Sunday, 31 May 2015

हिंदू परिवारों में रिश्ते-नाते

हिंदू परिवारों में रिश्ते-नाते

साली एक ऐसा रिश्ता है जो केवल हिंदू परिवार पद्धति में ही पाया जाता है जिसके संबंध में कई खट्टी-मीठी, मजेदार, हास्य पैदा करनेवाली तो, कभी-कभी अश्लीलता की हदों की छूनेवाली कहावतें-मुहावरे भारत के हर प्रदेश, समाज, भाषा में प्रचलन में हैं और साधारणतया उसका कोई बुरा भी नहीं मानता। उदाहरणार्थ कुछ कहावतें प्रस्तुत हैं -

1. साली तो आधी घरवाली होती है, 2. साली बडी कमीनी चीज है, 3. मेव्हणी (साळी/साली) म्हणजे अर्धी बायको (आधी पत्नी)(मराठी), 4. घरी नाही साळी, सासुशी करी टवाळी (घर पे नहीं है साली तो सास की ही उडाए खिल्ली (मराठी) 5. साली छोड सासू सूं ही मसकरी (राजस्थानी). 6. बायको पेक्षा मेव्हूणी बरी (पत्नी से साली अच्छी) (मराठी), 7. शाली शालाज आधेक माग यानी साली और साले की पत्नी आधी पत्नियां होती हैं, (बंगाली) 8. माछ जाकरे फली टापरा जाकरे साली यानी मछली में मछली 'फली" और गप्पे हांकने के लिए अच्छी होती है साली (ओरिया), 9. ससु रे न साहुरा साली अ रे न नींहुं यानी सास नहीं तो ससुराल नहीं, साली नहीं तो सुख नहीं (सिंधी)।

परंतु, साली के संबंध में जो भावनाएं ऊपर बयान की गई हैं उस तरह की भावनाएं मुस्लिम या ईसाई परिवारों में देखने को नहीं मिलेंगी। ऐसा क्यों? तो, जब हम हिंदू परिवारों पर दृष्टि डालें तो दिख पडेगा कि उनमें अनेक रिश्ते होते हैं जैसेकि, सगे भाई-बहन, ममेरे, चचेरे, फुफेरे भाई-बहन आदि। ये अधिकतर हमउम्र ही होते हैं परंतु, कभी-कभी यह भी दिख पडता है कि मामा और भांजे-भांजियां, चाचा और भतीजा-भतीजियां तो कभी-कभी बुआ, मौसी भी हम उम्र नजर आती है। परंतु, हिंदू परिवारों में इनमें आपस में विवाह हो नहीं सकता। ये विवाह निषिद्ध ही नहीं तो पाप की श्रेणी में गिने जाते हैं।

इसका कारण है हिंदू धर्म में स्वीकृत एक ही पिंड की कल्पना। पिंड यानी देह। माता-पिता की देह उनके बच्चों में संक्रांत होती है। मामा और मौसी में मां का पिंड तो बुआ और काका या चाचा में पिता का पिंड होता है इस कारण इनके साथ संबंध स्थापित हो नहीं सकता। ये संबंध कौटुंबिक व्यभिचार की श्रेणी में आते हैं और यह जो कल्पना है उसका प्रभाव, परिणाम हर हिंदू परिवार के सदस्य पर, उसके कामजीवन पर पडता ही है। 
इसी संबंध में और अधिक विचार करें। हिंदू परिवारों में बडे होते बच्चों को जो शिक्षा, संस्कार, वातावरण दिया जाता है वह इस प्रकार का होता है कि अब तुम बडे हो गए हो इसलिए एक दूसरे से दूर रहो, एक दूसरे को स्पर्श ना करो, आदि। इसके पीछे कारण यह है कि युवावस्था की ओर अग्रसर होते लडके-लडकियों में एकदूसरे के प्रति आकर्षण स्वाभाविक रुप से उत्पन्न हो जाता है। इस अवस्था में एक दूसरे के सान्निध्य में अच्छा लगता है, एकदूसरे से कुछ बात करने की इच्छा उत्पन्न होती है, एकदूसरे को चुपचुपके निहारने की इच्छा भी जागृत हो जाती है और यह सब कामवासना के निर्दोष आविष्कार हैं, जो कि स्वाभाविक, प्राकृतिक भी हैं। जो कि पृथ्वी पर मौजूद सभी प्राणियों में पाई जाती है। परंतु, इसीसे परिवारों के ज्येष्ठों को अगम्यगमन के पाप का भय भी सताने लगता है इसलिए उनकी स्वतंत्रता पर बंधन लगाए जाते हैं। जो कि उचित भी नजर आते हैं, हां यह बात अलग है कि अब बदलते समय के साथ कुछ परिवारों में अपने आपको आधुनिक दिखाने की होड में समवयस्कों में इतने बंधन ना हों परंतु आज भी अधिकांश हिंदू परिवारों में ये बंधन मौजूद हैं। इस कारण हिंदू परिवारों में कामवासना एक दबाव के अंतर्गत रहती है। 

परंतु, साला या साली के संबंध में ऐसा कुछ नहीं रहता यहां बंधनों में थोडी छूट है क्योंकि, ये संबंध विवाह के बाद निर्मित होते हैं और दूसरा सपिंड न होने के कारण निषिद्ध लैंगिक व्यवहार होने का भय नहीं रहता। पति-पत्नी का विवाह अधिकृत रुप से होता है और जीजा-साली के बीच पत्नी बफर स्टेट की तरह होती है। इस प्रकार यह जीजा-साली का नया संबंध जिसमें कुछ हद तक मुक्त व्यवहार की मिली हुई छूट दोनो की दबी हुई कामवासना को मिला हुआ आविष्कार स्वातंत्र्य है। इसे सामाजिक मान्यता भी प्राप्त है। इसी कारण से यदि कोई परिस्थिति उत्पन्न हुई तो जीजा-साली का विवाह हो सकता है। अपवाद स्वरुप कुछ हिंदू जातियों में ममेरे-फूफेरे भाई-बहनों में विवाह करने की पद्धति है इस कारण वहां अगम्यगमन की भावना तो शेष नहीं रहती लेकिन फिर साली के रिश्ते का मजा भी नहीं रहता।

जबकि मुस्लिम परिवारों में चचेरे भाई-बहनों में विवाह संबंध खुलेआम होते हैं और इसे धार्मिक-सामाजिक मान्यता भी प्राप्त है।  हिंदू परिवार तो इस प्रकार के संबंधों के बारे में सपने में भी सोच नहीं सकता। मुस्लिम परिवारों में बंंधन है तो केवल इतना की एक ही माता-पिता की संतानों के यानी सहोदरों के विवाह निषिद्ध हैं। मुस्लिम परिवार में एक मुस्लिम युवा अपनी सगी चचेरी बहन को भावी वधू के रुप में देख सकता है और ऐसा करने में न तो उसके धर्म की ना ही उसके समाज की ओर से कोई रोकटोक है। इसी कारण से मुस्लिम समाज में साली के रिश्ते का खट्टा-मिठा रिश्ता नहीं है। 

रही ईसाई परिवारों की बात तो वे हिंदू-मुस्लिम परिवारों के बनिस्बत मुक्त परिवार हैं। उनमें मुसलमानों के समान रिश्तों में विवाह नहीं होते। परंतु, उनमें कामवासना के प्रति उत्पन्न होनेवाले निर्दोष आविष्कारों पर हिंदुओं की तरह कोई बंधन भी नहीं है। उनमें विभिन्न रिश्तेवाले स्त्री-पुरुष साथ-साथ नाचते-गाते हैं, पार्टियां करते हैं, आपस में मुक्त व्यवहार करते हैं इस कारण उनमें भी साली के रिश्ते का आनंद भी मौजूद नहीं।

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