Sunday, 16 August 2015

सावन विशेष

सावन विशेष
शिव महिमा एवं वृहत्तर भारत की एकता के प्रतीक हैं द्वादश ज्योतिर्लिंग
पूरे विश्व में लिंग पूजा अत्यंत प्राचीन है। इस संबंध में वैदिक साहित्य में अनेकों प्रमाण मिलते हैं। चीन और जापान में भी लिंग पूजन के साक्ष्य मिलते हैं। अजरबैजान में भी एक पुराना शिव मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण कब हुआ यह ठीक ठाक ढ़ंग से कहना संभव नहीं है। इजिप्त, यूनान, रोम आदि देशों में भी शिवलिंग पूजन होता रहा है। पश्चिम के कई देशों की कई जातियों में किसी ना किसी रुप में लिंग पूजा होती रही है। अमेरिका के प्राचीन निवासी भी लिंग पूजा किया करते थे। कंबोडिया और थाईलैंड की सीमा पर एक शिव मंदिर स्थित है। 

वृहत्तर भारत में द्वादश ज्योतिर्लिंग का अपना एक विशेष स्थान है। द्वादश ज्योतिर्लिंग का विवरण शिव पुराण में दिया हुआ है। इस विवरण के अनुसार द्वादश ज्योतिर्लिंग इस प्रकार हैं - सौराष्ट्र गुजरात में सोमनाथ, श्रीशैल पर्वत (आंध्रप्रदेश) पर मल्लिकार्जुन, उज्जैन (म.प्र.) महाकाल, नर्मदा के तट पर ओंकारेश्वर, हिमालय पर्वत पर केदारेश्वर, सह्याद्रि पर्वत पर डाकिनी नामक स्थान पर भीमशंकर, वाराणसी (उ.प्र.) में विश्वनाथ, गोदावरी (महाराष्ट्र) के तट पर त्र्यम्बकेश्वर, बिहार में वैद्यनाथ, दारुक वन (आंध्रप्रदेश) में नागेश्वर, सेतुबंध पर रामेश्वर, शिवायल में घुमेश्वर। भारत में पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण में ये द्वादश ज्योतिर्लिंग अपना विशिष्ट इतिहास संजोए हुए हैं। 

सोमनाथ - शिव का पहला अवतार सोमनाथ के रुप में हुआ। इस मंदिर और ज्योतिर्लिंग की महत्ता पौराणिक एवं ऐतिहासिक दोनो ही है। चंद्रमा ने इसकी स्थापना की थी। महमूद गजनवी ने पहली बार इस मंदिर को लूटा। इस मंदिर को अनेक बार लूटा गया और यह अनेक बार फिर से स्थापित हुआ। सन्‌ 1413 में अंतिम बार मुस्लिम शासक सुलतान अहमद शाह ने इसे तोडा था। अंततोगत्वा सरदार पटेल के सत्प्रयास से इस मंदिर की पुनर्निमिति हुई।

मल्लिकार्जुन-मल्लिका अर्थ पार्वती है और अर्जुन शिव का वाचक है इस प्रकार से यहां शिव-पार्वती दोनो स्थापित हैं। पुत्र प्राप्ति के लिए इस लिंगपूजन को विशेष मान्यता है। पुराणों के कथनानुसार शैल पर्वत के दर्शन मात्र से मानव पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है।

महाकालेश्वर - इस ज्योतिर्लिंग के संबंध में अनेक कथाएं हैं। महाकालेश्वर सज्जनों का आश्रयदाता एवं दुष्टों का विनाशक है। महाकाल की गरिमा बढ़ाने में क्षिप्रा नदी सहायक है। हर 12वें वर्ष यहां सिंहस्थ का आयोजन होता है।

ओंकारेश्वर - प्राकृतिक एवं भव्य दृश्यों के मध्य मांधाता पर्वत पर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का भव्य मंदिर है। यह शिला रुप में  है। राजा मांधाता के नाम पर ही यह पर्वत प्रसिद्ध हुआ। पौराणिक कथा के अनुसार विंध्य पर्वत ने मानव रुप धारण कर शिवलिंगार्चन किया। उसी शिवलिंग के दो भाग हो गए एक को, ओंकारेश्वर तो दूसरे को ममलेश्वर (इच्छा पूर्ण करनेवाला ईश्वर कहा गया) 

केदारनाथ - केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना नर नारायण नामक देवों ने की। ऐसे तो नर नारायण अर्जुन और श्रीकृष्ण ही माने जाते हैं। इस मंदिर के निर्माण में भी छैनी हथौडी का प्रयोग नहीं हुआ है। यह केदार शिखर पर मंदाकिनी के तट पर स्थित है।

भीमशंकर - इस ज्योतिर्लिंग के संबंध में विद्वानों में कुछ मतभेद हैं। सामान्यतः तो यही माना जाता है कि मुंबई से पूर्व और पुणे के उत्तर में भीमा नदी के उद्‌गम स्थान सह्याद्रि पर्वत के डाकिनी नामक स्थान पर यह स्थित है। एक अन्य कथा के अनुसार यह असम के कामरुप जिले के ब्रह्मपुत्र पहाडी पर स्थित शिवलिंग है।

विश्वेश्वर - शिव का सांतवा ज्योतिर्लिंग काशी विश्वेश्वर या विश्वनाथ है। पौराणिंक मान्यता के अनुसार यहां शिव सदा विद्यमान रहते हैं। इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना-संस्थापक आदि का इतिहास नहीं मिलता। हां, आद्यशंकराचार्य ने इस विश्वेश्वर लिंग की स्थापना की थी। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 100 फुट ऊंची मानवाकार विश्ववेश्वर की मूर्ती का उल्लेख किया है। सबसे पहले कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे तोडा था। उसीने सारनाथ के चक्र को भी तोडा था। 1494 में सिकंदर लोधी ने इसे तोडा। 1669 में औरंगजेब ने तोडा और इसे विश्वनाथ मस्जिद का रुप दे दिया। 1790 में देवी अहिल्या ने इसी मस्जिद के पास नया विश्वनाथ मंदिर बनवाया।

त्र्यम्बकेश्वर - कहा जाता है कि गौतम ऋषि और दक्षिण की गंगा गोदावरी की प्रार्थना पर शिवजी यहां ज्योतिर्लिंग के रुप में प्रकट हुए थे। मंदिर के भीतर तीन शिवलिंग हैं वे क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और शिव के प्रतीक हैं। इसी कारण त्र्यम्बकेश्वर नाम पडा।

वैद्यनाथेश्वर - शिवभक्त राक्षस राज रावण ने कैलाश पर्वत पर घोर तपस्या की और अपने ही हाथों से अपना सिर काटकर चढ़ाने लगा, नवां सिर चढ़ाने के पश्चात जब वह दसवां सिर चढ़ाने को उद्यत हुआ तो भगवान शंकर प्रकट हो गए। शिवशंकर को प्रसन्न जान रावण ने कैलाश पर स्थापित शिवलिंग को लंका में स्थापित करने का विचार किया। शिवजी ने कहा तुम इसे बीच में कहीं ना रखना। भगवान शंकर की आज्ञा ले रावण चल पडा परंतु, मार्ग में लघुशंका के लिए रुकने के कारण यह ज्योतिर्लिंग इसी स्थान पर स्थापित हो गया और वैद्यनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 

नागेश्वर - सुप्रिय नामक एक वैश्य शिवजी का अनन्य भक्त था। उस भक्त को दारुक नामके एक राक्षस ने पकड लिया और कारागार में बंद कर दिया। सुप्रिय कारागार में भी शिवभक्ति कर रहा है यह अवगत होेने पर राक्षस उसकी हत्या करने पहुंचा। शिवजी  अपने भक्त की रक्षा के लिए कारागार में प्रकट हुए और वहीं उस दारुक दैत्य को मार डाला। नागेश्वर ज्योतिर्लिंग सभी कामनाओं को पूर्ण करनेवाला माना जाता है। यह ज्योतिर्लिंग पूर्णा-हिंगोली लाइन पर चौडी स्टेशन से 12 मील दूर औढ़ा नामक गांव में है। 

सेतुबंध रामेश्वरम्‌ - तमिलनाडु के रामनाथम या रामनद जिले में स्थित है। रामचरित मानस के आधार पर समुद्र पर पुल बांधने  के पूर्व ही रामेश्वरम्‌ की स्थापना श्रीरामचंद्रजी ने की थी। रामकथा के अनुसार श्रीराम ने शिवजी से सदैव वहां रहने का आग्रह किया था तद्‌नुसार शिवजी वहां रामेश्वर ज्योतिर्लिंग के रुप में स्थापित हुए। दाक्षिणात्य कथा के अनुसार लंका पर विजय प्राप्त करने के पश्चात अयोध्या वापसी के समय रामेश्वर शिवलिंग की स्थापना की। इस ज्योतिर्लिंग को गंगा स्नान करवाना विशेष पुण्य का माना जाता है। रामेश्वरम शिवलिंग के बगल में ही हनुमदीश्वर शिवलिंग स्थापित है। हनुमानजी द्वारा कैलाश पर्वत से शिवलिंग लाने में देर हो जाने के कारण दूसरे मुहुर्त पर इस लिंग की स्थापना की गई थी।

घूमेश्वर - शिव पुराण की कथा के अनुसार प्राचीन युग में देवगिरी नामक पर्वत के निकट सुधर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी घुश्मा अत्यंत शिवभक्त थी। वह नित्य एक सौ एक पार्थिव शिवलिंगों की पूजा करती और उन्हें निकट के सरोवर में विसर्जित कर देती। एक दिन शिवजी ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिए और घुश्मा के आग्रह पर जनहितार्थ वहीं ज्योतिर्लिंग के रुप में  रहे। इस शिवलिंग को घुसणेश्वर या घृष्णेश्वर शिवलिंग भी कहा जाता है। यह ज्योतिर्लिंग दक्षिण के हैदराबाद के अंतर्गत दौलताबाद स्टेशन से बारह कि.मी. दूर स्थित है।

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