Monday, 15 June 2015

अधिकस्य अधिकम्‌


अधिकस्य अधिकम्‌

वैश्वीकरण, निजीकरण, उदारीकरण, बाजारवाद की संकल्पनाओं के कारण सारी दुनिया में कुहराम मचा हुआ है। इसके कारण उपभोक्तावाद भी बहुत तेज गति से बढ़ा साथ ही फुजूलखर्ची, भ्रष्टाचार, बिनाकारण खर्च करना की प्रवृत्ति भी बढ़ने लगी,  विपुलतावाद, मौज-मजा की संस्कृति ने पांव फैलाना प्रारंभ कर दिया, मितव्ययिता शब्द ही मानो परिदृश्य से गायब होता चला जा रहा है। राजनैतिक, सामाजिक, स्वास्थ्य-परीक्षा, शैक्षणिक आदि सभी क्षेत्रों में इस प्रवृत्ति ने पांव फैलाना प्रारंभ कर दिया है। अधिकस्य- अधिकम्‌ की होड मची है।

विदेशों में लोग सप्ताह में पांच दिन 14 से 15 घंटे जमकर काम करते हैं फिर बचे हुए दो दिनों में 'वीक एंड" मनाते हैं। उसके लिए किसी शांत स्थान पर जाना वे पसंद करते हैं। वहां मौज-मजा, खाना-पिना करते हैं, कमाए हुए पैसे को खर्च करते हैं और आकर फिर काम में जुट जाते हैं। हमने केवल उत्तरार्ध स्वीकारा है। (कारपोरेट क्षेत्र में काम करनेवाले लोग अपवाद हैं) एक तो हमारे यहां मिलनेवाला वेतन या काम-धंधे से होनेवाली आय विदेशों की तुलना में कम है जिसमें जैसे-तैसे गुजारा हो सकता है। सिवाय बेरोजगारों की फौज फालतू घूम रही है। हमारे यहां कई अधिकारी-कर्मचारी बडी शान से यह कहते मिल जाएंगे कि मजे की नौकरी है कोई टेंशन नहीं अब ऐसे लोगों को क्या कहें? लेकिन प्रत्येक को कम से कम कष्ट उठाकर अधिक से अधिक ऐशोआराम चाहिए  और इसके लिए कुछ भी करने को लोग तैयार हैं इसीके कारण भ्रष्टाचार और लूट की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। अच्छे, ईमानदार लोग एकाकी, उपेक्षित और उपहास के पात्र बनते जा रहे हैं।

इस मौज-मजा की संस्कृति को फिल्में, टी. व्ही. और उनपर आनेवाले विज्ञापन बढ़ावा दे रहे हैं जिनका बहुत बडा प्रभाव आज के युवाओं पर नजर आ रहा है। फिल्मी अभिनेता-नेत्री किस प्रकार का व्यवहार करते हैं, कौनसी फैशन करते हैं, कैसे गहने, कपडे पहनते है इसी पर उनका ध्यान है। चित्रपट बाजार में आते ही या कोई सा सीरियल लोकप्रिय होते ही उसी नाम के गहने, कपडे बाजार में बिकने लगते हैं। बाजार, शॉपिंग मॉल, बडे शोरुम में बिना जेब की परवाह किए खर्च किए जा रहे हैं। फास्ट फूड संस्कृति ने घर-घर में प्रवेश कर लिया है।  घर के भोजन के बजाए होटलों में जाने का कल्चर बढ़ रहा है। कई परिवार तो छुट्टी के दिन बाहर ही भोजन करते हैं। ग्रामीण क्षेत्र भी अछूते नहीं रहे हैं वहां भी ढ़ाबे में जाकर भोजन करने की पद्धति रुढ़ हो रही है।  

आवश्यकता हो या न हो नए-नए दोपहिया वाहन वह भी महंगे से महंगे लेने का रुझान बढ़ रहा है साथ ही कई मोबाईल एक साथ रखना और उन्हें सतत बदलते रहना का चलन भी क्या शहर और क्या गांव दोनो में ही बढ़ता चला जा रहा है। आज हर एक के हाथ में मोबाईल है यह बात अलग है कि वे इसका सदुपयोग कितना और दुरुपयोग कितना करते हैं। इस मोबाईल ने मनुष्य के सारे जीवन को ग्रसित कर लिया है सभी जानते हैं कि इस मोबाईल से हमें लाभ कम हानि अधिक हो रही है फिर भी इसको प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया गया है। अधिकांश बच्चे और युवा इस पर 24 घंटे चॅटिंग करने में लगे रहते हैं या गेम खेलते रहते हैं। सुविधाएं स्वीकारने की प्रवृत्ति भी बढ़ती ही जा रही है एकने किया इसलिए दूसरे को भी वह आवश्यक लगने लगता है।

 भौतिक सुख सुविधाएं हमारे लिए ही हैं परंतु हम उनके कितने अधीन हों यह हम नहीं संबंधित कंपनियां तय कर रही हैं। रोकडा  नहीं हों तो क्रेडिट कार्ड है इस कारण अनावश्यक खरीदी और जो नहीं चाहिए वह हम स्वीकारते हुए ऑफर्स की बलि चढ़ रहे हैं।  इस क्रेडिट कार्ड के कारण पैसा खर्च करते समय में मन में जो टीस उठती है वह नहीं उठती और कितना पैसा खर्च हो गया का भान हमें नहीं रहता। देशी पौष्टिक पेय गन्ने का रस, छाछ, दूध, लस्सी, फलों का रस पीने के स्थान पर पेप्सी और कोला जैसे पेयों की खपत अधिकतम होती जा रही है। आम का रस पीने के स्थान पर कंपनियों का आम से बना ठंडा पेय हमें पसंद होते चले जा रहा है। सारी दुकानें यहां तक की पान की दुकान तक पर यह उपलब्ध हैं और खपत इतनी अधिक है कि उनकी शॉर्टेज भी होती है। एक लीटर दूध की कीमत इन पेयों से कम है परंतु, पीनेवाले गायब हैं। आज भी ग्रामीण क्षेत्र में कई गांवों में पिने के पानी के लिए महिलाओं को मीलों भटकना पडता है जहां जलयोजनाएं आज तक पहुंच नहीं सकी हैं ऐसे क्षेत्रों में भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के शीतल पेय, चीप्स-वेफर्स बडी सहजता से उपलब्ध हैं। यह किस बात का द्योतक है।

 बाजारवाद के केंद्र में है उपभोक्ता यानी कंज्यूमर और कंज्यूमर कंज्यूम करेगा तभी तो उत्पादन बढ़ेगा एवं उत्पादन और खपत बढ़ेगी तभी कंपनियों को लाभ होगा इसलिए कंपनियां उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए ग्राहक की क्रय शक्ति हो या न हो उसे कर्ज मुहैया कराने में पीछे हटती नहीं हैं और लोग भी अधिकाधिक सुविधाएं जुटाने के लिए कर्ज लेकर कर्ज में डूबते चले जा रहे हैं। हमारा पुराना अनुभव सिद्ध मंत्र 'जितनी चादर हो उतने ही पांव पसारो" को हम भूल जाएं इसलिए वे 'जितने चाहे पांव पसारो चादर हम दे देंगे" का लालच दिखाकर हमें उपभोगवादी बनाने पर तुले हैं। वे इस प्रकार के विज्ञापन बडे ही सुनियोजित ढ़ंग से दिखा रहे हैं कि यदि आपने फलां-फलां वस्तु का उपयोग नहीं किया तो लोग आप पर हंसेंगे और हम भावनाधीन हो बलि चढ़ रहे हैं। कारपोरेट क्षेत्र के लोगों को छोड बाकी लोगों की आय इतनी नहीं कि वे इस उपभोगवादी संस्कृति को स्वीकारे परंतु, वे स्वीकारते चले जा रहे हैं और अपना सुख-चैन खोते जा रहे हैं। इस झूठे नशे के अधीन हो उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो रही है, वे पतन की और बढ़ रहे हैं एवं कई संयम खोने के कारण आत्महत्या की ओर भी बढ़ जाते हैं।

ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी अपार धनराशी के बलबूते और साम-दाम-दंड-भेद की नीति को अपना स्थानीय व्यापार, उद्योगों को समाप्त कर देना चाहती हैं। एक बार यहां का व्यापार-उद्योग-धंधा ठप्प हुआ कि ये ग्राहकों को विकल्प ना होने के कारण मनमाने भाव पर सामान बेचेंगी। इसके लिए वे ऑफर्स का सहारा ले रही हैं हम हमारे बचत के मंत्र को भूल रहे हैं। हमें पुराने मंत्र बचाते रहो बचाते रहो के संदेश का अवलंबन कर इसका प्रचार करेंतो अधिक बेहतर होगा।   

हमारे राजनेता भी इस उपभोगवाद को बढ़ा रहे हैं। हर चुनाव के समय जो की लगभग साल भर ही चलते रहते हैं। युवाओं को साथ लेकर उन्हें जो चाहिए वह दिया जाता है और युवा भी मुफ्त में मिल रहा है इसलिए महंगा भोजन, शराब, पान-गुटखा सिगरेट का सेवन करने लगते हैं व्यसनाधीन हो जाते हैं और जब चुनाव के बाद यह सब मिलता नहीं तो गलत रास्ते पर निकल पडते हैं। यदि अपराधों पर नजर डालें तो दिख पडेगा कि समाज के सभी स्तरों के युवक अपराधों की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं। बात इतनी अधिक बढ़ती जा रही है कि मां या दादी बेजा खर्च के लिए पैसे ना दे तो वे हत्या तक कर गुजरते हैं। राजनैतिक दल जनता की सभी अपेक्षाओं को तो पूरा कर नहीं सकते और उम्मीदवार को तो चुनाव जीतना है इसलिए वह सुविधाएं लोगों को बांटकर वोट कबाडता है। एक प्रकार से यह भी तो मुफ्त में मौज मजा की संस्कृति को बढ़ावा देने का एक एक्सटेंशन है। परिणाम सभी जानते हैं भ्रष्टाचार।

यदि मौज-मजा संस्कृति को स्वीकारना ही है तो हमें अपनी आय बढ़ाना होगी। परंतु, हमारे यहां इतने अवसर नहीं। सिक्स्‌थ पे कमीशन के बाद सरकारी नौकरियों में वेतन अवश्य अत्यंत आकर्षक हो गए हैं परंतु वह नौकरियां मिलना आसान नहीं और कारपोरेट कंपनियों को छोडकर अन्य नौकरियों में कोई वेतन कोई खास नहीं। अब पीछे भी जा नहीं सकते पुराने जमाने की मितव्ययिता से गुजारा करना भी संभव नहीं। जो है उसे स्वीकारते हुए एक ही रास्ता बचता है वह है अधिकाधिक मेहनत, मेहनत और कठिन मेहनत। हम अमेरिका में तो हैं नहीं जहां की अर्थव्यवस्था अधिकाधिक खर्च पर चलती है, वहां क्रेडिट कार्ड के बलबूते लोग जीते हैं, साथ ही सरकार की ओर से सोशल सिक्योरिटी होने के कारण नौकरी या आय के साधन नहीं मिलने पर कोई भूखा नहीं मरे इसकी व्यवस्था सरकार करती है। परंतु, हम तो बचत पर निर्भर हैं, उसे ही बढ़ाना होगा जितना संभव हो सके बचाएं। यह ना भूलें कि हमारे यहां सोशल सिक्योरिटी सरकार की ओर से नहीं है। यदि नहीं समझे तो फिर घर फूंक तमाशा ही होगा लेकिन यह भी कितने दिन चलेगा। इसलिए मेहनत का मार्ग स्वीकारें, मौज मजा को नियंत्रित रखें। अपनी आवश्यकताओं को बेजा बढ़ाएं नहीं।

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