Thursday, 19 November 2015

टीपू सुलतान का मूल्यांकन हो

टीपू सुलतान का मूल्यांकन हो

सन्‌ 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुगल साम्राज्य रसातल को जाने लगा और धीरे-धीरे तीन शक्तियों का उदय हो गया। मराठा, सिक्ख और ब्रिटिश, इनमें मराठे सबसे प्रबल थे। 1757 में प्लासी की लडाई जीतकर अंग्रेजों ने अपनी रणनीति सफल कर दिखाई थी। मुसलमानों का एकमात्र ध्येय इस्लाम था और इसीको सामने रख शाहवलीउल्लाह ने अफगानिस्तान के अमीर अहमदशाह अब्दाली को हिंदुस्थान पर आक्रमण के लिए निमंत्रित किया था। 1761 में अब्दाली आया और पानीपत के युद्ध में मराठों को करारी हार का सामना करना पडा। प्लासी की लडाई का स्पष्ट परिणाम 1764 में बक्सर की लडाई जो मुख्यतः अयोध्या के नवाब और ब्रिटिशों में हुई थी के बाद नजर आया। ब्रिटिशों का आधार अधिक ही विस्तृत हो गया और स्पष्ट हो गया कि मराठे नहीं अंग्रेज ही भारत के अधिपति बनेंगे। 1803 में मराठे भी अंग्रेजों से पराजित हो गए और दिल्ली का बादशाह अंग्रेजों की कठपुतली बनकर रह गया साथ ही अब मुस्लिमों के शत्रु क्रमांक एक अंगे्रज हो गए।

इस प्रकार से जब उत्तर भारत के मुसलमान ब्रिटिश विरोधी भावना से आंदोलित हो रहे थे। दक्षिण में ब्रिटिश सत्ता को आव्हान देने के लिए धर्मवीर टीपू सुलतान (1740-99) का 1782 में उदय हुआ और ब्रिटिशों से लडते हुए वह शहीद हुआ। उसकी कब्र पर लिखा हुआ है 'टीपू सुलतान ने पवित्र जिहाद किया और अल्लाह ने उसे शहीद का दर्जा प्रदान किया।" अब प्रश्न यह उठता है कि वह ब्रिटिशों के विरुद्ध क्यों लड रहा था? और ब्रिटिशों को निकाल बाहर करने के बाद कौनसा राज्य लानेवाला था? टीपू कोे अंगे्रजों के साथ मराठों और धर्मबंधु निजाम से भी लडना पडा था और निजाम ने कई बार गैरमुस्लिम सत्ताओं से गठबंधन भी किया था इस कारण इस संघर्ष में धर्म का कोई संबंध नहीं था यह दिशाभ्रम होने की संभावना है इसलिए इस संघर्ष में निजाम के संबंध में टीपू की भूमिका क्या थी यह उसने निजाम को भेजे पत्र में स्पष्ट होती है।

निजाम को भेजे एक पत्र में टीपू इस्लामी बंधुभाव का आवाहन करते हुए लिखता है कि ''ब्रिटिश अपने को भुलावे में रखकर एकत्र आने नहीं दे रहे हैं। अगर अपन दोनो एकत्रित आ गए तो अपने पर हमला करने का साहस मराठे कभी भी नहीं जुटा सकेंगे।"" इस प्रकार की एकता के लिए उसने निजाम से पूर्व में जीता प्रदेश उसे वापिस देने का प्रस्ताव रखा और निजाम के खानदान से विवाह संबंध करने की तैयारी दिखलाई परंतु, निजाम तैयार नहीं हुआ। टीपू ने दिल्ली दरबार के एक निकटस्थ व्यक्ति को पत्र लिखकर विनती की कि, वह निजाम से आग्रह करे कि इस्लाम के उत्कर्ष के लिए अपन एकजुट हों। धर्म के प्रमुख होने के कारण पैगंबर के धर्म को प्रोत्साहित करना हमारे लिए बंधनकारक है। निजाम के दामाद और अधौनी के सूबेदार महाबतजंग को लिखा था कि ''निजाम काफिरों (मराठों) के पक्ष में है यह अनुचित है।""

इसी इस्लामी ध्येय को सामने रखकर उसने दिल्ली के बादशाह शाहआलम को लिखा था कि, ''यह इस्लाम का नम्र सेवक वर्तमान में ईसाइयों (यहां टीपू ने 'ब्रिटिश" या 'अंग्रेज" न कहते भान रखकर 'ईसाई" कहा है) का विद्रोह कुचल डालने के काम में लगा हुआ है ... अल्लाह पर श्रद्धा रखकर इस्लाम का यह सेवक गैरइस्लामी शक्तियों के विरुद्ध लडाई लडकर उन्हें नष्ट करने का विचार कर रहा है।"" मुगल दरबार के एक उच्च पदस्थ व्यक्ति मुहम्मद बेग को उसने लिखा था कि, ''तुम्हें यह निश्चित रुप से ज्ञात ही होगा कि, इस तुम्हारे मित्र ने भ्रष्ट ईसाइयों को किस प्रकार से कुचल डाला है। वर्तमान में मैं ऐसे कुछ मुस्लिम राज्यकर्ताओं का विद्रोह कुचलने में लगा हूं कि जो इस्लाम के विरुद्ध ईसाइयों की ओर से हो गए हैं। इस संदर्भ में मैंने पूरे देशभर में हस्तपत्रक बांटे हैं जिनमें इस्लामसंबंधी कर्तव्य और पैगंबर की हदीसें (उक्तियां और कृतियां) समाविष्ट की हुई हैं। उसकी एक प्रति तुम्हें भेज रहा हूं। इस्लाम की रक्षा और उत्कर्ष के लिए अपन सब लोगों को एकत्रित आने की और पूरी ताकत से ईसाइयों के आक्रमण को आव्हान देने की नितांत आवश्यकता है ... अभी भी यदि सभी मुस्लिम एकत्र आ जाएं तो इस्लाम का गतवैभव प्राप्त होना संभव है।""

परंतु, भारत के सभी मुसलमानों को एकत्रित न कर सकने के कारण उसने सैद्धांतिक रुप से विश्व के सारे मुस्लिमों के राजनैतिक और धार्मिक प्रमुख तुर्कस्तान के विश्व के खलीफा सलीम से सैनिक सहायता लेना तय किया। जिस प्रकार से विश्व के सारे मुस्लिम राजा अपने राजापद को कानूनी मान्यता मिले इसलिए खलीफा से मान्यतादर्शक राजवस्त्र मंगाते थे वैसे ही वस्त्र पाने के लिए उसने 1776 में 900 लोगों के एक शिष्टमंडल के साथ दसलाख रुपये और हीरेजवाहरात, चार हाथी की भेंट के साथ ही एक पत्र भी उनके साथ भेजकर उसमें लिखा था ः ''इस देश में ईसाइयो से हमारी लडाई चल रही है। इस सर्वोच्च काम में हम आपकी सहायता मांग रहे हैं।"" शत्रुओं को कुचलने और इस्लामी मूल्य कायम रखने के लिए चल रहे प्रयत्नों में आप सहायता करें। ैआगे वैश्विक इस्लाम की चिंता करते हुए उपाय के रुप में लिखा ः ''ब्रिटिशों की कारवाइयों के विरुद्ध भारतीय मुस्लिमों की ओर से संघर्ष करना मेरा कर्तव्य ही है, परंतु मुझे लगता है कि, सारे इस्लामी विश्व के लिए जिहाद अतिअनिवार्य हो गया है। हमारा ध्येय इस्लाम के श्रेष्ठत्व को ऊंचा रखना ही है, केवल हमारे देश की रक्षा करना ही नहीं!"" ... अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण खलीफा  अपने धर्मबंधु का प्रस्ताव स्वीकार न कर सका परंतु उसने राजवस्त्र और उसके नाम से खुत्बा पढ़ने और सिक्का ढ़ालने का अधिकार अवश्य दे दिया। मुगल बादशाहों ने कभी भी ऐसे वस्त्र नहीं मंगाए थे वे स्वयं को ही सम्राट समझते थे इस प्रकार टीपू का दर्जा धार्मिक दृष्टि से मुगल बादशाह से ऊंचा हो गया। 

खलीफा से भले ही सहायता नहीं मिली परंतु फिर भी उसने अफगानिस्तान के अमीर जमानशाह को पत्र लिखा ः ''हम हमेशा ही प्रार्थना करते हैं कि धर्म के आधार पर (विश्व के) सभी मुस्लिम राज्यकर्ताओं में सामंजस्य और एकता निर्मित हो। वर्तमान में हम बडी विकट स्थिति में हैं। इस्लाम विरोधी शक्ति हमारे विरोध में लडने की तैयारी कर रही है अतः हम आपके पास (सैनिकी) सहायता के लिए तरस खाने की विनती कर रहे हैं। हमें आशा है कि आप इस धर्मयुद्ध में हमारी सहायता करेंगे।"" उसने 20000 घुडसवारों की मांग की थी। जमानशाह ने उत्तर दिया ''इस्लाम विरोधी शक्ति इस्लामी साम्राज्य नष्ट करने की तैयारी में होने के कारण हम तुम्हें अपना समर्थन जाहीर करते हैं। तुम्हारा देश मूर्तिपूजा और इस्लाम बाह्य बातों से शुद्ध करने के लिए हम प्रचंड सेना लेकर तुम्हारी सहायता के लिए आ रहे हैं।"" वह 33000 की फौज लेकर निकला लेकिन अंग्रेजों द्वारा ईरान के सम्राट को दिशाभ्रम कर अफगानिस्तान पर हमले के लिए उद्युक्त कर दिए जाने के कारण भारत की सरहद तक पहुंच चुके अमीर को वापिस लौटना पडा। इसके बाद टीपू ने ईरान के सम्राट को भी पत्र लिखा परंतु ईरान युद्धजन्य परिस्थितियों के कारण कुछ न कर सका।

इस प्रकार तीनों बडी मुस्लिम साम्राज्य की शक्तियां जिहाद के लिए टीपू के काम न आ सकी। 1786 में टीपू ने एक राजाज्ञा निकालकर ब्रिटिश प्रांतों के मुस्लिमों को अपने इस्लामी राज्य में आकर स्थायी होने का आवाहन किया था। इसमें कहा गया था ः ''मुस्लिमों को श्रद्धाहीनों के देश से निकल जाना चाहिए (यह हिजरत का सिद्धांत है) और जब तक (टीपू) सुलतान वहां के बदमाश श्रद्धाहीनों को इस्लाम में ले नहीं आएगा अथवा उन्हें जजिया देने के लिए बाध्य नहीं कर देगा तब तक देश के बाहर ही रुकना चाहिए ... हमारा हेतु श्रद्धाहीनों के विरुद्ध जिहाद करना है।"" मुसलमानों में जिहाद की प्रेरणा निर्मित करने के लिए उसने एक पुस्तक प्रकाशित की थी 'फतह उल मुजाहिदीन" (धर्मयोद्धाओं की विजय) उसमें स्पष्ट किया था कि इस्लाम की विजय के लिए आक्रमक श्रद्धाहीनों के विरुद्ध जिहाद करना ही सच्चा इस्लाम है। 

वह विशुद्ध इस्लाम का कट्टर समर्थक था। शाह वली उल्लाह के विचारों का उस पर बडा प्रभाव था। ""अनेक शताब्दियों से हिंदुओं के सान्निध्य के कारण अनेक प्रकार की इस्लाम बाह्य विधियां एवं प्रथाएं घुस गई थी, धर्म में अनेक नई बातें आ गई थी, इन सबसे मुसलमानों को मुक्त करना उसका ध्येय था।"" ''वह इस्लाम के राजनैतिक वर्चस्व के लिए लड रहा था।"" ''उसे इस्लामी राज्य चाहिए था।"" ''विश्व में इस्लाम किस प्रकार वर्चस्वशाली बनेगा इसीकी उसे चिंता लगी रहती थी।"" संक्षेप में कहें तो शाहवलीउल्लाह को जिस प्रकार का खलीफा चाहिए था वैसा ही वह था।

टीपू की प्रशंसा भारत की स्वतंत्रता का योद्धा के रुप में की जाती है। क्योंकि, वह अंग्रेजों के विरुद्ध लडा था। अब यहां कुछ प्रश्न उपस्थित होते हैं। वास्तव में टीपू को यदि सचमुच अंगे्रजों को निकाल बाहर करना था, उनके वर्चस्व से देश को मुक्त कराना था तो वह हिंदुओं के विरुद्ध शस्त्र उठाता ही नहीं। वह क्या चाहता था उसकी विशिष्टता ऊपर बयान की ही जा चूकी है। ब्रिटिशों को निकाल बाहर करना इतनी ही बात स्वतंत्रता का योद्धा होने के लिए पर्याप्त है क्या? हां, ब्रिटिशों की बजाए मुस्लिमों का इस्लामी राज्य भारत में आ जाता तो मुस्लिमों की दृष्टि से स्वतंत्रता होती परंतु, हिंदुओं की दृष्टि से क्या होती? दूसरी महत्वपूर्ण बात- स्वतंत्रता की लडाई कब शुरु हुई यह समझें? उसका उत्तर एक ही है ः स्वतंत्रता गंवाने के बाद। टीपू अंग्रेजों के विरुद्ध लडा, परंतु टीपू मरने तक स्वतंत्र ही था। उसने अंगे्रजों से फौजें तैनात करने का समझौता नहीं किया था। निजाम ने सन्‌ 1800 में और दूसरे बाजीराव पेशवा ने वसई समझौते के द्वारा 1802 में अपनी स्वतंत्रता गंवाई। इस कारण हैदराबाद की स्वतंत्रता की लडाई की शुरुआत 1800 से और पश्चिम महाराष्ट्र की सन्‌ 1802 से समझना चाहिए। टीपू के पिता हैदरअली ने राज्य स्थापित किया और अंगे्रज-मराठा युद्ध में मराठों से सहयोग कर हैदरअली लडा। परंतु, अंग्रेज-मराठा युद्ध को कोई स्वतंत्रता की लडाई नहीं कहता। क्योंकि, मराठे क्या और हैदरअली क्या दोनो ही स्वतंत्र थे, अंग्रेजों के अधीन नहीं थे। उनकी लडाई को स्वतंत्रता की लडाई भला कैसे कहा जा सकता है? ठीक इसी प्रकार से टीपू स्वतंत्र के रुप मेंं लडा और स्वतंत्र रहते ही मरा, यह प्रशंसनीय है परंतु वह स्वतंत्रता संग्राम का योद्धा नहीं।

टीपू का चरित्रकार किरमानी ने टीपू के चरित्र में उसकी कट्टर इस्लामी निष्ठा और अन्य धर्मों के संबंध में घृणा का वर्णन किया हुआ है। 'अन्य धर्मियों के संबंध में टीपू को अत्यंत नापसंदगी थी प्रत्युत तिरस्कार ही था, ऐसा कहें तो भी चलेगा।" वास्तव में देखें तो टीपू के राज्य का आधार ही अस्थिर था। मराठों का राज्य जिन अर्थों से राष्ट्रीय कह सकते हैं वैसा टीपू का नहीं था। राष्ट्रीय इन अर्थों में कि मराठों की सत्ता की जडें मूल समाज में थी, वैसी टीपू की नहीं थी। बहुसंख्य समाज उसकी सत्ता से कभी भी एकरुप हो नहीं पाया और वह एकरुप हो इसके लिए टीपू ने प्रयत्न भी नहीं किए। हैदर ने परिस्थितियों का फायदा उठाकर अपनी ताकत बढ़ाई थी परंतु स्थानीय जागीरदार, नवाब उसके राज्य में असंतुष्टों के रुप में बचे ही रहे थे और विदेशी धर्मबंधुओं पर दारोमदार रखनेवाला टीपू उनका समावेश अपनी सत्ता में कर न सका और मौका मिलते ही वे अंग्रेज, मराठा और निजाम से जा मिले। 

टीपू ने एकनिष्ठ ऐसा एक सुरक्षा पथक बनाने के लिए खालिस मुसलमानों को भर्ती करना प्रारंभ किया। अपने पथक के बारे में वह बोलता था 'दर जुंभराए सा गम न बाशद" (मेरे हुजुरात में शोक नहीं) परंतु अर्थ कुछ ओर ही निकलता था। गम का 'ग" यानी हुजरात में गेर (परदेशी) नहीं चाहिए। 'म" यानी मोगल; मराठा, 'न" मतलब नवायत यानी कोकणी मुसलमान, 'ब" यानी ब्राह्मण, 'अ" यानी अफगान, 'श" यानी शिया और 'द" यानी मेदवी पठान नहीं चाहिए। उसने केवल शेख और सय्यदों को ही लिया इस कारण सेना में असंतोष फैल गया। परिणाम वही हुआ जो होना चाहिए। अंत में टीपू अंगे्रजों के हाथों मारा गया परंतु अंग्रेजों के हाथों मारे जाने के कारण उसके आस-पास हुतात्मा होने का वलय निर्मित हो गया। इकबाल ने टीपू के संबंध में कहा है ः 'धर्म और पाखंड (दीन और काफिर) के प्रचंड संघर्ष में हमारे तरकश का आखिरी तीर टीपू था।" सूज्ञ इस पर से टीपू का मूल्यांकन स्वयं ही करें। अंत में 'तमस" सीरियाल का यह वाक्य उद्‌धृत कर रहा हूं - 'जो इतिहास भूलते हैं, उनके माथे पर पुनः वैसा ही इतिहास लिखा जाता है।" 

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