Saturday, 24 October 2015

अत्यंत प्राचीन है भारत में गुप्तचर विज्ञान

अत्यंत प्राचीन है भारत में गुप्तचर विज्ञान

गुप्तचर व्यवस्था के संबंध में विश्व प्रसिद्ध सेनानायक नेपोलियन बोनापार्ट का कहना था कि ठीक स्थान पर एक गुप्तचर बीस हजार सैनिकों के बराबर होता है। यह उल्लेख इसलिए कि वर्तमान में प्रत्येक राष्ट्र सैनिक शक्ति के समान ही गुप्तचर व्यवस्था को भी उतना ही महत्व दे रहा है। संसार की सभी प्राचीन सभ्यताओं में गुप्तचरी का उल्लेख मिलता है। गुप्तचर व्यवस्था के महत्व को हमारे पूर्वजों ने भी समझा था। संसार की अन्य सभ्यताओं में जहां गुप्तचरी का प्रयोग मात्र राजा के हित संवर्धन और रक्षार्थ किए जाने के निर्देश मिलते हैं वहीं भारत के सभी ग्रंथों में प्रजा के हित संवर्धन को महत्व दिए जाने के निर्देश हैं। भारत के सभी प्राचीन ग्रंथों ऋगवेद, अथर्ववेद, मनु स्मृति से लेकर पुराणों तक में इस व्यवस्था के संंबंध में प्रत्यक्ष या परोक्ष वर्णन मिलते हैं। रामायण और महाभारत में भी गुप्तचर व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। हरिवंश पुराण में 'बाणासुर प्रसंग" में एक उल्लेख मिलता है, जिसमें लिखा गया है कि अनिरुद्ध जब गुप्त रुप से बाणासुर की कन्या के महल में पहुंचे और उषा-अनिरुद्ध मिलन हो गया तो,बाणासुर के महल में कार्यरत गुप्तचरों ने उसे उक्त घटना को बतला दिया। 

रामायण काल में अत्यंत उच्च कोटी की गुप्तचर व्यवस्था थी। राम और रावण की गुप्तचर व्यवस्था में भी बहुत अंतर था। जहां राम के गुप्तचर विद्वान और नीति का अनुसरण करनेवाले होकर सदाचारी और शालीन व्यवहारवाले थे, वहीं रावण के दूत कपटी और मायावी होकर धोखेबाज भी थे। रामायण में गुप्तचरी के दो उद्देश्य बतलाए गए हैं। 1. आत्मरक्षा, 2. राष्ट्र रक्षा। इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए राजा को चाहिए कि वह अपने गुप्तचरों द्वारा सतत न केवल शत्रुओं के भेद मालूम करता रहे अपितु अपने कर्मचारियों से भी सावधान रहे। जो राजा इनका पालन नहीं करेगा निश्चित रुप से एक दिन वह स्वयं नष्ट हो जाएगा। मनु ने चर-व्यवस्था का उल्लेख करते हुए इसे 'रक्षाधिकृत" (पुलिस) के अंतर्गत बताते हुए दो भागों में बांटा है। प्रथम अपराध अनुसंधान विभाग दूसरा सामान्य पुलिस विभाग। इससे यह पता चलता है कि यह कहना कि अपराध विज्ञान आधुनिक विज्ञानों में सबसे नया विज्ञान है असत्य है। प्राचीन काल में अपराध अनुसंधान किस प्रकार किया जाता था इस संबंध में कई कथाएं मिलती हैं। 
इसी प्रकार जासूसी में आजकल महिलाओं का प्रयोग अत्यंत व्यापक हो गया है पर वह भी नया नहीं है। प्राचीन भारत में स्त्रियों का प्रयोग गुप्तचरी के लिए किया जाता था। अपराधियों को पकडने के लिए वेश्याओं का प्रयोग किया जबकि सुंदर एवं संचारिकाओं को शत्रु पक्ष में भेजा जाता था। जो राजपरिवार के सदस्यों को अपने रुप जाल में फांस ठिकाने लगाने के काम आती थी। विषकन्याओं का उपयोग राजाओं व राजपुरुषों  की हत्या के लिए किया जाता था। इसके अतिरिक्त राज्य के अंदर ही आम जनता के बीच गुप्तचरी के लिए गुप्तचर सुंदरियां सार्वजनिक भोजनालयों और मदिरालयों में भी कार्य करती थी।

हम पुनः चर (चरकार्य यानी गुप्तचरी) व्यवस्था पर आते हैं। अपराध अनुसंधान विभाग के कर्मचारी साधारण वेशभूषा में रहते थे और अत्यंत गुप्त रुप से विभिन्न प्रकार के अपराधियों की जांच करते थे। विभिन्न क्षेत्रों के लिए विभिन्न उप-विभाग हुआ करते थे। कौटिल्य चाणक्य ने भी कहा है कि भिन्न-भिन्न कार्यक्षेत्रों के लिए भिन्न-भिन्न चर विभाग होने चाहिएं।

मनु ने राजा के लिए निर्देश दिए थे कि, राजा रोज अपने गुप्तचरों के साथ बैठक करा करे व आवश्यक सूचनाएं प्राप्त करे और इस आधार पर अपने वरिष्ठ चरों के साथ विचार-विमर्श करे। गुप्तचरों की भर्ती अत्यंत सतर्कतापूर्वक करे तथा सत्यनिष्ठ, होशियार, बुद्धिमान विश्वासपात्र लोगों को ही नियुक्त करे। चाणक्य ने भी कहा है कि राजा एक गुप्तचर पर विश्वास न करे वरन्‌ भिन्न-भिन्न तीन गुप्तचरों द्वारा सूचना की पुष्टि हो जाने पर ही विश्वास करे। गुप्तचरों को पर्याप्त वेतन दिया जाना चाहिए जिससे कि वह परिवार की ओर से निश्ंिचत हो कार्य कर सके। गलत सूचना देने पर चर को दंडित करना चाहिए।

भारत में गुप्तचरी का सर्वप्रथम संकेत ऋगवेद में मिलता है। अथर्ववेद में भी ऐसे अनेक संकेत हैं। अथर्ववेद में वरुण को सहस्त्रनेत्र कहा गया है। अर्थात्‌ वरुण के सहस्त्रों (हजारों) गुप्तचर। गुप्तचर ही राजा के नेत्र होते हैं। उन्हीं के माध्यम से राजा पूरे समाज-प्रजा की सभी सूचनाएं प्राप्त कर उनका ध्यान रख सकता है। शत्रुओं और अपराधियों के बारे में सूचनाएं पाकर उचित न्याय कर सकता है। वेदों में गुप्तचारिणी सभा का भी उल्लेख है जो दस्युओं से संबंधित सूचनाएं देने का कार्य करती थी। स्त्री गुप्तचरों की परंपरा वैदिक काल में ही आरंभ हो गई थी। ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिए आनेवाली अप्सराएं गुप्तचर नारियां ही तो थी।

Tuesday, 13 October 2015

दुर्गापूजोत्सव की परंपरा - इतिहास के झरोखे से

दुर्गापूजोत्सव की परंपरा - इतिहास के झरोखे से

सर्वत्र देवी दुर्गा 'शक्ति" का प्रतीक है। बंगाली मनुष्य के लिए तो दुर्गा मानो उनकी मॉं ही है। 'आमार मा" कहकर वे देवी दुर्गा के चरणों पर अपना मस्तक बडी श्रद्धा के साथ रखते समय भावविव्हल हो जाते हैं। स्वतंत्रता की लडाई के समय क्रांतिकारियों को इसी मॉं में भारत का दर्शन होता था। बंगालियों के भावविश्व में दुर्गा पूजा को जो अनन्य महत्व प्राप्त है उसकी पूर्वपीठिका के संबंध में अधिकतर लोग अपरिचित हैं उसीका यह थोडासा सिंहावलोकन है।


दुर्गापूजाोत्सव की परंपरा बडी मनोरंजक व कुछ अनपेक्षित भी है। बंगाली साहित्य में पहला उल्लेख पंद्रहवी शताब्दी के कृतिवास  के रामायण का संभवतः है। रावण को मारने के सभी प्रयत्न निष्फल होने पर राम ने यह आराधना की। देवी को जगाने के लिए राम ने 'अकालबोधन" (असमय जगाना) किया। यह संज्ञा आज भी प्रचलित है। इसका काल अश्विन शुद्ध षष्ठी से दशमी तक का कहा जाता है। दुर्गा के वर के पश्चात ही राम ने रावण को मारा। बंगाल में होनेवाली पूजा राम द्वारा की गई पूजा के समान ही होती है। कोलकाता में कुछ स्थानों पर यह पूजा और भी पंद्रह दिनों तक चलती है और उसका उद्यापन दीवाली की अमावस्या को होता है।
लगभग 200 वर्षों तक पूजा घर-घर में अपने सामर्थ्यानुसार की जाती रही और वह भी मूर्ती की न होकर घट या श्रीशालिग्राम शिला की। उत्सव का आडबंर अचूक किस समय आरंभ हुआ यह कहना जरा कठिन ही है। फिर भी नवद्वीप के राजा कृष्णचंद्र राय (1710-82) के काल में पहला ज्ञात महोत्सव संपन्न हुआ। 1757 में प्लासी की विजय के पश्चात कृष्णचंद्र ने लॉर्ड क्लाइव्ह को सूचित किया कि धूमधडाके से दुर्गा पूजा की जाए। उस जमाने में एक म्लेच्छ के हाथों पूजा होना असंभव ही था इसलिए राजा ने क्लाइव्ह की ओर से पूजा की। उस समय कुल खर्च 16 हजार आया था। ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से 12 हजार दिए गए थे। क्लाइव्ह ने पूरा समारंभ हाथी पर बैठकर देखा था। बहुत बडे भोज का आयोजन हुआ श्रीलंका और ब्रह्मदेश (म्यंमार) से नर्तकियां बुलवाई गई थी। संपन्नता का यह प्रदर्शन आगे भी बरसों तक जारी रहा।

सन्‌ 1956 में कर व्यवस्था पक्की हो गई इसीमें से जमीनदारों-मालगुजारों का एक नया संपन्न वर्ग अस्तित्व में आया। बाडिशा के सावर्ण राय चौधरी ने मात्र 1300 रुपये में पेशगी देकर लिए हुए तीन गांव बढ़ते-बढ़ते कोलकाता महानगर में तब्दील हो गए। कंपनी का कुसुम सौरभ चारों ओर महकने लगा। पारसी, अफगानी, हब्शी, रुसी आदि भी आने लगे। कोलकाता ने पैसे के पेड का रुप धारण कर लिया। सारा पांडित्य और हुनर यहां एकत्रित होने लगा। विलायत में यह कहावत प्रचलन में आ गई - 'गोइंग टू कोलकाता टू शेक द पगोडा ट्री"। अर्थात्‌ जिसमें दम है वह यहां आए और पैसा बनाए। इन सारे नवधनाढ्‌य लोगों ने दुर्गापूजा बडे पैमाने पर मनाना आरंभ कर दिया।

19 वी शताब्दी के प्रारंभ में कोलकाता की पूजा के वर्णन विस्तारपूर्वक अंग्रेजी समाचार पत्र छापने लगे और विलायत के समाचार पत्र भी उसी रौं में बहकर कुछ अद्‌भुत पढ़ने के लिए मिलेगा इसलिए छापने लगे। 1819 के 'कोलकाता जर्नल" के अंक में यह छपा था कि निकी नाम की गोरांगी जो कि उस जमाने की सबसे महंगी नर्तकी थी का नाच होगा। राजा रामचंद्र के घर की इस पूजा उत्सव की तुलना अरेबियन नाइट्‌स के शाही वातावरण से की गई थी। 1829 में लॉर्ड बैंटिक पत्नी सहित एक उत्सव में पधारे थे। उनका स्वागत 'गॉड सेव द किंग" के गान से किया गया था। (इसी वर्ष बैंटिक ने सती प्रथा बंद की थी) जमीनदार अपनी पूजा की ओर लोग आकर्षित हों इसलिए विज्ञापन दिया करते थे। जिसमें यह बतलाया जाता था कि फलां-फलां नर्तकी का नाच रखा गया है। पंचमी की सुबह से उत्सव शुरु होकर चारों ओर  हलचल मच जाती थी। हलवाइयों और फूल बेचनेवालों की परेशानी बढ़ जाती थी। जमीनदारों में स्पर्धा मच जाती थी। भोजन के लिए लगनेवाले केले के पत्ते बेचनेवाले, हमाल, भोइयों के भाव बढ़ जाते। ढ़ोल-ताशे बजानेवाले चौराहों पर ढ़ोल बजाते खडे हो जाते। उन्हें चार दिनों के लिए ठेके पर ले लिया जाता। रात-रात भर नाचना-गाना, भोज चलते। मैदानों में नाटक आदि चलते, खेल चलते, आतिशबाजी होती। दशमी को विसर्जन होता और बाद में स्नेह मिलन होता।

आगे चलकर नदिया, वर्धमान, नाटोर, शोभा बाजार के प्रसिद्ध उत्सवों की धूम कम होने लगी। 'ऊंची दुकान फीका पकवान"  वाली स्थिति जमीनदारों की हो जाने के कारण उत्सवों की बहार ढ़लान पर आ गई। जमीनदारों के आश्रितों और बेकार लोगों की भीड जिनको इस मौज-मजे की आदत पड गई थी उन्होंने चुप न बैठते सार्वजनिक आयोजन किए जाएं का हल निकाला। गुप्तीपाडा के बारह प्रतिष्ठों ने एकत्रित होकर चंदा कर यह पूजा प्रारंभ की इसलिए लोग इसे 'बारोवारी पूजा" कहने लगे। बारोवारी का यह उन्माद बहुत शीघ्र ही फैल गया। आज भी सार्वजनिक इस अर्थ से यह बारोवारी शब्द रुढ़ है।

मुहल्लावार केंद्र बन गए। चंदा वसूली चालू हो गई। नौबत यहां तक आ गई कि भद्र महिलाओं तक को रोककर इच्छित चंदा मांगा जाने लगा। चंदेबाजों की वाहियात बातों से बचने के लिए पैसे ना होने पर महिलाएं अपने गहने तक उन्हें सौंपने लगी। आपस में झगडे भी होने लगे। वैष्णवों और शाक्तों का बलि पर से झगडा होने लगा। विवाद हिंदुओ का और मध्यस्थता साहब बहादुर की। उसने फैसला दिया कि वैष्णव पहले पूजा करें फिर शाक्त करें। आज जिस प्रकार से ऊंची से ऊंची प्रतिमाओंें की और अवैध वसूली की होड मचती है वैसी उस जमाने में भी मचने लगी।

उस जमाने में किए जानेवाले पूजा उत्सवों का सबसे विकृत पहलू था - गोरे साहब बहादुर की चाटुकारिता। आज जिस प्रकार अपप्रवृत्तियों की आलोचना होती है वैसी उस जमाने में भी होती थी। गोरे साहब से पूजा करवाई जाती है की आलोचना समाचार पत्रों में भी छपती थी। आज ही के समान उस समय भी नाच-गाने के शोर-शराबे से पूजा की पवित्रता भंग होती है, कष्ट होता है की शिकायत बुजुर्ग लोग किया करते थे। कुछ ब्रिटिश भी इन उत्सवों के विरोध में थे। उनका मत था कि इस प्रकार की पागलपन भरी मूर्ति पूजा के समारोहों को प्रोत्साहन नहीं दिया जाना चाहिए, अंग्रेज अधिकारियों को इसमें शामिल नहीं होना चाहिए। वैसे आगे चलकर जब स्वतंत्रता की लडाई जोर पकडने लगी तो इन अंग्रेजों का महत्व कुछ कम होने लगा।

अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त कुछ घमंडी डेढ़ गुजरे धनिक हिंदू चापलूसी की हदें लांघ जाते थे। अंग्रेज अधिकारियों को जो चाहिए वह परोसा जाता था। ऊंचे दर्जे की शराब, मांसाहारी पदार्थ यहां तक कि गोमांस तक। कुछ चापलूस देवी को खीर के साथ कॉफी-सेंडविच का भोग लगाते थे। उस समय प्रथा यह थी कि देवी की प्रतिमा के पीछे शिव पुराण के चित्र रंगे जाते थे। परंतु, ये चापलूस रानी व्हिक्टोरिया, परियों आदि के चित्र रंगते थे। यदि साहब ने बिछायत पर पेशाब कर दी तो कहा जाता 'हुक्के का गुलाब पानी ढुल गया होगा"।
परंतु, जिस प्रकार से कीचड में कमल खिलता है वैसे ही इन विकृतियों में से ही कुछ अच्छे का जन्म हुआ। इन दुरावस्थाओं की धज्जियां बंकिमचंद्र चटोपाध्याय ने उडाना आरंभ की। उन्होंने 'आमार दुर्गोत्सव" निबंध में दशप्रहरण धारिणी दुर्गा पुनः जनमानस में प्रतिष्ठित की। 'वंदे मातरम्‌" का महान मंत्र दिया। महान मनीषियों विवेकानंद, भगिनी निवेदिता, बिपीनचंद्रपाल, श्री अरविंद आदि ने देवी दुर्गा का तेजस्वी रुप देशबंधुओं के सामने रखकर जनता की आंखे खोल दी। सारा हीनत्व समाप्त हो गया। सारी धमाचौकडी का रुप बदलकर दुष्टों का निर्दालन करनेवाली देवी दुर्गा का तेजस्वी रुप स्थापित हुआ।