Sunday, 28 June 2015

बेतहाशा बढ़ती छुट्टियों के कहर से निजात कब मिलेगी, कौन दिलाएगा?

बेतहाशा बढ़ती छुट्टियों के कहर से निजात कब मिलेगी, कौन दिलाएगा?
सरकारी कर्मचारियों का कार्यालय से गायब रहना और नित नए बहाने बनाते रहना यह प्रवृत्ति कोई आज की नहीं है। यह प्रवृत्ति कितने लंबे समय से है यह हमें सम्राट चंद्रगुप्त के गुरु चाणक्य, जो एक कुशल राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ, आयुर्वेदाचार्य आदि तो थे ही साथ ही एक कुशल प्रशासक एवं समस्याओं का संतोषजनक हल निकालने में भी अत्यंत पारंगत थे के जमाने में भी मौजूद थी इसका पता हमें इस कथा से मिलता है जो आज भी प्रासंगिक है-

चाणक्य को निरीक्षण में यह नजर आया कि सरकारी कार्यालयों में कई बार कर्मचारियों की उपस्थिति बहुत बडे पैमाने पर कम रहती है। पूछताछ करने पर यह पता चला कि अनुपस्थित कर्मचारियों के घर में मॉं अथवा पिता का श्राद्ध है इसलिए वे नहीं आए हैं। अधिक जांच करने पर यह भी ध्यान में आया कि वर्ष में दो-तीन बार मॉं या पिता का श्राद्ध है कहकर कर्मचारी कार्यालय से गायब रहते हैं। चाणक्य के लिए यह कहना तो संभव था नहीं कि श्राद्ध ना करें। क्योंकि, धार्मिक भावना को ठेस पहुंचा नहीं सकते थे। इस पर चाणक्य ने यह मार्ग ढूंढ़ निकाला कि भाद्रपद महीने के अंतिम पंद्रह दिनों को पितृ-पक्ष का नाम देकर उन पंद्रह दिनों में सभी लोग अपने मृत संबंधियों के श्राद्ध करें।

कुछ परिवारों में यदि कोई अडचन हो या श्राद्धकर्म करने के लिए पंडित (ब्राह्मण) उपलब्ध न हो सके तो अंतिम अमावस्या वाले दिन करें और चाणक्य ने उस दिन का नामकरण सर्वपितृ अमावस्या किया। इस प्रकार से बिना किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाए चाणक्य ने इस कामचोरी और कार्यालय से गायब रहने की प्रवृत्ति पर काबू पाया। परंतु, कर्मचारियों के गायब रहने की यह समस्या आज फिर सिर उठाए खडी है। परिस्थितियां यहां तक बेकाबू हो गई है कि कर्मचारी तो कर्मचारी अधिकारी तक गायब रहने लगे हैं और हमारे शासक-प्रशासक इस समस्या से पार पाने के स्थान पर अधिकाधिक छुट्टियां घोषित कर इस देशघातक प्रवृत्ति को क्षणिक लाभवश बढ़ावा ही दे रहे हैं और जनता हैरान-परेशान है एवं भारत दुनिया में सर्वाधिक छुट्टियोंवाला देश बनता चले जा रहा है। नया वर्ष आरंभ होने के समय समाचार पत्रों में यह समाचार बराबर स्थान पाता है कि नए वर्ष में कितनी छुट्टियां रहेंगी और कर्मचारी अपनी छुट्टियों का जोड-बाकी लगाने में भिड जाते हैं।

राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर उन्होंने पांच दिन का सप्ताह घोषित कर सरकारी कर्मचारियों से यह अपेक्षा की कि वे तरोताजा होकर अधिक काम करेंगे परंतु कोई बदलाव नहीं आया न तो काम करने की गति बढ़ी ना ही जवाबदेही बढ़ी। छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद अधिकारियों-कर्मचारियों का वेतन बढ़ा इससे हजारों करोडों रुपयों का बोझ सरकार पर पडा। सरकारी नौकरियां और भी अधिक आकर्षक हो गई। इस वेतन बढ़ौत्री के साथ सिफारिशें समयबद्धता, अनुशासन, कार्यसंस्कृति बढ़ाने। कर्मचारियों की संख्या और खर्चों में कटौती, कागजी कार्यवाही में कमी लाने, जांच अल्पावधि में करने, कार्यकुशलता के आधार पर पदोन्नति, देर से आनेवाले कर्मचारियों पर निगरानी आदि की जाए, की भी थी। परंतु, कर्मचारियों को तो खुश कर दिया गया परंतु, बाकी सिफारिशें उपेक्षित ही रह गई। कार्य संस्कृति में कोई इजाफा नहीं हुआ।

हम अमेरिकीयों की नकल करने में कहीं पीछे नहीं रहना चाहते, नई आर्थिक नीतियों से भी अमेरिकी संस्कृति को ही बढ़ावा मिल रहा है। कई भारतीय तो अमेरिका जाने का, खुद को अमेरिकी कहलवाने का सपना रात-दिन देखते रहते हैं, पाले रहते हैं। परंतु, अमेरिका में छुट्टियां ही नहीं मिलती इस बारे में न तो हम बात करना चाहते हैं न ही उसी तर्ज पर अपनी छुट्टियां कम करवाना चाहते हैं। ऑस्ट्रेलिया जाने का सपना भी बहुत से लोग पाले रहते हैं। वहां जरुर छुट्टियां मिलती हैं परंतु, इतनी नही जितनी हमारे देश में। अमेरिकी तो छुट्टियों के लिए ही तरस जाते हैं। वहां पेड अवकाश भी 'पर्क" है। छुट्टियां मोलभाव का विषय है। वहां की कई कंपनियां 5 से 15 दिन का वेतन सहित अवकाश उपहार के रुप में देती हैं। पाश्चात्य देशों की वैज्ञानिकप्रगति, अनुशासनप्रियता, स्वच्छता की सबसे अधिक प्रशंसा करनेवालों में हम ही सबसे आगे हैं। परंतु, उनकी तरह कर्मप्रधान होने की बजाए सर्वाधिक छुट्टियां मनानेवालों में भी सबसे आगे हम ही हैं।

हमारे यहां साप्ताहिक अवकाश के रुप में रविवार के अतिरिक्त महापुरुषों के नाम पर छुट्टियां चाही जाती हैं। हमारे नेता भी सस्ती लोकप्रियता और वोट बैंक की राजनीति के चलते सत्ता में आते ही अपनी विचारधारा के नेताओं के नाम पर छुट्टियां घोषित करते चले जाते हैं। मानो यह सबका संविधान प्रदत्त हक हो। लेकिन निजी कंपनियों के लोग और मजदूरों को यह नसीब नहीं होती। आपको आश्चर्य होगा कि सप्ताह में एक दिन का अवकाश-रविवार का अवकाश जो हम सबको अति प्रिय है वह भी एक जमाने में भारतीयों को लडकर लेना पडा था और आज से सवासौ वर्षों पूर्व तक तो उन्हें यह भी नहीं मिलता था। रविवार का सबसे पहला अवकाश 10 जून 1890 को मिला था। वह भी अंगे्रज बहादुर की कृपा से नहीं बल्कि नारायण मेघाजी लोखंडे के कारण जिन्होंने इसके लिए ब्रिटिशों से 6 साल तक लडाई लडी थी। लेकिन स्वतंत्रता के बाद हमें अधिकार क्या मिले हम छुट्टियां मांगते चले जा रहे हैं, मिलती चली जा रही हैं और महत्वपूर्ण काम देरी से होने के कारण राष्ट्रीय हानि हो रही है परंतु हममें से कोई भी परवाह नहीं कर रहा।

व्ही. पी. सिंह प्रधानमंत्री बनने के पूर्व तक पैगंबर मुहम्मद के नाम पर छुट्टी नहीं मिलती थी। अर्जुनसिंह ने अपने मुख्यमंत्रीत्व काल में सतनामी समाज के संत घासीदास के नाम पर अवकाश घोषित किया था। जिन्हें म. प्र. के अधिकांश लोग जानते तक नहीं थे। लेकिन छुट्टी पूरा प्रदेश मना रहा था। उत्तर प्रदेश सरकार तो इस मामले में सबसे बाजी मार गई है। वहां इस वर्ष 37 शासकीय अवकाश घोषित किए गए हैं और इसके खिलाफ लोग कोर्ट में भी चले गए हैं। इन छुट्टियों को घोषित करने के पीछे यह राजनीति काम करती है कि इस बहाने सरकारी कर्मचारियों-उनके परिवारों के साथ ही कुछ सामाजिक वर्गों को भी प्रसन्न किया जा सके जिन्हें आगे जाकर चुनावों में वोटों में तब्दील किया जा सके। 

आखिर में इन महापुरुषों के नाम पर इतनी सारी छुट्टियों का औचित्य ही क्या है। नेहरुजी और इंदिरा गांधी के जन्मदिन पर तो कोई छुट्टी नहीं होती तो क्या लोग उनको याद नहीं करते या उनके योगदान को भूल गए हैं। नेहरुजी कहा करते थे 'आराम हराम है"। गांधीजी के नाम पर छुट्टी दी जाती है। सच बताइए कितने लोग इस दिन गांधीजी को याद करते हैं और करते हैं तो किसलिए यह 'मुन्नाभाई सीरिज" की एक फिल्म से पता चल जाता है। कितने लोग गांधीजी के बताए रास्ते पर चलने का प्रयत्न करेंगे यह ठानते हैं। यदि ठानते होते तो आज देश में इतनी न तो हिंसा होती न हिंसा प्रधान फिल्में बॉक्स ऑफिस के रिकॉर्ड तोडती नजर आती। सभी महापुरुष तो हमेशा कर्मप्रधान रहे, अपने विचारों पर अडिग रहे। उन्होंने आजीवन अपने को देश और समाज के लिए कर्मरत रखा इसीलिए तो आज वे महापुरुष हैं, श्रद्धेय हैं। लेकिन हम उनके नाम पर छुट्टियां चाहते हैं। उसे प्रतिष्ठा का विषय बनाते हैं और छुट्टी मिलने के बाद मौज-मजा, सैर-सपाटे पर निकल जाते हैं या निठल्ले घर में बैठे रहते हैं। और भूले भटके कभी रविवार को इनके नाम पर मिलनेवाली छुट्टी आ गई तो लोग बडे दुखी हो जाते हैं कि अरे, यार एक छुट्टी फोकट में ही मारी गई।

भारत एक प्रजातांत्रिक देश है इसलिए जो कुछ होता है वह जनसंख्या के आधार पर ही होता है इस आधार पर तो हर 2, 3 करोड का समूह यदि अपने महापुरुषों या धर्म-संप्रदाय के त्यौहारों पर छुट्टी मांगने लगे तो, क्या यह देना संभव है? और यदि नहीं दी इसलिए वे धमकाने लगे ... और दी जाने लगी तो कल्पना कीजिए क्या होगा? क्योंकि, जब हम कुछ महापुरुषों के जन्मदिन पर और उस समूह के धर्म के आधार उसके त्यौहारों पर छुट्टी देते हैं तो इस आधार पर सभी समूहों को छुट्टियां दी जाना चाहिए और इस आधार पर तो मेरे खयाल से शायद और 100 छुट्टियां देना पडेंगी। कुछ विद्वानों के मतानुसार साल के 365 दिन में से हम केवल 150-55 दिन काम करते हैं। इस प्रकार से तो बमुश्किल दो महीने ही काम करेंगे बाकी समय मौज-मजा करेंगे। यह तो संभव नहीं इसलिए बेहतर यही होगा कि इस प्रकार की सभी छुट्टियां निरस्त की जाएं।

इस वर्ष यानी सन्‌ 2015 में केंद्र सरकार की घोषित छुट्टियां हैं 18 और वैकल्पिक 33, 1 मई की छुट्टी अलग से दी हुई है। म. प्र. शासन ने 24 अवकाश सामान्य और 57 वैकल्पिक अवकाश घोषित किए हैं उनमें से तीन लिए जा सकते हैं। केंद्र में तो पांच दिन का सप्ताह है इस आधार पर शनिवार-रविवार के लगभग 104 अवकाश बनते हैं। तो म. प्र. में 77। हडतालें आदि होती रहती हैं और हमारे कुछ चतुर कर्मचारी भाई अपनी छुट्टियों को उस हिसाब से भी एडजस्ट कर लेते हैं इसके अतिरिक्त स्थानीय अवकाश अलग से घोषित होते ही हैं। सी. एल., ई. एल. आदि अलग से हैं। उदा ः. सन्‌ 2012 में बैंककर्मियों ने दो दिन की हडताल की थी उसके पूर्व संलग्न तीन दिनों की छुट्टियां थी एक दिन और छुट्टी ले ली तो बढ़िया फेमिली टूर बनाया जा सकता था और कुछ भाई लोगों ने बनाया भी था। इस वर्ष भी इस प्रकार के बहुत से मजे के अवसर उपलब्ध हैं उसी पर अब नजर डालेंगे। 

जाते हुए वर्ष एवं नववर्ष के आगमन पर कई लोग पूरे साल क्या-क्या करना है, कौनसी उपलब्धियां हासिल करना है की योजनाएं बनाने में लग जाते हैं तो कुछ लोग केवल आनंद ही आनंद के प्लानिंग में छुट्टियों का गणित बैठाने में जुट जाते हैं। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी सरकारी कर्मचारी-अधिकारियों को जो तडी मारने, लेटलतीफी, काम के घंटों के दौरान गप्पे हांकने या घरेलु काम निपटाने, कामचोरी, आदि में माहिर हैं की छुट्टियों की विपुलता के कारण चांदी ही चांदी है।

1. जनवरी से आरंभ करते हैं नए वर्ष का प्रारंभ ही चार छुट्टियों से हुआ। एक जनवरी को छुट्टी थी 2 को सी.एल ले ली 3,4 (ईद मिलाद उन नबी) शनिवार रविवार था। 23 जनवरी को सुभाष जयंती, 24,25 'वीक एंड" 26 जनवरी को राष्ट्रीय अवकाश। 

2. फरवरी की पहली तारीख को रविवार की छुट्टी थी। 3 को रविदास जयंती। 14, 15 शनिवार, रविवार 16 को या तो तडी मार दी या सी. एल. ले ली तो 17 को महाशिवरात्री का आनंद डबल हो गया। 18 को बहुत से लोग काम के मूड में नहीं रहे इतनी छुट्टियों का आनंद भूले जो नहीं थे। फिर उपवास का भारी फरियाल भी तो किया था। महाराष्ट्र में तो 19 को छत्रपति जयंती के कारण छुट्टी मनाई गई यानी हर एक दिन छोडकर छुट्टियों का लुत्फ उठाया गया। क्योंकि, 21, 22 वीक एंड था। 

3. मार्च की शुरुआत भी रविवार यानी छुट्टी से हुई। 6 को धूलंडी थी फिर वीकएंड था। 21 मार्च गुढ़ी पडवा 22 रविवार छुट्टी।

4. अप्रैल के शुरुआत में ही 2 महावीर जयंती, 3 को गुडफ्रायडे, 4 को शनिवार हनुमान जयंती और 5 को रविवार की छुट्टियां रही। 11, 12 को शनिवार-रविवार था। 13 को एक छुट्टी ले ली तो 14 को फिर अंबेडकर जयंती की छुट्टी थी। 21 अप्रैल को अक्षय तृतीया-परशुराम जयंती की छुट्टी थी परंतु सरकारी कार्यालयों में छुट्टी का माहौल 18-19 के वीक एंड से प्रारंभ होकर पूरे सप्ताह बना रहा और कार्यालयों में कामकाम की शुरुआत धीरे-धीरे 27 से ही हो सकी। सभी कर्मचारी शादी-ब्याह में व्यस्त रहे। सरकारी कार्यालयों में 30 में से 18 दिन छुट्टियों का माहौल बना रहा।  
5. मई की शुरुआत ही छुट्टीवाले दिन से हुई 1 मई मजदूर दिवस, 2, 3 वीक एंड 4 को बुद्धपूर्णिमा की छुट्टी। हाल-फिलहाल जून-जुलाई जरुर छुट्टियों से मुक्त रहेंगे। केवल 18 जुलाई शनिवार को ईद-उल-फितर की छुट्टी रहेगी।

6. अगस्त में 5 रविवार हैं। 15 अगस्त के बाद 16 को रविवार की छुट्टी है। यदि 17 को कुछ एडजस्ट कर लिया गया तो 18 को पतेती (पारसी नववर्ष) की छुट्टी (महाराष्ट्र में) है ही। कुल 8 छुट्टियां हैं।  

7. 5 सितंबर शनिवार जन्माष्टमी।17 सितंबर को गणेश चतुर्थी है 19-20 वीक एंड 18 को जुगाड जमा ली जाए तो संलग्न 4 छुट्टियां। यही हाल 24 से 27 तक का है । 24 या 25 को ईदुज्जहा 26, 27 वीक एंड।  इस प्रकार की संलग्न मिलनेवाली छुट्टियों के कारण कई माता-पिता यह भी सलाह देते मिल जाते हैं कि अपने बच्चों को अपने शहर के निकट के शहर में  यदि संभव हो तो पढ़ने मत भेजो। यदि भेजना ही हो तो दूर ही भेजो या भेजो ही मत क्योंकि साल भर में कई बार इस प्रकार की संलग्न छुट्टियों के कारण बच्चे बार-बार घर चले आते हैं पढ़ाई का तो नुक्सान होता ही है पैसा भी बेजा खर्च होता है। मेरे एक शिक्षाविद मित्र के अनुसार उनके 47 साल के शैक्षणिक अनुभव का निचोड यह है कि साल भर में किसी भी हालत में 180 दिन से अधिक स्कूल लगते ही नहीं तो कोर्स कैसे पूरा होगा। शिक्षक बच्चों को उनका पाठ्यक्रम पूर्ण करवाएं कैसे? 

8. अक्टूबर 2 शुक्रवार को गांधी जयंती है 3, 4 वीक एंड है यानी 3 दिन छुट्टियों के। 22 को दशहरा है 23 को कार्यदिवस कैसे जाएगा यह बतलाने की आवश्यकता नहीं ! 24 (मोहर्रम), 25 वीक एंड और 27 को वाल्मिकी जयंती।

9. नवंबर छुट्टियों का महिना है। 1 को रविवार है और कुल 5 रविवार हैं इस महिने में। 7, 8 वीक एंड है। 9 तारीख धनतेरस से दीपावली प्रारंभ हो रही है, 10 को नरक चतुर्दशी या रुपचौदस है, 11 को लक्ष्मी पूजन, 12 को बलिप्रतिपदा या पडवा, गोवर्धन पूजा है, 13 को भाईदूज। 14, 15 वीक एंड। संलग्न 9 दिन छुट्टियों का आनंद उठाने के बाद 16 को या तो सरकारी कर्मचारी हमेशा से अधिक लेट आएंगे या आएंगे ही नहीं, पूछनेवाला भी या तो आएगा नहीं आ भी गया तो पूछने की जहमत नहीं उठाएगा उसे भी सब मालूम है, आदत में आ गया है। कर्मचारी आ भी गए तो दीवाली कैसी रही पर गंभीर चर्चा करेेंगे। काम का माहौल बनते बनते ही बनेगा, जनता भी अब समझदार हो गई है वह भी एक दिन और सही कहकर धका लेगी। इतने पर ही बस नहीं अभी तो दो वीक एंड और 25 नवंबर को गुरुनानक जयंती की छुट्टियां बाकी हैं।

10. साल जाते जाते भी कर्मचारियों पर मेहरबान है। 24 गुरुवार को ईद मिलाद दूसरी बार आई है। 25 को क्रिस्मस 26, 27 वीक एंड। इन सब का परिणाम जनता के काम न होने के रुप में सामने आता है। एक तो कई कर्मचारी गायब रहते हैं ऊपर से कई विभागों में तो सतत बैठके होती रहती हैं अधिकारीयों को उसमें भाग लेना रहता है इस कारण से भी जनता के काम रुकते हैं। इसलिए छुट्टियों पर नियंत्रण आवश्यक है। इस लेख में 'वीक एंड" का उल्लेख इसलिए बार-बार किया गया है क्योंकि जहां पांच दिन का अवकाश नहीं होता वहां भी शनिवार को छुट्टी हो या नहीं सरकारी ऑफिसों में काम नहीं होगा यह मानसिकता ही अब बन सी गई है और जनता भी अपेक्षा नहीं करती कि इस दिन कुछ काम होगा। बेहिसाब छुट्टियों का यह सिलसिला बरसों से चला आ रहा है इस वर्ष भी है और आनेवाले वर्ष का आगाज भी छुट्टियों से ही होनेवाला है। 2,3 जनवरी वीक एंड है। 
कई छुट्टियां तो ऐसी हैं कि जो मिलना ही नहीं चाहिए या केवल उन्हें ही मिले जो संबंधित हैं। उदाहरणार्थ ः पारसियों के नववर्ष 'पतेती" की छुट्टी। इस संबंध में पहली बात तो यह है कि सरकारी नौकरियों में पारसी हैं ही कितने और उनकी आबादी है ही कितनी और जो है वह देश के कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित है और कितने बहुसंख्य समाज के लोग इस बारे में जानते हैं या उसमें सम्मिलित होते हैं। यही बात मुस्लिम या ईसाई समुदाय के त्यौहारों के संबंध में भी कही जा सकती है। कितने हिंदू बकरा ईद मनाते हैं। सरकार चाहे तो इन समुदायों को अलग से छुट्टी दे या उस दिन अन्य कोई विशेष सुविधा भी दी जा सकती है जैसेकि अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में दीपावली के दिन पार्किंग फ्री होती है। मेरे मत से तो रविवार के अतिरिक्त राष्ट्रीय त्यौहारों के नाम पर 15 अगस्त और 26 जनवरी की ही छुट्टियां यानी कुल मिलाकर दो छुट्टियां हों इसी प्रकार बहुसंख्य लोग किसी ना किसी रुप में दीवाली मनाते हैं या इस त्यौहार से जुडे हुए हैं अतः इन त्यौहारों पर दो या तीन दिन की छुट्टी दी जाना चाहिए बाकी सभी छुट्टियां समाप्त कर दी जाना चाहिएं। जिन्हें यह मान्य नहीं वे अपना वेतन कटवाएं और लें छुट्टियां।   
 वर्तमान में हो यह रहा है कि बेचारी जनता कर कुछ नहीं सकती, मन ही मन कुढ़ती रहती है। हैरान-परेशान होती रहती है। रिश्वत देने के बाद भी समय पर काम इन छुट्टियों की विपुलता के कारण होता नहीं है और यदि रिश्वत नहीं दी तो इन छुट्टियों का उपयोग हथियार के रुप में करने में सरकारी अधिकारी-कर्मचारी माहिर हैं। इन बेतहाशा बढ़ती छुट्टियों के कहर के कारण कार्यदिवस की हानि होती है, कार्यसंस्कृति का ह्रास होता है इसलिए जनता तो चाहती है कि छुट्टियां कम हों परंतु, एक भी कर्मचारी संगठन जो वेतन एवं सुविधा वृद्धि के नाम पर एकजुट हो अपनी मांगे मनवाने पर उतारु रहते हैं वे भूले से भी अपने संगठन के सदस्यों को ईमानदारी और तेज गति से काम करो, छुट्टियां कम करो, कार्यालयीन समय में गायब मत रहा करो कि अपील करते कहीं नजर नहीं आते हैं। ना ही सरकार से कभी कहते हैं कि हमारी छुट्टियों में कमी की जाना चाहिए जिससे कि सरकारी काम तेज गति से हों।
हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल को एक वर्ष पूर्ण हो चूका है और जब उन्होंने पूरे वर्षभर में एक दिन की भी छुट्टी नहीं ली है और सतत परिश्रम कर रहे हैं तो, इन सरकारी कर्मचारी-अधिकारियों, उनके संगठनों और साथ ही बात बे बात छुट्टियां घोषित करनेवाले नेतागणों को भी तो कुछ सोचना चाहिए। लेकिन वे सोचते नजर आते नहीं। अतः अब केंद्र सरकार ही सबसे पहले पहल करे और बिना किसी की परवाह किए राष्ट्रीय हित में तत्काल छुट्टियों में कटौती प्रारंभ करे। कर्मचारियों के गायब रहने, लेटलतीफी के प्रति सख्ती दिखाए। देखिए कितने शीघ्र देश की सूरत बदली हुई नजर आने लगेगी।

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