Thursday, 25 December 2014

पाबंदी हो धर्मांतरण पर

पाबंदी हो धर्मांतरण पर

धर्मांतरण का मुद्दा इस समय छाया हुआ है। कहीं ईसाइयों को हिंदू बनाकर उनकी 'घर वापसी" करवाई जा रही है तो, कहीं हिंदुओं को धर्मांतरित कर ईसाई बनाया जा रहा है के समाचार प्रतिदिन समाचार पत्रों में छप रहे हैं। देश की संसद इस मुद्दे पर बार-बार स्थगित की जा रही है। इस कारण बीमा, कोयला जैसे अन्य कई महत्वपूर्ण विधेयक अटके पडे हैं। इस तरह का वातावरण बनाया जा रहा है मानो अन्य सभी मुद्दे गौण हैं और धर्मांतरण का मुद्दा ही जीवन-मरण का प्रश्न हो। पहले भी धर्मांतरण होते रहे हैं जो चुप चुपके ही हुआ करते थे। परंतु, इस बार सामूहिक रुप से खुले आम हो रहा है। वास्तव में धर्मांतरण के मुद्दे पर सार्थक बहस होने की बजाए केवल वातावरण को बिगाडने के प्रयास ही अधिक हो रहे हैं।

इस मुद्दे पर एक लंबी बहस स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हो चूकी है। वस्तुतः जब देश स्वतंत्र हुआ तब मिशनरियों में यह भय पैदा हुआ कि उनके धर्मांतरण के कार्यक्रमों पर नियंत्रण आएगा। कई मिशनरियों को तो यह भी लगता था कि अब अपना बाड-बिस्तरा समेटने का समय आ गया है। इसलिए इस संबंध में भारत के भावी राज्यकर्ताओं का मानस समझने की दृष्टि से उन्होंने गांधीजी को छोड अन्य नेताओं से संपर्क स्थापित किया। गांधीजी के विचार धर्मांतरण के संबंध में उन्हें मालूम ही थे इसलिए उन्हें टाला गया। (जो मैं एक लेख 'विशुद्ध धार्मिकता एवं धर्मांतरण" (स्पूतनिक 7 से 13 अक्टूबर 2013) के द्वारा पहले ही दे चूका हूं) 

लंदन के 'द कॅथलिक हेरल्ड" ने पंडित जवाहरलाल नेहरु से पूछा 'अपने धर्म के आचरण और प्रचार की स्वतंत्रता हो, हिंदी  ईसाइयों के प्रतिनिधि मंडल द्वारा कॅबिनेट मिशन को की गई सूचनाओं के विषय में आपका मत क्या है?" पंडितजी ने जवाब दिया- 'जिसकी जडें मजबूत और निरोगी हों, ऐसा कोई सा भी धर्म फैले, यह विवेक सम्मत है और उसके फैलने के अधिकार में हस्तक्षेप  उसकी जडों पर आघात है। अगर विशिष्ट धर्म सार्वजनिक सुव्यवस्था को तकलीफ नहीं दे रहा हो अथवा उसके उपदेशक अनुत्सुक अन्य धर्मींयों के गले अपना धर्म नहीं उतार रहे हों तो।" 

रेव्हरंड स्टॅन्ले जोन्स सरदार वल्लभभाई पटेल, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, मौलाना आजाद और नेहरुजी से मिले। वल्लभभाई पटेल को मिशनरियों के स्वास्थ्य और शिक्षा कार्यों पर एतराज नहीं था। उनका मत था ः परंतु, मिशनरी राजनैतिक उद्देश्यों के लिए सामूहिक धर्मांतरण ना करें, देश से एकरुप हों। राजगोपालाचारी मिशनरियों के धर्मांतरण के अधिकार के संबंध में सहमत थे। उनकी सूचना थी ः परंतु, धर्म के कारण निर्मित हुए देशविभाजन के वर्तमान संकट के कारण धर्मांतरण बंद करें और परिस्थिति सुधरने तक विभिन्न मार्गों से जनसेवा करें। यह मान्य हो तो, 'प्रोफेस", 'प्रेक्टिस" और 'प्रोपगेट" के स्थान पर 'बिलीफ", 'वर्शिप" और 'प्रीच" हो। मौलाना आजाद मिशनरियों का इस्तिकबाल करते थे। परंतु, उनका आक्षेप मिशनरियों द्वारा किए जानेवाले सामूहिक धर्मांतरण पर था। नेहरुजी का प्रतिपादन था जो देश को अपना घर माने उसका स्वागत है। कांग्रेस ने अपने निर्वाचन प्रकटन में, प्रत्येक नागरिक को सार्वजनिक सुव्यवस्था और नीति की मर्यादा में सद्‌विवेकबुद्धि से स्वतंत्रता और स्वधर्म प्रकटन एवं आचरण का अधिकार घोषित किया था।

भारतीय संविधान में 'मूलभूत स्वतंत्रता" में धार्मिक स्वतंत्रता का समावेश होना अपेक्षित था। धार्मिक स्वतंत्रता में धर्मप्रकटन (प्रोफेस), आचरण (प्रेक्टिस) अंतर्भूत होंगे इस विषय में मतभेद नहीं थे। परंतु, निम्न बातों में मतभेद एवं तीव्र भावनाएं थी ः धर्मप्रसार (प्रोपगेट) और उसकी मर्यादा। उदा. सख्ती, धोखाधडी, प्रलोभन द्वारा किए हुए धर्मांतरण, अज्ञानियों का धर्मांतरण, धर्मांतरित पालकों की संतति का धर्म।

भारतीय संविधान का अंतिम प्रारुप तय करने के पूर्व, 'मूलभूत अधिकार" जैसे विषयों के संबंध में समादेशक समितियां और उपसमितियां स्थापित की गई। अनेक बार चर्चा करके इन समितियों और उपसमितियों ने बनाए हुए प्रतिवृत्त संविधान परिषद के सम्मुख चर्चा के लिए रखे गए। सुझाई हुई धाराओं, वाक्यांशों, उनके क्रमांक और उनके स्पष्टीकरणों में अनेक बार बदलाव हुए।

'मूलभूत अधिकार" इस संबंध में क. मा. मुन्शी ने उपसमिति को 17 मार्च 1947 को प्रस्तुत की हुई सूची ः 1. सार्वजनिक सुव्यवस्था, नीति और स्वास्थ्य से सुसंगत रहनेवाली प्रत्येक नागरिक को सद्‌विवेकबुद्धि, स्वतंत्रता और स्वधर्म आचरण एवं प्रकटन का अधिकार, इनमें उपासना में की आर्थिक, वित्तीय, राजनैतिक कामों का समावेश नहीं। 2. माता-पिता या पालक की सहमति के बिना 18 वर्ष।

देश स्वतंत्र होनेवाला है इसकी कल्पना चर्च नेताओं को 1937 से थी। संयुक्त राष्ट्रसंघ से विभिन्न ईसाई संगठनों के निकट संबंध थे। भारत के चर्च नेताओं को वैश्विक स्तर पर होनेवाली ईसाई हलचलों की कल्पना थी। भारतीय संविधान के संबंध में उन्होंने विस्तृत विचार किया था। उनके उद्देश्य स्पष्ट थे। नेशनल ईसाई कौंसिल ने एक शिष्ट मंडल भेजकर संविधान परिषद के सारे ईसाई सदस्यों को इस संबंध में तैयार किया था। 'नेशनल ईसाई कौंसिल रिव्यू" में इस संबंध में सतत लेख आ रहे थे। ईसाई नेताओं ने संविधान समिति के अपने उद्देश्यों का सतत पीछा किया।
संविधान परिषद के सदस्यों ने जो प्रतिपादन किए थे उनका सारांश संक्षेप में इस प्रकार है -

रत्नस्वामी - ईसाइयत और इस्लाम में धर्मांतरण अति आवश्यक भाग होने के कारण उन धर्मीयों के स्वधर्मानुसार अधिकारों की व्यवस्था होना चाहिए। माता-पिता द्वारा धर्म अथवा राष्ट्रीयत्व बदलने पर बच्चे ने माता-पिता का अनुसरण करना चाहिए। 
एच. सी. मुकर्जी (यह ईसाई थे) - धर्म प्रसार के समान स्वतंत्रता का भी अंतर्भाव हो।

रत्नस्वामी - 'प्रसार" में उपदेशों के साथ-साथ चित्रपट, आकाशवाणी आदि आधुनिक प्रचार साधनों का भी समावेश होना चाहिए।

क. मा. मुन्शी - भाषण की स्वतंत्रता में किसी भी प्रकार के उपदेशों का समावेश होता है। प्रचार में उपदेशों से अलग भी कुछ हो तो वह क्या है यह मालूम होना चाहिए। मेरा इस संबंध में विरोध है।

अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर - अमेरिका में भी यह विशेषाधिकार नहीं। अपने यहां भाषण की स्वतंत्रता है। 'प्रसार" का अधिकार मुझे मान्य नहीं।

एच. सी. मुकर्जी - संतती के धर्मांतरण के विषय का वाक्यांश हटाया जाए। उचित जांच के बाद मजिस्ट्रेट द्वारा प्रमाणित किए बगैर धर्मांतरण मान्य नहीं होगा, यह (22वां) वाक्यांश हटाया जाए।

फ्रॅन्क ऍन्थनी (अँग्लो इंडियन नेता) - ईसाइयों को इन दोनों बातों से आत्मीयता, घनिष्ठता है।

डॉ. श्यामाप्रसाद मुकर्जी - 22 वां वाक्यांश हटाया ना जाए।

चर्चा के बाद मूल सूची में 'प्रकटन", 'आचरण" के साथ 'प्रसार" डाला गया।
फॅ्रन्क ऍन्थनी - ईसाइयों को 'आचरण" और 'प्रसार" का मूलभूत अधिकार देने के बाद संतती के धर्मांतरण के विषय में मर्यादा डालकर वह अधिकार वापिस ना लिया जाए।

आर. पी. ठाकुर (दलित वर्ग) - साधारणतया दलित वर्ग के लोग धर्मांतरण के बलि होते हैं। उनके अज्ञान का लाभ उठाकर धर्मप्रचारक उन्हें लालच में डालकर उनका धर्मांतरण करते हैं। यह 'धोखाधडी" में आता है क्या? वैसा ना होने पर मुन्शी अपने वाक्यांश में सुधार करें।

रेव्ह. जे. जे. एम. निकल्स रॉय - अच्छी आध्यात्मिक शक्ति के विरुद्ध कानून ना बनाए जाएं। 12 अथवा 18 वर्ष की आयु के नीचे के युवाओं को प्रभु का बुलावा आया तो उन्हें धर्मांतरण से परावृत्त ना किया जाए।

पुरुषोत्तमदास टंडन - 18 वर्ष की आयु के लडके ने 100 रुपये की झोपडी बेची तो वह व्यवहार अवैध ठहरता है। परंतु, इसी लडके द्वारा अपना धर्म बदलने इतना वह समझदार है, ऐसा हमारे बंधु कह रहे हैं। धर्म का मूल्य 100 रुपये से कम है क्या? अज्ञानों का धर्मांतरण हमेशा सेे ही दबाव और अयोग्य प्रभाव के कारण हुआ होता है। अधिकांश कांग्रेसजन 'प्रसार" के विरुद्ध हैं फिर भी हमारे ईसाई मित्रों का आदर रख हमने 'प्रसार" शब्द रखने की मान्यता दी है। परंतु, अब अज्ञानों का धर्मांतरण मान्य करने के लिए हमें कहा जा रहा है, यह तो अति हो रही है।

डी. एन. दत्ता - बहुसंख्य कांग्रेसजन 'प्रसार" शब्द रखने के पक्ष में हैं।
रेव्ह. जेरोम डि"सूझा - इसमें परिवार के अधिकार का तत्त्व है। सभी वाक्यांश ध्यानपूर्वक शब्दरचना के लिए समादेशक समिति के पास वापिस भेजें।

अल्गु राय शास्त्री - लोभवश धर्मांतरण करनेवालों के बच्चों को भी धर्मांतरण के लिए बाध्य ना किया जाए। छत्तीसगढ़ जैसे 'एक्स्ल्यूडेड एरिआज" में केवल मिशनरियों का प्रवेश है। यह रोका जाना चाहिए। असम में ईसाइयों की संख्या तीनसौ गुना बढ़ गई है।

जगतनारायण लाल - अल्पसंख्यकों के मामले में यह सभागृह अधिकतम की मर्यादा तक गया है। विश्व के किसी भी देश के संविधान में धर्म 'प्रसार" करने का अधिकार मान्य नहीं किया गया है। इससे अधिक अल्पसंख्यकों ने मांगा तो बहुसंख्यकों की उदारता का अनुचित लाभ ठहरेगा।

अनंतशयनम अय्यंगार - आत्माएं बचाने के लिए नहीं बल्कि समाज का विघटन करने के लिए धर्म का उपयोग किया जा रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। संख्या बढ़ाकर विधिमंडल में अधिक स्थान प्राप्त का अवसर तुम्हें चाहिए क्या? धर्मांतरण ना चलने दें। वह करना हो तो संंबंधित व्यक्ति न्यायाधीश के सामने प्रतिज्ञा पर वैसी उसकी इच्छा है कहे। विषय पुनर्विचार के लिए वापिस भेजें।

आर. व्ही. धुलेकर - देश का पुनः विभाजन करने के लिए अपने गुट की संख्या बढ़ाने के प्रयत्न चल रहे हैं। देश का पुनः विभाजन हो, ऐसा विभाजन के लिए कारण रहनेवालों की इच्छा है। हमारी इच्छा है और दस साल बाद कोई ऐसा ना कहे, हमारा भी राष्ट्र है।

हुसैन इमाम - धोखाधडी और सख्ती से हुई कोई सी भी बात अवैध है, ऐसे कई निर्णय हैं। परंतु, यह बात मूलभूत अधिकारों की सूची में ना डाली जाए।

हुसैन इमाम की सूचना, मत संग्रह के पश्चात सम्मत हुई। दबाव और अयोग्य प्रभाव द्वारा किया हुआ धर्मांतरण अवैध है, यह वाक्यांश मूलभूत अधिकारों में से हटाए जाने पर 'नेशनल ख्रिश्चन्स रिव्ह्यू" (अक्टूबर 1947) में एक ईसाई पत्र लेखक ने आनंद व्यक्त किया।

प्रा. के. टी. शाह - प्रचार की स्वतंत्रता का दुरुपयोग ना हो। अबोध बच्चे और शारीरिक-मानसिक दृष्टि से दुर्बल व्यक्तियों का धर्मांतरण करने के उद्देश्य से स्कूल, महाविद्यालय, रुग्णालय, आश्रम आदि संस्थाओं का अपवाद किया जाए, ऐसी सूचना मैं प्रस्तुत करता हूं।

लोकनाथ मिश्रा - अपनने निधर्मी राज्य घोषित किया है। देश में अनेक धर्म हैं। तुम धर्म स्वीकारनेवाले ही वाले हो तो देश में प्रचंड बहुसंख्यकों का हिंदूधर्म ही रहना चाहिए। धर्मनिरपेक्ष राज्य हिंदुबहुल देश द्वारा अल्पसंख्यकों को दिखाया हुआ सर्वाधिक औदार्य है। अपने देश की प्राचीन संस्कृति को नजरअंदाज करने के लिए धर्मनिरपेक्ष राज्य यह पिच्छल शब्द प्रयोग में लाया गया है। लोगों को धर्म प्रसार करना हो तो करने दो। परंतु, उसका समावेश मूलभूत अधिकारों में ना करें। इसके कारण वैमनस्य बढ़ेगा। 'प्रसार" शब्द मूलभूत अधिकारों में से हटाया जाए।

पंडित जवाहरलाल नेहरु - विषय क्या है यह मुझे मालूम पडेगा क्या? 

लक्ष्मीकांत मैत्रा - अपनी विरासत संपन्न है। सभी को धर्मप्रकटन, आचरण, प्रसार के समान मूलभूत अधिकार मिलना चाहिए। ईसाइयों ने उत्साह और उन्मादपूर्वक धर्मांतरण नहीं किए हैं।

रोहिणीकुमार चौधरी - धर्मप्रचार में अन्य धर्मियों पर किचड उछालने उदा. भगवान श्रीकृष्ण और मूर्तिपूजा की निंदा पर कठोर दंड की व्यवस्था संविधान में होना चाहिए। 

टी. टी. कृष्णमाचारी - 'प्रसार" और 'धर्मांतरण" का अधिकार सभी को दिया गया है।

क. मा.मुन्शी - अल्पसंख्यक समिति ने प्रशंसनीय ढ़ंग से घटित करवाई गई सुलह ना बिगडे इसलिए प्रसार इस धारा का शब्द रखा गया है।

इतनी चर्चा के उपरांत ईसाइयों के धर्मप्रसार का अधिकार , वस्तुतः (अज्ञान व्यक्ति सहित) धर्मांतरण का अधिकार मान्य हुआ।

संविधान का गठन होते समय गांधीजी जीवित थे। इस विषय पर उनके विचार 'ख्रिश्चन मिशन्सः देअर प्लेस इन इंडिया" (1941) इस पुस्तक में संकलित हुए हैं। परंतु, आश्चर्य यह है कि उनके विचारों की दखल किसी ने भी नहीं ली। यहां तक कि कांग्रेसियों तक ने।

 वस्तुतः यदि धर्मपरिवर्तन बुद्धिपूर्वक किया गया है तो कोई हर्ज नहीं, परंतु ऐसे धर्मांतरण कुछ ही लोग करते हैं अधिकतर धर्मांतरण धन आदि का लोभ अथवा जोरजबरस्दती से ही किए जाते हैं यह वस्तुस्थिति है। जो भी हो इस तरह के धर्मांतरण वैमनस्य बढ़ाने का ही काम करते हैं। यह वैमनस्य असंतोष ही फैलाता है जो देश के विकास व प्रगति लिए घातक ही है। वर्तमान में लगभग जितने भी धर्मांतरण हो रहे हैं उनमें बहुलता किसी लालच या स्वार्थ की ही है। देश में शांति बने रहे बेवजह के विवाद ना खडे हों इसके लिए अब आवश्यक हो गया है कि उपर्युक्त प्रकार के धर्मांतरणों पर पाबंदी ही लगा दी जाए। 

हां, जो लोग बुद्धिपूर्वक धर्मांतरण करना चाहें वे चाहें तो धर्मांतरण कर एक धर्म से दूसरे धर्म में खुशी-खुशी जाएं कोई एतराज नहीं। वर्ना इसी तरह से सामूहिक धर्मांतरणों के आयोजन प्रतिस्पर्धात्मक ढ़ंग से होते ही रहेंगे और धर्म का मजाक बनता रहेगा।

Saturday, 20 December 2014

विश्व मानवता में उम्मा की दीवार 2

सर्व साधारण यह समझ नहीं पाते कि इस तरह के अपराधिक, आतंकवादी कृत्यों का जिनमें बेगुनाह लोग मारे जाते  हैं का समर्थन धर्म के आधार पर कैसे किया जा सकता है, किया जा रहा है। यह जानने के लिए हमें कुरान क्या कहती है यह समझना पड़ेगा। समझने में आसानी  रहे इसलिए हम रेडियंस में दि. 19,20 नवम्बर 2000 में अब्दुल रहमान हमद अल ओमर द्वारा एक लेख में किए गए प्रतिपादन को प्रस्तुत कर रहे हैं, "" इस्लाम भौगोलिक सीमाएं, राष्ट्रीय रिश्ते, लोकप्रिय संबंधों और  राष्ट्रीयत्व को नहीं जानता; क्योंकि उनके कारण लोगों में विभक्तता और दुजाभाव निर्मित होता है। मुसलमानों के लिए इस्लाम के सिवाय अन्य कोई राष्ट्रीयत्व नहीं।'' अर्थात इस्लाम राष्ट्रवाद को मान्यता नहीं देता और मौ. मौैदूदी तो इस राष्ट्रवाद पर आरोप ही जड़ते हैं कि "" मुस्लिमों की दृढ़ एकता (यानी उम्मा) के भंग करने के उद्देश्य से ही मुसलमानों के दुश्मन राष्ट्रवाद का प्रचार कर रहे हैं।'' (Who is maududi?- Maryam Jameelah) ़ 

कुरान के अनुसार-"" तुम (मुसलमान) खैर-उम्मत (बेहतरीन गिरोह) हो।'' (3ः110) ""अल्लाह ने तुमको जमीन का खलीफा (शासक) बनाया है।'' (6ः165) इस तरह की आयतों के कारण स्वयं को अन्यों की अपेक्षा सर्वश्रेष्ठ समझने की  ओर वे ही राज्य करने लायक हैं यह भावना पैदा हो जाती है। उनका श्रेष्ठत्व इसलिए है, क्योंकि वे एकमेव अल्लाह की ही इबादत करते हैं। और जो नहीं करते हैं वे काफीर हैं। शिर्क (बहुदेव वाद) का गुनाह करते हैं। इसलिए गुनाहगार हैं। कुरान और हदीस के अनुसार सबसे बड़ा गुनाह शिर्क है। "" अल्लाह का शरीक (साझी) न ठहरा निस्संदेह  शिर्क बहुत बड़ा जुल्म है।'' (31ः13), (बुखारीः 32, 3428) और जो ऐसा करते हैं वे "" कुफ्र (इस्लाम से इनकार) करने वाले गुनाहगार है।'' (2ः276) उन्हें अल्लाह  पसंद नहीं करता। और यदि ऐसे काफीरों को इस्लाम के बंदे बतौर सजा बम से उड़ा दें तो वे गलत कहां हैं !  क्योंकि कुरान के अनुसार- ""तबाही है उसके लिए जो शिर्क (बहुदेव पूजन) करते हैं।'' (41ः6) "" और इनका  (काफीरों का) आखिरी ठीकाना दोजख (नरक) है।'' (13ः18)  जहां उनको पहुंचाने का नेक कार्य बम विस्फोट जैसी कारगुजारियों से इन अल्लाह के बंदों द्वारा बखूबी अंजाम दिया जा रहा है।
तो यह है कुरान की सीख और अल्लाह के वचन जो कि अपरिवर्तनीय हैं। हमेशा के लिए हैं जो पूरे होकर ही रहेंगे, इस बात पर हर मुसलमान की दृढ़ श्रद्धा रहती है। इस श्रद्धा को पै. मुहम्मद के अंतिम विदाई यात्रा के भाषण से और भी बल मिलता है। पै. मुहम्मद ने अपनी मक्का की अंतिम बिदाई यात्रा में कहा था-"" ऐ लोगों, मेरे शब्द ध्यान से सुनो और समझ लो। ध्यान में  रखो, प्रत्येक मुसलमान दूसरे मुसलमान का भाई है। तुम सब (मुसलमान) समान हो। तुम सब मिलकर एक (मुस्लिम) बंधुसंघ) (उम्मा) हो। तुम एक दूसरे पर अन्याय मत करो, परस्पर गले काटकर काफिर मत बनो।''

""मैंने अपना जीवन कार्य पूर्ण कर लिया है। मैं मेरे पीछे अल्लाह का (कुरान) ग्रंथ और उसके पैगंबर की सुन्नाह (हदीस) तुम्हारे लिए छोड़े जा रहा हूं। अगर उसे (श्रद्धा से और कृति सेे) दृढ़ता से पकड़े रहोगे तो तुम सीधी राह छोड़कर कभी भी मार्ग भ्रष्ट नहीं होओगे'' (The Spirit of  Islam- Saiyad Amir Ali पृ. 114) उसी समय अल्लाह की ओर से आगे का संदेश अवतरित हुआ-""मैंने तुम्हारे लिए दीन को मुकम्मल (परिपूर्ण)  कर दिया तुम्हारे लिए इस्लाम को दीन (धर्म) की हैसियत से पसंद कर लिया।'' (5ः3) इस आयत पर दअ्‌वतुल कुर्आन का  भाष्य है- "" दीन के मुकम्मल (परिपूर्ण) करने का मतलब यह है कि दीन की इमारत का निर्माण परिपूर्ण हो गया। इसमें न तो कोई रिक्ति रह गई और न किसी वृद्धि एवं संशोधन की गुंजाइश है। मानव जाति के लिए अल्लाह तआला को जो हिदायत देनी थी वह दे चुका और.... अब इस दीन को इसी रूप में कियामत तक बाकी रहना  है और सम्पूर्ण जगत की सारी कौमों के लिए यही हिदायत का स्तंभ है।'' भाष्य आगे कहता है- "" दीन या  यह व्यवस्था मानव जीवन के तमाम विभागों पर हावी है। जन्म से लेकर मृत्यु तक जिन मार्ग निर्देशों की आवश्यकता थी और व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ सामाजिक जीवन के लिए जो आसमानी हिदायत दरकार थी उन सबका आयोजन इस व्यवस्था में है और उन सबका समावेश इस व्यवस्था में है।'' भाष्य आगे यह भी कहता है कि-"" जब दीन परिपूर्ण हो गया तो रिसालत (पैगंबरी) का सिलसिला भी खत्म हो गया। किसी नए नबी के आने की  जरूरत बाकी नहीं रहती।'' (द.कु. खंड1 पृ.340) अर्थात अब जो कुछ करना है वह अनुयायियोें को ही करना है, और वे कर भी रहे हैं तथा वे जो कुछ कर रहे हैं यह ऊपर पहले ही बतलाया जा चुका है। कुरान की इस शिक्षा का मुस्लिमों के मन-मस्तिष्क पर इतना गहरा प्रभाव है कि अशिक्षित, अल्पशिक्षित या उच्चशिक्षित इनमें से कोई भी हो वे अल्लाह एक है मुहम्मद उसका अंतिम पैगंबर है, और कुरान उसकोे अल्लाह ने दी है तथा जो कुछ कुरान में है वही अंतिम सत्य है। जो कुछ है वह कुरान में  ही है। उसमें हर चीज का समाधान मौजूद है के दायरे से बाहर ही नहीं निकल पाते और इसी कारण स्वयं को सुधारवादी, आधुनिक समझने वाले, कहे जाने वाले मुस्लिम विद्वान, चिंतक, विचारक भी, इस्लाम की कई चीजें कालबाह्य हो चुकी हैं और कुरान का पुनर्वाचन कर नए अन्वयार्थ लगाए जाकर उस अनुसार मुस्लिम समाज के सामने प्रस्तुत किए जाना चाहिए, करना चाहिए, यह कहने का साहस नहीं जुटा पाते जिसकी आवश्यकता है। 
सम्पूर्ण आलेख का निष्कर्ष यह निकलता है कि इस्लाम धर्म की "उम्मा' की संकल्पना केवल भयंकर ही नहीं तो अति संकुचित भी है, क्योंकि वह तो केवल ईमानवालों यानी इस्लाम पर श्रद्धा रखने वाले मुसलमानों तक ही सीमित है। उसमें गैर मुस्लिमों (काफिरों) को कोई स्थान प्राप्त नहीं। अर्थात्‌ इस्लाम की सदाचार, भाईचारा आदि की नैतिक शिक्षाओं, श्रद्धावानों ;"उम्मा' के सदस्यों द्वारा आपस में एक दूसरे के साथ पालन करने के लिए है, गैर-उम्मा या काफिरों के साथ इन सदवर्तनों के पालन की आवश्यकता नहीं। क्योंकि वे काफिर तो हैं ही-""नजिस (अपवित्र)''। (9ः22) अर्थात्‌ उनके साथ किए जाने वाले कदाचार, दुराचार, हिंसा सब जायज हैं। इसमें कोई गुनाह नहीं। बल्कि सर्वत्र-"" दीन अल्लाह ही का हो'' अर्थात सभी ओर इस्लाम गालिब (प्रबल) हो। इसके लिए तो ऐसे कृत्य करना ही पड़ते हैं, पड़ेंगे। क्योंकि "" इस्लाम के प्रति समस्त मुस्लिमें की केवल परिपूर्ण भावनात्मक निष्ठा ही पर्याप्त नहीं वरन गैर- मुस्लिमों के विचार- सिद्धांत, इनके विषय में भी चरम की घृणा होना अत्यावश्यक है।'' (सय्यद कुल्ब अंतरराष्ट्रीय विद्वान, विवेक 20-8-06 पृ. 84 ) जब इतनी घृणा होगी तो  बम विस्फोट जैसे कृत्य तो होंगे ही ना। शांति, सहिष्णूता, भाईचारे के कृत्य तो होने से रहे।

धर्म तो सम्पूर्ण विश्व के कल्याणार्थ होता है, विश्व के सम्पूर्ण मानव जगत के तारण के लिए होता है। जबकि इस्लाम धर्म के उम्मा के कारण तो सम्पूर्ण मानव जगत दो भागों में बंटकर रह जाता है। एक तो, उम्मा के सदस्य जो ""अल्लाह की पार्टी के हैं।'' (58ः22) दूसरे वे जो उम्मा के सदस्य नहीं वे ""शैतान की पार्टी के हैं।'' (58ः19) दअ्‌वतुल कुर्आन भाष्य भी कहता हैः ""कुफ्र (इस्लाम से इनकार) और इस्लाम की जंग में ईमान वालों को काफिरों से निर्भिकता पूर्वक और निःसंकोच लड़ना चाहिए। '' (द.कु. खंड 3, पृष्ठ 1993) और निःसंदेह वे बेझिझक लड़ भी रहे हैं।

 स्पष्ट है कि उम्मा की भयानक और संकुचित संकल्पना के कारण विश्वमानवता में उम्मा की जो दीवार खडी है, उसकी वजह से सम्पूर्ण विश्व समुदाय एक ही परिवार के समान, एक ही तरह के सभी को प्राप्त समान अधिकारों  और कर्त्तव्यों के साथ, शांत और सहिष्णू वातावरण में  सुख के साथ रह ही नहीं सकता।  "वसुधैव कुटुम्बकम '  और  "सर्वे भंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामयः' की आदर्श एवं श्रेष्ठ भावनाएं साकार रूप ले ही नहीं सकती। मुस्लिम विद्वानों, िंचंतकों, विचारकों को सोचना चाहिए कि जब विश्व समुदाय की दूरियां कम हो रही हैं, वैश्वीकरण और उदारीकरण का दौर चल रहा है, ऐसे दौर में इस तरह की भयंकर संकुचित संकल्पना से जनित दूषित विचारों के  साथ मुस्लिम समुदाय रहा तो  उसके दुष्परिणाम कितने घातक होंगे। इससे तो इस्लाम मतलब शांति नहीं, वरन अशांति या कब्रस्तान की शांति कहा जाएगा। और धर्म का अर्थ यह तो कदापि नहीं। संक्षेप में, हम इस बात से कतई इनकार नहीं कर रहे हैं कि इस्लाम में इंसानियत नहीं, लेकिन यह किसी विशेष घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप उपजी सहज भावना हो सकती है; व्यक्तिगत तौर पर हो सकती है। लेकिन, जहां सवाल इस्लाम का आता है तो सभी इंसानों के लिए नहीं वरन्‌ वहां वह उम्मा का रूप धरकर ही सामने आती है। जिस प्रकार कोई मां ममता की मूर्ति, वात्सल्य से परिपूर्ण होती है, परंतु जितना वात्सल्य वह अपनी स्वयं की संतान पर उंडैलती है उतनी ममता वह दूसरे बच्चों पर प्रकट नहीं करती। उसी प्रकार इस्लाम में जो इंसानियत है वह इतनी सीमित है जितनी की रेगिस्तान की तपती भर दोपहरी में की इंसान की छाया। जो उस तक ही सीमित रहती है। वह छाया क्षितिज तक जा पहुंचे इतनी लंबी नहीं हो पाती। जैसी की संध्याकाल की होती है। जो कि मानव धर्म में होती है।
विश्व मानवता में उम्मा की दीवार 1

प्राचीन अरबस्तान में कबीलाई संस्कृति व्याप्त थी। "" कबीलों के अलग-अलग  रहने तथा सभी आदमियों के एक दूसरे पर निर्भर होने के कारण इन लोगों में एक प्रकार का प्रेम भाव पैदा हो जाता था, जिसकी वजह से कबीलों तथा कौमों के संगठन में अत्याधिक सहायता मिलती थी। यह भावना " असबियह' अर्थात "असबियत' के नाम से प्रसिद्ध है। इसी के कारण एक कबीला अपनी मर्यादा की रक्षा हेतु दूसरे कबीले से युद्ध करते समय अपने प्राणों की बलि देना ब़ड़ी साधारण बात समझता था। बदवी (अरबस्तान के लोग) भाट का यह गीत सर्वदा उसके कबीले में गूंजता रहता था कि " अपने कबीले के प्रति निष्ठावान रहो। कबीले का हक इतना अधिक है कि पति अपनी पत्नी का त्याग कर सकता है।  '' (इब्ने खल्दून का मुकदमा पृ.6) संक्षेप में, "असबियत' मतलब  "कबीले के अंतर्गत लोगों का आपसी प्रेम, भाईचारा अथवा संगठन।' मुहम्मद साहेब और उनके द्वारा स्थापित इस्लाम पर यह संस्कार स्वाभाविक ही था। इसलिए कहा जा सकता है कि इस्लाम ने इन भावनाओं से लाभ उठाया और यह संकल्पना इस्लाम में "उम्मा' के रूप में दृढ़ मूल हुई।

 "उम्मा' यह वह संकल्पना है जो अपने अलावा और किसी के सम्मान से जीने के अधिकार को अन्य किसी सभ्यता, संस्कृति, जीवन शैली या परंपरा के हक को नकारती है। कलमा "ला इलाहइल्लल्लाह मुहम्मद रसूल्लल्लाह' अर्थात अल्लाह एक है और मुहम्मद उसका पैगंबर है, के बाद मुस्लिमों की सबसे अधिक श्रद्धा "उम्मा' में ही होती है। उम्मा यानी मुस्लिम बंधु संघ। उम्मा की संकल्पना का आधार है कुरान की यह आयत ""ईमान वाले (मुसलमान)(सब) आपस में भाई हैं। ''(49ः10, 9ः71, 8ः72) । यह भावना बलवती हो इसलिए कुरान में आगे यह हृदय स्पर्शी प्रश्न पूछा गया है- "" क्या तुममेें से कोई अपने भाई का गोश्त खाना पसंद करता है़?'' (49ः12)। इस "उम्मा' की सर्वश्रेष्ठता बनी रहे इस संबंध में पैगंबर मुहम्मद के वचन (हदीस) हैं। "हदीस' कथन के पूर्व हम यह जान लें कि हदीस के मायने क्या हैं़? मुस्लिमों में कुरान के अनंतर हदीस का महत्व है। हदीस को  "सुन्नाह' भी  कहते हैं। सुन्नाह का अर्थ मार्ग, नियम, कार्यपद्धति अथवा जीवन पद्धति होता है। कुरान की शिक्षाओं का योग्य स्पष्टीकरण और उसके अन्वयार्थों के विवाद मिटाने का एकमेव साधन हदीस ही है। अर्थात कुरान और हदीस मिलकर "दीन' (धर्म) की शिक्षा को पूर्णत्व तक पहुंचाते हैं। संक्षेप में हदीस मतलब मुहम्मद साहेब की कृतियां, उक्तियां एवं यादें, जो उनके निकटस्थ एवं विश्वसनीय अनुयायियों द्वारा आस्थापूर्वक संभालकर रखी थी, जिन्हें बाद में संग्रहीत कर संशोधकों ने ग्रंथ का रूप दिया। तो, हदीस कथन हैः-" कियामत के दिन सभी को फैसले के लिए अल्लाह के सामने लाया जाएगा। उसके द्वारा सभी प्रकार के धर्म विधि किए जाने के उपरांत भी जब उसको धिक्कारा जाएगा तब उसे आश्चर्य होगा कि यह दंड मुझे क्यों? तब उसे बताया जाएगा कि उसने उसके शब्दों द्वारा "उम्मा' (मुस्लिम समाज) में फूट डाली थी। उसका यह फल है।' (Tabligh movement मौ. वहीदुद्दीन खान- पृ. 48) एक और हदीस कथन है- "मुस्लिम समाज के (उम्मा के) परस्पर संबंधों में भेद पैदा करने वाले का तलवार से कत्ल करो, फिर वह कोई भी क्यों ंन हो।' (मुस्लिम 4565 से 66) एक और पैगंबर कथन- पैगंबर ने कहा-  "जो एकजुट (मुस्लिम) समाज से दूर जाता है वह नरक में जाता है।'  (रेडियंस 16-1-2000 पृ.5)पै. मुहम्मद द्वारा मक्का से हिजरत कर मदीना आगमन के बाद उम्मा की स्थापना उन्हें अनिवार्य प्रतीत हुई। इस प्रकार यह उम्मा मदीनावासियों (जिन्हें कुरान में अनसार (मददगार) कहा गया है) और मक्का से हिजरत (देशत्याग) कर आए हुए शरणार्थी (मुहाजिर) मक्कावासियों के बीच एक ही धर्म के अनुयायियों के रूप में स्थापित किया गया था। इस संबंध में कुरान की आयत 8ः72 में कहा हुआ है-"" जो लोग ईमान (श्रद्धा) लाए और उन्होंने हिजरत (यानी देशत्याग) किया और अल्लाह के रास्ते में अपनी जान माल से ल़ड़े और जिन  लोगों(यानी अनसारों) ने देश त्याग करने वालों को जगह दी और मदद की यह लोग (आपस में) एक दूसरे के वारिस हैं।' '  यह"उम्मा' कितना दृढ़ था उसका एक उदाहरण इस हदीस में मिलता है! एक मददगार ने एक शरणार्थी जो उसका भाई बना था से कहा- मैं अपनी सारी सम्पत्ति हम दोनों में बांटता हूं। वैसे ही मेरी दो पत्नियां है उनमें से जो तुझे पसंद हो वह बता तो मैं उससे तलाक ले कर उसकी शादी तेरे साथ करा देता हूं। (बुखारी3680, 81, 3937)
 "उम्मा'  को इस ऐतिहासिक वाकिये से और भी अच्छी तरह से समझा जा सकता है कि सिकंदर जब विश्व विजय के लिए निकला तब उसके पास केवल 30,000 सैनिक थे, लेकिन तक्षशिला तक पहुंचते-पहुंचते उन सैनिकों  की संख्या 1,20,000 तक जा पहुंची। हारे हुए देशों की सेनाओं को सिकंदर अपनी सेना में शामिल कर लिया करता था, परंतु इस प्रकार के बहुद्देशीय सैनिक उसके वफादार कभी भी नहीं हुए और अंत में मात्र कुछ ही सैनिक उसके साथ बचे रहे। वहीं हारे हुओं को अपनी सेना में शामिल करने की नीति मुहम्मद साहेब ने भी अपनाई थी, परंतु वे सिकंदर के समान असफल न रहे। यही तो थी मुहम्मद साहेब की दूर-दृष्टि भरी चतुराई कि वे जिन्हें भी पराजित करते थे उन्हें सर्वप्रथम धर्मांतरित कर अपने "उम्मा' का सदस्य बना डालते थे। (इनकार की तो गुंजाइश रहती ही नहीं थी) और वादा रहता था कि यदि लड़ते हुए जीते तो युद्ध लूट के रूप में उपभोग के लिए धन सम्पत्ति और सुंदर औरतें और यदि खुदा न खास्ता शहादत को प्राप्त हुए तो मिलेगा परलोक का सुखी जीवन और मिलेगी जन्नत की हुरें (स्वर्ग की अप्सराएं), जहां उन्हें सदा के लिए रहना है।  सिकंदर यहीं मात खा गया। यदि सिकंदर ने भी मुहम्मद साहेब की भांति धर्म का जोड़ लगाया होता तो वह दुर्दशा को प्राप्त न हुआ होता। उदाहरणार्थः- मक्का विजय के पश्चात हुनैन के युद्ध के लिए निकलते समय उन्होेंने मक्का के 2000 नव मुस्लिमों को अपनी सेना में लिया था और उन्हें युद्ध लूट में से निश्चित हिस्सा भी दिया था, जिससे कि वे इस्लाम की ओर आकर्षित हों। इसका वर्णन कुरान की (9ः58-60) आयतों में आया हुआ है। तो बनी कुरैजा के साथ हुए युद्ध के पश्चात स्वयं को (यानी मुहम्मद साहेब को) लूट के प्राप्त पांचवे हिस्से में से कुछ लड़कियां और स्त्रियां अपने मित्रों को भेंट के रूप में दी और बची हुई बेचकर उससे राज्य के लिए घोड़े और शस्त्र खरीदे तथा शेष लूट 3000 सैनिकों में नियमानुसार बांट दी। (मुस्लिम 4370) इस कारण धर्मांतरित लोग और उनकी सेनाएँ अपना बहुदेेशीयत्व खोकर एक संघ मुस्लिम समुदाय का भाग बनकर रह गए और मुहम्मद साहेब विजेता कहलाए। जबकि सिकंदर यहीं मात खा गया। यदि सिकंदर ने भी मुहम्मद साहेब की भांति ही धर्म का जोड़ लगाया होता तो वह दुर्दशा को प्राप्त न होता।

"उम्मा' के संबंध में एक इस्लामिक विद्वान सय्यद हुसैन कहते हैं-"" पै. मुहम्मद द्वारा पुरस्कृत (बंधुभाव) का मूलभूत सिद्धांत यह था कि "बंधुसंघ' यह रक्त संबंधों पर आधारित न होकर (समान) धर्म श्रद्धा पर आधारित है और इसीलिए मुस्लिमों के साथ गैर-मुस्लिमों के रिश्तों को उन्होंने नकारा था। उन्होंने मक्का से आए हुए मुहाजिर और मदीना के अनसारों के बीच व्यक्तिगत स्तर पर बंधुसंघ निर्मित किया था।'' ( The Early History of Islam-Saiyad safdar Husain  पृ. 95) उम्मा का घटक बनने के लिए जिस कलमातैयबा ""ला इलाह इल्लल्लाह मुहम्मद रसूल्लुल्लाह'' का उच्चारण करना प़ड़ता है उस पर मौ. मौदूदी का भाष्य गौर करने लायक है-"" इसी कलमें की वजह से आदमी और आदमी में भी  बड़ा फर्क हो जाता है जो इस कलमें के पढ़ने वालेे हैं  वे एक (समुदाय) उम्मत होते हैं। बाप अगर कलमा पढ़ने वाला है और बेटा इससे इनकार करता है तो गोया बाप बाप न रहा और बेटा बेटा न रहा।  पराया, आदमी अगर कलमा पढ़ने वाला है.. गोया यह कलमा ऐसी चीज है कि गैरों को एक दूसरे से मिला देती है और अपनों को एक दूसरे से काट देती है, यहां तक कि इस कलमें का जोर इतना है कि खून और जन्म के रिश्ते इसके मुकाबले में कुछ नहीं।'' (खुतबात सय्यद अबुल आला मौदूदी मर्कजी मकतबा इस्लामी देहली- पृ.26,27)

मौै. मौदूदी आगे यह भी कहते हैं- "" अतः तुमने इकरार कर लिया कि जो कानून और जो तरीका हुजूर (यानी मुहम्मद साहेब) ने बताया है तुम उसी पर  चलोगे और जो कानून इसके खिलाफ है उस पर लानत भेजोगे'' यह इकरार करने के बाद अगर तुमने हुजूर के लाए हुए कानून को छोड़ दिया और दुनिया के कानून को मानते रहे तो तुमसे बढ़कर झूठा और बेईमान कोई न होगा, क्योंकि तुम यही इकरार करके तो इस्लाम में दाखिल हुए थे कि मुहम्मद साहेब का लाया हुआ कानून हक है और इसी की तुम पैरवी करोगे। इसी इकरार की बदौलत तो तुम मुसलमानों के भाई बने। '' (पृ.31)
यही "पॅन इस्लामिझम' वैश्विक मुस्लिम भाईचारे का भी आधार है। इस संबंध में दअवतुल कुर्आन भाष्य कहता है- "" दीनी (धार्मिक) रिश्ते के हिसाब से मुसलमान एक दूसरे के भाई हैं। रंग और वंश, जाति और देश का अंतर इस विश्वव्यापी भाईचारे में कोई अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकता। वे जहां कहीं भी होंगे एक दूसरे से जुड़े रहेंगे और एक के दर्द की चोट दूसरा अपने अंदर महसूस करेगा चाहे उनके बीच हजारों मील का फासला हो।'' इस भाईचारे के रिश्ते को मजबूत करने की ताकीद (चेतावनी) हदीस में दी गई है, मुसलमान मुसलमान का भाई है, न उस पर जुल्म करें और न उसे जालिम के हवाले करें। जो व्यक्ति अपने भाई की हाजत (इच्छा) पूरी करने में लगा रहता है और जो व्यक्ति किसी मुसलमान की तकलीफ दूर करेगा और जोे किसी मुसलमान की परदापोशी करेगा (दोषों को छुपाएगा) अल्लाह कियामत के दिन उसकी परदापोशी करेगा।'' (दअ्‌वतुल कुर्आन खंड 3 पृ.1848) यही कारण है कि 11 सितम्बर का वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर हवाई हमला हो या लंदन हवाई अड्डे की साजिश या लंदन के 2005 के बम विस्फोट या मुम्बई के बम विस्फोट इन मुस्लिम विस्फोटकर्ता, हमलावर आतंकवादियों के कृत्यों के समर्थन में मुस्लिम समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग विभिन्न रूप धरकर सामने आ जाता है। जुलाई 2005 में लंदन में हुए बम विस्फोट जिसमें 56 लोग मारे गए थे के संदर्भ में  हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में 25 से 28 प्रतिशत तक ब्रिटिश मुस्लिमों ने इस हमले का समर्थन किया है। समर्थन का कारण यह बतलाया गया है कि अमेरिका ने आतंकवाद से युद्ध के नाम पर मुस्लिमों के विरुद्ध लड़ाई छेड़ दी है और ब्रिटिश सरकार उसको समर्थन दे रही है। इसी "उम्मा' की संकल्पना के कारण "अक्षरधाम मंदिर' पर हमले के आरोपी फांसी की सजा प्राप्त तीनों अपराधियों का गुजरात से किसी भी तरह का कोई संबंध न होने पर भी उन्होंने यह कुकृत्य किया। ठीक इसी तरह लंदन हवाई अड्डे से उड़ान भरने वाले विमानों को उड़ाने की साजिश और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर तथा पेंटागन पर हवाई हमले करने वाले स्वतंत्र पॅलिस्टन समर्थक हैं, परंतु इनमें से कोई भी पॅलेस्टिनी नहीं। और तो और इस तरह के अपराधिक कृत्यों का जिनमें निर्दोष बलि चढ़ते हैं, जिहाद के नाम पर, कैरो (इजिप्त) के 1000 वर्ष पूर्व स्थापित "अल अजहर' विश्वविद्यालय के कुछ शिक्षक भी समर्थन करते हैं। ....

Friday, 12 December 2014

हैरान ना होइए विश्व भर में फैले हुए है अंधविश्वास

हैरान ना होइए विश्व भर में फैले हुए है अंधविश्वास

कर्नाटक के मंत्री जरकिहोली जिन्होंने राज्य विधान सभा में अंधविश्वास विरोधी विधेयक लाने में मुख्य भूमिका निभाई थी ने श्मशान में रात बीता एवं रात्री-भोज कर श्मशान में भूत-प्रेत रहते हैं, वह अपवित्र स्थान है, आदि मिथ तोडने एवं अंधविश्वास के खिलाफ जागरुकता लाने की दृष्टि से यह कार्य कर एक सराहनीय पहल की है। उनका यह कहना कि जब तक लोगों के मन से अंधविश्वास समाप्त नहीं होगा तब तक पिछडे तबके के लोगों को न्याय नहीं मिलेगा एकदम सत्य है। परंतु, पिछडे ही नहीं तो अगडे समझे जानेवाले समाज के लोग भी अंधविश्वास में मुझे नहीं लगता कि कहीं किसी से कमतर पडते हैं। जो भी फरक होगा उन्नीस बीस का ही होगा। मंत्रीजी ने उठाया हुआ कदम कितना कठिन है इसका अंदाजा भी उन्हें होगा ही तभी उन्होंने यह कहा कि भले ही वह सत्ता में रहें या ना रहें अंधविश्वास के विरुद्ध उनकी लडाई चलती रहेगी। क्योंकि, जिस प्रकार से नकली बाबाओं-महाराजों की महामारी से पूरा विश्व ग्रस्त है उसी प्रकार से अंधविश्वासों की मारी यह पूरी की पूरी दुनिया ही है और अंधश्रद्धा तथा अंधविश्वासों के विरुद्ध आवाज उठानेवालों को हमेशा से ही तिरस्कार, अपमान व विरोध सहना पडा है। यहां तक कि जान का धोखा तक उठाना पडा है। 

 विश्व में कितने अंधविश्वास प्रचलित हैं इनके बारे में एक जर्मन ज्ञानकोश के 10 बडे खंड प्रकाशित हो चूके हैं। वास्तव में अंधविश्वासों का अस्तित्व तो मनुष्य के आरंभिक काल से ही है। इस बात के साक्षी हैं आदिवासियों में प्रचलित कई तरह के रीतिरिवाज एवं अजीबोगरीब क्रियाएं। सभ्य विश्व में भी अंधविश्वास व विचित्र मान्यताओं की भरमार है। जैसे कि कई बडे-बडे लोग यह मानते हैं कि फलां दिन सोचा हुआ कार्य नहीं होता या फलां-फलां दिन शुभ होता है या विशिष्ट दिवस पर खट्टा नहीं खाना चाहिए, फलां व्यक्ति को यात्रा प्रारंभ करते समय देख लें तो यात्रा स्थगित कर दें, आदि।

पश्चिमी लोग जो हमें अंधविश्वासी, डरपोक जाहिल कहते रहे हैं, हमारी श्रद्धाओं, मान्यताओं, देवी-देवताओं का मजाक उडाना  जिनका शगल है, जो हमें सुधारने का दावा करते रहते हैं। वे स्वयं कितने जाहिल हैं यह जानना भी बडा ही रोचक सिद्ध होगा। कैथोलिक सम्प्रदाय के अनुयायी इस्टर के पूर्ववाले गुरुवार को अशुभ मानते हैं। उस दिन चर्च की सारी घंटियां बंद कर दी जाती हैं। 13 का अंक अशुभ है यह एक पागलपन भरी समझ है परंतु, दुनिया भर में इस बात को लोग प्रमुखता से मानते हैं। अमेरिका के चंद्र अभियान अपोलो के दौरान अपोलो 13 के समक्ष आई विपत्तियों के लिए भी इसी अंक को दोषी माना गया था। 13 के अंक से संबद्ध अंधविश्वास संभवतः उस समय से प्रारंभ हुआ जब 12 देवताओं के एक भोज में 'मोकी" नामक देवता धोखे से शामिल हो गया फलस्वरुप बल्दूर  नामक लोकप्रिय देवता की मौत हो गई। ईसाई धर्म में 13 का अंक अपशकुनी है के सबूत के रुप में लास्ट सपर (ईसामसीह को क्रॉस पर चढ़ाने के एक दिन पूर्व की रात को ईसा और उसके शिष्यों को मिलाकर 13 लोगों ने एकत्रित रुप से किया हुआ अंतिम भोजन) के चित्र को पहचाना जाता है। इसी प्रकार से 3 के अंक को भी लेकर विश्वव्यापी अंधविश्वास है। ईसाई धर्म में 3 के अंक को उस समय से बुरा माना जाता है जब पीटर ने मुर्गे की बांग से पूर्व को 3 बार इंकार किया था।

स्काटलैंड में रोगी के बाल और नाखुन काटकर मुर्गे के साथ जमीन में गाढ़ दिया जाता है। स्काटिश लोगों की धारणा है कि कपडे की गेंद को कुंवारी लडकी ही फेंकेगी और वह दिन सेंट व्हैटीन माना जाता है। इस गेंद को फेंकने का उद्देश्य यह है कि जो भी पुरुष उसे उठाने के लिए 'हां" करेगा वह उसका भावी पति होगा। स्काटलैंड में नववर्ष की सुबह काले आदमी या काली वस्तु को देखना शुभ माना जाता है और जब काला आदमी दिखाई देने की संभावना ना हो तो लोग सिरहाने कोयला रखकर सो जाते हैं ताकि नववर्ष की सुबह सबसे पहले उसे ही देख लें। स्वीट्‌जरलैंड के शिकारी अगर यात्रा के समय सियार देख लें तो घर वापस आ जाते हैं। उन्हें इस बात का डर लगने लगता है कि कहीं गलती से वे मानवहत्या न कर बैठें।

इंग्लैंड और अमेरिका में शनिवार को कोई काम नहीं किया जाता है। वर एवं वधू या प्रेमी जोडों का साथ में फोटो खींचना भी अशुभ माना जाता है। पति-पत्नी या प्रेमियों को दर्पण में एक साथ देखना भी अपशकुन समझा जाता है। स्वीडन और डेनमार्क में प्रसूती के घर में आग जलाकर रखी जाती है कारण भूत-प्रेत। ग्रीस में बच्चे को पालने में लिटाकर आग के चारों ओर तीन बार परिक्रमा करने की प्रथा है। डेनमार्क में दरवाजे पर स्टील का एक टुकडा गाड देते हैं। पश्चिम के भूत हैं भी बडे अजीबोगरीब वे घडी के होते हैं, कुर्सियों के होते हैं, मकानों के हैं और तो और पानी के जहाजों के भी भूत वहां मौजूद हैं, लंदन में तो लोगों ने बसों के तक भूत सडक पर दौडते देखे हैं। वहां के भूतों ने तो मरने के बाद भी उपन्यास लिखे हैं।

छींक को लेकर पूरे विश्व में कई धारणाएं प्रचलित हैं। अमेरिका में यदि लडकी को छींक आती है तो माना जाता है कि उनका मित्र उन्हें याद कर रहा है। शिशु के जन्म के वक्त छींक आती है तो समझा जाता है कि वह बडा होकर नेता बनेगा। आस्ट्रेलिया के लोग छींक आने पर ईश्वर का आभार मानते हैं। जर्मनी में जूते पहनते समय छींकना अत्यंत अशुभ माना जाता है। यूनानी छींक को दैवी कृपा मानते हैं। अत्यंत आश्चर्यजनक अंधविश्वास है एस्टोनिया के निवासियों के संदर्भ में वहां यदि दो गर्भवती महिलाएं एक साथ छींके तो कन्या का जन्म होगा, दो पति एक साथ छींके तो पुत्र का जन्म होगा ऐसा माना जाता है।

खेल जगत भी अंधविश्वासों से भरा पडा है। क्रिकेट के कई खिलाडी किसी विशेष बल्ले, टोपी अथवा जूतों की जोडी को अपने लिए भाग्यशाली मानते हैं। कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाडी गले में ताबीज धारण किए रहते हैं अथवा मुकाबले के पूर्व अपनी किसी विशिष्ट आदत को दोहराते नजर आते हैं। अर्जेंटीना के राष्ट्रपति मेनिम ने भी स्वीकार किया है कि वे भी अंधविश्वासी हैं। इटली पर विजय पाने के बाद खेलप्रेमी मेनिम ने कहा कि वे सभी मैचों को एक ही टाई और कपडे पहनकर देखते हैं। अर्जेंटीना के निवासियों की मान्यता है कि 'भगवान अंर्जेंटीनी है।" कई लोग तो प्रेतबाधाओं से बचाव के पारंपरिक तरीके की लहसुन की माला बनाकर मैच के दौरान हाथ में दबाए बैठते हैं। 

अब इन प्रगत कहे जानेवाले देशों में फैले अंधविश्वासों को देखते यह टिप्पणी देने से मैं अपने आपको रोक नहीं पा रहा कि बताइए क्या खाकर हम भारतीय अंधविश्वासों में इनसे आगे निकल सकते हैं। हम तो ठहरे इन गोरों के आगे निपट गंवार, अनपढ़, अज्ञानी। वैसे इन प्रगतिशील गोरों के कैथोलिक चर्च के अंतर्गत योरोप में मध्यकाल में किस प्रकार से अंधविश्वासों का साम्राज्य फैला हुआ था यह और किसी लेख का विषय हो सकता है अतः यहीं विराम।

Tuesday, 9 December 2014

गाली पुराण

गाली पुराण

गालियां क्या है आक्रोश की अभिव्यक्ति का माध्यम। जब कोई किसी पर क्रुद्ध होता है तो उसका यह क्रोध अपशब्द के रुप में प्रकट होता है जो अश्लील होता है यही गाली है। संस्कृत-हिंदी शब्दकोश (आपटे) के अनुसार अश्लीलम्‌ यानी गाली - रचना का एक दोष जिसमें ऐसे शब्द प्रयोग किए जाएं जिनसे श्रोता के मन में शर्म, जुगुप्सा और अमंगल की भावना पैदा हो। उदाहरण के लिए 'साधनं सुमहद्यस्य, मुग्धा कुड्‌मलिताननेन दधती वायुं स्थितिकासा", तथा 'मृदुपवनाविभिन्नो मत्प्रियाया विनाशात्‌" - में साधन, वायु और विनाश शब्द अश्लील हैं और क्रमशः शर्म, जुगुप्सा और अमंगल की भावना पैदा करते हैं- 'साधन" शब्द तो लिंग (पुरुष की जननेन्द्रिय), 'वायु" शब्द अपान (गुदा से निकलनेवाली दुर्गंधयुक्त वायु) तथा 'विनाश" मृत्यु को प्रकट करता है। 

हमारे यहां षड़रिपु (काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह) दमन का उपदेश है क्योंकि, ये वृत्तियां समाज के लिए हानिकारक हैं। इस दृष्टि से भी गाली बकना, अपशब्दों का प्रयोग, दुर्वचन कहना वर्जित है। गालियां सामनेवाले व्यक्ति के मन पर चोट करती है और कभी-कभी अत्याधिक अपमान की अनुभूति होने पर हत्याएं तक हो जाती हैं। गालियां भी दो प्रकार की होती हैं ः सुसंस्कृत लोगों की गालियां जो थोडी शिष्ट होती हैं। दूसरे में उन लोगों की गालियां होती हैं जिन्हें सुसंस्कृत होने का मौका नहीं मिला। उनकी गालियां ठेठ होती हैं एवं इन लोगों का गालियों का कोष भी बहुत समृद्ध होता है व नई-नई गालियों का ईजाद करने में भी इन लोगों को महारत हासिल होती है।

गालियां बकने को भा.दं.वि. की धारा 294 में दंडनीय माना गया है। मनुसंहिता में नियम बतलाया गया है कि, कोई भी किसी को भी देश, जाति या वृत्ती (कामकाज) पर से गाली देता है तो उसे राजा दो सौ पण से दंडित करे। भाष्यकार मेधातिथि ने उसके उदाहरण भी दिए हुए हैं।

साहित्य संस्कृति का सबसे पुष्ट अंग है तथा संस्कृति संस्कार शब्द से उपजा है, संस्कार अनगढ़ को गढ़ता है, परिष्कृत करता है अर्थात्‌ साहित्य हमें परिष्कृत करने के लिए होता है। जिस प्रकार से साहित्य में भूषण होते हैं उसी प्रकार से दूषण भी होते हैं। गालियों का अक्षरशः वाड्‌मय है परंतु, लगभग लिखित रुप में उपलब्ध न होने के कारण उपेक्षित है। फिर भी संसार में अनेक भाषा वैज्ञानिक संस्थाएं उनका संग्रह करती हैं और इस संबंध में ऊहापोह करनेवाले सामयिक पत्र-पत्रिकाएं भी प्रकाशित करती हैं। लगभग 35-40 वर्ष पूर्व गालियों का अध्ययन करने के लिए दो रशियन भाषाशास्त्री भारत आए भी थे और उन्होंने अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला था कि पंजाब गालियों में सबसे समृद्ध प्रदेश है। उडीसा के गोपालचंद्र प्रहराज का 'पूर्णचंद्र उडीया भाषाकोश" संकलित करने में महत्वपूर्ण हाथ है। उन्होंने गांव-गांव घूमकर पनघटों पर महिलाओं के बीच होनेवाली कहासुनी को ध्यानपूर्वक सुनकर नए-नए अपशब्दों को दर्ज किया था।

प्राचीनकाल से ही गाली बकना प्रचलित रहा होना चाहिए। सांसारिक कलह ही इनकी जन्मदाता है। भगवत पुराण में तो कलियुग को कलहयुग कहा गया है। पुराण बतलाते हैं कि जुए का अड्डा, मदिरालय, संसार और पशुहत्या का स्थान। यहीं पर सबसे अधिक गालियां पैदा होती हैं। जैसे कविता भावनाओं का उत्कट सहज आविष्कार है वैसे ही गालियों की भावना (अच्छी-बुरी) भी श्रुतीगोचर सहज आविष्कार है। सुवचन व दुर्वचन मनुष्य के मुख में एक ही समय विद्यमान रहते हैं। संतज्ञानेश्वर से लेकर समर्थ रामदास तक की रचनाओं में अपशब्द सहज रुप से आए हुए हैं। संस्कृत के गालीगलौज के उदाहरण भी संस्कृत को शोभा दें उसी स्तर के हैं। संस्कृत भाषा का महासागर उसमें लिखित ग्रंथों के कारण ही उफन रहा है और उसमें आई हुई अशिष्टता जंगल की खुशबू की तरह ही है। 

वर्तमान में हमारे जीवन का ऐसा कौनसा क्षेत्र है जहां अपशब्दों का प्रयोग धडल्ले से जारी ना हो। क्रिकेट के क्षेत्र में आस्ट्रेलिया के खिलाडियों में अपशब्दों के प्रयोग की प्रवृत्ति आम बात है। मुक्केबाजी में तो लंबे समय से गालियां बकना खेल का मानो हिस्सा सा ही रहा है। मुक्केबाजी के दौरान गालियां बकने के लिए विश्वप्रसिद्ध मुक्केबाज मुहम्मदअली (केसियस क्ले) मशहूर थे। टीम अन्ना के आंदोलन में भी अपशब्दों का प्रयोग हो चूका है। आजकल की फिल्मों में गालियां बेछूट दी जा रही हैं। यहां तक की फिल्मों के नाम तक अपशब्दों पर रखे जा रहे हैं, गानों में भी गालियों का प्रयोग धडल्ले से किया जा रहा है। 

उ.प्र. और म.प्र के कुछ क्षेत्रों में विवाह के अवसर पर औरतें अश्लील गीत गाती हैं जिसमें दुल्हा-दुल्हन को या उनके नाते-रिश्तेदारों को बेहद अश्लील उपमाओं से नवाजा जाता है। महाराष्ट्र के सांगली जिले की खंडाला तहसील के सुखेड और बोरी गांव में हर साल गाली देने का त्यौहार मनाया जाता है जिसमें दोनो गांवों की औरतें नागपंचमी के दूसरे दिन एक दूसरे को गालियां बकती हैं। जिसे ब्रिटिश शासन काल में 1940 में बलपूर्वक बंद करवा दिया गया था। बाद में यह प्रथा फिर से प्रारंभ हो गई थी और शायद वर्तमान में यह बंद है। जयपुर के गालीबाज तो मशहूर रहे हैं जिन्होंने गालियों को समाज सुधार का माध्यम बनाया था।

आजकल साहित्य में भी गालियों का प्रवेश यथार्थवाद के नाम पर हो गया है जो विवाद्य है। परंतु, राजनीति में गालियों के रुप में नई शब्दावली जरुर प्रविष्ट हो गई है। म.प्र. विधानसभा में भी इनका प्रयोग हो चूका है। इस संबंध में समाचार पत्रों के कुछ शीर्षक देखिए- 'हरामजादे" व 'साले" शब्द चुनाव संहिता के नजरिए से गलत नहीं", 'चोर, उचक्का, धूर्त, कमीना, गुंडी, गुंडों का सरदार, आदि। 

यह सब देख, पढ़-सुनकर ऐसा लगता है कि गांधीजी ने सौ वर्ष पूर्व (1909) संसदीय लोकतंत्र को वेश्या कहा था जिस पर बहुत हंगामा मचा था, ब्रिटिश महिलाओं ने इस पर बहुत हाय-तौबा मचाई, गांधीजी ने तीव्र प्रतिक्रिया को देखकर अंत में बांझ कहना अधिक उचित समझा, आज संसद की नाकारा बहस, संसद में होनेवाले हंगामे और अंततः या तो संसद का स्थगन या बहिष्कार देखकर लगता है कि गांधीजी ने कहीं सच ही तो नहीं कहा था।