Saturday, 20 December 2014

विश्व मानवता में उम्मा की दीवार 2

सर्व साधारण यह समझ नहीं पाते कि इस तरह के अपराधिक, आतंकवादी कृत्यों का जिनमें बेगुनाह लोग मारे जाते  हैं का समर्थन धर्म के आधार पर कैसे किया जा सकता है, किया जा रहा है। यह जानने के लिए हमें कुरान क्या कहती है यह समझना पड़ेगा। समझने में आसानी  रहे इसलिए हम रेडियंस में दि. 19,20 नवम्बर 2000 में अब्दुल रहमान हमद अल ओमर द्वारा एक लेख में किए गए प्रतिपादन को प्रस्तुत कर रहे हैं, "" इस्लाम भौगोलिक सीमाएं, राष्ट्रीय रिश्ते, लोकप्रिय संबंधों और  राष्ट्रीयत्व को नहीं जानता; क्योंकि उनके कारण लोगों में विभक्तता और दुजाभाव निर्मित होता है। मुसलमानों के लिए इस्लाम के सिवाय अन्य कोई राष्ट्रीयत्व नहीं।'' अर्थात इस्लाम राष्ट्रवाद को मान्यता नहीं देता और मौ. मौैदूदी तो इस राष्ट्रवाद पर आरोप ही जड़ते हैं कि "" मुस्लिमों की दृढ़ एकता (यानी उम्मा) के भंग करने के उद्देश्य से ही मुसलमानों के दुश्मन राष्ट्रवाद का प्रचार कर रहे हैं।'' (Who is maududi?- Maryam Jameelah) ़ 

कुरान के अनुसार-"" तुम (मुसलमान) खैर-उम्मत (बेहतरीन गिरोह) हो।'' (3ः110) ""अल्लाह ने तुमको जमीन का खलीफा (शासक) बनाया है।'' (6ः165) इस तरह की आयतों के कारण स्वयं को अन्यों की अपेक्षा सर्वश्रेष्ठ समझने की  ओर वे ही राज्य करने लायक हैं यह भावना पैदा हो जाती है। उनका श्रेष्ठत्व इसलिए है, क्योंकि वे एकमेव अल्लाह की ही इबादत करते हैं। और जो नहीं करते हैं वे काफीर हैं। शिर्क (बहुदेव वाद) का गुनाह करते हैं। इसलिए गुनाहगार हैं। कुरान और हदीस के अनुसार सबसे बड़ा गुनाह शिर्क है। "" अल्लाह का शरीक (साझी) न ठहरा निस्संदेह  शिर्क बहुत बड़ा जुल्म है।'' (31ः13), (बुखारीः 32, 3428) और जो ऐसा करते हैं वे "" कुफ्र (इस्लाम से इनकार) करने वाले गुनाहगार है।'' (2ः276) उन्हें अल्लाह  पसंद नहीं करता। और यदि ऐसे काफीरों को इस्लाम के बंदे बतौर सजा बम से उड़ा दें तो वे गलत कहां हैं !  क्योंकि कुरान के अनुसार- ""तबाही है उसके लिए जो शिर्क (बहुदेव पूजन) करते हैं।'' (41ः6) "" और इनका  (काफीरों का) आखिरी ठीकाना दोजख (नरक) है।'' (13ः18)  जहां उनको पहुंचाने का नेक कार्य बम विस्फोट जैसी कारगुजारियों से इन अल्लाह के बंदों द्वारा बखूबी अंजाम दिया जा रहा है।
तो यह है कुरान की सीख और अल्लाह के वचन जो कि अपरिवर्तनीय हैं। हमेशा के लिए हैं जो पूरे होकर ही रहेंगे, इस बात पर हर मुसलमान की दृढ़ श्रद्धा रहती है। इस श्रद्धा को पै. मुहम्मद के अंतिम विदाई यात्रा के भाषण से और भी बल मिलता है। पै. मुहम्मद ने अपनी मक्का की अंतिम बिदाई यात्रा में कहा था-"" ऐ लोगों, मेरे शब्द ध्यान से सुनो और समझ लो। ध्यान में  रखो, प्रत्येक मुसलमान दूसरे मुसलमान का भाई है। तुम सब (मुसलमान) समान हो। तुम सब मिलकर एक (मुस्लिम) बंधुसंघ) (उम्मा) हो। तुम एक दूसरे पर अन्याय मत करो, परस्पर गले काटकर काफिर मत बनो।''

""मैंने अपना जीवन कार्य पूर्ण कर लिया है। मैं मेरे पीछे अल्लाह का (कुरान) ग्रंथ और उसके पैगंबर की सुन्नाह (हदीस) तुम्हारे लिए छोड़े जा रहा हूं। अगर उसे (श्रद्धा से और कृति सेे) दृढ़ता से पकड़े रहोगे तो तुम सीधी राह छोड़कर कभी भी मार्ग भ्रष्ट नहीं होओगे'' (The Spirit of  Islam- Saiyad Amir Ali पृ. 114) उसी समय अल्लाह की ओर से आगे का संदेश अवतरित हुआ-""मैंने तुम्हारे लिए दीन को मुकम्मल (परिपूर्ण)  कर दिया तुम्हारे लिए इस्लाम को दीन (धर्म) की हैसियत से पसंद कर लिया।'' (5ः3) इस आयत पर दअ्‌वतुल कुर्आन का  भाष्य है- "" दीन के मुकम्मल (परिपूर्ण) करने का मतलब यह है कि दीन की इमारत का निर्माण परिपूर्ण हो गया। इसमें न तो कोई रिक्ति रह गई और न किसी वृद्धि एवं संशोधन की गुंजाइश है। मानव जाति के लिए अल्लाह तआला को जो हिदायत देनी थी वह दे चुका और.... अब इस दीन को इसी रूप में कियामत तक बाकी रहना  है और सम्पूर्ण जगत की सारी कौमों के लिए यही हिदायत का स्तंभ है।'' भाष्य आगे कहता है- "" दीन या  यह व्यवस्था मानव जीवन के तमाम विभागों पर हावी है। जन्म से लेकर मृत्यु तक जिन मार्ग निर्देशों की आवश्यकता थी और व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ सामाजिक जीवन के लिए जो आसमानी हिदायत दरकार थी उन सबका आयोजन इस व्यवस्था में है और उन सबका समावेश इस व्यवस्था में है।'' भाष्य आगे यह भी कहता है कि-"" जब दीन परिपूर्ण हो गया तो रिसालत (पैगंबरी) का सिलसिला भी खत्म हो गया। किसी नए नबी के आने की  जरूरत बाकी नहीं रहती।'' (द.कु. खंड1 पृ.340) अर्थात अब जो कुछ करना है वह अनुयायियोें को ही करना है, और वे कर भी रहे हैं तथा वे जो कुछ कर रहे हैं यह ऊपर पहले ही बतलाया जा चुका है। कुरान की इस शिक्षा का मुस्लिमों के मन-मस्तिष्क पर इतना गहरा प्रभाव है कि अशिक्षित, अल्पशिक्षित या उच्चशिक्षित इनमें से कोई भी हो वे अल्लाह एक है मुहम्मद उसका अंतिम पैगंबर है, और कुरान उसकोे अल्लाह ने दी है तथा जो कुछ कुरान में है वही अंतिम सत्य है। जो कुछ है वह कुरान में  ही है। उसमें हर चीज का समाधान मौजूद है के दायरे से बाहर ही नहीं निकल पाते और इसी कारण स्वयं को सुधारवादी, आधुनिक समझने वाले, कहे जाने वाले मुस्लिम विद्वान, चिंतक, विचारक भी, इस्लाम की कई चीजें कालबाह्य हो चुकी हैं और कुरान का पुनर्वाचन कर नए अन्वयार्थ लगाए जाकर उस अनुसार मुस्लिम समाज के सामने प्रस्तुत किए जाना चाहिए, करना चाहिए, यह कहने का साहस नहीं जुटा पाते जिसकी आवश्यकता है। 
सम्पूर्ण आलेख का निष्कर्ष यह निकलता है कि इस्लाम धर्म की "उम्मा' की संकल्पना केवल भयंकर ही नहीं तो अति संकुचित भी है, क्योंकि वह तो केवल ईमानवालों यानी इस्लाम पर श्रद्धा रखने वाले मुसलमानों तक ही सीमित है। उसमें गैर मुस्लिमों (काफिरों) को कोई स्थान प्राप्त नहीं। अर्थात्‌ इस्लाम की सदाचार, भाईचारा आदि की नैतिक शिक्षाओं, श्रद्धावानों ;"उम्मा' के सदस्यों द्वारा आपस में एक दूसरे के साथ पालन करने के लिए है, गैर-उम्मा या काफिरों के साथ इन सदवर्तनों के पालन की आवश्यकता नहीं। क्योंकि वे काफिर तो हैं ही-""नजिस (अपवित्र)''। (9ः22) अर्थात्‌ उनके साथ किए जाने वाले कदाचार, दुराचार, हिंसा सब जायज हैं। इसमें कोई गुनाह नहीं। बल्कि सर्वत्र-"" दीन अल्लाह ही का हो'' अर्थात सभी ओर इस्लाम गालिब (प्रबल) हो। इसके लिए तो ऐसे कृत्य करना ही पड़ते हैं, पड़ेंगे। क्योंकि "" इस्लाम के प्रति समस्त मुस्लिमें की केवल परिपूर्ण भावनात्मक निष्ठा ही पर्याप्त नहीं वरन गैर- मुस्लिमों के विचार- सिद्धांत, इनके विषय में भी चरम की घृणा होना अत्यावश्यक है।'' (सय्यद कुल्ब अंतरराष्ट्रीय विद्वान, विवेक 20-8-06 पृ. 84 ) जब इतनी घृणा होगी तो  बम विस्फोट जैसे कृत्य तो होंगे ही ना। शांति, सहिष्णूता, भाईचारे के कृत्य तो होने से रहे।

धर्म तो सम्पूर्ण विश्व के कल्याणार्थ होता है, विश्व के सम्पूर्ण मानव जगत के तारण के लिए होता है। जबकि इस्लाम धर्म के उम्मा के कारण तो सम्पूर्ण मानव जगत दो भागों में बंटकर रह जाता है। एक तो, उम्मा के सदस्य जो ""अल्लाह की पार्टी के हैं।'' (58ः22) दूसरे वे जो उम्मा के सदस्य नहीं वे ""शैतान की पार्टी के हैं।'' (58ः19) दअ्‌वतुल कुर्आन भाष्य भी कहता हैः ""कुफ्र (इस्लाम से इनकार) और इस्लाम की जंग में ईमान वालों को काफिरों से निर्भिकता पूर्वक और निःसंकोच लड़ना चाहिए। '' (द.कु. खंड 3, पृष्ठ 1993) और निःसंदेह वे बेझिझक लड़ भी रहे हैं।

 स्पष्ट है कि उम्मा की भयानक और संकुचित संकल्पना के कारण विश्वमानवता में उम्मा की जो दीवार खडी है, उसकी वजह से सम्पूर्ण विश्व समुदाय एक ही परिवार के समान, एक ही तरह के सभी को प्राप्त समान अधिकारों  और कर्त्तव्यों के साथ, शांत और सहिष्णू वातावरण में  सुख के साथ रह ही नहीं सकता।  "वसुधैव कुटुम्बकम '  और  "सर्वे भंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामयः' की आदर्श एवं श्रेष्ठ भावनाएं साकार रूप ले ही नहीं सकती। मुस्लिम विद्वानों, िंचंतकों, विचारकों को सोचना चाहिए कि जब विश्व समुदाय की दूरियां कम हो रही हैं, वैश्वीकरण और उदारीकरण का दौर चल रहा है, ऐसे दौर में इस तरह की भयंकर संकुचित संकल्पना से जनित दूषित विचारों के  साथ मुस्लिम समुदाय रहा तो  उसके दुष्परिणाम कितने घातक होंगे। इससे तो इस्लाम मतलब शांति नहीं, वरन अशांति या कब्रस्तान की शांति कहा जाएगा। और धर्म का अर्थ यह तो कदापि नहीं। संक्षेप में, हम इस बात से कतई इनकार नहीं कर रहे हैं कि इस्लाम में इंसानियत नहीं, लेकिन यह किसी विशेष घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप उपजी सहज भावना हो सकती है; व्यक्तिगत तौर पर हो सकती है। लेकिन, जहां सवाल इस्लाम का आता है तो सभी इंसानों के लिए नहीं वरन्‌ वहां वह उम्मा का रूप धरकर ही सामने आती है। जिस प्रकार कोई मां ममता की मूर्ति, वात्सल्य से परिपूर्ण होती है, परंतु जितना वात्सल्य वह अपनी स्वयं की संतान पर उंडैलती है उतनी ममता वह दूसरे बच्चों पर प्रकट नहीं करती। उसी प्रकार इस्लाम में जो इंसानियत है वह इतनी सीमित है जितनी की रेगिस्तान की तपती भर दोपहरी में की इंसान की छाया। जो उस तक ही सीमित रहती है। वह छाया क्षितिज तक जा पहुंचे इतनी लंबी नहीं हो पाती। जैसी की संध्याकाल की होती है। जो कि मानव धर्म में होती है।

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