Thursday, 26 February 2015

महापुरुषों का प्रभाव - अटलजी और प्रधानमंत्री मोदी पर

जब अटल बिहारी बाजपेयी एनडीए 1 के प्रधानमंत्री थे। तब 'उन्होंने स्वयं उन दस महान व्यक्तियों के नाम गिनाए थे, जिन्होंने उनके संपूर्ण व्यक्तित्व को प्रभावित किया। ... इन दस व्यक्तियों में आठ भारतीय हैं और दो विदेशी हैं। 'रेडिफ ऑन द नेट" चैनल के 'द मिलेनियम स्पेशल" श्रंखला को दिए गए साक्षात्कार में श्री वाजपेयी ने यह जानकारी दी थी। उन्होंने कहा था - इन व्यक्तियों का प्रभाव मुझ पर छात्र जीवन से रहा तो कुछ नेताओं ने मेरे पांच दशक के राजनीतिक जीवन पर छाप छोडी। स्वामी विवेकानंद से मैं बाल्यकाल से प्रभावित रहा। बाल्यकाल के बाद जब मैं पत्रकार बना और आज जब मैं देश का प्रधानमंत्री हूं, तब भी स्वामी विवेकानंद का जीवन और संदेश मुझे  प्रेरणा देता रहता है। ... महात्मा गांधी का भी मुझ पर बहुत प्रभाव है। आधुनिक भारत के निर्माण में उनका योगदान अमूल्य है। शहीद भगतसिंह ने तो मेरी समूची पीढ़ी की कल्पनाशक्ति को ही चुनौती दी। विदेशियों के खिलाफ उनके संघर्ष से तो मैं अवाक्‌ रह गया। बैरिस्टर सावरकर की राष्ट्रवाद के इतिहास में मिसाल नहीं है। अत्यंत विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष कैसे किया जाए, यह मैंने उनसे सीखा है। मेरे छात्र जीवन को प्रभावित करनेवाले नेताओं में नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी थे। आजादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल और पंडित जवाहरलाल नेहरु से मैंने खूब सीख ली। आज जो भारत हम देख रहे हैं, उसका निर्माण पटेल-नेहरु ने ही किया। अखंड भारत के लिए डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के राष्ट्रवाद को मैं कतई नहीं भूल सकता। विंस्टन चर्चिल और मार्टिन ल्यूथर किंग के जीवन से भी मुझे प्रेरणा मिली है।" (नईदुनिया 9-12-99)

अब नरेंद्र मोदी एनडीए 2 के प्रधानमंत्री हैं और वे गांधी-पटेल से बहुत प्रभावित हैं। यह गांधीजी का ही प्रभाव है जिसके कारण 2 अक्टूबर 2014 को 'स्वच्छ भारत अभियान" का आगाज कर सन्‌ 2019 तक संपूर्ण भारत को स्वच्छ कर गांधीजी के 'स्वच्छ भारत" के सपने को साकार करने का बीडा उन्होंने उठाया है। गांधीजी स्वच्छता पसंद होेने के साथ ही साथ सादगीप्रिय भी थे। मोदी जिस संघपरिवार से आते हैं उस परिवार में भी स्वच्छता पसंदगी और सादगीप्रियता की परंपरा रही है। लेकिन मोदी की जीवनशैली और कार्यशैली दोनो ही तडक-भडक पूर्ण और सामनेवाले को चकाचौंध कर देनेवाली है। वैसे इस मामले में यह भी कहा जा सकता है कि पसंद अपनी-अपनी, शौक अपना-अपना।

संघपरिवार में चाणक्य और चंद्रगुप्त का भी बडा प्रभाव है और उनके उदाहरण भी दिए जाते रहते हैं। इन्हीं कौटिल्य और चंद्रगुप्त पर एक एपिसोड्‌ क्रमांक (10) 'मानव पुरुषार्थ - अर्थ" 'उपनिषद गंगा" में है। इस 'उपनिषद गंगा" धारावाहिक का प्रसारण तीन-चार वर्ष पूर्व उपनिषदों के विचार और वैदिक संस्कृति से अवगत कराने के प्रयत्न के तहत दूरदर्शन द्वारा किया गया था। इस एपिसोड्‌ का कुछ वार्तालाप प्रासंगिक होने के कारण उसका उल्लेख यहां कर रहा हूं। (यह संपूर्ण एपिसोड्‌ देखना पाठकों के लिए अधिक योग्य साबित होगा)

चंद्रगुप्त राज्य संचालन एवं अपने जीवन के निजी विषयों के संबंध में चाणक्य के कठोर निर्णयों से दुखी हो कह उठता है - नहीं बनना मुझे सम्राट, नहीं चाहिए यह साम्राज्य। नहीं होगा यह राज्याभिषेक। रोक दो यह राज्याभिषेक। इसके बाद चाणक्य आकर कहते हैं ः यह क्या सुन रहा हूं मैं चंद्रगुप्त।

चंद्रगुप्त ः आपने ठीक ही सुना है आचार्य। नहीं बनना मुझे मगध का सम्राट। चाणक्य ः क्यों? 
चंद्रगुप्त ः जब से यहां आया हूं, अपनी इच्छा से सांस तक नहीं ले सका हूं। आपने मुझे एक महान स्वप्न दिया था। चक्रवर्ती सम्राट का स्वप्न। एक महान साम्राज्य का स्वप्न। परंतु, यहां आने के बाद पता चला, आचार्य विष्णुगुप्त के लिए सम्राट एक वेतन लेनेवाले नौकर से बढ़कर कुछ नहीं।
चाणक्य ः तूने ठीक ही समझा है चंद्रगुप्त। मेरे लिए सम्राट समाज के नौकर से बढ़कर कुछ नहीं।
चंद्रगुप्त ः तो रखें अपना साम्राज्य। नहीं बनना मुझे सम्राट। यदी यही सुख है सम्राट होने का।
चाणक्य ः चंद्रगुप्त तुझे सुखी होना है। चंद्रगुप्त ः क्या सम्राटों को सुखी नहीं होना चाहिए?
चाणक्य ः मूर्ख, जब तक तेरे साम्राज्य में एक भी व्यक्ति भूखा है तो क्या, तू सुखी हो पाएगा? सुख शिक्षक और सम्राटों के भाग्य में नहीं होता। भूल गया तू, चंद्रगुप्त। मैंने तुझे साम्राज्य देने का वचन दिया था। सुख देने का नहीं। भूल गया तू, प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है। सुख चाहता है! तो, पहले अपनी प्रजा को सुखी बना। तूने साम्राज्य अर्जित किया है। सुख अर्जित करने का मार्ग भी तेरे लिए खुला है। (क्या यही एकात्ममानवतावाद नहीं है)

तत्पश्चात चंद्रगुप्त का राज्याभिषेक चाणक्य के हाथों होता है। इस समय चाणक्य चंद्रगुप्त को उपदेश देता है- चंद्रगुप्त यह राष्ट्र तुम्हें सौंपा जाता है। तुम इसके संचालक, नियामक और उत्तरदायित्व के दृढ़वाहनकर्ता हो। यह राज्य तुम्हें कृषि के कल्याण, संपन्नता और प्रजा के पोषण के लिए दिया जाता है। 

इस पूरे घटनाक्रम के पश्चात उद्‌घोषिका कहती है - अपने महान गुरु के महान शिष्य चंद्रगुप्त ने अर्थ का ऐसा पाठ पढ़ा कि अपने जीवन के अंतकाल में चालीस दिन तक अन्न ग्रहण नहीं किया। क्यूं? क्योंकि, अपने जीवन के अंतसमय में चंद्रगुप्त के राज्य में भीषण अकाल के कारण लोगों के पास अन्न नहीं था। महान गुरु, महान शिष्य, महान आदर्श। अपने महान शिष्य के लिए महान गुरु ने कौटिल्य के नाम से अर्थशास्त्र नामक ग्रंथ की रचना की।

Thursday, 19 February 2015

 शिवरात्री विशेष 
शिवशंकर की आंख से टपका आंसू - रुद्राक्ष 

रुद्राक्ष हिंदुओं के जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। रुद्राक्ष को धारण करनेवाला शिव का आराधक है ही यह माना जाता है। जिस प्रकार से शिवजी की पूजा में आक, धतूरा, बेलपत्र और चंदन अनिवार्य रुप से रहते ही हैं उसी प्रकार से रुद्राक्ष भी होता ही है। रुद्राक्ष यानी रुद्र + अक्ष। एक और अर्थ रुद्र के तेज से बहे अश्रु। रुद्राक्ष को हिंदुओं के दैनिक जीवन में कैसे स्थान मिला इस संबंध में कथा इस प्रकार से है ः प्राचीनकाल में असुरों का नेता त्रिपुरासुर ने युद्ध में देवताओं को पराजित कर दिया। दुखी हो देवता शिवजी की शरण में आए। थोडा विचार करने के पश्चात शिव ने नेत्र मूंद लिए और हजारों वर्ष की तपस्या में लीन हो गए। लंबे समय के पश्चात अनायास उन्होंने अपने नेत्र जरा से खोले और उनसे आंसू की बूंंदे टपक पडी। कहते हैं उन्हीं आंसुओंं से रुद्राक्ष का वृक्ष पल्लवित हुआ। इस प्रकार जनकल्याण की भावना से उत्पन्न हुआ शिवजी का यह अंशरुपी परम श्रेष्ठ फल है रुद्राक्ष जो शिवजी को बहुत ही प्रिय है। रुद्राक्ष धारण करने से भुक्ति-मुक्ति, कल्याण एवं सर्वांगिण सुख-शांति प्राप्त होती है।

बताया जाता है कि सूर्य से बारह प्रकार के रुद्राक्ष अस्तित्व में आए, सोलह चन्द्रमा से और दस अग्नि से जन्मे हैं। सूर्य से निकले  रुद्राक्ष का रंग रक्त की भांति लाल, चन्द्रमा से निकले रुद्राक्ष का रंग सफेद एवं अग्नि से निकले काले रंग के थे। प्रत्येक रुद्राक्ष पर खाने एवं मुख अंकित होते हैं और उनके अंकों में भी विभिन्नता होती है। इसकी इक्कीस किस्में अस्तित्व में हैं। पंचमुखी रुद्राक्ष बहुतायत से उपलब्ध होते हैं एवं सस्ते भी होते हैं। जबकि एकमुखी, ग्यारह मुखी, चौदह मुखी और इक्कीस मुखी रुद्राक्ष दुर्लभ होते हैं। अलग-अलग मुखी रुद्राक्ष एक ही पेड पर हो सकते हैं। जंगल में रुद्राक्ष को एकत्र किया जाता है, फिर मुख के अनुसार उन्हें छांटा जाता है। वैसे नकली रुद्राक्ष मिलना आम बात है। रुद्राक्ष का भ्रम उत्पन्न करनेवाला छोटे बेर के आकार का रुद्राक्ष भी मिलता है जो बडा सुंदर होता है। प्रायः यह जावा-सुमात्रा द्वीपों से आता है। महिलाएं इसकी माला गले में पहनती हैं, परंतु यह रुद्राक्ष से भिन्न है। हरिद्वार और वाराणसी जैसे धार्मिक केंद्रों पर रुद्राक्ष जैसा ही एक वृक्ष पाया जाता है जिसका फल भी बिल्कूल रुद्राक्ष जैसा ही होता है इसे भद्राक्षस कहा जाता है। छोटे आकार का रुद्राक्ष सुख और भाग्य बढ़ानेवाला होता है।

एक मुखी रुद्राक्ष स्वयं शिव का प्रतिनिधित्व करता है और प्रायः दुर्लभ है। जिसके पास एकमुखी रुद्राक्ष होता है उसके पास किसी चीज का अभाव नहीं रहता। शैव मतावलंबियों के मतानुसार सदाशिव स्वरुप एक मुखी रुद्राक्ष वृक्ष से चटखकर वहीं गिरता है जहां विधिवत शिवलिंग की स्थापना की गई हो एवं वहीं विलीन भी हो जाता है। 

दो मुखी रुद्राक्ष विरल होकर उसको गौरीशंकर के नाम से संबोधित किया जाता है और पाप दूर करता है। तीन मुखी रुद्राक्ष अग्निस्वरुप होकर यह माना जाता है कि शक्तिप्रदाता होकर बीमारी दूर करता है एवं बेरोजगारी भी दूर करता है। चतुर्मुखी रुद्राक्ष ब्रह्म स्वरुप होकर छात्रों के लिए औषधी है। यह मस्तिष्क को तेज करता है व स्मरणशक्ति भी बढ़ाता है। पंचमुखी रुद्राक्ष कालाग्नि का स्वरुप है। सभी अभक्ष्य एवं अगम्यागम्य पापों से मुक्ति दिलाता है। ह्रदयरोग एवं मानसिक अशांति वालों के लिए लाभदायक है।

छहमुखी रुद्राक्ष साक्षात कार्तिकेय है। इसे दाहिने हाथ में धारण करना चाहिए। जो इसे धारण करता है उसकी भौतिक इच्छाओं की क्षति नहीं होती। यह हिस्टीरिया, रक्तचाप एवं स्त्री रोगों का भी उपचार करता है। सप्तमुखी रुद्राक्ष कामदेव का प्रतीक है और धन की प्राप्ति कराता है। अष्टमुखी रुद्राक्ष व्यापारियों के लिए लाभकारी है एवं साक्षात गणेश स्वरुप है। नौमुखी रुद्राक्ष भैरव नाम होकर बाएं हाथ में पहना जाता है। यह दुर्लभ होकर भैरव के समान शक्ति प्राप्त होती है।

दसमुखी रुद्राक्ष जनार्दन यानी विष्णु का रुप है। इसको धारण करनेवाले के पास भूत-पिशाच निकट नहीं आते। ग्यारहमुखी रुद्राक्ष रुद्र का प्रतीक है। इसे शिखा में धारण करने का विधान है और अधिकतर महिलाएं इसे धारण करती हैं। द्वादशमुखी रुद्राक्ष बारह आदित्यों का निवास स्थान है। इसे कानों में ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए धारण किया जाता है। इससे पशुओं के दांतों और सिंगों से सुरक्षा मिलती है। तेरह मुखी रुद्राक्ष कार्तिकेय के समान धर्म, अर्थ काम और मोक्ष प्रदान करता है। चौदहमुखी रुद्राक्ष शिव का नेत्र है, शिव स्वरुप है और इससे बीमारी के विरुद्ध रक्षा होती है। पंद्रहमुखी रुद्राक्ष पशुपतिनाथ का प्रतीक है। यह उन लोगों के लिए लाभकारी है जो आध्यात्मिक उपलब्धि चाहते हैं। सोलहमुखी रुद्राक्ष धारण करनेवाले की चोरी के विरुद्ध रक्षा होती है। सत्रहमुखी रुद्राक्ष विश्वकर्मा का प्रतीक है। लोगों का विश्वास है कि इसको धारण करने से अचानक धन प्राप्ति होती है। अठराहमुखी रुद्राक्ष को पृथ्वी का प्रतीक माना जाता है तो कुछ लोग इस भैरवस्वरुप भी मानते हैं। गर्भवती महिलाओं की समयापूर्व प्रसूती से रक्षा करता है और बच्चों की रोगों से रक्षा करता है। उन्नीसमुखी साक्षात नारायण का रुप है और इसको धारण करनेवाले की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। बीसमुखी रुद्राक्ष ब्रह्म का प्रतीक होकर ज्ञानवर्धक होने के साथ ही मानसिक शांति प्रदाता एवं नेत्र रोगों में लाभकारी होता है। अंत में इक्कीसमुखी रुद्राक्ष जो कि अत्यंत दुर्लभ होता है और कुबेर का प्रतीक है। जो लोग सांसारिक सुख-विलास-आनंद चाहते हैं वे इसे धारण करते हैं। यह निर्धनता को पास फटकने भी नहीं देता। अनेक उदाहरण रुद्राक्ष की महिमा साबित करते हैं। रुद्राक्ष न केवल आध्यात्मिकता का प्रतीक है वरन्‌ चिकित्सा के उपयोग में भी लाया जाता है। इसे किसी शुभ मुहुर्त में धारण करना चाहिए। रुद्राक्ष साक्षात शिव होकर इसकी महिमा रुद्राक्ष महिमा के बिना अधूरी ही रहेगी। परंतु, लेख की सीमा को देखते दे नहीं रहा हूं। 

Friday, 6 February 2015

रेल-पेल मची है अभियानों की

इस समय पूरे देश में कई अभियान बडे जोर-शोर से चलाए जा रहे हैं, जैसेकि गंगा स्वच्छता अभियान, सर्वशिक्षा अभियान-चलो स्कूल चलें हम, निर्मल भारत, स्वच्छ भारत, आदि। जब भी कोई अभियान प्रारंभ होता है तो बडी-बडी चर्चाएं होती हैं, मीडिया में समाचार छपते हैं और फिर अंत में टांय-टांय फिस्स, चाहिए वैसे परिणाम हासिल होते ही नहीं और अभियान सरकारी कागजों में सिमटकर रह जाते हैं। उदा. के लिए सर्वशिक्षा अभियान को ही लें - आज भी करोडों बच्चे स्कूल नहीं जाते और प्राप्त समाचारों के अनुसार सन्‌ 2015 तक 'सबको प्राथमिक शिक्षा" के लक्ष्य तक पहुंचना कठिन है। इसके पीछे सबसे बडा कारण ग्रामीण क्षेत्रों में रहनेवाले और आर्थिक दृष्टि से कमजोर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए आधारभूत संरचना नहीं है, न ही इसके लिए कोई विशेष योजना है।

गांधी जयंती 2 अक्टूबर सन्‌ 2014 को शुरु हुए 'स्वच्छ भारत अभियान" की हालत तो और भी बदतर है। उदाहरण के लिए रेल्वे को ही लें, डिब्बे के शौचालयों में फ्लश वॉल्व ही नहीं होते तो, उपयोग के पश्चात फ्लश कैसे करें? रेल्वे स्थानकों, वहां के शौचालयों, डिब्बों के अंदर की गंदगी के लिए जनता भी कम जिम्मेदार नहीं। मेरे एक संबंधी जो सतत प्रवास करते रहते हैं ने इस संबंध में अपने जो अनुभव मेरे साथ साझा किए वे बडे ही चौंकानेवाले हैं। उनके अनुसार लोग एसी कोच में भी गंदगी फैलाने से बाज नहीं आते। (घर से लाया) भोजन करने के पश्चात बचा हुआ भोजन बर्थ के नीचे खिसका देते हैं और कुछ कहने पर नाराज हो जाते हैं। ये तथाकथित मॉडर्न लोग जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वह तो और भी हास्यास्पद है। एक युवा महिला ने अपने बच्चे को खाने के लिए पिज्जा और कोल्डडिं्रक दिया और बाद में बचा हुआ पिज्जा और कोल्डडिं्रक का ग्लास बर्थ के नीचे सरका दिया व बच्चे से कहा  चल बेटा 'आपका हैंड वॉश करा दूं, माउथ साफ करा दूं।"

वास्तव में हमारे यहां अस्वच्छता के पीछे सबसे बडा कारण है - सामाजिक संस्कारों की कमी। जब तक लोग स्वच्छता को अपने आचरण में नहीं लाते, बच्चों में सफाई के संस्कार नहीं डालते तब तक कुछ हो नहीं सकता। दूसरा महत्वपूर्ण कारण अधिकांश लोग स्वच्छता किस प्रकार रखी जाए इस संबंध में भी अनजान हैं। जैसेकि शौचालय एवं वॉशबेसिन का उपयोग किस प्रकार किया जाए, डस्टबिन और पीकदान में का फर्क। यदि स्वच्छता रखनी है तो लोगों को इस संबंध में शिक्षित तथा जागरुक करना पडेगा। एक और कारण है कि दूर-दूर तक जिस प्रकार से मूत्रालय नजर नहीं आते उसी प्रकार से कचरा पेटियां भी नजर नहीं आती। इस कारण लोग जहां खाली जगह दिखी कचरा फैंक देते हैं। प्लास्टिक की पन्नियों, थैलियों के दुरुपयोग पर भी कुछ ना कुछ प्रतिबंध आवश्यक है, आदि।

ऐसे हालात में जब हम पूर्व से ही चले आ रहे अभियानों से वांछित परिणाम हासिल कर नहीं पा रहे हैं उस पर नए-नए अभियान प्रारंभ करना जैसेकि 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ" और शीघ्र ही आरंभ होनेवाला अभियान 'रीड इंडिया कैम्पेन" मतलब केवल अभियानों की भीड या संख्या बढ़ाना मात्र ही सिद्ध होगा। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि लडकियों की भ्रूण हत्याएं हो रही हैं। लडकियों की संख्या लडकों के मुकाबले कई राज्यों-प्रदेशों के क्षेत्र विशेष में कम है इसलिए इस अभियान को प्रारंभ किया गया है। परंतु, जब तक समाज, जनता इन अभियानों से स्वयं होकर नहीं जुडेगी, उन्हें प्रेरित करनेवाली सामाजिक संस्थाएं सक्रिय होकर ईमानदारी से उन्हें गंतव्य तक पहुंचाने में नहीं जुटेगीं, सार्थक परिणाम मिलनेवाले नहीं हैं।

इसी प्रकार से 'रीड इंडिया कैम्पेन"  गांवों में पढ़ने की आदत को बढ़ावा मिले इसलिए प्रारंभ किया जानेवाला है। यह भी एक अत्यंत सार्थक अभियान सिद्ध हो सकता है। क्योंकि, दिन ब दिन लोगों की पढ़ने की आदत छुटती जा रही है वर्तमान में इसके बहुत से कारण हैं। वैसे तो पढ़ने के मामले में हमेशा से ही कमजोरी नजर आई है परंतु, पहले फिर भी लोग पढ़ लिया करते थे भले ही मांग करके ही सही। उस समय 'सरिता" जैसी समाज को जागरुक करने का प्रयास करनेवाली पत्रिका ने एक अभियान चलाया था 'क्या आप मांगकर खाते हैं, क्या आप मांगकर पहनते हैं? नहीं ना तो फिर आप मांगकर क्यों पढ़ते हैं?" लेकिन लगता है कि प्रयास कम पडे तभी तो दिनमान, धर्मयुग जैसी पत्रिकाएं बंद हो गई। फिर भी पढ़ना लोगों की आदत में शुमार हो के प्रयास करनेवाले प्रयास कर ही रहे हैं। जैसेकि कुछ माह पूर्व मैंने एक पत्रिका पढ़ी थी जो टाटा की किसी कंपनी द्वारा केवल इसलिए शुरु की गई कि लोग पढ़ने की आदत डालें। 

महाराष्ट्र सातारा जिले के वाई गांव कस्बे के प्रदीप लोखंडे ने ग्रामीण क्षेत्र की भावी पीढ़ि को शैक्षणिक दृष्टि से मजबूत करने और ग्रामीण भाग को विकसित करने के लिए सन्‌ 2000 में पुणे में 'रुरल रिलेशन्स" नामकी संस्था स्थापित की। इस संस्था द्वारा 'ग्यान की" ग्रंथालयों का उपक्रम आरंभ किया गया है। अभी तक वे 1255 ग्रंथालय दान कर चूके हैं। इस संबंध में अभिप्राय प्रकट करनेवाले 200 से 400 पोस्टकार्ड उन्हें प्रतिदिन प्राप्त होते हैं।

वास्तव में अभियानों की इस रेल-पेल में यदि सर्वाधिक आवश्यकता किसी अभियान की है तो वह है जनसंख्या नियंत्रण की। आज हमारे देश में जनसंख्या विस्फोट हो गया है। हालात ऐसे हो गए हैं कि हम लाख अभियान छेडें, इंफ्रास्ट्रकचर खडे करें, भांति-भांति के संसाधन जुटा लें, वे ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित होंगे। समस्याएं हल होने के स्थान पर बढ़ेंगी ही। उदाहरण के लिए ध्वनि व वायु प्रदूषण नियंत्रण के मुद्दे को ही लें। जनसंख्या बढ़ेगी तो वाहन भी बढ़ेंगे ही और वाहन बढ़ेंगे तो ध्वनि व वायु प्रदूषण बढ़ेगा ही, कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ेगा ही। जनसंख्या बढ़ने से जो योजनाएं जैसेकि वाटर सप्लाय, ड्रेनेज सिस्टम, रास्तों की चौडाई, रेल सुविधाएं आदि तय कर किए गए कार्य समय के पूर्व ही अपर्याप्त सिद्ध हो जाएंगे, हो भी रहे हैं।

परंतु, खेद है कि इस संबंध में कोई अभियान छेडना तो दूर हमारे नेता इस संबंध में कोई सार्थक बात तक करना पसंद नहीं करते। उलटे कोई कह रहा है चार बच्चे पैदा करो, तो कोई कहता है पांच पैदा करो, जो भी समस्या आएगी वह भगवान हल कर देंगे। यदि सारी समस्याएं भगवान को ही हल करना है और भगवान ही करनेवाले हैं तो रोज नए-नए अभियान प्रारंभ करने की आवश्यकता ही क्या है?