Saturday, 31 January 2015

30 जनवरी हुतात्मा दिवस - 
गांधीयुग का आदर्श सेवामयी जीवनव्रती - 
अप्पा पटवर्धन उर्फ कोंकण का गांधी

आज जब चारों ओर स्वच्छता और शौचालयों पर चर्चा बडे जोर शोर से चल रही है ऐसे समय में महान कर्मयोगी अप्पा पटवर्धन (सीताराम पुरुषोत्तम पटवर्धन) जो गांधीजी के असहकार युग के पहले ही उनके सत्याग्रह आश्रम में दाखिल हो गए थे। जिनकी मूलभूत प्रेरणा थी - मातृभक्ति, ब्रह्मचर्य, दलित सेवा। उनका गोपूरी का प्रयोग बडा प्रसिद्ध हुआ था। जिसके बाद वे विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से भी जुडे के आत्म चरित्र को जो स्वच्छता विषय से जुडा है, प्रस्तुत करना अत्यंत समयानुकूल समझ उसे संक्षेप में प्रस्तुत कर रहा हूं। उनकी 'जीवन यात्रा" के महत्व को बतलाने की आवश्यकता इसलिए महसूस होती है क्योंकि, अप्पा पटवर्धन उन 8-10 दस लोगों में से एक थे जिन्होंने गांधी कार्य को उत्तम रीति से समझ अपना जीवन उसके लिए अर्पित करना तय किया था। उनके बारे में विनोबा भावे हमेशा कहते थे - 'एक अप्पा, बाकी गप्पा।" (काम करनेवाला एक ही है अप्पा बाकी सब गपोडे)

उनके लिखे इस आत्मचरित्र में अत्यंत उच्च प्रति की प्रामाणिकता सर्वत्र मिलती है। इसकी साक्ष यह पक्तियां हैं ः 'गांधी और अप्पा पटवर्धन में फर्क बतलाते हुए वे कहते हैं ः जो बात उचित और आवश्यक है इसलिए बुद्धि सहमत हुई वह लोगों की निंदा-स्तुती की परवाह ना करते तत्काल अमल में लाना यह गांधीजी एक दिन में कर दिखाते थे और वही करने में मुझे कई वर्ष लगे और अंत में करने लगा वह भी गांधीजी के आश्रम के आश्रय से (वे सार्वजनिक अप्पा गांधीजी के सत्याग्रह आश्रम में ही बने) और बाद में कर्तव्य विस्मृति दूर हुई, जागृति आई वह रस्किन को पढ़ने से।" जॉन रस्किन की 'अंटु दिस लास्ट" भारत में 'सर्वोदय" के नाम से प्रसृत हुई। जिसे गांधीजी ने रेल यात्रा के दौरान पढ़ा था और उसका परिणाम वे बॅरिस्टर गांधी से किसान गांधी बन गए। फिर वे क्रमशः चमार, हरिजन और बुनकर भी बने। 

संडास शब्द से उनका परिचय सबसे पहले 1904 में तब हुआ जब वे पहली बार रत्नागिरी नगर मिडल स्कूल स्कॉलर्शिप की परीक्षा के लिए आए थे। उन्हीं के शब्दों मेें ः 'रत्नागिरी शहर का वैभव देखकर मैं चकित हो गया परंतु, जब दूसरे दिन मैं संडास में गया वह प्रसंग मैं जीवनभर नहीं भूल नहीं सकता। संडास की बदबू इतनी असह्य थी कि वहां एक मिनिट भर सांस रोक कर बैठना तक दुश्वार हो गया। इस कारण कई वर्षों तक मैं संडास में ही नहीं गया। खुले में शौच के लिए जाता था। बरसात के दिनों में धान के खेत की मुंडेर पर बैठना पडता था जिस पर मुझे बडा अफसोस होता था। वे आगे कहते हैं स्वच्छ संडास मेरी एक जीवन विषयक आवश्यकता है। (वर्तमान में भी यही परिस्थिति कई स्थानों पर बडी सहजता से दिख जाएगी) 

स्पूतनिक की नीति शौचालयों के संबंध में जागरुकता आए के तहत मैंने सबसे पहला लेख 'स्पूतनिक" में 31 दिसंबर से 6 जनवरी 2013 के अंक में लिखा था जिसमें मैंने लिखा था कि 'आपको आश्चर्य होगा कि 20 शताब्दी के आरंभ तक हमारे नेताओं को शौचालय भी कोई समस्या है इसका भान तक न था। यह एक समस्या है इस ओर सबसे पहले यदि किसीने ध्यान आकर्षित किया तो वह थे गांधीजी। गांधीजी कांग्रेस के हर अधिवेशन में सबसे पहले शौचालयों की व्यवस्था की ओर ही ध्यान देते थे कि पानी आदि की समुचित व्यवस्था है कि नहीं!"

यह वाक्य कितना सटिक था इसका पता अप्पा के 'मेरी जीवन यात्रा" इस आत्मचरित्र से भी पता चलता है। वे लिखते हैं ः 'खादी संघ की सभा के लिए अगस्त 1925 में मैं (अहमद) नगर में गया। वहां 'पेशाब करने के लिए कहां जाएं?" पूछने पर सूचना मिली कि छत पर चले जाएं। छत का उपयोग शौच के लिए भी किया जाता है का पता मुझे चला। रत्नागिरी और मुंबई-पुणे के बाहर के महाराष्ट्र का यह मेरा पहला परिचय था।"

उनके द्वारा सार्वजनिक स्वच्छता कार्य अप्रैल 1928 से अचानक प्रारंभ हुआ। कोंकण बालावली के नारायण मंदिर में जहां रामनवमी के उत्सव के वास्ते चार दिन के लिए अनेक गांवों के लोग एकत्रित होते थे, वे चरखे के प्रचार-प्रसार कार्य के लिए गए। धर्मशाला के निकट ही एक तालाब था रात में वे वहां पानी पीने के लिए गए। मंदिर के आसपास पेशाब की बदबू आ रही थी और वही पेशाब का बहाव बहकर तालाब की सीढ़ियों पर आ गया था। (पेशाब के बहाव के इसी प्रकार के नजारे इंदौर के नवलखा बस स्टैंड पर भी देखे जा सकते हैं) सुबह क्या देखते हैं कि तालाब के दूसरे किनारे पर लोग निवृत्त हो रहे हैं और सफाई भी उसी तालाब में कर रहे हैं। उनके पास सामने प्रश्न खडा हो गया 'अब क्या करें? चार दिन कैसे रहेंगे? गांव छोडकर जाएं तो पलायनवाद होगा।" अंत में उत्सव के संचालक से जाकर मिले और उसके सामने उत्सव के दौरान सफाई की योजना रखी। गड्‌ढ़ों के मूत्रालय और कचरे के लिए टोकरियां। संचालक ने सहयोग का आश्वासन दिया और इस प्रकार से उनके सफाई कार्यक्रम की शुरुआत हुई। परिणामस्वरुप उत्सव के दौरान स्वच्छता बनी रही। 

स्थानीय समाचार पत्र में स्वच्छता कार्य की प्रशंसा छपी। उनके स्वच्छता कार्य की दखल सर्व्हंट्‌स ऑफ इंडिया सोसायटी के अधिकारी एन.एम.जोशी ने ली। उन्होंने कहा 'तुम्हारे गांधीवाद से मैं सहमत नहीं हूं तो भी तुम्हारी ग्राम सेवा अमूल्य है। हमारी सोशल सर्विस लीग के पास फ्लारेंस नाइटेंगल व्हिलेज सेनिटेशन फंड है उससे हम सहायता मंजूर करेंगे।" अप्पा ने गड्‌ढ़ोंवाले शौचालयों के प्रचार की कल्पना उनके सामने रखी। इसके लिए रु. 150 मंजूर कर अप्पा को भिजवा दिए। अप्पा ने गड्‌ढ़े, झांप, तट्टे, टाट, आदि सामग्री के शौचालय निर्मित कर उसे किसान का शौचालय नाम दिया। सावंतवाडी म्युनसिपालटी ने भी इन्हें मंजूरी प्रदान कर दी। इन शौचालयों की तारीफ हुई।

1928 से उनके द्वारा संडास-मूत्रालय-स्वच्छता बाबद अनेक उपक्रम, प्रचार, प्रयोग और सत्याग्रह किए गए थे। 1946 में वे हरिजन मुक्ति कार्य की ओर अग्रसर हुए। इसका पहला प्रयोग कणकवली में किया। इसका कारण यह था कि कणकवली गांव की सार्वजनिक सफाई बाबद की स्थिति अत्यंत ही दयनीय थी। कणकवली के तिराहे पर ही गाडियां रुका करती थी और जहां बाजार, पोस्ट-ऑफिस, स्कूल आदि होने के कारण बडी भीड रहा करती थी। वहीं आसपास लोग पेशाब किया करते और निकट की झाडियों में निवृत्त भी हो लिया करते थे। यह सब वह मुंबई-गोवा हायवे बन जाने के बावजूद बदस्तूर जारी था। इस कारण बरसात के दिनों में वहां दुर्गंध व्याप्त रहती थी। अप्पा कहते हैं 'मुझे स्वयं को पेशाब के लिए बार-बार जाना पडता था इस कारण छोटे शहरों और गांवों में जहां सार्वजनिक मूत्रालय नहीं होते वहां पेशाब जाने में कठिनाई महसूस होती थी।" (आज भी परिस्थितियां कुछ विशेष बदली नहीं हैं) कणकवली का रहवासी होने के कारण मैं स्वयं को बडा शर्मिंदा महसूस किया करता था।

देश की स्वतंत्रता निकट ही थी और अब जेल जाने के प्रसंग आनेवाले नहीं थे। स्वतंत्र भारत स्वच्छ भारत होना चाहिए इस दृष्टि से कुछ प्रयत्न करना चाहिए यह सोच 'स्वच्छ कणकवली" की योजना हाथ में ली। 1946 मई में कणकवली में जगह-जगह पर  सार्वजनिक शौचालय और विशेष स्थानों एवं स्कूलों में मूत्रालय आरंभ करने, रास्ते साफ करने और जगह-जगह पर के कचरे के ढ़ेरों को साफ करना आदि कार्यक्रम हाथ में लिए। गांधीजी के आश्रम पद्धति के दो-दो बालटियों के संडास खडे किए। बालटियों के स्थान पर कुम्हार से बडे-बडे कुंडे बनवाकर उनमें डामर पोता। गांव के सरपंच की सलाह पर बस स्टैंड पर तीन-चार स्थानों पर संडास बनाए। कुंंडों में सागवान के पत्ते बिछाए और मल ढ़ांकने के लिए एक डिब्बे में राख रखी गई। मल ढ़ोेने के लिए कांवर की व्यवस्था की। पूरी बरसात यह काम बडे उत्साहपूर्वक चला। स्वयं अप्पा ने पेशाब से भरे कांवर उठाए। यह मानवता के अनंतर  स्वच्छता की दृष्टि थी और मलमूत्र उत्कृष्ट खाद बनाकर उससे अन्न उत्पादन बढ़े।

उन्होेंने जो गोपूरी की कल्पना प्रस्तुत की थी जिसके कारण उन्हें बडी प्रसिद्धि मिली थी उसके पीछे यह त्रिविध घोषणा थी - 1. हरिजन मुक्ति आंदोलन - प्रबलता से चलाओ। 2. स्वच्छ भारत आंदोलन - सफल करो। 3. अन्न समृद्धि आंदोलन - पूरा करो। उनका हरिजन मुक्ति आंदोलन संडास-मूत्रालयों तक ही सीमित नहीं था। मृत पशु विच्छेदन (मरे हुए जानवर का चमडा निकालना) और शव साधना (मृत देह का परिपूर्ण उपयोग करना)। यह हरिजन मुक्ति आंदोलन के अंग ही थे। गोपूरी में गांधी निधी, हरिजन सेवक संघ के कार्यकर्ता सफाई की 'ट्रेनिंग" लेने के लिए आया करते थे। गोपूरी संडास की रचना सीखने के लिए भी आया करते थे। गांधी निधी से उन्होंने कई ग्राम पंचायतों को मैला गैस प्लांट बनाकर दिए।

अप्पा पटवर्धन कहते हैं इस तरह से मैं भारत विख्यात सफाई-नेता बन गया और इन सब को मात दे दी विनोबा भावे ने। आगे वे कहते हैं ः इंदौर के लोगों को विनोबाजी के प्रति भक्तिभाव और आकर्षण अद्‌भुत था। इंदौर के प्रमुख नागरिकों ने विनोबाजी से भेंट कर पूछा ः 'हमसे आप किस-किस चीज की अपेक्षा करते हैं?" विनोबाजी ने कहा- इंदौर नगरी साफसुथरी हो, इसके लिए तुम अप्पा को बुला लो। तत्काल उज्जैन के सांसद पुस्तके और दादाभाई नाईक ने शीघ्रता से इंदौर आने के बारे में पत्र लिखा।

इंदौर आने के पिछे मेरा उद्देश्य 'सफाई यज्ञ" का जोरदार प्रचार करना था साथ ही अपनी नगर दान की कल्पना से विनोबाजी को सहमत करना भी था। विनोबाजी की प्रेरणा से इंदौर के नागरिक स्वयं सफाई का अथवा सफाई-यज्ञ का व्रत बडी संख्या में स्वीकारें यह भी था। परंतु, इन दोनो ही उद्देश्यों में से मेरा कोई सा भी उद्देश्य सफल नहीं हुआ। फिर भी मेरे और विनोबाजी के इंदौर छोडने के बाद भी स्वयं सफाई का कार्य कुछ समय तक चलता रहा। परंतु, इंदौर में रहने के कारण मुझे सफाई कार्यकर्ता के रुप में अखिल भारतीय प्रसिद्धि जरुर मिल गई। बाद में मैंने जीवन निष्ठा के रुप में हरिजन मुक्ति स्वयं तक की सीमित शुरु रखी। विनोबाजी की तर्ज पर अखंड और अनन्य भाव से घूमते रहना तय किया तथा जिस जगह मुकाम करता वहां स्वच्छता कार्य के शिविर आयोजित करता। 

अप्पा ने सफाई करनेवाले को कम से कम घिन आए और घर के लोगों को उपयोग में लाने के लिए पूरी तरह से स्वच्छ, सस्ता और आसान कहीं भी फिट कर सकें, ले जा सकें ऐसा संडास 'कुटुंब कमोड" प्रस्तुत किया। जिसे मुंबई राज्य कल्याण विभाग ने मान्य कर 50 प्रतिशत सहायता मंजूर की। उन्होंने अंबर चरखा सीखने आनेवालों युवाओं को सफाई काम के लिए तैयार किया। और इस प्रकार से 'स्वर्ण हरिजन वर्ग" या 'नव हरिजन संप्रदाय" तैयार हुआ। लेकिन विघ्न संतोषियों ने युवकों को विचलित करना शुरु कर दिया। उन युवकों के विवाह में भी बाधाएं आने लगी। अंततः अप्पा ने हरिजन मुक्ति कार्य को दोयम स्थान देना तय कर हरिजन मुक्ति कार्य का संयोजक पद छोड दिया।

 हरिजन मुक्ति कार्य के दो पहलू थे। पहला और मुख्य- हरिजनों का घिन आनेवाला काम भी अपन स्वयं करें ः घिन आनेवाला होने पर भी करना ऐसा नहीं वरन्‌ घिनवाला है इसलिए दूसरे को न सौंपते अपना अपन ही करें यह मानवी प्रेरणा। दूसरा, उस काम का घिनौनापन जितना संभव हो सके उतना कम करने के लिए संडास के आसान नमूने और सफाई के आसान उपकरणों का प्रबंध करना। इन उपकरणों में आसान कांवर, मैला ढ़ोने के लिए हाथ गाडियां, ऊंचे जूते, रबर के हाथमौजे और विभिन्न औजार आते हैं। अप्पा को अनुभव यह आया कि हरिजन मुक्ति का दूसरा पहलू जो तांत्रिक पक्ष है वह तो सर्वसाधारण कार्यकर्ता को समझ में आ जाता है, सहमत हो जाता है, कर भी सकता है और उसीका बोलबाला होता है। परंतु, मुख्य प्रेरणा बडी आसानी से नजरअंदाज कर दी जाती है।

वर्तमान में प्रधानमंत्री मोदी के आवाहन पर सफाई करने के लिए भाजपा के सभी छोटे-बडे नेता जुट रहे हैं, सेलेब्रिटिज भी जुड रही हैं परंतु, सफाई के नाम पर केवल दिखावा एवं फोटो सेशन हो रहे हैं। 14 नवंबर से 19 नवंबर 2014 तक जो सफाई अभियान चला उस विशेष स्वच्छता अभियान पर केंद्र सरकार स्वयं नजर रखनेवाली थी एवं राज्यों में होेने वाले विशेष अभियान के साक्ष्य भी मांगे जानेवाले थे। परंतु, नतीजा शून्य ही निकला सब ओर गंदगी वैसी की वैसी ही फैली पडी रही। 25 दिसंबर को भारत रत्न अटलजी और महामना मालवीयजी के जन्मदिवस पर आयोजित सफाई कार्यक्रम का परिणाम भी यही हुआ। यानी कि यहां भी मुख्य प्रेरणा सफाई आचरण में आए वह स्वयं करें नदारद है।

वास्तव में इस प्रकार के कार्य जो सीधे समाज से जुडे हैं वे सरकारों और राजनीतिक दलों के बूते के होते ही नहीं हैं। यह कार्य तो उन सामाजिक संस्थाओं द्वारा किए जाने चाहिएं जिनका नेटवर्क (अखिल भारतीय) होने के साथ ही जिनके पास समर्पित कार्यकर्ता हों तो अधिक सफलता मिलने की संभावना है। विनोबाजी के भूदान आंदोलन में कांग्रेस कहीं नहीं थी। यह कार्य विनोबाजी ने अपने एवं कार्यकर्ताओं के बलबूते किया था। आज भी यदि उपर्युक्त प्रकार के गैर राजनैतिक सामाजिक संगठन इस स्वच्छता अभियान को हाथ में लें तो सफलता मिल सकती है। गांधीजी का सपना स्वच्छ भारत साकार हो सकता है। अंत में केवल एक ही बात कहना चाहूंगा कि बिना पर्याप्त पानी के स्वच्छता हो नहीं सकती और हिंदुस्थान में पानी के क्या हाल हैं यह जगजाहिर है। 

Friday, 23 January 2015

गांधीयुगाचा आदर्श सेवामयी जीवनव्रती - अप्पा पटवर्धन ऊर्फ कोंकणचा गांधी

आजकाल स्वच्छते व शौचकूपांचा उल्लेख मोठ्या धामधूमीने केला जात आहे. अशा वेळेस महान कर्मयोगी अप्पा पटवर्धन (सीताराम पुरुषोत्तम पटवर्धन) जे गांधीजींच्या असहकार युगाच्या आधीच त्यांच्या सत्याग्रह आश्रमात दाखल झाले होते. ज्यांची मूळभूत जीवन प्रेरणा होती - मातृभक्ति, ब्रह्मचर्य, दलित सेवा. त्यांच्या गोपुरीच्या प्रयोगला भरपूर प्रसिद्धि लाभली होती. गोपुरीच्या  प्रयोगांतूनच ते विनोबाजींच्या भूदान चळवळीकडे वळले. त्यांचे आत्म-चरित्र स्वच्छतेच्या विषयाशीच निगडित आहे, अत्यंत समयानुकूल असल्यामुळे त्यांस संक्षेपात प्रस्तुत करित आहे. त्यांच्या 'जीवन-यात्रा"चे महत्व यावरुन समझले जाऊ शकते की अप्पा पटवर्धन त्या 8-10 लोकांपैकी एक होते ज्यांनी गांधीकार्य उत्तम रीतीने समजून घेऊन त्याला आपले आयुष्य अर्पण करण्याचे ठरविले. त्यांच्या विषयी विनोबा नेहमी म्हणत - 'एक अप्पा, बाकी गप्पा."

त्यांनी लिहिलेल्या या त्यांच्या आत्मचरित्रात अत्यंत उच्चप्रतीचा प्रांजळपणा सर्वत्र आढ़ळतो. ह्याची साक्ष ह्या ओळी आहेत ः 'जी गोष्ट उचित व आवश्यक म्हणून बुद्धिला पटली ती लोकांच्या निंदा-स्तुतीची पर्वा न करता तत्काळ अंमलात आणायची हे गांधींनी एक दिवसात केलें आणि तेंच करायला मला कित्येक वर्षे लागली आणि शेवटी करु लागलो तेहि गांधींजींच्या आश्रमाच्या आश्रयाने. नंतर जी कर्तव्य-विस्मृति आली होती ती रस्किनच्या वाचनापासून दूर झाली, सुस्ती जाऊन जागृति सुरु झाली." जॉन रस्किनचे 'अंटु धिस लास्ट" भारतात 'सर्वोदयच्या" नावाने प्रसृत झाले. या पुस्तकाला गांधींनी रेल्वेच्या प्रवासात वाचले होते आणि त्याचा परिणाम ते बॅरिस्टर गांधींचे किसान गांधी झाले. आणि नंतर क्रमाक्रमाने चांभार, हरिजन व विणकर बनले.

संडास या शब्दाशी त्यांची पहली ओळख रत्नागिरीस त्या वेळेस झाली जेव्हां ते येथे मिडलस्कूल स्कॉलर्शिप परिक्षेसाठी आले होते. त्यांच्या शब्दांत - 'तो प्रसंग मी जन्मभर विसरणार नाही. संडासाची घाण इतकी असह्य झाली की तेवढ़े एक मिनिट भर श्वांस कोंडून धरणे अवघड झाले. मी पुढ़े कित्येक वर्षे पुन्हा संडासात गेलोच नाही. दूर उघड्यावरच शौचाला जात असे. पावसाळ्यात भातशेतीच्या बांधोळ्यावरच बसावे लागे त्याची खंत वाटे." (आजही हीच परिस्थिती कित्येक स्थानांवर सहजच दिसून पडते)

शौचकूपांसंबंधी जागृती यावी या करिता मी सगळ्यात आधी डिसेंबर 2012 मध्यें पहिला लेख लिहिला होता. त्यांत मी लिहिले होते- 'तुम्हांस आश्चर्य वाटेल की 20व्या शतकाच्या सुरुवातीपर्यंत आमच्या नेत्यांना शौचकूप पण एक समस्या आहे याचे भान सुद्धा नव्हते. ही एक समस्या आहे याकडे सगळ्यात आधी कोणी लक्ष वेधिले असेल ते गांधीजींनी. गांधीजी कांग्रेसच्या प्रत्येक अधिवेशनात सगळ्यात आधी शौचालयांच्या व्यवस्थेकडेच लक्ष देत असत की तेथे पाणी इत्यादिची योग्य व्यवस्था आहे की नाहीं."

हे वाक्य किती अचूक आहे हे अप्पांच्या 'जीवन यात्रा" या आत्मचरित्रातल्या या ओळींवरुन देखील कळते ः खादी संघाच्या सभेकरिता ते नगरला आले होते. 'लघवीला कोठे जावें?" विचारता घराच्या वरील गच्चीवर जाण्याची सूचना मिळाली. गच्चीचा शौचासाठीही उपयोग केला जातो असें समजलें ! रत्नागिरी व मुंबई-पुण्याबाहेरील महाराष्ट्राचा हा मला पहिलाच परिचय होता."

सार्वजनिक स्वच्छतेचे कार्य त्यांच्याकडून अकस्मात्‌ एप्रिल 1928 मध्यें सुरु झाले. कोंकण बालावलीच्यानारायण मंदिरात रामनवमी उत्सवांप्रीत्यर्थ अनेक लोक एकत्रित होत असत. तेथे ते चरख्याच्या प्रचारार्थ गेले असतां रात्रीच्यावेळेस धर्मशाळेच्या जवळच्या तलावात पाणी पिण्याकरिता गेले. मंदिराच्या आसपास सगळीकडे लघवीची घाण येत होती. ती तुडवत तलावावर जावून त्यांनी पाहिल की तलावाच्या पायऱ्या-पायऱ्यांवरुनहि लघवीचे ओघळ जात होते. (लघवीच्या ओघळांचे अशाच प्रकाराचे दृश्य बस स्थानकांवरच तर काय कित्येक स्थानी देखील पाहावयास मिळतात.) सकाळी शौचाला जाताना त्यांना आढ़ळले की त्याच तलावाच्या दूरच्या टोकाशी यात्रेकरु शौचाची सफाईहि बिना तांब्यानेच करित होते.

'आता काय करावे? येथे चार दिवस काढ़ायचे कसे? निघून जावे तर तो पलायनवाद होतो." ते उत्सवाच्या चालकांना जावून भेटले. आणि त्यांच्या समोर उत्सवाच्या मुदतीत देवळाच्या आसमंतातील सफाई योजना - खड्‌डयाच्या मुत्र्या व कचऱ्यासाठी करंड मांडण्याची, मांडली. त्यांनी सहकार्य देण्याचे मान्य केले व अशा प्रकारे सफाई कार्यक्रमाची सुरुवात झाली. परिणामी उत्सवाच्या मुदतीत चांगलीच स्वच्छता राहिली. सर्वांचे सर्वप्रकारें साह्य मिळाले. स्थानीय साप्ताहिकाने सफाई कार्याची तारीफ केली.

त्यांच्या या कामगिरीची दखल सर्व्हंट्‌स ऑफ इंडिया सोसायटीचे अधिकारी एन.एम.जोशीनी घेतली. ते अप्पांना म्हणाले - 'तुमचा गांधीवाद आम्हाला पटत नसला तरी तुमची ग्राम सेवा मोलाची आहे. आमच्या सोशल सर्विस लीगपाशी फ्लारेंसनाइटिंगेल व्हिलेज सेनिटेशन फंड आहे त्यांतून खेड्यात कांही आरोग्य संवर्धक कार्य करशील तर आपण मदत मंजूर करु." त्यांनी चराच्या संडासाची प्रचाराची कल्पना मांडली. तिच्यासाठी त्यांनी 150 रु. मंजूर करुन मला पाठवूनहि दिले." अप्पांनी मोडत्या-जोडत्या व फिरत्या चौकटी संडासाच्या आडोशासाठी आणि झाप, तट्टे, किंतान व चर खणून एक स्वस्त, स्वच्छ, सभ्य, सुटसुटीत, स्वाधीनचा, समृद्धिदाता आदि गुणांचे वर्णन करुन त्यांस शेतकऱ्यांचा शौचकूप अशा नावाचे संडास उभारले. सावंतवाडी म्युनिसिपालटीने देखील या संडासांना मंजूरी दिली. या संडासांची सर्वत्र वाहवा झाली. 

1928 पासून त्यांनी संडास-मुत्री-सफाई बाबत अनेक उपक्रम, प्रचार, प्रयोग व सत्याग्रह केले होते. 1946 मध्यें ते हरिजन मुक्ति कार्याकडे वळले. याचा पहला प्रयोग कणकवली गांवात केला. याच कारण कणकवली गांवाची सार्वजनिक सफाई बाबतची स्थिति एकंदरित किळसवाणीच होती. कणकवलीच्या तिठ्‌यावरच मोटारी थांबत असत व तेथेच बाजार, हॉटेले, पोस्ट ऑफिस, प्राथमिक शाळा इत्यादि होत्या. लोक तेथेच लघवी करीत व नजीकच्या झाडीत शौच्याला जाण्याची वहिवाट, नवीन मुंबई-गोवा रस्ता झाल्यानंतरहि, चालूच होती. यामुळे पावसाळ्यात चिखल व लघवीची दुर्गंधी इतकी येत की तेथे उभे राहणे मुश्किलीचें होत. अप्पा म्हणतात, 'मला स्वतःला लघवीला फार वेळा जावें लागते, त्यामुळे छोट्या शहरामध्यें व देशावरील गांवामध्येंहि जेथे सार्वजनिक मुत्र्या नसतात तेथे, लघवीची मला स्वतःला अडचण जाणवत असते. (आज देखील हिच परिस्थिती कित्येक जागी अजून दिसून पडते) याबद्दल कणकवलीचा रहिवाशी या नात्याने मला मोठी शरम वाटत असे.

देशाला लवकरच स्वातंत्र्य मिळणार व आता आपल्याला तुरुंगात जाण्याचे प्रसंग येणारच नाही. स्वतंत्र भारत हा स्वच्छ भारत असलाच पाहिजे त्या दृष्टिने काही प्रयत्न सुरु करावा असा विचार करुन 'स्वच्छ कणकवली" कार्यक्रम हाती घेतला. '1946च्या मे मध्ये कणकवलीमध्ये मी जागोजाग सार्वजनिक संडास आणि विशेष ठिकाणी व शाळांमध्ये मुत्र्या सुरु करण्याचें, रस्ते झाडणे व ठिकठिकाणचे उकिरडे साफ करणे इत्यादि कार्यक्रम हाती घेतले. गांधीजींच्या आश्रमाच्या पद्धतीचे दोन दोन बालद्यांचे संडास मांडले. बालद्यांऐवजी मातीच्या मोठमोठ्या कुंड्‌या स्थानिक कुंभाराकडून करवून घेतल्या व त्यांना डांबर काढ़ले. सरपंचाच्या सल्ल्याने मोटर स्टंडवर व आणखी तीन-चार ठिकाणी चार-चार संडास सुरु केले. कुंड्यात सागवानाचीं पानें आंथरीत व मळ्यावर झाकण्यासाठी एका डब्यात राख ठेवीत असू. मलमूत्र वाहून घेण्यासाठी कावडी केल्या. भर पावसाळ्याचे दोन-तीन महिने हें काम मोठ्या उत्साहाने चालले. स्वतः अप्पाने लघवीने भरलेल्या कावडी वाहून नेल्या. यात मानवतेच्या खालोखाल स्वच्छतेची दृष्टी होती. आणि मलमूत्रापासून उत्कृष्ट खत बनून त्यातून धान्यवाढ़ व्हावी अशी दृष्टीहि होती.

त्यांच्या गोपुरीच्या कल्पनेला चांगलीच प्रसिद्धी लाभली होती. त्यामागे ही त्रिविध घोषणा होती - 1. हरिजन मुक्ति आंदोलन - निकराने चालवा. 2. स्वच्छ भारत आंदोलन - यशस्वी करा. 3. अन्नसमृद्धि आंदोलन - तडीस न्या. त्यांची हरिजनमुक्ति ही संडासमुत्र्यांपुरतीच मर्यादित नव्हती. मृतपशु विच्छेदन (मेलेल्या जनावरांची कातडी सोडविणे) व शवसाधना (मृतदेहांचा परिपूर्ण उपयोग करणे) ही हरिजनमुक्ति कार्यक्रमाचीं अंगेच होती. गोपुरीत गांधी निधीचे कार्यकर्ते सफाईच्या शिक्षणासाठी येत. गोपुरी संडासाची रचना शिकून घेण्यासाठी पण येत. कित्येक ग्रामपंचायतींना त्यांनी मैला गॅसप्लॅंट बांधून दिले.

अशा प्रकारे ते भारतविख्यात सफाई नेता बनले. आणि या सर्वांवर मात केली विनोबांनी. इंदूरच्या लोकांना विनोबांबद्दल वाटणारा भक्तिभाव किंवा आकर्षण अद्‌भुत होतें. इंदूरच्या प्रमुख नागरिकांनी विनोबांना भेटून 'आमच्याकडून तुम्हीं कोणकोणत्या गोष्टींची अपेक्षा करता?" असें विचारले. विनोबांनी इंदूर नगरी साफसूफ व्हावी, त्यासाठी तुम्ही अप्पांना बोलवून घ्या, असें सांगतिले. लगेच  अप्पांना उज्जैनचे खासदार श्रीपुस्तके, व श्री. दादाभाई नाईक यांनी तांतडीने इंदूरला येण्याबद्दल पत्रें धाडली.

अप्पा म्हणतात, इंदूरला जाण्यात माझा हेतु 'सफाई यज्ञा"चा उठावदार प्रचार करायला मिळावा हा होताच, पण आपली नगरदानाची कल्पना विनोबांना पटवून देता आल्यास पाहावें असाहि होता. पण या दोहोंपैकी माझा कोणताच हेतु सफल झाला नाही. तरीपण मी व विनोबा इंदूर सोडून गेल्यानंतर तेथे साप्ताहिक सफाई स्वयंसफाई कार्यक्रम काही काळ चालू राहिला. शिवाय इंदूरच्या वास्तव्यात मला सफाई कार्यकर्ता म्हणून अखिल भारतीय प्रसिद्धि मिळाली. नंतर मी जीवननिष्ठा म्हणून हरिजनमुक्ति स्वतःपुरती चालूच ठेवली. विनोबांच्या कित्त्यानुसार अखंडपणे व अनन्यभावाने फिरत राहण्याचे ठरविले व ज्याजागी मुक्काम करित असे तेथे सफाईकाम शिविर भरवीत असे.

सफाई करणाराला कमीत कमी किळस वाटावा व घरच्या वापरणारांना पूर्ण स्वच्छ, स्वस्त, सुटसुटीत, कोठेहि मांडता व हलवता यावा असा 'कुटुंब कमोड" अप्पानी योजला. मुंबई राज्याच्या समाज कल्याण खात्याने 50% साह्य मान्य केले. अंबर चरखा शिकायला आलेले तरुणहि स्वच्छता कार्य करण्यास तयार झाले. एक खासा 'सवर्ण हरिजनवर्ग" किंवा 'नव-हरिजन संप्रदाय" तयार झाला. पण हिरमोड करणारेहि टपलेलेच असतात. अशांमुळे अनेक युवकांचा उत्साह कायमचा खच्ची होई. या तरुणांची लग्नें होण्याचीसुद्धा अडचण पडू लागली. शेवटी अप्पांनी हरिजनमुक्ति कार्याला दुय्यम स्थान देण्याचे ठरवून हरिजन मुक्तिकार्याचें संयोजक पद सोडून दिले.

हरिजनमुक्ति कार्याच्या दोन बाजू आहेत. पहिली व मुख्य बाजू - सफाईकर्मींचे किळसवाणे कामहि आपण जातीने करणे ः किळसवाणे असले तरीहि करणे असे नव्हे तर किळसवाणे आहे म्हणूनच परक्यावर न सोपविता आपले आपणच करणें ही मानवी प्रेरणा ः व दूसरी त्या कामाचा किळसवाणेपणा, शक्य तेवढ़ा कमी करण्यासाठी संडासाचे सोयीस्कर नमुने व सफाईची सोयीस्कर उपकरणे योजणें. या उपकरणांमध्ये सोपी कावड, मैला वाहण्याच्या हातगाड्या, ऊंच बूट, रबरी हातमोजे व विविध अवजारें येतात. अप्पांना अनुभव असा आला की हरिजनमुक्तिची ही दूसरी तांत्रिक बाजू सर्वसामान्य कार्यकर्त्यांना पटते, जुळते, झेपते, तिचाच बोलबाला होतो. आणि पहली किंवा मुख्य प्रेरणा सोयीस्कर प्रकारें नजरेआड केली जाते. 

वर्तमानात पंतप्रधान मोदींच्या आवाहनावर भाजपचे सगळे छोटे-मोठे नेते सफाई कामास लागले आहेत यांत सेलेब्रिटिज देखील सामील आहेत. परंतु, सफाईच्या नावावर देखावा व फोटो सेशन चालले आहेत. 14 ते 19 नोव्हेंबर जी सफाई मोहिम चालली होती त्या विशेष स्वच्छते मोहिमेवरती स्वतः केंद्रसरकार नजर ठेवणार होती आणि राज्यांत चालणाऱ्या या विशेष मोहिमेची साक्ष्य देखील मागली जाणार होती. परंतु, परिणाम शून्यच निघाला व सगळीकडे घाण जशीच्या तशीच पसरलेली राहिली. 25 डिसेंबरला भारतरत्न अटलजी व पंडित मालवीयचींच्या जन्मदिवसावर योजलेल्या सफाई कार्यक्रमाचा परिणाम देखील तोच निघाला म्हणजे स्वच्छता आचरणात यावी व ती स्वतः करावी बेपत्ताच होती. 

वस्तुतः अशाप्रकाराचे कार्य जे सरळ समाजाशी संबंद्ध आहेत ते सरकार व राजनीतिक पक्षांच्या कुवतीच्या बाहेरचे असतात. अशी कार्ये तर अशा सामाजिक संस्थेंनी केली पाहिजेत ज्यांचा नेटवर्क (अखिल भारतीय) असून ज्यांच्या जवळ समर्पित कार्यकर्ते असतील तर यश मिळण्याची शक्यता जास्तीच जास्त राहिल. विनोबांच्या भूदान आंदोलनात कांग्रेस कोठेच नव्हती. हे कार्य विनोबांनी स्वतः आणि स्वतःच्या कार्यकर्त्यांच्या जोरावरच केले होते. आज जर कां वरील प्रकारच्या अराजकीय सामाजिक संघटनेंनी स्वच्छतेचे कार्य हाती घेतले तर यश नक्कीच मिळू शकते. गांधींच्या स्वप्नातील भारत साकारले जाऊ शकते. शेवटी एकच गोष्ट नमूद करावीशी वाटते की स्वच्छतेसाठी हवे भरपूर पाणी आणि हिंदुस्थानांततर पाण्याचे हाल काय आहेत ते सगळ्यां समोरच आहे. याचा देखील विचार आवश्यक आहे. 

Monday, 19 January 2015

प्राचीन भारत में गणिका

प्राचीनकाल में गणिका का स्थान एवं अर्थ जिस संदर्भ में आज की वेश्या का लिया जाता है कि तरह हेय नहीं था। उस काल में समाज में आज की तरह न तो रुढ़ियां व्याप्त थी ना ही वह इतना यौन पीडित था। वास्तव में गणिका उस परंपरा की स्मृति है जब समाज में सामूहिक अथवा गण विवाह हुआ करते थे। बाद में ऐसा काल आया जब सामूहिक विवाह के स्थान पर व्यक्तिगत विवाह प्रचलित हुए। जो स्त्री पहले पूर्ण सामाजिक सम्मान के साथ जीवन-यापन करती थी वह अब विवाहिता की अपेक्षा निचले स्तर पर आ गई। परंतु, वेश्या फिर भी ना हुई। अब वह संगीत की त्रिविध कलाओं का केंद्र बनी तथा सभ्यता के नियम सीखने के लिए धनवान लोग अपने बच्चों को उनके पास भेजा करते थे। इस प्रकार से वह समाज में सम्मान की पात्रा बनी रही। 

महाकवि शूद्रक के 'मृच्छकटिकम्‌" में तत्कालीन गणिकाओं की स्थिति का विस्तृत ज्ञान मिलता है। महाकवि के इस नाटक में प्रत्येक बात को प्रामाणिक रुप में प्रस्तुत किया गया है। गणराज्यों में गणिकाएं संपूर्ण राज्य की संपत्ति मानी जाती थी। गणराज्यों के ह्यास होने पर गणिकाओं एवं वेश्याओं भेद जाता रहा। मेधातिथि ने गणिका एवं वेश्या के भेद को स्पष्ट किया है। वेश्या केवल रुपजीवा व तनविक्रय वाली होती है जबकि गणिका कलावती स्त्री को कहा गया है। गणिका का दर्जा वारांगना से श्रेष्ठ है।

प्राचीन यात्री अलबेरुनी ने लिखा है कि गणिकाओं को वास्तव में राजाओं ने प्रोत्साहित किया, यदि ऐसा न होता तो कोई भी ब्राह्मण अथवा पुरोहित अपने मंंदिरों में गणिकाओं को सहन नहीं करता, जो नाचती-गाती, क्रीडा करती हैं। वास्तव में राजा अपनी शारीरिक,आर्थिक, राजनैतिक स्वार्थ पूर्ति के लिए इन गणिकाओं को आकर्षण एवं प्रजा के आनंद का साधन बनाते हैं। इसके अतिरिक्त गणिकाओं का उपयोग अपने अविवाहित सैनिकों की कामुकता से प्रजा की रक्षा करना भी था। 

चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल में गणिकाओं की स्थिति सुदृढ़ थी तथा उन्हें गुप्तचर विभाग में सम्मानजनक पद प्राप्त थे। इस काल में वे भारतीय दरबारों व नगरों का आकर्षण हुआ करती थी तथा विशेष रुप से राजपरिवारों, धनी व्यापारियों का मनोरंजन किया करती थी। उन्हें समाज में हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता था। वे सभी कलाआ में पारंगत हुआ करती थी। उन्हें संसद तक में उच्च स्थान प्राप्त था। गणिकाओं के यहां सभी का प्रवेश तक संभव नहीं था। शासक एवं कुलीन व्यक्तियों से भी वे अधिक सम्मानित थी।

कथा सरितसागर में उदारचरित तथा सदाचारी गणिकाओं की तुलना महारानियों तथा अन्य कुलीन नारियों से की गई है। अपने श्रेष्ठ गुणोें व चरित्र के कारण अनेक गणिकाओं ने तत्कालीन समाज में उच्च स्थान प्राप्त किया उनमें से कुछ हैं 'मृच्छकटिकम्‌" की नायिका 'वसंतसेना" जिसका उल्लेख नाटककार ने बडे आदर से किया है। उस पर 'उत्सव" नामकी एक फिल्म भी बनी है। वैशाली की नगरवधू 'आम्रपाली" जिसने मातृभूमि  के लिए सम्राट अजातशत्रु के प्रेम को ठुकरा दिया था। इस पर भी 'आम्रपाली" नामकी फिल्म बनी है। भगवान तथागत ने भी उसे 'आर्यअंबा" कहकर संबोधित किया था तथा उसका आतिथ्य ग्रहण किया था।

प्राचीनकाल में गणिका होना कितना कठिन कार्य था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनका चौंसठ कलाओं में परिपूर्ण होना आवश्यक था। उदाहरणार्थः उनका नृत्य, गीत-संगीत, चित्रकला, अभिनय के साथ-साथ पाककला में निपुणता, व्याकरण, तर्कशास्त्र, ज्योतिष विद्या, द्यूतकला, श्रृंगारकला, युद्धकला, घुडसवारी, भेष बदलने की कला आदि में पारंगत होना आवश्यक था। उस समय की गणिकाओं में रुपजाल में फांसने एवं चाटुकारिता के गुण आवश्यक माने जाते थे और संभवतः इन्हीं तमाम गुणों के कारण उन्हें गुप्तचरी के कार्य में लगाया जाता था इन्हीं में से कुछ सुंदर वेश्याओं को विषकन्या बनाकर शत्रु के खेमे में भेजा जाता था।

समसामयिक आवश्यकतानुसार इस कर्म अथवा परंपरा को मान्यता मिलती रही परंतु उनके प्रति आम धारणा अच्छी नहीं रही। संभवतः इसीलिए कौटिल्य ने सबसे पहले वेश्याओं को लाइसेंस देने की बात कही थी। अर्थशास्त्र में कौटिल्य ने लिखा है कि 'गणिकाध्यक्ष" की नियुक्ति कर गणिकाओं की आमदनी और खर्च को नियंत्रित किया जाए। 'तारीख-ए-फरिश्ता" से पता चलता है कि एक बार एक दरबारी ने अलाउद्दीन से शिकायत की थी दिल्ली के बाजार में वेश्याएं ग्राहकों से मनमानी रकम ऐंठती हैं इस पर बादशाह ने शुल्कराशि तय कर दी शायद इसी समय से वेश्याओं के पंजीकरण की परिपाटी का प्रारंभ हुआ।

आज परिस्थितियां जरुर कुछ बदल गई हैं फिर भी वेश्याएं मौजूद ही हैं बल्कि उनकी तादाद कई गुना बढ़ी ही है। वेश्यावृत्ति का रुप भी निश्चित रुप से विकृत हो गया है जो समाज के ही विकृत रुप की अभिव्यक्ति है और ऐसा लगता है कि जब तक यह पितृसत्तात्मक समाज रहेगा तब तक यह वेश्यावृत्ति भी किसी ना किसी रुप में रहेगी ही।

Friday, 2 January 2015

पहिली मुस्लिम स्त्रीवादी महिला -
 रुकैया सखावत हुसैन
स्त्रीमुक्तीचे पहिले कथाविधान
shirishsapre.com
'सुलतानाज ड्रीम" ही एक काल्पनिक विज्ञानकथा आहे रुकैया सखावत हुसैनची. जी विलक्षण स्वप्नकथेच्या रुपात आहे. त्यात रुकैया ने कल्पनेची जी भरारी भरली आहे ती कोणास ही आश्चर्यात पाडणारी आहे. या कथेस वाचताना असे वाटते की रुकैया जणू कांही संपूर्ण पुरुषसमाजाशीच बदला घेत आहे. 

19व्या शतकाच्या काळात जेव्हां म.ज्योतिबा फुले सर्वथरातून शिक्षण पोचविण्यासाठी प्रयत्नशील होते, बंगालात ब्राम्होसमाजाचा जन्म झाला होता, उत्तेरत आर्यसमाजाचे आंदोलन वाढ़िस लागले होते, इंग्रजी शिक्षणाची नुकतीच कुठे सुरुवात झाली होती. स्त्री शिक्षण आणि ते ही मुस्लिम स्त्रींच्या बाबतीत दुर्लभच होते. अशा काळात 1880 मध्यें रुकैयाचा जन्म तात्कालिक ब्रिटिश इंडिया आणि वर्तमानातील बांग्लादेशच्या रंगपूर मध्यें एक उच्चकुलीन जमीनदार घराण्यात झाला. रुकैयाचे वडील सनातनी रुढ़िप्रिय होते. त्यांच्या नजरेत मुलींचे शिक्षण म्हणजे कुराणपठन. भाषेच्या बाबतीत अरबी, फारसी मिश्रित उर्दू आणि इंग्रजी मध्यें व्यवहार व बंगाली भाषेकडे गुलामांची व गैरमुसलमानांची भाषा म्हणून तुच्छतेने पाहणे. परंतु, रुकैयाने आपला भाऊ इब्राहिम यांजकडून बंगाली भाषा लिहणे-वाचणे शिकून घेतले. तिचे लग्न वयाच्या 16व्या वर्षी 30वर्षाच्या विधुर खानबहादुर सैयद सखावत हुसैनशी 1896 मध्यें झाले. जे इंग्रजीत उच्चविद्याविभूषित असून बिहार मध्यें जिला मजिस्ट्रेट होते. त्यांनी पण तिला बंगाली व इंग्रजी शिकण्या व लिहिण्याकरिता प्रोत्साहन दिले. तिने कित्येक लघुकथा व उपन्यास लिहिले. पतिप्रेरणेनेच तिने कोलकता मध्यें मुस्लिम मुलींन करिता एका शाळेची सुरुवात केली. जी आता राज्यशासनाकडून संचालित केली जात आहे. तिचा मृत्यु 1932 मध्यें झाला.

रुकैया स्त्री-पुरुष समानता व मुस्लिम स्त्रियांच्या शिक्षणाकरिता केलेल्या कार्याकरिता ओळखली जाते. 9डिसेंबर रुकैया दिवसच्या रुपात बांग्लादेशात साजरा केला जातो. 1926 मध्यें तिने बांग्ला महिला शिक्षा सम्मेलनात म्हटले होते ः 'महिला शिक्षा विरोधी म्हणतात की महिला अमर्यादशील होतील ... जरी ते स्वतःला मुसलमान म्हणवून घेतात तरी ते इस्लामच्या मूल शिक्षणाच्या विरुद्ध जातात जो स्त्रियांना समानता आणि शिक्षणाचा अधिकार देतो. जर शिक्षणानंतर पुरुष भटकत नाहीत तर स्त्रियांच कां?"

रुकैयाने 'सुलतानाज ड्रीम" नावाची स्वप्नकथा लिहिली. त्यांत स्त्रीवादाची कल्पना होती. ही स्वप्नकथा 1905 मध्यें मद्रासहून प्रकाशित होणाऱ्या 'इंडियन लेडिज जनरल" मध्यें प्रकाशित झाली. रुकैया कल्पना करते की एका मध्यरात्री तिला एक स्वप्न पडलेले आहे त्यांत एक स्त्री तिच्या जवळ येते. तिला ती आपली बहिण सारा समजते. ही तिला चार भिंतीतून बाहेर पाडून एक दुसऱ्याच देशात घेऊन जाते. या नव्या देशात सगळा कारभारच मुळी वेगळा आहे. या देशातल्या स्त्रिया परदा करित नाहीत. इथे सर्वत्र स्त्रियाच स्त्रिया आहेत. पुरुष कोठेच दिसत नाहीत. विचारल्यावर कळते की या देशात पुरुष बंदिश म्हणजे मर्दानखान्यात राहतात. हे पुरुष स्वयंपाक करणे, मुले सांभाळणे व अन्य घरकाम करतात. परक्या स्त्रियां समोर ते येऊ शकत नाही. त्यांचे जग घरच्या चार भिंतीच्या पलीकडे नाही.

आतापर्यंत पुरुष जी जी क्षेत्रे सांभाळायचे ती सगळी आता स्त्रिया सांभाळतात. कोठेच कोणत्याही प्रकारचा गुन्हा, अत्याचार, शोषण, हिंसा दिसत नाही कांकी ही सारी काम पुरुषच करतात व ते बंदिस्त आहेत. त्यामुळे येथे न्यायालयांची काही आवश्यकताच नाही. दिड़्‌मूढ़ रुकैया विचारते आम्ही स्त्रियांना तर निसर्गानेच दुबळे बनविले आहे अशा अवस्थेत स्त्रियांना इतके स्वातंत्र्य कितपत योग्य आहे? इथल्या स्त्रियांना संरक्षणाची आवश्यकता भासत नाही कां? या वर तिला उत्तर मिळते की जोपर्यंत पुरुष घरात आहेत तोपर्यंत स्त्रियांना कसली भिती. हिंस्त्र आणि वेड्या लोकांना ज्याप्रकारे वेड्यांच्या दवाखान्यात डांबून ठेवतात अगदी त्याचप्रमाणे या पुरुषांना घरात कोंडून ठेवणे आवश्यक असते. रुकैया म्हणते आमच्या देशात हे शक्य नाही. यावर तिला उत्तर मिळते तुमच्या देशात पुरुष स्त्रियां बरोबर दुर्व्यवहार करतो, करु शकतो परंतु त्याला मोकळ सोडून स्त्रियांनाच घरात कोंडून ठेवण्यात येते.

रुकैया विचारते की आम्ही भारतीय स्त्रियांना करावे तरी काय? पुरुष तर खूपच शक्तिवान असतो. त्यावर ती स्त्री उद्‌गारते ः सिंह देखील माणसापेक्षा शक्तिवान असतो पण म्हणून तो सिंह माणसावर वर्चस्व स्थापित करण्याचा, त्याला गुलाम बनविण्याचा प्रयत्न करतो काय? तुम्हा भारतीय स्त्रियांना हेच कळत नाही की स्वतःचे कल्याण कशात आहे. त्याला मी तरी काय करु? तुम्ही स्वतःचे नैसर्गिक अधिकार स्वतःच गमावून बसलात. 

या विलक्षण स्वप्नकथेत सौरऊर्जेच्या कल्पनेचे रोमांचित करणारे वर्णन आहे, स्वतंत्र महिला विद्यापीठाची कल्पना देखील केली गेली आहे. कदाचित अशी कल्पना देणारी रुकैया पहिलीच स्त्री असावी. वृष्टीवर पूर्ण नियंत्रणाचे वर्णन आहे. मुलींना मोफत शिक्षण मिळते. कायदाच असा आहे की 21व्या वर्षापूर्वी कोणाही स्त्रीला लग्न करता येणार नाही. या देशात धर्म म्हणजे 'प्रेम आणि सत्य". प्रत्येकाचे हे धार्मिक कर्तव्य आहे की एकमेकाशी प्रेमाने व्यवहार करायचे. खरे तेच बोलायचे. या देशाचा सगळा कारभार एक स्त्रीच बघते व सर्व संशोधनाचे कार्य देखील इथल्या स्त्रियाच करतात.

अशाप्रकारे एकापेक्षा एक विचित्र कल्पनांनी ही स्वप्नकथा भरलेली आहे. जी स्त्री स्वतंत्रता, तिच्यावर होणाऱ्या अन्याय, अत्याचार, तिला घरात कोंडून ठेवणे, शिक्षणापासून वंचित ठेवणे इत्यादी, पुरुष मानसिकतेच्या विरुद्ध चीड प्रकट करित आहे असे वाटते. या कथेच्या माध्यमाने रुकैयाचा आत्मविश्वास, तिची बुद्धिमत्ता, प्रतिभाच आम्हास दिसून पडते. 

ही कथा म्हणून महत्वपूर्ण आहे कां की ज्या कल्पनांना आज आम्ही काही प्रमाणात प्रत्यक्ष बघित आहोत त्या कल्पना रुकैयाने आजच्या 100हून अधिक वर्षांपूर्वीच करुन घेतल्या होत्या. एक गोष्ट आणखिन एक उच्चकुलीन महिला असून देखील तिच्या कल्पनेची भरारी साधारण स्त्रियांच्या भावभावनांशी जोडलेली आहे. एक रुढ़ींनी ग्रासलेल्या धर्मांध मुस्लिम समाजाच्या स्त्रीविषयक दृष्टिकोणाच्या विरुद्ध उभी राहून स्त्रीमुक्तिचा उद्‌घोष करणारी ती पहली स्त्रीवादी पुरोगामी लेखिका आहे. तिच्या स्वप्नकथेचा बंगाली भाषेत अनुवाद जेव्हा प्रकाशित झाला त्यावेळी मुस्लिम धर्मांध मंडळीनी तिला तसा फारसा त्रास दिला नाही कारण तिचा पति ब्रिटिशांचा मोठा अधिकारी मजिस्ट्रेट, माहेर जमीनदार मंडळी व शासन ब्रिटिशांचे होते. पण तिच्या या स्वप्नकथेला धर्म व राष्ट्रविरोधी जरुर ठरविले गेले.

रुकैयाच्या पूर्वी महाराष्ट्रात ताराबाई शिंदे जी एक जमीनदार कुटुंबाची असून तिला हिंदी, इंग्रजी, मराठी व संस्कृत भाषा येत असून त्या काळात ती घोड्यावर बसून स्वतःच्या शेतावर जात असे. तिने देखील स्त्री-पुरुष संबंधांवर एक 52पानी लेख 'स्त्री-पुरुष तुलना" पुरुष वर्चस्वा विरुद्ध लिहिला होता पण तिला ती चर्चा वा प्रसिद्धी लाभली नाही जी रुकैयाला मिळाली. एक वैशिष्ट्य म्हणजे  सन्‌ 1950-60 पर्यंत योरोप, अमेरिकेत देखील स्त्रीवादाची संकल्पना रुढ़ होऊ शकली नव्हती त्या आधीच ताराबाई शिंदे व रकैया सारख्या महिलांनी स्त्री मुक्तिवादी भूमिका घेतली होती. आजच्या स्त्रीवादी महिलांकरिता या स्त्रिया निश्चितच आदर्श सिद्ध होऊ शकतात. कारण स्त्री समान अधिकारवादची संकल्पना कोणत्याही विशिष्ट देश किंवा धर्माकरिता अवतरित झालेली नसून ही आत्मविश्वास संपन्न स्वतंत्रतेची इच्छा बाळगणाऱ्या संवेदशील स्त्रीचे एक सुंदर स्वप्न आहे.