Sunday, 31 May 2015

हिंदू परिवारों में रिश्ते-नाते

हिंदू परिवारों में रिश्ते-नाते

साली एक ऐसा रिश्ता है जो केवल हिंदू परिवार पद्धति में ही पाया जाता है जिसके संबंध में कई खट्टी-मीठी, मजेदार, हास्य पैदा करनेवाली तो, कभी-कभी अश्लीलता की हदों की छूनेवाली कहावतें-मुहावरे भारत के हर प्रदेश, समाज, भाषा में प्रचलन में हैं और साधारणतया उसका कोई बुरा भी नहीं मानता। उदाहरणार्थ कुछ कहावतें प्रस्तुत हैं -

1. साली तो आधी घरवाली होती है, 2. साली बडी कमीनी चीज है, 3. मेव्हणी (साळी/साली) म्हणजे अर्धी बायको (आधी पत्नी)(मराठी), 4. घरी नाही साळी, सासुशी करी टवाळी (घर पे नहीं है साली तो सास की ही उडाए खिल्ली (मराठी) 5. साली छोड सासू सूं ही मसकरी (राजस्थानी). 6. बायको पेक्षा मेव्हूणी बरी (पत्नी से साली अच्छी) (मराठी), 7. शाली शालाज आधेक माग यानी साली और साले की पत्नी आधी पत्नियां होती हैं, (बंगाली) 8. माछ जाकरे फली टापरा जाकरे साली यानी मछली में मछली 'फली" और गप्पे हांकने के लिए अच्छी होती है साली (ओरिया), 9. ससु रे न साहुरा साली अ रे न नींहुं यानी सास नहीं तो ससुराल नहीं, साली नहीं तो सुख नहीं (सिंधी)।

परंतु, साली के संबंध में जो भावनाएं ऊपर बयान की गई हैं उस तरह की भावनाएं मुस्लिम या ईसाई परिवारों में देखने को नहीं मिलेंगी। ऐसा क्यों? तो, जब हम हिंदू परिवारों पर दृष्टि डालें तो दिख पडेगा कि उनमें अनेक रिश्ते होते हैं जैसेकि, सगे भाई-बहन, ममेरे, चचेरे, फुफेरे भाई-बहन आदि। ये अधिकतर हमउम्र ही होते हैं परंतु, कभी-कभी यह भी दिख पडता है कि मामा और भांजे-भांजियां, चाचा और भतीजा-भतीजियां तो कभी-कभी बुआ, मौसी भी हम उम्र नजर आती है। परंतु, हिंदू परिवारों में इनमें आपस में विवाह हो नहीं सकता। ये विवाह निषिद्ध ही नहीं तो पाप की श्रेणी में गिने जाते हैं।

इसका कारण है हिंदू धर्म में स्वीकृत एक ही पिंड की कल्पना। पिंड यानी देह। माता-पिता की देह उनके बच्चों में संक्रांत होती है। मामा और मौसी में मां का पिंड तो बुआ और काका या चाचा में पिता का पिंड होता है इस कारण इनके साथ संबंध स्थापित हो नहीं सकता। ये संबंध कौटुंबिक व्यभिचार की श्रेणी में आते हैं और यह जो कल्पना है उसका प्रभाव, परिणाम हर हिंदू परिवार के सदस्य पर, उसके कामजीवन पर पडता ही है। 
इसी संबंध में और अधिक विचार करें। हिंदू परिवारों में बडे होते बच्चों को जो शिक्षा, संस्कार, वातावरण दिया जाता है वह इस प्रकार का होता है कि अब तुम बडे हो गए हो इसलिए एक दूसरे से दूर रहो, एक दूसरे को स्पर्श ना करो, आदि। इसके पीछे कारण यह है कि युवावस्था की ओर अग्रसर होते लडके-लडकियों में एकदूसरे के प्रति आकर्षण स्वाभाविक रुप से उत्पन्न हो जाता है। इस अवस्था में एक दूसरे के सान्निध्य में अच्छा लगता है, एकदूसरे से कुछ बात करने की इच्छा उत्पन्न होती है, एकदूसरे को चुपचुपके निहारने की इच्छा भी जागृत हो जाती है और यह सब कामवासना के निर्दोष आविष्कार हैं, जो कि स्वाभाविक, प्राकृतिक भी हैं। जो कि पृथ्वी पर मौजूद सभी प्राणियों में पाई जाती है। परंतु, इसीसे परिवारों के ज्येष्ठों को अगम्यगमन के पाप का भय भी सताने लगता है इसलिए उनकी स्वतंत्रता पर बंधन लगाए जाते हैं। जो कि उचित भी नजर आते हैं, हां यह बात अलग है कि अब बदलते समय के साथ कुछ परिवारों में अपने आपको आधुनिक दिखाने की होड में समवयस्कों में इतने बंधन ना हों परंतु आज भी अधिकांश हिंदू परिवारों में ये बंधन मौजूद हैं। इस कारण हिंदू परिवारों में कामवासना एक दबाव के अंतर्गत रहती है। 

परंतु, साला या साली के संबंध में ऐसा कुछ नहीं रहता यहां बंधनों में थोडी छूट है क्योंकि, ये संबंध विवाह के बाद निर्मित होते हैं और दूसरा सपिंड न होने के कारण निषिद्ध लैंगिक व्यवहार होने का भय नहीं रहता। पति-पत्नी का विवाह अधिकृत रुप से होता है और जीजा-साली के बीच पत्नी बफर स्टेट की तरह होती है। इस प्रकार यह जीजा-साली का नया संबंध जिसमें कुछ हद तक मुक्त व्यवहार की मिली हुई छूट दोनो की दबी हुई कामवासना को मिला हुआ आविष्कार स्वातंत्र्य है। इसे सामाजिक मान्यता भी प्राप्त है। इसी कारण से यदि कोई परिस्थिति उत्पन्न हुई तो जीजा-साली का विवाह हो सकता है। अपवाद स्वरुप कुछ हिंदू जातियों में ममेरे-फूफेरे भाई-बहनों में विवाह करने की पद्धति है इस कारण वहां अगम्यगमन की भावना तो शेष नहीं रहती लेकिन फिर साली के रिश्ते का मजा भी नहीं रहता।

जबकि मुस्लिम परिवारों में चचेरे भाई-बहनों में विवाह संबंध खुलेआम होते हैं और इसे धार्मिक-सामाजिक मान्यता भी प्राप्त है।  हिंदू परिवार तो इस प्रकार के संबंधों के बारे में सपने में भी सोच नहीं सकता। मुस्लिम परिवारों में बंंधन है तो केवल इतना की एक ही माता-पिता की संतानों के यानी सहोदरों के विवाह निषिद्ध हैं। मुस्लिम परिवार में एक मुस्लिम युवा अपनी सगी चचेरी बहन को भावी वधू के रुप में देख सकता है और ऐसा करने में न तो उसके धर्म की ना ही उसके समाज की ओर से कोई रोकटोक है। इसी कारण से मुस्लिम समाज में साली के रिश्ते का खट्टा-मिठा रिश्ता नहीं है। 

रही ईसाई परिवारों की बात तो वे हिंदू-मुस्लिम परिवारों के बनिस्बत मुक्त परिवार हैं। उनमें मुसलमानों के समान रिश्तों में विवाह नहीं होते। परंतु, उनमें कामवासना के प्रति उत्पन्न होनेवाले निर्दोष आविष्कारों पर हिंदुओं की तरह कोई बंधन भी नहीं है। उनमें विभिन्न रिश्तेवाले स्त्री-पुरुष साथ-साथ नाचते-गाते हैं, पार्टियां करते हैं, आपस में मुक्त व्यवहार करते हैं इस कारण उनमें भी साली के रिश्ते का आनंद भी मौजूद नहीं।

Friday, 29 May 2015

18 मई स्पूतनिक स्थापना दिवस विशेष स्पूतनिक - निर्भीक पत्रकारिता ही जिसका मिशन है

18 मई स्पूतनिक स्थापना दिवस विशेष
स्पूतनिक - निर्भीक पत्रकारिता ही जिसका मिशन है

कोई भी व्यक्ति या संस्था, आदि जब एक लंबे समय तक किसी क्षेत्र में अपना अस्तित्व बनाए रखती है तो उसके बारे में लोगों में एक जिज्ञासा, कुतुहल निर्मित हो जाना स्वाभाविक ही होता है कि, आखिर यह कौन है, क्या है? इसकी गतिविधियां क्या हैं? इसकी सोच-विचारधारा क्या है? इससे कौन-कौन जुडे हैं? इसके संस्थापक कौन हैं? आदि। वे उनके बारे में जानना चाहते हैं? यदि वह समाचार पत्र हुआ तो, यह जिज्ञासा-कुतुहल और भी बढ़ जाता है। क्योंकि, हर पढ़ा-लिखा, विचारवान व्यक्ति भले ही कितना भी व्यस्त क्यों ना रहता हो किसी ना किसी समाचार पत्र को पढ़ता ही है और उसमें छपे समाचारों-लेखों, कभी-कभी विशिष्ट समाचार या विषय पर लिखे गए लेख को थोडा बहुत ही क्यों ना हो पर पढ़ता अवश्य है। उस पर विचार भी करता है, गाहेबगाहे उस पर चर्चा भी करता है या कम से कम कहीं चल रही चर्चा को सुनता तो भी है। 

इन सब पर से वह उस समाचार पत्र के बारे में एक विशिष्ट धारणा बना लेता है और जब उस समाचार पत्र से संबंधित व्यक्ति जैसे कोई पत्रकार या लेखक, आदि से मिलता है तो वह अपनी जिज्ञासा-कुतुहल को दबा नहीं पाता और उस समाचार पत्र के संबंध में उसकी धारणा क्या है? वह उसके बारे में क्या मत रखता है, उसे प्रकट करता है। वह सब जानने कि कोशिश करता है जिनका कथन मैंने ऊपर किया है। कई बार वह भ्रांत धारणाएं कोई विशिष्ट समाचार या लेख पढ़कर भी बना लेता है। मेरा तो अनुभव ऐसा भी है कि, कई लोग इतने अधिक पूर्वाग्रस्त होते हैं कि केवल किसी लेख का शीर्षक या कभी-कभी तो समाचार पत्र का नाम पढ़कर ही अपने पूर्वाग्रह के आधार पर उसके बारे में अपना मत बना लेते हैं और तत्काल उसके बारे में अपना द्वेष प्रकट करने से बाज नहीं आते। स्थानीय दैनिक समाचार पत्र जिसे वह रोज पढ़ता है उसके बारे में हो सकता है कि उसकी सोच ठीक हो, परंतु साप्ताहिक आदि जिन्हें वह हमेशा नहीं पढ़ता उसके बारे में कोई भ्रांत धारणा यदि उसने बना ली हो तो यह बात जरुर समझ में आती है। उसे दोष नहीं दिया जा सकता। दोषी तो वह तब होगा कि मौका मिलने पर भी वह इस दोष को दूर करने का प्रयास ना करे।

स्पूतनिक के संबंध में यही बात कही जा सकती है। इस संबंध में मेरा अनुभव यह है कि, मुझे कुछ लोग यह कहते मिले कि, अरे यह तो भाजपा विरोधी है तो, कुछ लोग सीधे कांग्रेस समर्थक ही घोषित कर देते हैं। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि यह तो समाजवादी अखबार लगता है। इन पर मैं टिप्पणी करना नहीं चाहता क्योंकि इनमें से अधिकांश बगैर पढ़े, अधूरी जानकारी के बूते, बगैर किसी विश्लेषण के या पूर्वाग्रह के आधार पर तो कभी अंधश्रद्ध हो इस प्रकार के मत प्रकट करते हैं। इन लोगों को मेरा उत्तर एक ही होता है पहले पढ़ो, विश्लेषण करना सीखो, पूर्वाग्रह, अंधश्रद्धा छोडो फिर मुझसे बात करो। 

फिर मैं अपना मत प्रकट करते हुए उनसे कहता हूं कि, भई ये विशुद्ध पत्रकारिता है। ये किसी से बंधे हुए लोग नहीं हैं। उनकी नजरों में जो सच है जो उनके विश्लेषण, उन्हें प्राप्त सूचनाओं पर आधारित है उसे सामने लाने का प्रयास करते हैं। अपने पत्रकारिता धर्म का पालन बिना किसी संकोच के निर्भीक एवं निष्पक्ष रुप से करते हैं। जिस समाचार को छापने का साहस दूसरे समाचार पत्र या पत्रकार जुटा नहीं पाते उसे वे बिना किसी भय के छापने से हिचकिचाते नहीं। इस कारण स्पूतनिक में छपनेवाले समाचार या लेख लीक से हटकर होते हैं और साधारण सोचवाले लोगों के गले जल्दी से उतरते नहीं हैं। यह स्पूतनिक का तो दोष नहीं, इसे समझने की आवश्यकता है।

उदाहरणार्थ ः 14 से 20 अप्रैल 2014 में छपा 'वाजपेयी-मोदी की तुलना" यह विश्लेषणात्मक लेख पढ़ने के बाद क्या हर किसी को सोचने के लिए मजबूर नहीं कर देता । इसी प्रकार 2 से 8 जून 2014 के अंक में छपा यह लेख 'आडवाणी की बिदाई का समय नियति का फैसला" पढ़ें। इसमें लिखा यह कथन कि, 'लालकृष्ण आडवाणी नियती के फैसले को स्वीकार करके अपनी राजनैतिक बिदाई का रास्ता चुन लें तो अब उनका सम्मान बना रह सकता है। वे अपनी कैसी बिदाई चाहते हैं? इसका निर्णय उनको स्वयं को करना पडेगा।" कितना समयोचित था। इसी अंक में छपा यह दूसरा लेख 'केंद्रिय मंत्रीपरिषद के गठन में नरेंद्र मोदी ने किया 'जनादेश का अपमान" क्या इस प्रकार का लेख किसी समाचार पत्र ने छापा था। क्या यह सबसे हटकर नहीं था। 9 से 15 जून 2015 का '10 जनपथ की खामोशी ने किया कांग्रेस का बंटाधार" स्पूतनिक को कांग्रेसी कहनेवाले पहले पढ़ें फिर बोलें। वैसे सच तो यह है कि इस प्रकार की बातें करनेवाले पढ़ने का कष्ट उठाने में ही विश्वास नहीं करते तो विश्लेषण किस प्रकार करेंगे ऊपर वाले ने जबान दी है तो बस बोलते रहो।   

आज समाचार पत्रों की दुनिया में व्यवासियकता ने 100 प्रतिशत प्रवेश कर लिया है। इस पूंजीवादी दौर में भी स्पूतनिक इन सबसे दूर होकर अपने मिशन में लगा है। इस संबंध में स्पूतनिक के 56 वर्ष पूर्ण होने पर 19 से 25 मई 2014 के अंक में डॉ. गीता ने इसी सच को इस लेख 'स्पूतनिक की बेबाक लेखनी से थर्रा जाती हैं सरकारें" क्या यह सिद्ध नहीं करती हैं कि इसी पूंजीवादी पत्रकारिता के दौर में स्पूतनिक एक जगमगाता सितारा है। रामदेव बाबा का जब डंका बज रहा था कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था वह हिम्मत सिर्फ और सिर्फ स्पूतनिक ने जुटाई और रामदेव एक व्यवसायी है, उसके गुरु कहां लापता हैं? आदि कई प्रश्न आज से कई वर्ष पूर्व ही खडे कर दिए थे। जो अब जाकर कुछ माह पूर्व से सभी समाचार पत्र छापने लगे।

यह निर्भीकता, इस दबंगता के संस्कार स्पूतनिक ने अपने संस्थापक श्री दिनेशजी अवस्थी से पाए हैं। जिनका जन्म 12 जुलाई 1927 को हुआ था। वे द्वितीय विश्वयुद्ध के समय 1944-45 में वायुसेना में भी रहे। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्रकारिता 'नेशनल हैराल्ड" जिसके संस्थापक स्वंय नेहरुजी और संपादक चेलापतिराव थे जो उनके पत्रकारिता के गुरु भी रहे से प्रारंभ की।  म. प्र. का तत्कालीन लीडिंग दैनिक 'नवप्रभात" ग्वालियर संस्करण में भी कार्य किया। इसके बाद इंदौर आकर उस समय के सर्वाधिक प्रसारण संख्यावाले 'इंदौर समाचार" में भी पत्रकारिता की फिर 18 मई 1958 को 'स्पूतनिक" का पहला अंक प्रकाशित हुआ। इसके साथ ही वे देश भर की पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेखन कार्य करते रहे।

उनके दो कार्य जो वास्तव में मील का पत्थर हैं वह मैं सबके सामने लाना चाहता हूं जिससे बहुत से लोग अनजान होंगे। 1970 में चंबल के बीहडों के दस्युओं के पुनर्वास के विचार को ध्यान में रख महिनों तक बीहडों में स्कूटर पर अपने मित्र के साथ भटकते रहे और गंभीर अध्ययन के पश्चात जब उनके निष्कर्ष और अध्ययन सामग्री स्पूतनिक सहित दिल्ली के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई तो सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ और इसके बाद जयप्रकाश नारायण और सर्वोदयी सुब्बाराव के मार्गदर्शन में चंबल के इन खतरनाक दस्युओं (माधोसिंह, मोहरसिंह सहित लगभग 125 दस्युओं) ने आत्मसमर्पण किया।

आज शिरडी के साईबाबा के दरबार में दर्शनों के लिए घंटों कतार में लगना पडता है तब जाकर कहीं उनके दर्शन हो पाते हैं। परंतु, जब शिरडी के साईबाबा का माहात्म्य इतना न था उस जमाने में 1975-76 में शिरडी के साई बाबा के संबंध मेें विस्तृत अध्ययन एवं उनके संबंध में अधिकृत जानकारी जुटाने के उद्देश्य से  सपत्नीक दो माह तक शिरडी के आसपास के क्षेत्र का दौरा किया। इस कठिन प्रवास में उन्होंने पगडंडियों के रास्ते गांव-गांव घूमकर सूचनाएं एकत्रित की। इसी दौरान उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति से भी मुलाकात एवं चर्चा की जो साईबाबा के सान्निध्य में उनके अनुयायी के रुप में रह चूका था। इसके पश्चात वह सारा अध्ययन स्पूतनिक एवं तत्कालीन सुप्रसिद्ध अखबार 'ब्लिट्‌ज" में प्रकाशित हुआ और सर्वसाधारण लोगों के सामने साईबाबा का माहात्म्य सामने आया और साईबाबा के भक्तगणों की संख्या उसीके बाद बढ़ना प्रारंभ हुई।

इस प्रकार से स्पूतनिक की निर्भीक पत्रकारिता की यात्रा बगैर अपने उद्देश्य से भटके इस पूंजीवादी-व्यवसायिकता के दौर में भी यथावत जारी है और अब 18 मई को स्पूतनिक अपना 57 स्थापना दिवस मनाने जा रहा है। जो अपनेआप में एक रिकार्ड है।

Friday, 8 May 2015

पक्षी दिवस 4 मई जूझ पक्षियों की

पक्षी दिवस 4 मई
जूझ पक्षियों की 

पक्षियों और उनकी अनूठी दुनिया का आकर्षण मनुष्य को प्रारंभ से ही रहता चला आया है। पक्षियों का मानव जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान अनेकानेक प्रकार से प्राचीनकाल से ही रहा है। मनुष्य का संबंध पक्षियों से भक्षण, मनोरंजन से लेकर अपने मन की बात कहने तक रहा है। प्राचीन भारतीयों ने विभिन्न पक्षियों जैसेकि तोता-मैना, हंस आदि को घर में स्थान दिया। उनसे अपनी  प्रेमकथा कहने से लेकर विरहकथा तक कही, अपना राजदार बनाकर उनके माध्यम से प्रेमसंदेश भेजने का काम लिया तो कभी शुभाशुभ जानने के लिए उनका उपयोग किया। तोता-मैना तो स्त्री-पुरुषों के सुख-दुख के साझीदार होते थे।  

प्राचीनकाल में इतने मनोरंजन के साधन नहीं थे जितने की आज हैं। उस काल में पक्षी एक बहुत बडा मनोरंजन का साधन थे।  प्राचीनकाल में पक्षियों की जूझ या लडाई का खेल अत्यंत लोकप्रिय था। बाण ने मुर्गा, सारस आदि की लडाइयों का वर्णन कर रखा है। चालुक्य नरेश सोमेश्वर के बारहवीं शताब्दी में रचित मानसोल्लास में मुर्गों की जूझ का वर्णन विस्तार से मिलता है। उसने लडाकू मुर्गों की आठ जातियां बतलाई हैं।

मुर्गों की लडाई के खेल की उत्पत्ति पौर्वात्य देशों में हुई और फिर वह खेल बाद में पाश्चात्य देशों में गया। वात्सायायन के कामसूत्र में मनोरंजन के लिए पशु-पक्षियों की जूझ का उपयोग किस प्रकार से किया जाता था का वर्णन मिलता है। वे बतलाते हैं ः दोपहर भोजन के पश्चात नागरिक तोता-मैना से कानाबाती किया करते थे अथवा लावा (पक्षी), मुर्गों की जूझ, भेडों की टक्कर का आनंद उठाते। पशु-पक्षियों की लडाई पर पैसा लगाकर जुआ भी खेला जाता था। मनु ने जुअॆ के दो प्रकार बतलाए हैं। पहला अचेतन वस्तुओं द्वारा खेला जानेवाला जुआ उसे 'द्यूत" कहते और मुर्गा, भेड आदि की लडाइयों पर शर्त लगाकर खेले जानेवाले जुअॆ को 'समाह्वय" कहा है।(मनुस्मृती, 9-221) याज्ञवल्क्य ने प्राणियों की जूझ को 'प्राणिद्यूत" कहा है। प्राणिद्यूत के दो प्रकार थे - सपणबंध यानी जिस लडाई पर शर्त लगाई जाती थी और पणबंधरहित यानी शर्त न लगाते खेली जानेवाली जूझ।
दूसरों के शौर्य पर अपने मन की बदले की भावना, युद्धपिपासा पूर्ण करने का शौक नवाबकालीन लखनऊ के निवासियों को बहुत था। यह तीन प्रकार का था 1. हिंसक जानवरों और चौपायों को लडवाने का। 2. पक्षियों की जूझ का। और 3. पतंगबाजी का। हिंसक जानवरों को लडवाने का शौक प्राचीन भारत में कहीं नहीं था। हां, रोम में जरुर पहले के जमाने में यह शौक था। वहां मनुष्य और पशुओं को परस्पर अथवा एकदूसरे के विरुद्ध लडवाया जाता था। परंतु, ख्रिश्चनिटी के उदय के पश्चात यह प्रथा बंद हो गई। परंतु, स्पेन और यूरोप के कुछ देशों में अद्याप सांडों की लडाई का खेल परस्पर या कभी-कभी मनुष्य के विरुद्ध लडा जाता है। 

हिंसक जानवरों की लडाई का खेल बादशाह और नवाबों तक ही सीमित था परंतु, पक्षियों की जूझ का खेल तो हरएक अमीर-गरीब के बस का था। लडने के लिए मुर्गा, बटेर को तैयार करने का शौक तो सर्वसामान्य व्यक्ति के लिए भी संभव था। नवाबकालीन लखनऊ में मनोरंजन के लिए मुर्गा, बटेर, तीतर, लावा, गुलदुम, लाल, कबूतर और तोता को लडवाया जाता था। गुलदुम को सामान्यतः सभी लोग बुलबुल समझते हैं। परंतु, यह गलत है। बुलबुल बदख्शां और ईरान का गानेवाला पक्षी है। परंतु, इस पक्षी की दुम के नीचे एक लाल रंग की चित्ती होती है। भारतीय संस्कृति पर गर्व करनेवाले और लखनऊ के ऐश्वर्यशाली व वैभवसंपन्न दीर्घ इतिहास का अंतिम पर्व देखनेवाले मशहूर पत्रकार, उपन्यासकार एवं निबंधकार अब्दुल हलीम 'शरर" ने अपने उपन्यास 'कल का लखनऊ" (नॅशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया) में इन लडाइयों का विस्तार से रसभरा वर्णन किया हुआ है। एक जमाने में लखनऊ की 'कबूतरबाजी" और 'बटेरबाजी" प्रसिद्ध रही है। 

प्राचीनकाल में बाज को सभी पक्षियों का सिरमौर माना जाता था। राजा के हाथ पर बैठने का बहुमान केवल उसे ही हासिल था। बाज को अच्छे शगुनवाला और राजा का मित्र माना जाता था। ऐसा माना जाता था कि सफेद रंग का बाज निडर, पीले रंग का बाज श्रेष्ठ स्वभाव का और काला बाज बदमाश होता है। सोमेश्वर ने इनकी अनेक जातियों का वर्णन किया हुआ है। बाज को पकडने की पद्धति का वर्णन भी सोमेश्वर ने किया हुआ है। पक्षी विशेषज्ञ बाज को शिकार करने का प्रशिक्षण दिया करते थे। हाथ में कौअॆ को पकडकर उसे बाज को दिखाते थे और फिर उसे 'एहीती" कहकर बुलाते। बाज पास में आकर जैसे ही झपट्टा मारता कि कौअॆ को छोड दिया जाता था। इस प्रकार से कई बार करने पर पक्षी को झपट्टा मारकर पकडने में बाज निपुण हो जाता था। इसी प्रकार से आकाश में उडते पक्षियों पर झपट्टा मारकर पकडने का प्रशिक्षण भी उसे दिया जाता था। 'बाबरनामा" और 'आइन ए अकबरी" में भी बाज का उल्लेख आया है।

जूझ जोरदार हो इसके लिए जूझवाले दिन उसे भूखा रखा जाता था व सोने भी नहीं दिया जाता था जिसके कारण वह क्रोधित  अवस्था में रहता। जूझवाले दिन बाजों को जंगल में ले जाया जाता वहां विभिन्न जातियों के बाजों को राजा विभिन्न पक्षियों के बीच छोड देता। भिन्न-भिन्न पक्षियों से होनेवाली बाजों की लडाइयों का आनंद राजा उठाता। बाज कई पक्षियों को घायल कर मार डालता।  

आज तो पशु-पक्षी प्रेमी इसे निश्चय ही सहन नहीं करेंगे। कई देशों में इस प्रकार के हिंसक खेलों पर प्रतिबंध है। स्मृतिकार मनु ने भी शर्त लगाकर पक्षियों की जूझ पर शर्त लगाकर खेलनेवालों के हाथ तोडने का दंड बतलाया है। बुद्ध के काल में भी मुर्गों को लडवाया जाता था, परंतु बुद्ध ने भिक्षुओं के लिए 'कुक्कुट युद्ध" निषिद्ध माना है। सम्राट अशोक ने भी अपने राज्य में प्राणि द्यूत पर बंदी लाई थी। निश्चय ही इसके पीछे यही भावना थी कि स्वयं के मनोरंजन के लिए निरीह प्राणियों की होनेवाली यातनाओं पर रोक लगे। यजुर्वेद में भी जीवदया को दृष्टि में रख कहा गया है कि 'प्राणी मात्र को दया की दृष्टि से देखो।"