मीय होकर एक कठिन समय से गुजर चूके हैं क्योंकि वे धर्मांतरित हो ईसाई नहीं बनना चाहते।


हमने वह पूरी रात बांस से बने बुद्ध मंदिर में गुजारी। पूरी रात भारी वर्षा होती रही। एक बौद्ध सन्यासी ने हमें मंदिर में चावल और एक अनजान सी सब्जी खाने के लिए दी। हमने उसे ग्रहण किया। उसके बाद कुछ लोग गांव से हमसे मिलने के लिए आए। मुझे उनके नाम याद हैं - ज्ञानरंजन चकमा, धिमान चकमा, जनानडू चकमा, बिश्रुत चकमा, कुमारी खेमा चकमा और श्रीमति कनिका चकमा। वहां बिजली नहीं थी इसलिए वे साथ में कुछ मोमबत्तियां लाए थे।


श्रीज्ञानरंजन चकमा थोडी बहुत हिंदी जानते थे, इसलिए मैंने उनके साथ बैठकर उन लोगों के जीवन के बारे में पुछताछ शुरु की, उनके गांव में कितने लोग हैं? वे अपना जीवन किस प्रकार से व्यतीत करते हैं? गांव में कौन-कौन लोग रहते हैं... आदि। उसने उत्तर दिया राजीवनगर और उसके आस-पास के 15 गांवों में केवल चकमा लोग रहते हैं। (उस भाग में कुल 25000 लोग रहते हैं) इसके बाद कुछ गांवों में रियांग और कुछ मिजू रहते हैं। रियांग और चकमा केवल पहाडी क्षेत्र में रहते हैं और मिजोरम के अन्य भागों में मिजू रहते हैं।


इसके बाद मैंने उनसे 1997 की घटना के बारे में पूछा जब वहां रियांग जनजाति और मिजू जनजाति के बीच तनाव फैल गया था और जिसकी परिणती एक बडे संघर्ष में बदल गई तथा रियांग लोगों को पलायन कर त्रिपुरा जाना पडा था। श्री ज्ञानरंजन चकमा ने मुझे पूरी कहानी इस प्रकार से बतलाई -


उस क्षेत्र में एक मिजू जनजाति का वनरक्षक था। एक दिन उसने रियांग जनजाति की एक अतिसुंदर लडकी को देखा। उसे वह भगाकर अपने कार्यालय में ले गया। कुछ दिनों बाद वह उसे उसी गांव में लेकर आया और गांववासियों से बोला कि वह उसकी पत्नी थी। रियांग समुदाय ने इसे स्वीकार कर लिया वैसे इसके अलावा उनके पास कोई चारा भी तो ना था। वे मिजुओं द्वारा भयभीत एवं दबाए जाने लगे। वे उन्हें प्रताडित करने लगे। यह घटना घटित होने के कुछ समय पश्चात वह वनरक्षक उन्हें अधिकाधिक यंत्रणाएं देने लगा और अन्य लडकियों पर भी बुरी दृष्टि रखने लगा। उसने स्पष्ट रुप से कहना प्रारंभ कर दिया कि मुझे तुम्हारे समुदाय से और अधिक लडकियां चाहिए, तुम लोग क्या कर लोगे और एक लडकी को छूने का प्रयत्न किया। परंतु, वहां बहुत से रियांग लोग होने के कारण वह उसे ले जा ना सका। उसी रात रियांग समुदाय के कुछ युवा एकत्रित हुए और वन कार्यालय में जाकर उस वनरक्षक को मार डाला। इस कारण से मिजू समुदाय हिंसक हो उठा और कई लोगों को मार डाला; कई गांवों को आग लगा दी, कई लडकियों के साथ बलात्कार कर उन्हें मार डाला; कई रियांग ग्रामप्रमुखों का अपहरण कर उन्हें मार डाला गया उनके सिर-हाथ-पांव काट डाले गए। यह सब कुछ दिनों तक और चलता रहा परंतु, कोई पुलिस बल यह रोकने के लिए नहीं आया। इसलिए बचे-खुचे रियांग समुदाय के लोग भागकर त्रिपुरा सीमा की ओर चले गए। त्रिपुरा सरकार ने उन्हें शरण दी।


यह घटना थी 1997 की और तभी से अब तक यह लोग शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। उस समय के केंद्रिय गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी वहां आए थे और आश्वासन दिया था कि कुछ ही दिनों में उन्हें वापिस उनके स्थानों पर पहुंचा दिया जाएगा और भूमि तथा घर दिए जाएंगे, परंतु आज तक कुछ नहीं हुआ। इसके बाद श्री शिवराज पाटिल, श्री पी. चिदंबरम्‌ भी आए परंतु उन्होंने भी कोई सहायता नहीं की। (कुछ दिनों पूर्व दिल्ली में हुई मुख्यमंत्रियों की बैठक में भारत के गृहमंत्री श्री सुशील कुमार शिंदे ने इस संबंध में एक वाक्य कहा- त्रिपुरा और मिजोरम के मध्य कुछ समस्या है जिसका हल वे ही कर सकते हैं हम यानी भारतशासन उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत सरकार हस्तक्षेप करना नहीं चाहती, क्योंकि वहां के मिजू इससे प्रसन्न नहीं होंगे।)


इसके बाद मैंने श्रीज्ञानरंजन चकमा से पूछा - आप लोग (चकमा) यहां रहने की व्यवस्था किस प्रकार से करते हैं? सरकार का  न तो आपको समर्थन है और ना ही आपके लोगों की कोई सुरक्षा? उसने कहा ''हम हमारे घर-भूमि को छोडना नहीं चाहते भले ही वे (मिजू) कहते हों कि हम (चकमा) वहां के निवासी नहीं है हम विदेशी हैं, परंतु यह कैसे संभव है? क्योंकि, हम चकमाओं के पुराने स्मारक बांग्लादेश में देख सकते हैं और यहां भी हम चकमा राजाओं के किले देख सकते हैं। मिजोरम सरकार और मिजुओं ने हमें बडे कठिन समय से गुजरने के लिए विवश कर दिया है। प्रतिदिन पुलिस और अन्य लोग हमें यंत्रणाएं दे रहे हैं, हमारा उत्पीडन कर रहे हैं। आप देख ही रहे हैं कि पिछले दो दिनों से एक मृत शरीर हमारे गांव में पडा हुआ है परंतु, कोई पुलिसवाला अभी तक हमारे गांव में आया नहीं है। यदि हमने बिना पोस्टमार्टम के अंतिम संस्कार कर दिया तो पुलिस यहां आएगी और कम से कम हमारे दस लोगों को ले जाएगी और उन पर केस लगा देगी। हरएक सप्ताह एक से दो लोग मारे जाते हैं या अपह्रत कर लिए जाते हैं; किसी भी तरह की कार्रवाई ना तो मिजोरम सरकार द्वारा होती है ना ही भारत सरकार द्वारा। हो यह रहा है कि हमें हमारी भूमि हमारे घर नहीं दिए जा रहे हैं, हमें उनके विरुद्ध लडना पड रहा है। हम हमारे रियांग लोगों से भी कह रहे हैं कि, साथ आओ, हम हमारे अधिकारों के लिए लडेंगे, भागो मत।""


अगले दिन सुबह लगभग 50 चकमा राजीवनगर और आस-पास के गांवों से हमसे मिलने आए और हमारे प्रति कृतज्ञता व्यक्त की कि आप हमारी सुध लेने के लिए आए और निवेदन किया कि हम फिर से आएं। उन्होंने विशेष निवेदन 'एम फॉर सेवा" और विशेष रुप से पू. स्वामी दयानंदजी के सामने रखा कि ''कृपया आप हमारे बच्चों को 'एम फॉर सेवा" के छात्रावासों में ले जाएं।"" इन लोगों ने पू. स्वामी दयानंदजी को गुवाहाटी में सन्‌ 2006 में उस समय देखा था जब वे अखिल भारतीय जनजाति सभा में मुख्य अतिथि के रुप में आए थे।

स्वामी ऐश्वर्यानंद सरस्वती, इंदौर, म. प्र.।

 

अनुवाद - शिरीष सप्रे  

दृष्टांत कथा

धर्म फायद्यासाठी नाही

दृष्टांत कथा
धर्म फायद्यासाठी नाही


द्वापर युगाच्या शेवटी हस्तिनापूरचे सम्राट होते धर्मराज युधिष्ठिर. ते धर्माची मूर्ती होते. त्यांच्या आचरणात धर्म जागत होता. कितीही कठीण प्रसंग आले, दुःख भोगावे लागले तरी त्याने धर्म सोडला नाही.


एकदा द्यूतामध्यें त्याने सर्वस्व गमावले. त्याच्या पतिव्रता स्त्रीची विटंबना झाली. बारा वर्षे वनवास व एक वर्ष अज्ञातवास त्यांच्या वाट्याला आला. धर्मराजा आपल्या भावासहित द्रोपदीसहित अरण्यात गेला व वनवास भोगू लागला. सोन्याच्या ताटात जेवणाऱ्या, वैभवात लोळणाऱ्या द्रोपदीला वनात झोपडीत राहवे लागले. कंदमुळे खावी लागली. दुःख विटंबना सहन करावी लागली.


वनात अनेक ऋषी, मुनी, संन्यासी युधिष्ठिराबरोबर चर्चा करण्यास येत. युधिष्ठिर त्यांना सांगत असे, ''धर्म ग्रंथात नाही तर आचरणात आहे. प्राण जायचा प्रसंग आला तरी धर्म सोडू नये. धर्म हा अभ्युदय व निःश्रेयसाचे कारण आहे. धर्माचे आचरण कर्तव्य म्हणून करावे. बळी राजाने वामनाला सर्वस्व दिले. वामनाने त्याचे सर्वस्व हरण केले तरी तो आपल्या धर्मापासून ढ़ळला नाही. म्हणून माणसाने धर्म सोडू नये.""


हे सारे द्रोपदी ऐकत होती. ती संतापली व त्वेषाने म्हणाली, ''नाथ तुम्ही जन्मापासून धर्माने वागत आला. लोक तुम्हाला धर्मराज म्हणतात. परंतु असे असूनही तुम्ही व तुमच्या बरोबर धर्म पाळणारे आम्ही सदैव दुःख भोगत आहोत. तो दुर्योधन व त्याचे भाऊ पाहा. सदैव अधर्माने वागतात दुराचार करतात ते मात्र सुख भोगतात. तुमच्या धर्माला काय करायचे आहे?""


धर्मराज म्हणाला, ''मी धर्माचा व्यापार करीत नाही. मी धर्माने वागलो म्हणून मला सुख मिळणार या हेतूने धर्म पाळणे हा व्यापार झाला. व्यापारी पैसे देऊन वस्तु देतात, तसे धर्म देऊन सुख विकत घेता येत नाही. धर्म पाळणे हे माझे कर्तव्य आहे म्हणून मी धर्म पाळतो. माझ्या फायद्यासाठी मी धर्म पाळत नाही. धर्माच्या सुखाच्या मोबदल्यात विनिमय करता येत नाही. मी धर्मवणिक नाही.""


ईश्वराची भक्ती सुद्धा मोबदल्यासाठी करु नये.

आप-का-लाल

'आप का लाल"


छीन ली दिल्ली की गादी बिना किसी धमाल।
हरियाणा के लाल तूने कर दिया कमाल।।


ना बांटे कंबल ना दारु पिलाई।
फिर भी शीला मौसी को धूल चटाई।।


आम आदमी की व्यथा कर दी तूने आम।
खास लोगों की खास बातें छोडी सरे आम।।


बारुद थी तेरी मुट्ठी में कोई समझ नहीं पाया।
जमाना देख रहा था बस तेरी दुबली काया।।


लालू जैसे चालू नेताओं ने किया तुझे मजबूर।
बनाने को आम पार्टी होकर अन्ना से दूर।।

राजवीरसिंह 'स्वतंत्र"

विचारों के आदान -प्रदान का एक प्रभावी माध्यम इंटरनेट

विचारों के आदान -प्रदान का एक प्रभावी माध्यम इंटरनेट

लंदन का हाईड पार्क वहां वर्षभर होने वाले अनेकानेक असाधारण बडे सार्वजनिक आयोजनों के लिए प्रसिद्ध है। इस पार्क की एक विशेषता और भी है और वह यह कि वहां एक स्थान ऐसा भी है जहां एक बेंच पर खडे होकर कोई भी व्यक्ति अपने विचार मुक्त रुप से रख सकता है और विशेषता यह है कि उसे श्रोता भी मिल जाते हैं। वर्तमान में लोकप्रिय फेसबुक, आरकुट, ट्‌विट्‌र जैसी सोशल साइट्‌स भी कुछ इसी प्रकार के मंच जैसा कार्य कर रही हैं। निश्चय ही ये साइट्‌स मुक्त एवं स्वतंत्र विचारों के आदान-प्रदान का एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरी हैं और करोडों-अरबों लोग इन साइट्‌स का लाभ अनेकानेक ढ़ंग से उठा भी रहे हैं। उनमें टाइमपास करने, व्यवासायिक लाभ उठाने आदि से लेकर ज्ञान आदान-प्रदान करने जैसे कार्य भी सम्मिलित हैं।

ज्ञान की महिमा को तो सभी धर्मों ने स्वीकारा है। गीता में कहा गया है - ना हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिहविद्यते। अर्थात्‌ इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निस्संदेह कुछ भी नहीं है। ""ज्ञानदेव तु कैवल्यम्‌। ज्ञान के कारण ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।'' भगवान राम युद्ध में पराजित और मरणासन्न रावण के पास अपने लघु भ्राता लक्ष्मण को ज्ञान प्राप्त करने के लिए भेजते हैं। योग वसिष्ठ में महर्षि वसिष्ठ भगवान राम को कहते हैं - ज्ञानवान्‌ एव सुखवान्‌, ज्ञानवान्‌ एव जीवति। ज्ञानवान्‌ एव बलवान्‌, तस्मात्‌ ज्ञानमयो भव।।

ज्ञान और विचारों के मुक्त आदान-प्रदान की, अभिव्यक्ति की, अपने-अपने विचारों को मानने की स्वतंत्रता तो हमारे यहां प्राचीनकाल से ही है। निराकार के पूजक सिख धर्म के संस्थापक गुरुनानकदेवजी के सुपुत्र श्रीचंदजी साकार के पूजक निकले और प्रसिद्ध उदासीन आश्रम की स्थापना की। महांकाल की पेढ़ी पर बैठक चार्वाक घोषणा करते हैं - यावज्जीवेत्सुखं जीवेत्‌ ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्‌। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ।। उन्हें भी हम ऋषि परंपरा में गिनते हैं और उन्हें भी भक्त प्राप्त हैं तथा उनके विचारों को चार्वाक या लोकायत दर्शन माना जाता है। आद्य शंकराचार्य अद्वैत पर भाष्य करते हैं और मूर्तिपूजकों के लिए मंत्रो की रचना भी करते हैं।

महाराष्ट्र में भी लगभग 138 वर्षों की परंपरावाली वसंत व्याख्यानमाला का आयोजन हर वर्ष होता है। जिसका शुभारंभ प्रसिद्ध समाज सुधारक न्यायाधीश महादेव गोविंद रानडेजी द्वारा किया गया था। जिसे बाद में लोकमान्य तिलकजी ने आगे बढ़ाया। यह व्याख्यानमाला आरंभ करने के पीछे विचार यह था कि विविध प्रकार के व्याख्यान, विविध विषयों पर आयोजित किए जाएं, क्योंकि उस समय समाचार पत्र सरलता से उपलब्ध नहीं होते थे। और यह व्याख्यानमाला ज्ञान प्रदान करने का माध्यम बन सके। अब यह व्याख्यानमाला फेसबुक  और ट्‌विट्‌र पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा चूकी है।

इस प्रकार से विविधता को स्वीकारने और ज्ञान की परंपरा को माननेवाले हम हिंदुस्थानी यदि फेसबुक आदि जैसी सोशल साइट्‌स से बडी संख्या में न जुडते तो ही आश्चर्य होता। परंतु, इस लाभदायी उपक्रम को कुछ लोगो ने अश्लीलता, असभ्यता-अभद्रता, अशालीनता फैलाने का माध्यम बना दिया है। जिस प्रकार से अभद्र, अशालीन टिप्पणियां, अश्लील फोटो फेसबुक पर चस्पा किए जा रहे हैं या कुछ लोगों द्वारा दूसरों के अकाउंट को हैक कर अश्लील व्हिडीओ आदि सामग्रियां लोड की जा रही हैं यह निश्चय ही चिंतनीय एवं आपत्तिजनक, अवैधानिक, स्वतंत्रता का दुरुपयोग करना ही है। इस प्रकार के कृत्यों पर कुछ लोग प्रतिबंध लगाने की बातें कर रहे हैं तो कुछ लोग इसे स्वतंत्रता का हनन समझकर विरोध प्रकट कर रहे हैं। इस संबंध में चिंतक सावरकरजी की यह टिप्पणियां विचारणीय हैं -

1). किसी व्यक्ति का अथवा समाज की केवल मानहानि, केवल उपमर्द या केवल हानि करने की दुष्ट बुद्धि से घृणित या असभ्य भाषा में जो लिखा जाए वही वाड्‌मय ही अनैर्बंधिक (गैर-कानूनी) या अप्रसिद्धेय समझा जाना चाहिए।

 2). ... सत्य जिज्ञासा से या तथ्य प्रतिपादन के उद्देश्य से जिस मत की प्रस्थापना कोई करना चाहता है उसे जहां तक संभव हो सके प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। लेखन अथवा उपदेश की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इसके कारण पवित्रता का विडंबन हो रहा है ऐसा किसी को लगता हो तो उसका यह मत गलत है ऐसा विरुद्ध पक्ष द्वारा साधार प्रतिपादन किया जाना चाहिए; यानी उसके विडंबन की अप्रतिष्ठा हुए बगैर रहेगी नहीं। उसका कहना सत्य अथवा तथ्य ठहरा तो अपन ने भलती ही बात को असत्य अथवा अतथ्य बात को पवित्रता दी थी यह अपने ध्यान में आएगा। सत्य की ओर तथा तथ्य की ओर मनुष्य की  अधिक प्रगति होगी।

 

मंदिर और शौचालय पर खुली बहस हो

मंदिर और शौचालय पर खुली बहस हो


गत दिनों केंद्रिय मंत्री श्रीजयराम रमेश ने मंदिर से अधिक शौचालय आवश्यक हैं से संबंधित बयान क्या दिया देश में कइयों की भवें टेढ़ी हो गई और वे निशाने पर आ गए। वैसे उनका यह बयान तथ्यपूर्ण है परंतु चूंकि यह आस्था से संबंधित है इसलिए इस प्रकार के बयान जरा सावधानीपूर्वक देना चाहिए इस प्रकार की एक टिप्पणी भी एक संपादक द्वारा की गई, जो योग्य भी है। परंतु सत्य तो यह है कि इन तथ्यों को नकारा नहीं जा सकता कि आज विश्व के खुले में शौच जानेवाले 60% लोग हिंदुस्थान में ही बसते हैं, देश की आधी से अधिक आबादी के पास शौचालयों की सुविधा नहीं है। पहले हम शौचालय का अर्थ भी समझ लें- शौचालय एक ऐसी सुविधा है जो मानव के मल-मूत्र की समुचित व्यवस्था के लिए प्रयुक्त किया जाता है या उस युक्ति के लिए भी।


श्री रमेश ने भारतीय रेल को एक बहुत बडे शौचालय का नाम दिया है जो सच ही है। रेलयात्रा के दौरान सुबह-सबेरे यदि आप खिडकी से झांककर देखें तो आपको दर्शन होंगे पटरी किनारे शौच के लिए बैठे लोगों के ही, यही दृश्य बस यात्रा के दौरान भी देखने को मिल जाता है। शहरों में भी खुले स्थानों पर प्रातःकाल में शौच के लिए बैठे लोगों के हाथ में डिब्बा या पानी से भरी बोतल लिए शौच के लिए स्थान तलाशते लोग नजर आ ही जाएंगे।


जरा सोचिए विदेशों से आनेवाले पर्यटकों के सामने हमारी क्या छवि बनती है। कितने गंदे लोग हैं इस देश के जो चाहे जहां गंदगी करते हैं और इसमें भी कोई दो मत हो नहीं सकता कि हम अव्वल दर्जेे के गंदों मेें गिने जा सकते हैं। अब तो मुंबई जो हमारे देश की आर्थिक राजधानी है को दुनिया के सबसे गंदे शहरों में गिना गया है। वस्तुस्थिति तो यह है कि, यदि हम केवल स्वच्छ रहना और स्वच्छता रखना भी सीख जाएं तो मात्र पर्यटन ही हमारे देश में रोजगार का एक बहुत बडा साधन बन सकता है।


परंतु, स्वच्छतागृहों की कमी के चलते यह कैसे संभव है? वैसे इसके लिए हमें सबसे पहले अपनी शौच निवृत्ति संबंधी आदतों को भी बदलना पडेगा। हमारे यहां आज भी खुले में शौच जाने की मानसिकता रखनेवाले लोगों की कमी नहीं। कुछ लोग तो लगता है कि इस समस्या को इतने हल्के से लेते हैं कि वे यह तक कहने से बाज नहीं आते कि लगता है इस देश में सारी समस्याएं हल हो गई हैं और इस देश में एक ही समस्या बची है और वह है शौचालयों की।


यह भी एक कटु सत्य ही है कि घटती जमीनें और उनकी बढ़ती कीमतों ने शहरों में सबसे अधिक कहर मूत्रालयों पर ही ढ़ाया है, जहां उन्हें तोडकर पार्किंग, व्यापार आदि के लिए उपयोग में लाया जाने लगा है। और लगता है कि, इस नेचरल कॉल से निवृत्त होने के लिए शहरों में स्थान ही शेष नहीं रहे हैं। इस कारण लोग चाहे जहां खडे होकर लघुशंका निवृत्त होते रहते हैं परंतु, महिलाएं क्या करें? बाहर से या छोटे गांवों से शहरों में किसी काम के सिलसिले में सुबह आकर शाम को वापिस चले जानेवाला एक बहुत बडा वर्ग जिसे फ्लोटिंग वर्ग भी कहा जा सकता है के सामने भी यही समस्या है। वर्तमान में छोटे शहरों-कस्बों के बसस्टैंड पर भी या तो सुविधा ही नहीं है और यदि है भी तो अति अपर्याप्त वह भी गंदी जिसमें महिलाओं के लिए कोई स्थान ही नहीं मानो महिलाएं यात्रा ही नहीं करती या उन्हें इस सुविधा की आवश्यकता ही नहीं पडती। बस छूट न जाए इसलिए शीघ्रताशीघ्र निवृत्त हो आए कि आपाधापी में दौड लगाते यात्री इन बसस्टैंडों पर दिख पडना आम है। क्या शौचालयों की यह कमी भयावह नहीं है? चीन में तो महिलाओं ने इस कमी के समाधान के लिए ऑक्यूपाय वॉलस्ट्रीट की तर्ज पर ऑक्यूपाय मॅन्स टॉयलेट का आंदोलन ही छेड दिया है यहां इस आंदोलन का उल्लेख केवल इस समस्या की गंभीरता को दर्शाने के लिए ही किया है।


सर्वेक्षणों के अनुसार कई कार्यालयों में महिलाओं के लिए टॉयलेट की अलग से व्यवस्था ही नहीं है, कहीं-कहीं तो टॉयलेट ही नहीं हैं या हैं भी तो स्वच्छता की कमी के कारण कई महिलाएं इनका उपयोग घृणावश या यूरीन इंफेक्शन के डर से करना नहीं चाहती। मुंबई जैसी जगह पर तो कई महिलाएं सुबह घर से निवृत्त हो निकलने के पश्चात शाम को घर लौटकर ही टॉयलेट में जाती हैं। मुंबई ही क्यों अन्य कई शहरों में भी यही समस्या मौजूद है। सार्वजनिक शौचालयों की कमी एवं अस्वच्छता के कारण महिलाओं का एक बडा वर्ग यूरीन इंफेक्शन या अन्य संक्रमणों से पीडित हैं। गांवों की समस्या तो और भी गंभीर होती चली जा रही है बढ़ती आबादी के दबाव से गांव भी अछूते नहीं रहे हैं। पहले गांवों के पास ही झाडियों के झुरमुट हुआ करते थे लेकिन बढ़ती आबादी के कारण अब वे भी ना के बराबर होते चले जा रहे हैं गांव की महिलाएं जब शौच के लिए जाती थी तो वे आड का काम करते थे।


आयुर्वेद में सात वेगों का उल्लेख है जिन्हें रोका नहीं जाना चाहिए उनमें शौच निवृत्ति भी है। शौच निवृत्त होने का सुख चेहरे पर ही झलकता है। क्या आप इस सुख से परिचित नहीं हैं? और जिनके पास इनकी सुविधा नहीं है, जिन्हें सुबह-शाम के प्राकृतिक परदे का सहारा लेना पडता है और तब तक इस आवेग को रोके रखने का कष्ट और इस आवेग से मुक्त होने के प्रयत्नों में झेलने के लिए बाध्य होने की जिल्लत और कष्टों की कल्पना विपरीत मौसम जैसे बाढ़ आदि को दृष्टि में रख कर करें तभी इन शौचालयों की आवश्यकता कितनी अहम्‌ हैऔर लोगों का ध्यान एकदम से इस समस्या की ओर आकर्षित हो इसके लिए श्रीजयराम रमेश द्वारा दिए गए स्फोटक, दिलो-दिमाग को झकझोर देनेवाले बयानों में कुछ आपत्तिजनक नहीं है यह महसूस होगा।


सुप्रीम कोर्ट ने भी इस समस्या पर निर्देश दिए हैं कि छः माह के भीतर सभी स्कूलों में शौचालय की सुविधा प्रदान की जाए, विशेषकर लडकियों के लिए शौचालय बनाए जाएं। केंद्र सरकार ने ही लोकसभा में बतलाया है कि एक लाख से अधिक स्कूलों में शौचालयों की सुविधा नहीं है। सफाई के अभाव में कई जलजनित और शौच संबंधी बीमारियां जन्म लेती हैं, फैलती हैं, जो किसी महामारी से कम नहीं। पूरी दुनिया में इस सुविधा के अभाव में प्रतिवर्ष 40 लाख बच्चे डायरिया जैसी बीमारी से मर जाते हैं।


आपको आश्चर्य होगा कि 20 शताब्दी के आरंभ तक हमारे नेताओं को शौचालय भी कोई समस्या है इसका भान तक न था। यह एक समस्या है इस ओर सबसे पहले यदि किसीने ध्यान आकर्षित किया तो वह थे गांधीजी। गांधीजी कांग्रेस के हर अधिवेशन में सबसे पहले शौचालयों की व्यवस्था की ओर ही ध्यान देते थे कि पानी आदि की समुचित व्यवस्था है कि नहीं! गांधीजी के एक अनुयायी अप्पा पटवर्धन, गांधीजी द्वारा जो असहयोग आंदोलन छेडा गया था उसके पूर्व ही उनके सत्याग्रह आश्रम में रह चूके थे ने ही 1928 में किसानों के लिए शौचकूप का प्रचार सफलता पूर्वक किया था और 1930 में उन्होंने जेल में आगे होकर, मांगकर भंगी काम न केवल स्वयं ने किया था अपितु इसके लिए बारा लोगों को और तैयार भी किया था। गांधीजी स्वयं भी अपना संडास स्वयं स्वच्छ किया करते थे।


देश के प्रधानमंत्री रह चूके चौधरी चरणसिंह ने भी इस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया था परंतु, उनका कार्यकाल बडा ही अल्प रहा। इतने वर्षों से इस समस्या की और ध्यान आकर्षित किए जाने के बावजूद परिस्थिति क्या है तो - यह ऊपर बयान कर ही दी गई है। ऐसी विकट परिस्थितिमें यदि जनता का तत्काल ध्यान आकर्षित हो सके इसके लिए कोई स्फोटक, किसीको भी हिला देनेवाला बयान मंत्री महोदय श्री जयराम रमेश ने दे दिया तो कौनसा पहाड टूट पडा हमारी दृष्टि में तो वे बधाई के पात्र हैं जो निर्मल भारत अभियान के तहत शौचालयों की आवश्यकता पर इतना जोर दे रहे हैं, इसके लिए जोरदार प्रयास भी कर रहे हैं। जिसे आजतक इस देश में किसीने भी नहीं किया अपवाद है तो सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक श्री बिंदेश्वरजी पाठक और उनके स्वयंसेवकों का और यही श्री बिंदेश्वरजी हैं जो अकेले श्री रमेश के समर्थन में आगे आए जबकि उनकी स्वयं की कांग्रेस पार्टी ने भी उनके वक्तव्य से किनारा कर लिया था।


लेकिन चूंकि हमारा देश धर्मप्रधान होने के साथ ही मंदिरों का देश भी है। और हमारी मंदिर इस संकल्पना में जैन मंदिर, सिक्खों का गुरुद्वारा, ईसाइयों का चर्च, मस्जिद तथा अन्य धर्मों-संप्रदायों-पंथों के धर्मस्थल भी समाहित हैं। श्रीरमेश के बयान के मंदिर को भी इसी संदर्भ में देखें तो अधिक योग्य होगा, चूंकि भारत हिंदूबहुल देश है इसलिए स्वाभाविक ही है कि जब कोई उल्लेख होगा तो वह सबसे पहले हिंदुओं से संबंधित ही होगा इसे भी समझना आवश्यक है। अब हम अपने इस मुद्दे पर आते हैं कि हमें शौचालयों के साथ ही मंदिर भी चाहिए लेकिन वह मंदिर कैसे होने चाहिए यही असली मुद्दा है।


वर्तमान में देखें तो मंदिर कहें या धर्मस्थल कहें कुकुरमुत्तों की तरह उगे चले जा रहे हैं। जहां दिखी जगह वहीं बना दिया मंदिर फिर वह गली के नुक्कड हों या फिर कोई मैदान, सडक आदि। कहीं-कहीं तो लोगों के कंपाउंड में ही मौका देखकर धर्मस्थल बना दिए गए हैं। जहां धंधेबाजी के सिवा और कुछ नहीं हो रहा। इन धंधेबाजों ने तो नालों के ऊपर, किन्हीं सार्वजनिक प्रसाधनगृह के पास तक मंदिर बना डाले हैं। इसके लिए एक चबूतरा बनाया एक मूर्ति रखी या सिंदूर पोतकर पत्थर रख दिया और धीरे-धीरे लोगों की अंधश्रद्धा का लाभ उठाकर धीरे से मंदिर बना दियाऔर हो गई चंदे, भंडारे की दुकान चालू।


श्रद्धा की आवश्यकता हर मनुष्य को होती है किसी मंदिर में जाने के बाद मूर्ति के आगे हाथ जोडकर खडे होने से उसे आत्मिक शांति की संतुष्टि प्राप्त होती है, वह एक प्रकार की शक्ति प्राप्त करता है। समस्या का समाधान हो जाएगा का उसे विश्वास प्राप्त होता है। लेकिन इन धंधेबाजों के मंदिर में ये कैसे प्राप्त हो सकती है केवल श्रद्धा का क्षेत्र है इसलिए किसीको भी धर्म के नाम पर कुछ भी करने की अनुमति किस प्रकार से दी जा सकती है। इसके लिए तो चाहिए कि समाज के लोग ही इस प्रकार के धार्मिक स्थलों को प्रोत्साहन ना दें। मंदिरों का स्वरुप क्या हो इसका भी विचार किया जाना चाहिए। किसी चबूतरे पर एक बडा सा पत्थर पोतकर रख देने से वह मंदिर तो नहीं हो सकता।


इसी प्रकार से कहीं-कहीं तो घरों में ही बडे मंदिर बना लिए गए हैं जहां हर सप्ताह भंडारे-प्रसाद वितरण, आरती वह भी जोर-जोर से भले ही आसपास के रहवासियों को कष्ट हो, समय-समय पर होने वाले यज्ञ अखंड पाठ, प्रवचन आदि चलता रहता है वह भी सडकों को घेरकर और आयोजन के पश्चात जो गंदगी होती है उसे या तो सडकों पर ऐसे ही छोड दिया जाता है या ड्रेनेज के हवाले कर दिया जाता है भले ही पूरी ड्रेनेज व्यवस्था चरमरा जाए। कहीं-कहीं तो बीच सडक पर ही मंदिर स्थित हैं या सडक को बाधित कर रहे हैं। इन मंदिरों में से अधिकांश तो अवैध ही होते हैं जिन्हें अतिक्रमण कर ही बनाया जाता है। जब शास्त्रों में कहा गया है कि सबसे बडा पाप भूमि अतिक्रमण है तब इन मंदिरों को मान्यता कैसे दी जा सकती है।


जब विश्वनिर्माण संबंधी तत्त्वज्ञान अस्तित्व में आया, श्रद्धालु आए, श्रद्धा बनी रहे इसके लिए कर्मकांडों की निर्मिती हुई तो यह श्रद्धा सतत बनी रहे इसके लिए कुछ अभिनिवेश भी आए। इसीसे शिल्प, संगीत, चित्रकला, नाटक आदि आए। परंतु आज यह कलाएं जो मंदिर के माध्यम से सुचारु रुप से चला करती थी वह इन तथाकथित मंदिरों में तो कहीं नजर ही नही आती। निश्चय ही ऐसे मंदिरों की क्या आवश्यकता?
कुछ मंदिर जो व्यक्ति विशेष या समाज विशेष द्वारा निर्मित एवं संचालित किए जा रहे हैं वे तो निश्चय ही इस प्रकार की झांकीबाजी, शोभायात्राएं निकालकर समस्याएं पैदा करने की प्रवृत्ति, उत्सवों के नाम पर बेजा फिजूलखर्ची से बाज आ सकते हैं, समाज के लोगों को जागरुक कर इस प्रकार की प्रवृत्तियों पर अंकुश लगा सकते हैं। अपना दृष्टिकोण व्यापक कर समाजहित समाज सुधार की दृष्टि से कदम बढ़ा सकते हैं। परंतु, इस प्रकार के मंदिर और इस प्रकार की प्रवृत्तिवाले भी कुछ कम ही हैं। फिर भी आशा की कुछ किरणें तो हैं ही वैसे ये बढ़े यह भी आशा है।


यदि वर्तमान में उदारीकरण-वैश्विकरण या बाजारवाद कहें की जो लहर चल रही है उसने हर चीज को बाजार का रुप दे दिया है तो मंदिर भी क्यों कर इससे अछूते रह सकते हैं। आज की तारिख में यदि सबसे बडा बाजार किसी का है तो वह मंदिरों का ही है। जरा कल्पना कीजिए देश में कितने गांव है, कितने विभिन्न स्तरों के नगर हैं, महानगर हैं और फिर इनको मद्देनजर रख कितने मंदिर इस देश में हैं और उन मंदिरों में आनेवाले चढ़ावे की कल्पना भी लगे हाथ कर ही लें तो यह आंकडा अरबों-खरबों में जाएगा। कुछ वर्ष पूर्व समाचार पत्रों में छपा था कि अकेले मुंबई में ही सांईबाबा के कितने मंदिर वैध-अवैध हैं और उनमें आनेवाला चढ़ावा किस प्रकार से करोडों का है तो यह मार्केट कितना बडा है इसकी कल्पना सहज ही आ जाएगी। और यह स्मरण रहे कि मंदिर तो ना नफा का क्षेत्र है।


और भारत का यह सबसे बडा सर्वस्पर्शी क्षेत्र नितांत अनियोजित है। और यही मुख्य मुद्दा भी है। इस क्षेत्र में आधुनिक कहा जाए ऐसा व्यवस्थापन ही नहीं है। मुख्यतः जो दान-चढ़ावा आदि आता है वह और सुरक्षा का प्रश्न। सुरक्षा के लिए आपातकालीन व्यवस्था क्या है? श्रद्धालुगण जो पैसा दान के रुप में परमेश्वर के सामने सत्कार्य के लिए देते हैं उसका उपयोग उनकी श्रद्धा का सम्मान रखते हुए उतनी ही पवित्रता से हो रहा है कि नहीं? जब यह आस्था का, पवित्रता का क्षेत्र है तो इस पर समुचित ध्यान देनेवाली, नियंत्रण रखनेवाली मशीनरी कौनसी? यह एक अध्ययन मांगता है। इस मिशनरी की आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि, दान पेटी में दिया हुआ दान, या थाली में रखे पैसे कहां जा रहे है यह पूछने की हिम्मत तो साधारण व्यक्ति जुटा ही नहीं सकता लेकिन यदि कोई अथारिटी हो तो वह कम से कम उसे शिकायत कर अपनी आवाज तो उठा सकेगा। जैसे बैंक या इंश्योरेंस सेक्टर में लोकपाल जिन्हें शिकायत कर आप न्याय मांग सकते हैं उसी प्रकार से इस क्षेत्र में कोई हो क्या ऐसा आपको भी नहीं लगता। यदि ऐसा कोई पूछनेवाला होगा तो इस क्षेत्र में आनेवाले को भी यह तय करना पडेगा कि वह 'फीलगुड" के लिए आ रहा है कि श्रद्धावश श्रद्धालुओं को लाभ पहुंचा सके इसलिए आ रहा है।


आज जब हम वैश्वीकरण के दौर से गुजर रहे हैं तब इस व्यवस्था को पुरातन स्थिति में कैसे छोडा जा सकता है। पुराने जमाने में मंदिरों की व्यवस्था राजे-रजवाडे, उनके सरदार आदि करते थे और जो भी कार्य संपादन होता था वह परंपरागत रुप से होता था वैसे तो 1860 से लेकर आज तक मंदिरों के लिए ट्रस्ट पंजीकरण, उसकी व्यवस्था, मिलनेवाले चढ़ावे का विनियोग आदि के लिए कानून उपलब्ध हैं। परंतु, इस क्षेत्र में भी आधुनिक प्रबंधन की, टेक्नालॉजी की आवश्यकता है यह सोच भी तो होना चाहिए जो जरा कुछ कम ही है।


आज के इस नए दौर में जब नियामकों का महत्व बढ़ता चला जा रहा है और जिस क्षेत्र में नियामक नहीं है वहां कितनी गडबड है यह जगजाहिर है उदाहरणार्थ रीयल्टी सेक्टर को ही लिया जा सकता है जहां नियामक की मांग एक लंबे समय से की जा रही है और अब सरकार भी इस पर शीघ्र ही कारवाई करने जा रही है। एक और उदाहरण है टेलीकॉम सेक्टर का जहां नियामक ट्राय को जब अधिकार कम थे तो हमें किन समस्याओं का सामना करना पडा और जब अधिकार मिले तो परिस्थितियां कैसे बदल गई यह सबके सामने ही है। तो धर्मस्थलों के क्षेत्र में व्याप्त गडबडियों को रोकने के लिए भी नियामक क्यों नहीं होना चाहिए?


यदि आस्था के इस क्षेत्र में अनियोजन, कुप्रबंधन कहें या अव्यवस्थापन के कारण मची गडबडी जिसे भ्रष्ट आचरण भी कहा जा सकता है को दूर करना है तो क्यों ना इस क्षेत्र में भी कोई नियामक हो। जो श्रद्धालुओं के हितों की, भावनाओं की कदर करे, उसकी क्या आवश्यकता है, उसे किस दर्जे की सेवा प्रदान की जाए, आदि का ध्यान रखे, उसकी शिकायतों की सुनवाई करे। जिस स्थान का प्रबंधन ग्राहकाभिमुख होता है, जहां महिलाओं, बच्चों, वृद्धों के साथ आदर का, सहयोगात्मक व्यवहार होता है क्या वहां प्रसन्नता प्राप्त नहीं होती। क्या मुजोर प्रबंधन किसीको आनंद दे सकता है। दिल पर हाथ रखकर कहिए कि ऊपर वर्णित अव्यवस्थित मंदिरों में क्या आप आत्मिक शांति पाते हैं, तो क्यों नहीं व्यापक चर्चा इस बात पर भी आयोजित की जाए कि उस नियामक का रुप किस प्रकार का होगा, उसके नियंत्रण मंडल में प्रतिनिधि के रुप में सरकारी, गैर-सरकारी, धर्माचार्य, समाजसेवी आदि कौन लोग होंगे, कितने सदस्य होंगे, उनकी योग्यता आदि। क्योंकि, मंदिर में आनेवाले श्रद्धालुओं में सभी वर्गों के लोग, खिलाडी, व्यापारी, उद्योगपति, सरकारी-निजी क्षेत्र के लोग आदि आते हैं।