Saturday, 20 December 2014

विश्व मानवता में उम्मा की दीवार 1

प्राचीन अरबस्तान में कबीलाई संस्कृति व्याप्त थी। "" कबीलों के अलग-अलग  रहने तथा सभी आदमियों के एक दूसरे पर निर्भर होने के कारण इन लोगों में एक प्रकार का प्रेम भाव पैदा हो जाता था, जिसकी वजह से कबीलों तथा कौमों के संगठन में अत्याधिक सहायता मिलती थी। यह भावना " असबियह' अर्थात "असबियत' के नाम से प्रसिद्ध है। इसी के कारण एक कबीला अपनी मर्यादा की रक्षा हेतु दूसरे कबीले से युद्ध करते समय अपने प्राणों की बलि देना ब़ड़ी साधारण बात समझता था। बदवी (अरबस्तान के लोग) भाट का यह गीत सर्वदा उसके कबीले में गूंजता रहता था कि " अपने कबीले के प्रति निष्ठावान रहो। कबीले का हक इतना अधिक है कि पति अपनी पत्नी का त्याग कर सकता है।  '' (इब्ने खल्दून का मुकदमा पृ.6) संक्षेप में, "असबियत' मतलब  "कबीले के अंतर्गत लोगों का आपसी प्रेम, भाईचारा अथवा संगठन।' मुहम्मद साहेब और उनके द्वारा स्थापित इस्लाम पर यह संस्कार स्वाभाविक ही था। इसलिए कहा जा सकता है कि इस्लाम ने इन भावनाओं से लाभ उठाया और यह संकल्पना इस्लाम में "उम्मा' के रूप में दृढ़ मूल हुई।

 "उम्मा' यह वह संकल्पना है जो अपने अलावा और किसी के सम्मान से जीने के अधिकार को अन्य किसी सभ्यता, संस्कृति, जीवन शैली या परंपरा के हक को नकारती है। कलमा "ला इलाहइल्लल्लाह मुहम्मद रसूल्लल्लाह' अर्थात अल्लाह एक है और मुहम्मद उसका पैगंबर है, के बाद मुस्लिमों की सबसे अधिक श्रद्धा "उम्मा' में ही होती है। उम्मा यानी मुस्लिम बंधु संघ। उम्मा की संकल्पना का आधार है कुरान की यह आयत ""ईमान वाले (मुसलमान)(सब) आपस में भाई हैं। ''(49ः10, 9ः71, 8ः72) । यह भावना बलवती हो इसलिए कुरान में आगे यह हृदय स्पर्शी प्रश्न पूछा गया है- "" क्या तुममेें से कोई अपने भाई का गोश्त खाना पसंद करता है़?'' (49ः12)। इस "उम्मा' की सर्वश्रेष्ठता बनी रहे इस संबंध में पैगंबर मुहम्मद के वचन (हदीस) हैं। "हदीस' कथन के पूर्व हम यह जान लें कि हदीस के मायने क्या हैं़? मुस्लिमों में कुरान के अनंतर हदीस का महत्व है। हदीस को  "सुन्नाह' भी  कहते हैं। सुन्नाह का अर्थ मार्ग, नियम, कार्यपद्धति अथवा जीवन पद्धति होता है। कुरान की शिक्षाओं का योग्य स्पष्टीकरण और उसके अन्वयार्थों के विवाद मिटाने का एकमेव साधन हदीस ही है। अर्थात कुरान और हदीस मिलकर "दीन' (धर्म) की शिक्षा को पूर्णत्व तक पहुंचाते हैं। संक्षेप में हदीस मतलब मुहम्मद साहेब की कृतियां, उक्तियां एवं यादें, जो उनके निकटस्थ एवं विश्वसनीय अनुयायियों द्वारा आस्थापूर्वक संभालकर रखी थी, जिन्हें बाद में संग्रहीत कर संशोधकों ने ग्रंथ का रूप दिया। तो, हदीस कथन हैः-" कियामत के दिन सभी को फैसले के लिए अल्लाह के सामने लाया जाएगा। उसके द्वारा सभी प्रकार के धर्म विधि किए जाने के उपरांत भी जब उसको धिक्कारा जाएगा तब उसे आश्चर्य होगा कि यह दंड मुझे क्यों? तब उसे बताया जाएगा कि उसने उसके शब्दों द्वारा "उम्मा' (मुस्लिम समाज) में फूट डाली थी। उसका यह फल है।' (Tabligh movement मौ. वहीदुद्दीन खान- पृ. 48) एक और हदीस कथन है- "मुस्लिम समाज के (उम्मा के) परस्पर संबंधों में भेद पैदा करने वाले का तलवार से कत्ल करो, फिर वह कोई भी क्यों ंन हो।' (मुस्लिम 4565 से 66) एक और पैगंबर कथन- पैगंबर ने कहा-  "जो एकजुट (मुस्लिम) समाज से दूर जाता है वह नरक में जाता है।'  (रेडियंस 16-1-2000 पृ.5)पै. मुहम्मद द्वारा मक्का से हिजरत कर मदीना आगमन के बाद उम्मा की स्थापना उन्हें अनिवार्य प्रतीत हुई। इस प्रकार यह उम्मा मदीनावासियों (जिन्हें कुरान में अनसार (मददगार) कहा गया है) और मक्का से हिजरत (देशत्याग) कर आए हुए शरणार्थी (मुहाजिर) मक्कावासियों के बीच एक ही धर्म के अनुयायियों के रूप में स्थापित किया गया था। इस संबंध में कुरान की आयत 8ः72 में कहा हुआ है-"" जो लोग ईमान (श्रद्धा) लाए और उन्होंने हिजरत (यानी देशत्याग) किया और अल्लाह के रास्ते में अपनी जान माल से ल़ड़े और जिन  लोगों(यानी अनसारों) ने देश त्याग करने वालों को जगह दी और मदद की यह लोग (आपस में) एक दूसरे के वारिस हैं।' '  यह"उम्मा' कितना दृढ़ था उसका एक उदाहरण इस हदीस में मिलता है! एक मददगार ने एक शरणार्थी जो उसका भाई बना था से कहा- मैं अपनी सारी सम्पत्ति हम दोनों में बांटता हूं। वैसे ही मेरी दो पत्नियां है उनमें से जो तुझे पसंद हो वह बता तो मैं उससे तलाक ले कर उसकी शादी तेरे साथ करा देता हूं। (बुखारी3680, 81, 3937)
 "उम्मा'  को इस ऐतिहासिक वाकिये से और भी अच्छी तरह से समझा जा सकता है कि सिकंदर जब विश्व विजय के लिए निकला तब उसके पास केवल 30,000 सैनिक थे, लेकिन तक्षशिला तक पहुंचते-पहुंचते उन सैनिकों  की संख्या 1,20,000 तक जा पहुंची। हारे हुए देशों की सेनाओं को सिकंदर अपनी सेना में शामिल कर लिया करता था, परंतु इस प्रकार के बहुद्देशीय सैनिक उसके वफादार कभी भी नहीं हुए और अंत में मात्र कुछ ही सैनिक उसके साथ बचे रहे। वहीं हारे हुओं को अपनी सेना में शामिल करने की नीति मुहम्मद साहेब ने भी अपनाई थी, परंतु वे सिकंदर के समान असफल न रहे। यही तो थी मुहम्मद साहेब की दूर-दृष्टि भरी चतुराई कि वे जिन्हें भी पराजित करते थे उन्हें सर्वप्रथम धर्मांतरित कर अपने "उम्मा' का सदस्य बना डालते थे। (इनकार की तो गुंजाइश रहती ही नहीं थी) और वादा रहता था कि यदि लड़ते हुए जीते तो युद्ध लूट के रूप में उपभोग के लिए धन सम्पत्ति और सुंदर औरतें और यदि खुदा न खास्ता शहादत को प्राप्त हुए तो मिलेगा परलोक का सुखी जीवन और मिलेगी जन्नत की हुरें (स्वर्ग की अप्सराएं), जहां उन्हें सदा के लिए रहना है।  सिकंदर यहीं मात खा गया। यदि सिकंदर ने भी मुहम्मद साहेब की भांति धर्म का जोड़ लगाया होता तो वह दुर्दशा को प्राप्त न हुआ होता। उदाहरणार्थः- मक्का विजय के पश्चात हुनैन के युद्ध के लिए निकलते समय उन्होेंने मक्का के 2000 नव मुस्लिमों को अपनी सेना में लिया था और उन्हें युद्ध लूट में से निश्चित हिस्सा भी दिया था, जिससे कि वे इस्लाम की ओर आकर्षित हों। इसका वर्णन कुरान की (9ः58-60) आयतों में आया हुआ है। तो बनी कुरैजा के साथ हुए युद्ध के पश्चात स्वयं को (यानी मुहम्मद साहेब को) लूट के प्राप्त पांचवे हिस्से में से कुछ लड़कियां और स्त्रियां अपने मित्रों को भेंट के रूप में दी और बची हुई बेचकर उससे राज्य के लिए घोड़े और शस्त्र खरीदे तथा शेष लूट 3000 सैनिकों में नियमानुसार बांट दी। (मुस्लिम 4370) इस कारण धर्मांतरित लोग और उनकी सेनाएँ अपना बहुदेेशीयत्व खोकर एक संघ मुस्लिम समुदाय का भाग बनकर रह गए और मुहम्मद साहेब विजेता कहलाए। जबकि सिकंदर यहीं मात खा गया। यदि सिकंदर ने भी मुहम्मद साहेब की भांति ही धर्म का जोड़ लगाया होता तो वह दुर्दशा को प्राप्त न होता।

"उम्मा' के संबंध में एक इस्लामिक विद्वान सय्यद हुसैन कहते हैं-"" पै. मुहम्मद द्वारा पुरस्कृत (बंधुभाव) का मूलभूत सिद्धांत यह था कि "बंधुसंघ' यह रक्त संबंधों पर आधारित न होकर (समान) धर्म श्रद्धा पर आधारित है और इसीलिए मुस्लिमों के साथ गैर-मुस्लिमों के रिश्तों को उन्होंने नकारा था। उन्होंने मक्का से आए हुए मुहाजिर और मदीना के अनसारों के बीच व्यक्तिगत स्तर पर बंधुसंघ निर्मित किया था।'' ( The Early History of Islam-Saiyad safdar Husain  पृ. 95) उम्मा का घटक बनने के लिए जिस कलमातैयबा ""ला इलाह इल्लल्लाह मुहम्मद रसूल्लुल्लाह'' का उच्चारण करना प़ड़ता है उस पर मौ. मौदूदी का भाष्य गौर करने लायक है-"" इसी कलमें की वजह से आदमी और आदमी में भी  बड़ा फर्क हो जाता है जो इस कलमें के पढ़ने वालेे हैं  वे एक (समुदाय) उम्मत होते हैं। बाप अगर कलमा पढ़ने वाला है और बेटा इससे इनकार करता है तो गोया बाप बाप न रहा और बेटा बेटा न रहा।  पराया, आदमी अगर कलमा पढ़ने वाला है.. गोया यह कलमा ऐसी चीज है कि गैरों को एक दूसरे से मिला देती है और अपनों को एक दूसरे से काट देती है, यहां तक कि इस कलमें का जोर इतना है कि खून और जन्म के रिश्ते इसके मुकाबले में कुछ नहीं।'' (खुतबात सय्यद अबुल आला मौदूदी मर्कजी मकतबा इस्लामी देहली- पृ.26,27)

मौै. मौदूदी आगे यह भी कहते हैं- "" अतः तुमने इकरार कर लिया कि जो कानून और जो तरीका हुजूर (यानी मुहम्मद साहेब) ने बताया है तुम उसी पर  चलोगे और जो कानून इसके खिलाफ है उस पर लानत भेजोगे'' यह इकरार करने के बाद अगर तुमने हुजूर के लाए हुए कानून को छोड़ दिया और दुनिया के कानून को मानते रहे तो तुमसे बढ़कर झूठा और बेईमान कोई न होगा, क्योंकि तुम यही इकरार करके तो इस्लाम में दाखिल हुए थे कि मुहम्मद साहेब का लाया हुआ कानून हक है और इसी की तुम पैरवी करोगे। इसी इकरार की बदौलत तो तुम मुसलमानों के भाई बने। '' (पृ.31)
यही "पॅन इस्लामिझम' वैश्विक मुस्लिम भाईचारे का भी आधार है। इस संबंध में दअवतुल कुर्आन भाष्य कहता है- "" दीनी (धार्मिक) रिश्ते के हिसाब से मुसलमान एक दूसरे के भाई हैं। रंग और वंश, जाति और देश का अंतर इस विश्वव्यापी भाईचारे में कोई अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकता। वे जहां कहीं भी होंगे एक दूसरे से जुड़े रहेंगे और एक के दर्द की चोट दूसरा अपने अंदर महसूस करेगा चाहे उनके बीच हजारों मील का फासला हो।'' इस भाईचारे के रिश्ते को मजबूत करने की ताकीद (चेतावनी) हदीस में दी गई है, मुसलमान मुसलमान का भाई है, न उस पर जुल्म करें और न उसे जालिम के हवाले करें। जो व्यक्ति अपने भाई की हाजत (इच्छा) पूरी करने में लगा रहता है और जो व्यक्ति किसी मुसलमान की तकलीफ दूर करेगा और जोे किसी मुसलमान की परदापोशी करेगा (दोषों को छुपाएगा) अल्लाह कियामत के दिन उसकी परदापोशी करेगा।'' (दअ्‌वतुल कुर्आन खंड 3 पृ.1848) यही कारण है कि 11 सितम्बर का वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर हवाई हमला हो या लंदन हवाई अड्डे की साजिश या लंदन के 2005 के बम विस्फोट या मुम्बई के बम विस्फोट इन मुस्लिम विस्फोटकर्ता, हमलावर आतंकवादियों के कृत्यों के समर्थन में मुस्लिम समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग विभिन्न रूप धरकर सामने आ जाता है। जुलाई 2005 में लंदन में हुए बम विस्फोट जिसमें 56 लोग मारे गए थे के संदर्भ में  हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में 25 से 28 प्रतिशत तक ब्रिटिश मुस्लिमों ने इस हमले का समर्थन किया है। समर्थन का कारण यह बतलाया गया है कि अमेरिका ने आतंकवाद से युद्ध के नाम पर मुस्लिमों के विरुद्ध लड़ाई छेड़ दी है और ब्रिटिश सरकार उसको समर्थन दे रही है। इसी "उम्मा' की संकल्पना के कारण "अक्षरधाम मंदिर' पर हमले के आरोपी फांसी की सजा प्राप्त तीनों अपराधियों का गुजरात से किसी भी तरह का कोई संबंध न होने पर भी उन्होंने यह कुकृत्य किया। ठीक इसी तरह लंदन हवाई अड्डे से उड़ान भरने वाले विमानों को उड़ाने की साजिश और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर तथा पेंटागन पर हवाई हमले करने वाले स्वतंत्र पॅलिस्टन समर्थक हैं, परंतु इनमें से कोई भी पॅलेस्टिनी नहीं। और तो और इस तरह के अपराधिक कृत्यों का जिनमें निर्दोष बलि चढ़ते हैं, जिहाद के नाम पर, कैरो (इजिप्त) के 1000 वर्ष पूर्व स्थापित "अल अजहर' विश्वविद्यालय के कुछ शिक्षक भी समर्थन करते हैं। ....

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