Friday, 6 February 2015

रेल-पेल मची है अभियानों की

इस समय पूरे देश में कई अभियान बडे जोर-शोर से चलाए जा रहे हैं, जैसेकि गंगा स्वच्छता अभियान, सर्वशिक्षा अभियान-चलो स्कूल चलें हम, निर्मल भारत, स्वच्छ भारत, आदि। जब भी कोई अभियान प्रारंभ होता है तो बडी-बडी चर्चाएं होती हैं, मीडिया में समाचार छपते हैं और फिर अंत में टांय-टांय फिस्स, चाहिए वैसे परिणाम हासिल होते ही नहीं और अभियान सरकारी कागजों में सिमटकर रह जाते हैं। उदा. के लिए सर्वशिक्षा अभियान को ही लें - आज भी करोडों बच्चे स्कूल नहीं जाते और प्राप्त समाचारों के अनुसार सन्‌ 2015 तक 'सबको प्राथमिक शिक्षा" के लक्ष्य तक पहुंचना कठिन है। इसके पीछे सबसे बडा कारण ग्रामीण क्षेत्रों में रहनेवाले और आर्थिक दृष्टि से कमजोर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए आधारभूत संरचना नहीं है, न ही इसके लिए कोई विशेष योजना है।

गांधी जयंती 2 अक्टूबर सन्‌ 2014 को शुरु हुए 'स्वच्छ भारत अभियान" की हालत तो और भी बदतर है। उदाहरण के लिए रेल्वे को ही लें, डिब्बे के शौचालयों में फ्लश वॉल्व ही नहीं होते तो, उपयोग के पश्चात फ्लश कैसे करें? रेल्वे स्थानकों, वहां के शौचालयों, डिब्बों के अंदर की गंदगी के लिए जनता भी कम जिम्मेदार नहीं। मेरे एक संबंधी जो सतत प्रवास करते रहते हैं ने इस संबंध में अपने जो अनुभव मेरे साथ साझा किए वे बडे ही चौंकानेवाले हैं। उनके अनुसार लोग एसी कोच में भी गंदगी फैलाने से बाज नहीं आते। (घर से लाया) भोजन करने के पश्चात बचा हुआ भोजन बर्थ के नीचे खिसका देते हैं और कुछ कहने पर नाराज हो जाते हैं। ये तथाकथित मॉडर्न लोग जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वह तो और भी हास्यास्पद है। एक युवा महिला ने अपने बच्चे को खाने के लिए पिज्जा और कोल्डडिं्रक दिया और बाद में बचा हुआ पिज्जा और कोल्डडिं्रक का ग्लास बर्थ के नीचे सरका दिया व बच्चे से कहा  चल बेटा 'आपका हैंड वॉश करा दूं, माउथ साफ करा दूं।"

वास्तव में हमारे यहां अस्वच्छता के पीछे सबसे बडा कारण है - सामाजिक संस्कारों की कमी। जब तक लोग स्वच्छता को अपने आचरण में नहीं लाते, बच्चों में सफाई के संस्कार नहीं डालते तब तक कुछ हो नहीं सकता। दूसरा महत्वपूर्ण कारण अधिकांश लोग स्वच्छता किस प्रकार रखी जाए इस संबंध में भी अनजान हैं। जैसेकि शौचालय एवं वॉशबेसिन का उपयोग किस प्रकार किया जाए, डस्टबिन और पीकदान में का फर्क। यदि स्वच्छता रखनी है तो लोगों को इस संबंध में शिक्षित तथा जागरुक करना पडेगा। एक और कारण है कि दूर-दूर तक जिस प्रकार से मूत्रालय नजर नहीं आते उसी प्रकार से कचरा पेटियां भी नजर नहीं आती। इस कारण लोग जहां खाली जगह दिखी कचरा फैंक देते हैं। प्लास्टिक की पन्नियों, थैलियों के दुरुपयोग पर भी कुछ ना कुछ प्रतिबंध आवश्यक है, आदि।

ऐसे हालात में जब हम पूर्व से ही चले आ रहे अभियानों से वांछित परिणाम हासिल कर नहीं पा रहे हैं उस पर नए-नए अभियान प्रारंभ करना जैसेकि 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ" और शीघ्र ही आरंभ होनेवाला अभियान 'रीड इंडिया कैम्पेन" मतलब केवल अभियानों की भीड या संख्या बढ़ाना मात्र ही सिद्ध होगा। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि लडकियों की भ्रूण हत्याएं हो रही हैं। लडकियों की संख्या लडकों के मुकाबले कई राज्यों-प्रदेशों के क्षेत्र विशेष में कम है इसलिए इस अभियान को प्रारंभ किया गया है। परंतु, जब तक समाज, जनता इन अभियानों से स्वयं होकर नहीं जुडेगी, उन्हें प्रेरित करनेवाली सामाजिक संस्थाएं सक्रिय होकर ईमानदारी से उन्हें गंतव्य तक पहुंचाने में नहीं जुटेगीं, सार्थक परिणाम मिलनेवाले नहीं हैं।

इसी प्रकार से 'रीड इंडिया कैम्पेन"  गांवों में पढ़ने की आदत को बढ़ावा मिले इसलिए प्रारंभ किया जानेवाला है। यह भी एक अत्यंत सार्थक अभियान सिद्ध हो सकता है। क्योंकि, दिन ब दिन लोगों की पढ़ने की आदत छुटती जा रही है वर्तमान में इसके बहुत से कारण हैं। वैसे तो पढ़ने के मामले में हमेशा से ही कमजोरी नजर आई है परंतु, पहले फिर भी लोग पढ़ लिया करते थे भले ही मांग करके ही सही। उस समय 'सरिता" जैसी समाज को जागरुक करने का प्रयास करनेवाली पत्रिका ने एक अभियान चलाया था 'क्या आप मांगकर खाते हैं, क्या आप मांगकर पहनते हैं? नहीं ना तो फिर आप मांगकर क्यों पढ़ते हैं?" लेकिन लगता है कि प्रयास कम पडे तभी तो दिनमान, धर्मयुग जैसी पत्रिकाएं बंद हो गई। फिर भी पढ़ना लोगों की आदत में शुमार हो के प्रयास करनेवाले प्रयास कर ही रहे हैं। जैसेकि कुछ माह पूर्व मैंने एक पत्रिका पढ़ी थी जो टाटा की किसी कंपनी द्वारा केवल इसलिए शुरु की गई कि लोग पढ़ने की आदत डालें। 

महाराष्ट्र सातारा जिले के वाई गांव कस्बे के प्रदीप लोखंडे ने ग्रामीण क्षेत्र की भावी पीढ़ि को शैक्षणिक दृष्टि से मजबूत करने और ग्रामीण भाग को विकसित करने के लिए सन्‌ 2000 में पुणे में 'रुरल रिलेशन्स" नामकी संस्था स्थापित की। इस संस्था द्वारा 'ग्यान की" ग्रंथालयों का उपक्रम आरंभ किया गया है। अभी तक वे 1255 ग्रंथालय दान कर चूके हैं। इस संबंध में अभिप्राय प्रकट करनेवाले 200 से 400 पोस्टकार्ड उन्हें प्रतिदिन प्राप्त होते हैं।

वास्तव में अभियानों की इस रेल-पेल में यदि सर्वाधिक आवश्यकता किसी अभियान की है तो वह है जनसंख्या नियंत्रण की। आज हमारे देश में जनसंख्या विस्फोट हो गया है। हालात ऐसे हो गए हैं कि हम लाख अभियान छेडें, इंफ्रास्ट्रकचर खडे करें, भांति-भांति के संसाधन जुटा लें, वे ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित होंगे। समस्याएं हल होने के स्थान पर बढ़ेंगी ही। उदाहरण के लिए ध्वनि व वायु प्रदूषण नियंत्रण के मुद्दे को ही लें। जनसंख्या बढ़ेगी तो वाहन भी बढ़ेंगे ही और वाहन बढ़ेंगे तो ध्वनि व वायु प्रदूषण बढ़ेगा ही, कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ेगा ही। जनसंख्या बढ़ने से जो योजनाएं जैसेकि वाटर सप्लाय, ड्रेनेज सिस्टम, रास्तों की चौडाई, रेल सुविधाएं आदि तय कर किए गए कार्य समय के पूर्व ही अपर्याप्त सिद्ध हो जाएंगे, हो भी रहे हैं।

परंतु, खेद है कि इस संबंध में कोई अभियान छेडना तो दूर हमारे नेता इस संबंध में कोई सार्थक बात तक करना पसंद नहीं करते। उलटे कोई कह रहा है चार बच्चे पैदा करो, तो कोई कहता है पांच पैदा करो, जो भी समस्या आएगी वह भगवान हल कर देंगे। यदि सारी समस्याएं भगवान को ही हल करना है और भगवान ही करनेवाले हैं तो रोज नए-नए अभियान प्रारंभ करने की आवश्यकता ही क्या है?

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