Saturday, 20 June 2015

योगशास्त्र पर सावरकरजी के विचार

योगशास्त्र पर सावरकरजी के विचार

सावरकरजी की योगशास्त्र में रुचि युवावस्था में ही हो गई थी। उनके काव्य 'सप्तर्षि" और 'माझी जन्मठेप" (मेरा आजन्म कारावास) में योगशास्त्र का उल्लेख मिलता है। स्वामी विवेकानंद का राजयोग उनका प्रिय ग्रंथ था। स्नान के बाद ध्यानधारणा करना उनका नित्यक्रम था। उन्होंने अखिल हिंदू ध्वज पर कृपाण के साथ कुंडलिनी को स्थान दिया था।

योगशास्त्र - मानव को एक वरदान

योगशास्त्र का वर्णन मानवी जीवन को एक श्रेष्ठ वरदान के रुप में किया जा सकता है। इस प्रयोगाधारित शास्त्र को हिंदुओं ने पूर्णत्व तक पहुंचाया है।
योगशास्त्र मनुष्य की आंतरिक शक्तियों के संपूर्ण विकास का एक सर्वश्रेष्ठ शास्त्र है।

व्यक्तिगत अनुभवों का शास्त्र

योगशास्त्र व्यक्तिगत अनुभवों का शास्त्र है इसलिए उसमें मतभेद को स्थान नहीं।

गुप्त नहीं शास्त्र है
योग गोपनीय न होकर एक शास्त्र है।

मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ ध्येय

योग को आचरण में लानेवाले मनुष्य में आश्चर्यकारी, इंद्रियातीत और उत्कंट प्रसन्नता प्राप्त होती है। इस अवस्था के बारे में योगी कैवल्यानंद कहते हैं - वज्रायनी महासुख। अद्वैती ब्रह्मानंद और भक्त प्रेमानंद कहते हैं - यह सर्वश्रेष्ठ आनंद प्राप्त कर लेना मनुष्य का फिर वह हिंदू या अहिंदू, आस्तिक हो या नास्तिक, नागरिक हो या वनवासी हो, सर्वश्रेष्ठ ध्येय है। (वि. दा. सावरकर)

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