Friday, 31 July 2015

राजनीति में वंशवाद

राजनीति में वंशवाद

आज राजनैतिक क्षेत्र में चारों ओर वंशवाद का ही बोलबाला नजर आता है। पहले तो वंशवाद केवल कांग्रेस की ही बपौति था और नेहरु गांधी परिवार तक ही सीमित था। परंतु, वर्तमान में कमोबेश सभी राजनैतिक दल एवं लगभग सभी बडे राजनेता इस वंशवाद के पोषक नजर आ रहे हैं। इस वंशवाद की शुरुआत पंडित मोतीलाल नेहरु से ़शुरु हुई जो कांग्रेस के एक सुप्रतिष्ठित एवं सुस्थापित बडे नेता थे। जिन्होंने अपनी दूरदृष्टी से यह भांप लिया था कि लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद कांग्रेस नेतृत्व में एक रिक्ती आ गई है उस रिक्ती को गांधीजी ही भर सकेंगे और वे ही उगते सूरज हैं जिनके पीछे भारत की जनता चलेगी और वे ही भविष्य के नेता होंगे। और उन्होंने अपने बेटे जवाहर (पंडित नेहरु) को गांधीजी से निकटस्थता बढ़ाने की सलाह दी जिससे की वे गांधीजी का आशीर्वाद प्राप्त कर राजनैतिक बुलंदियों को हासिल कर सकें। पंडित जवाहरलाल नेहरु ने अपने पिता की सलाह को माना और अंततः गांधीजी के प्रिय पात्र बन प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचने में सफल भी रहे। हां यह ठीक है कि सरदार वल्लभभाई पटेल भी गांधीजी के निकटस्थों में से एक थे परंतु भाग्य ने नेहरुजी का साथ दिया। वैसे किसी भी प्रसिद्ध एवं बडे व्यक्ति के पास कई योग्य, अनुभवी, सक्षम नेतृत्व दे सकने की काबिलीयत रखने वाले विश्वासपात्र लोग होते ही हैं। परंतु, सर्वोच्च पद पर तो किसी एक व्यक्ति को ही बैठाया जा सकता है ना। जैसेकि बालासाहेब ठाकरे से जब एक बार पूछा गया था कि आपने श्री मनोहरराव जोशी को ही महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री क्यों बनाया? तो उन्होंने यही जवाब दिया था कि मेरे पास कई योग्य व्यक्ति हैं परंतु मुझे उन सबमें श्री मनोहरराव जोशी ही सबसे योग्य लगे और इसीलिए मैंने उन्हें मुख्यमंत्री के पद पर आसीन कराया। बस इसी तरह से शायद गांधीजी को भी ऐसा ही कुछ लगा होगा और उन्होंने अपना आशीर्वाद पंडित नेहरु को दे दिया। 

वैसे ही समकालीन जिन्ना से नेहरु की प्रतिद्वदिंता थी और दोनो ही बेरिस्टर और तुल्यबल भी थे,साथ ही दोनो आधुनिक विचारों वाले होने के अलावा अलग-अलग पार्टियों मुस्लिम लीग और कांग्रेस में थे। जो भी हो शायद इसका भी लाभ नेहरुजी को मिला हो। हां इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पंडित जवाहरलाल नेहरु भारत की जनता के बीच एक अत्यंत लोकप्रिय व प्रभावशाली नेता थे और वे कितना प्रभावी थे यह तो हमें इसी बात से पता चलता है कि उनके प्रभाव से भारत के अंतिम गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबैंटन की पत्नी लेडी एडविना भी न बच सकी थी। और अपनी लोकप्रियता व प्रभाव के कारण ही वे सबसे लम्बे समय तक भारत के प्रधानमंत्री रहे और अपनी राजभोग प्रिय प्रवृति के कारण अपनी बेटी इंदिरा को राजनीति में ले आए। हां यह भी सही है कि इंदिराजी नेहरुजी की मृत्यु के तत्काल बाद प्रधानमंत्री के पद पर उस तरह से आसीन नहीं हुई जिस तरह से की उनकी मृत्यु के तत्काल बाद राजीव गांधी हो गए थे। नेहरुजी की मृत्यु के बाद पहले लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने। परंतु, ज्यादा समय तक जीवित न रह सके और अल्प कार्यकाल के बाद ताशकंद में उनका संदिग्ध परिस्थितियों मे स्वर्गवास हो गया। 

उस जमाने में स्वतंत्रता संग्राम में नेहरुजी के साथ कार्य करने वाले कई वरिष्ठ कांग्रेसी उदा. कामराज, मोरारजी देसाई जैसे लोग जीवित थे। उन्होंने एक सिंडीकेट बनाकर श्रीमति इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री के पद पर यह सोचकर बैठाया कि उन्हें कठपुतली बनाकर वे राज करेंगे। परंतु, इंदिराजी उनसे बढ़कर कूटनीतिज्ञ एवं राजनीतिज्ञ निकली और उन्होने कांग्रेस दो फाडकर सिंडीकेट के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को हराकर अपनी इंडीकेट कांग्रेस के माध्यम से श्री वी.वी.गिरी को राष्ट्रपति बनाने में सफलता पाई और उसके बाद प्रीविपर्स समाप्ति, बैंकों का राष्ट्रीयकरण जैसे बडे क्रांतिकारी कदम उठाकर और 1971 में पाकिस्तान को बुरी तरह से हराकर, उसके लगभग एक लाख सैनिकों से हथियार रखवाकर एवं पाकिस्तान के दो टुकडे कर बांग्लादेश बनाने में सफलता प्राप्त कर लोकप्रियता की नई ऊंचाइयों को छुआ। उनकी बांग्लादेश पर प्राप्त की गई अभूतपूर्व विजय के कारण विपक्षी तत्कालीन जनसंघ के नेता श्री अटलबिहारी बाजपेयी ने तो उन्हें देवी दुर्गा का अवतार कहकर सम्मानित किया। अपनी कूटनीति और राजनीति के बल पर ही उन्होंने सिक्कीम को भारत में विलय कर वृहत्तर भारत, अखंड भारत की दिशा में एक कदम बढ़ाने में भी सफलता पाई। परंतु सन 1975 में उच्च न्यायालय द्वारा उनके चुनाव को अवैध घोषित करने पर उच्च न्यायालय के आदेश का सम्मान कर त्याग-पत्र देने की बजाए उन्होंने आपातकाल का सहारा लिया और उनके पतन की शुरुआत हो गई। उसीमें पुत्र मोह से ग्रस्त होकर अपने बेलगाम तानाशाही प्रवृति वाले पुत्र संजय गांधी के अलोकतांत्रिक आचरण एवं व्यवहार को रोक न सकने के कारण वे अलोकप्रिय हो गई एवं आपातकाल को हटाने के बाद हुए 1977 के चुनाव में स्वयं तो हारी ही पूरी कांग्रेस भी हार गई और कांग्रेस फिर से विभाजित हो गई  और जनता पार्टी के नाम से बेमेल पार्टियों के विलय से बनी पार्टी शासन में आ गई। लेकिन आपसी मनमुटाव और सिरफुटोव्वल के कारण अपना कार्यकाल पूरा न कर सकी। और इसी का लाभ उठाकर व बिहार में घटित हुए बेलछी कांड का व जनता पार्टी शासन द्वारा उठाए गए सतत इंदिरा विरोधी कदमों से अकेली पडी हुई एक महिला के प्रति उपजी सहानुभूति के कारण वे फिर से सत्तासीन हो गई।

परंतु दुर्भाग्यवश एक विमान दुर्घटना में उनके पुत्र संजय गांधी नहीं रहे, अटलजी के शब्दों में कहें तो 'मध्यांह में सूर्यास्त हो गया" यह उद्‌गार अटलजी ने संजय गांधी को उनके द्वारा दी गई श्रद्धांजलि के समय निकाले गए थे, तो इंदिराजी के वंशवाद ने फिर से जोर पकडा और वे अपने बडे बेटे राजीव गांधी जो एक व्यवसायिक विमान चालक थे और जिनकी रुचि राजनीति में कतई न थी उनको राजनीति में ले आई, जो आगे जाकर प्रधानमंत्री जरुर बने पर राजनीति के दांव-पेंचों से अनभिज्ञ होने के कारण असफल ही सिद्ध हुए। 1984 में अपनी ही गलतियों के कारण श्रीमति इंदिरा गांधी को शहीद होना पडा और सहानुभूति की लहर पर आरुढ़ हो स्व. राजीव गांधी ने वह बहुमत हासिल कर दिखाया जो उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरु को भी प्राप्त न हुआ था। परंतु राजनीति पर पकड न होने और अनुभवहीनता के चलते कभी हिंदू कार्ड तो कभी मुस्लिम कार्ड खेलने के चक्कर में सत्ता खो बैठे और अपने कार्यकाल की अपरिपक्वतावश की हुई गलतियों के कारण आतंकवाद का शिकार हो गए। और कुछ समय बाद इस वंशवाद के प्रभाव से उपजी अभिलाषा के कारण जो सोनिया गांधी राजनीति में पहले तो आने से इंकार करती थी वही सोनिया गांधी राजनीति में सक्रिय हो गई और धीरे से कांग्रेस की बागडोर सम्हाल ली और राजग को पराजित कर संप्रग के माध्यम से सत्ता की पायदान तक जा पहुंची। परंतु अपने विदेशी मूल के होने के कारण संभावित खतरों को भांप सत्ता सिंहासन पर भले ही आरुढ़ नहीं हुई परंतु अपने वंशवादी गुलाम मानसिकता के कांग्रेसियों के महान त्याग और बलिदान वाले नारों के बलबूते यह आभास निर्माण करने में  जरुर सफल रही की उन्होंने आई हुई सत्ता को ठुकराया है। और वंशवादी गुलाम मानसिकता के कांग्रेसियों ने तो उनके इस (मजबूरीवश किए गए) 'महान त्याग" को गांधीजी के त्याग से भी बढ़कर बतलाना शुरु कर दिया। भले ही वे प्रधानमंत्री के पद पर आसीन नहीं हुई परंतु आज जो उनकी सर्वोच्च की स्थिति कांग्रेस में है और सरकार में रही है वह किसी से भी छुपी नहीं है। और इसी का लाभ उठाकर उन्होंने अपने बेटे राहुल गांधी को राजनीति के क्षेत्र में सर्वोच्च पद की ओर अग्रसर करना शुरु कर दिया था और बेटा कहीं कम न पड जाए इसलिए अपने ही वंशवादी चाटुकारितावालों की ही नई पीढ़ी के कुछ युवा सांसदों को भी तैयार करना शुरु कर दिया जो भविष्य में जब कभी राहुल सत्तासीन हुए तो उनके काम आएंगे।

इस वंशवाद की आलोचना, विरोध करने वाले भी इस वंशवाद की परंपरा के प्रभाव से बच न सके और जो भाजपा जनसंघ के जमाने से इस नेहरु गांधी परिवार के वंशवाद का मुखर विरोध और आलोचना बडे जोर-शोर से करती थी वह भी समय के साथ इस विरोध को भूलकर इसी वंशवाद की रौं में बह गई और इस वंशवाद की परंपरा में नए आयाम जोडते हुए कांग्रेस से कई गुना आगे बढ़ गई। और जहां कांग्रेस में नेहरु-गांधी परिवार का वंशवाद ही शीर्ष पर था बाकी नेता तो वंशवाद के छोटे-मोटे टापू के रुप में ही दृष्टिगोचर होते थे वहीं भाजपा ने तो जो रणनीति अपनाई थी कि 'कांग्रेस को कांग्रेस के ही अखाडे में कांग्रेस के ही दांव से पटकनी देना" में पटकनी देने में तो वह निश्चय ही सफल रही। परंतु, उसका परिणाम यह हुआ कि खुद ही कांग्रेस के रंग में इतने गहरे रंग  में रंग गई कि अपनी मूल पहचान, अपना मूल उद्देश्य, अपना अलगत्व ही खो बैठी और 'पार्टी विथ डिफरंस" का नारा जरुर बुलंद करती रही परंतु वह नारा हास्यास्पद रुप ले हास्य का पर्याय सा ही बन गया। और अब वंशवाद इतना सर चढ़कर बोल रहा है कि भाजपा के हर छोटे-बडे नेता का कोई ना कोई रिश्तेदार राजनीति में सक्रिय नजर आ रहा है। फिर भले ही इस वंशवाद को आगे बढ़ाने में पार्टी की किरकिरी भी क्यों ना हो जाए। 

केवल भाजपा ही नहीं तो भाजपा के साथ जो अन्य विरोधी दल थे जो कांग्रेस के वंशवाद की आलोचना में भाजपा से उन्नीसे नहीं तो बीसे ही बैठते होंगे उन्होने भी इसी वंशवाद को अपना लिया। उदा. इधर उत्तरप्रदेश में मुलायमसिंग के भाई और पुत्र दोनो ही राजनीति में सक्रिय हैं तो उधर बिहार में लालू यादव अपनी पत्नी और पत्नी के भाई तो, तमिलनाडु में करुणानिधि अपने पूरे कुनबे के साथ राजनीति में सक्रिय नजर आ रहे हैं। यह वंशवाद अब इतना बढ़ गया है कि महिला आरक्षण के इस दौर में यह नगर पालिका, निगमों में तो पार्षद पति, पार्षद भाई, पार्षद पिता के रुप में नजर आ रहा है। यदि यह महिला आरक्षण और वंशवाद का दौर यूं ही परवान चढ़ता रहा तो आज जहां केवल पार्षद पति आदि नजर आ रहे हैं वहीं कल को विधायक पति, सांसद पति, मंत्री पति आदि भी केंद्र से लेकर राज्य तक, राज्य के शहरों, गांवों में तक घूमते नजर आएंगे। अब तो इस वंशवाद ने हर क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है। फिल्मों में भी पहले जहां केवल कपूर या चोपडा परिवार जैसे कुछ ही गिने-चुने परिवार वंशवाद का झंडा थामे हुए थे वहीं आज कई परिवार वंशवाद के पोषक नजर आ रहे हैं। और तो और इस वंशवाद ने धार्मिक क्षेत्र को भी अछूता नहीं रहने दिया है और शीघ्र ही वहां भी पिता के बाद पुत्र को लोग गद्दीनशीन होते देख सकेंगे। यह राजस शक्ति का प्रभाव है जो धार्मिक क्षेत्र में भी घुस आया है। लेकिन इस वंशवाद को दोष देना व्यर्थ है यह तो मानव की सहज राजभोग प्रवृत्ति है जो कमोबेश हर व्यक्ति में कम या ज्यादह मात्रा में मौजूद रहती ही है। लगभग हर व्यक्ति कम या अधिक मात्रा में चाहता है कि मैंने जो सत्ता भोग का आनंद लूटा है वही आगे भी जारी रहे और मेरे बाद मेरी पत्नी, पुत्र, पुत्री और अन्य रिश्तेदारों को भी पीढ़ी दर पीढ़ी आगे भी मिलता रहे और जीते जी तो क्या मरते वक्त तक वह इसी जुगाड में लगा रहता है और इसके लिए तमाम तरह के उचित, अनुचित  तरीके अपनाने से भी बाज नहीं आता। उदाहरणार्थ ः इस वंशवाद के समर्थक नेतागणों द्वारा  यह तर्क दिया गया  कि 'बढ़ई का बेटा बढ़ई बनता है" तो नेता का बेटा नेता क्यों नहीं बन सकता? या 'जब डॉक्टर का बेटा डॉक्टर बन सकता है, व्यवसायी का बेटा व्यवसायी कर सकता है तो ऐसे में राजनीति करनेवाले का बेटा राजनीति क्यों नहीं कर सकता?" लेकिन यह तर्क देनेवाले यह भूल जाते हैं कि यह सामंती तर्क है कि 'राजा का बेटा राजा बनेगा" भले ही वह योग्य हो या कि अयोग्य। प्रजातंत्र में तो नेता प्रजा यानी जनता द्वारा चुना जाता है और इस तरह के तर्कों के आधार पर अपने पुत्र को नेता के रुप में थोपना सरासर प्रजातंत्र का अपमान नहीं हुआ क्या? लेकिन यह सभी दलों में हो रहा है और यह प्रवृति प्राचीन -काल से ही चली आ रही है। परंतु यहां यह याद दिला देना उचित होगा कि इस प्रवृति के दो ही अपवाद आधुनिक काल में हैं और वे हैं महात्मा गांधी और वीर सावरकर जिन्होने इस प्रवृति को प्रश्रय कभी भी नहीं दिया।

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