Saturday, 22 November 2014

बढ़ता ही जा रहा है ढ़ोंगी गुरुओं का तिलिस्म

बढ़ता ही जा रहा है ढ़ोंगी गुरुओं का तिलिस्म

लगभग दो सप्ताह चले अभियान और करोंडों रुपये खर्च होने के बाद तथाकथित गुरु रामपाल महाराज ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और उसे राष्ट्रद्रोह, हत्या आदि सहित कई धाराओं के तहत गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश करने के पश्चात जेल भेज दिया गया है। इसी के साथ फिर से ढ़ोंगी साधुओं, बाबाओं, महाराजाओं, गुरुओं के कारनामे चर्चा में आ गए। आश्चर्य है कि 21वीं सदी में जहां विज्ञान चरम की ओर बढ़ रहा है वहीं इन नकली गुरुओं की देश में बाढ़ सी आ गई है।

किसी समय जिनके बडे जलवे हुआ करते थे लेकिन बाद में जिनको जेल यात्राएं करना पडी, कुछ तो अभी भी जेल में ही हैं, ऐसे तथाकथित धर्मगुरुओं के चित्रों सहित उनके कारनामों का स्मरण भी मीडिया नेे मौके का फायदा उठाकर लगे हाथ हमें करवा दिया। जैसेकि आसाराम, चंद्रास्वामी, बाबा रामरहीम आदि। अब समाचार पत्रों में रामपाल के कुकर्मों, उसकी संपत्ति, उसके आश्रम में पाई गई अय्याशी की सामग्रियों के बारे में जमकर छापा जा रहा है। सवाल यह उठता है कि इन गुरुओं, बाबाओं ने जो स्वंय परमेश्वर होने का दावा करते हैं ने अपना साम्राज्य एक रात में तो फैला नहीं लिया! अब रामपाल सहित जिन बाबाओं के समाचार  छापने की होड सी मची है। जब अपने पाखंड का जाल फैलाकर अपनी ताकत बढ़ा रहे थे उस समय तो सभी चुप्पी साधे बैठे रहे।

वास्तव में इन ढ़ोंगी महाराजाओं के पीछे होता है दादा (माफिया), पूंजीपति, स्वार्थी-सत्तालोलुप राजनेताओं का समर्थन और जब अति हो जाती है तथा इन गुरुओं का बचाना असंभव सा हो जाता है या इस चौकडी में फूट पड जाती है तभी वास्तविकता सामने आने लगती है। यह सोच पूरे समाज में पूरी तरह से व्याप्त है अन्यथा तो क्या मीडिया और क्या बुद्धिजीवी एवं जनता के समझदार लोग सब डर, स्वार्थ और हमें क्या की मानसिकता के चलते जानकर भी अनजान बने रहते हैं। कई बार तो मीडिया के बहुत बडे वर्ग का हित भी इस गठजोड से सधते रहता है यह भी एक कारण है।

भारत की धर्मभीरु जनता (शिक्षित-अशिक्षित दोनो ही) अज्ञान, अंधविश्वास, अंधश्रद्धा के जाल में बुरी तरह फंसी हुई है। गांव-गांव में भूतबाधा, असाध्य बीमारियों के इलाज, गुप्तधन प्राप्ति, मनचाही संतान की चाह एवं कई कुरीतियों के नाम पर अनेकानेक ढ़ोंगी साधु-बाबा-तांत्रिक अमानवीय क्रूरकर्म, नरबलि सहित इनके साथ करते रहते हैं। जिनके कारनामे पकड में आने पर समय-समय पर छपते ही रहते हैं। लोगों को फुसलाने के लिए अधिकांशतः ये ढ़ोंगी चमत्कार दिखलाने के साथ ही मुफ्त रहवास, उनके संप्रदाय में रोजगार के नाम पर सेवा-चाकरी और प्रचार का काम करवाते हैं एवं मुफ्त भोजन-भंडारे का भी सहारा लेते हैं।  दकियानूसी विचारों के पीलिया से अनेक वर्षों से ग्रस्त हमारे समाज में हो चूके अनेक समाज सुधारकों के डोज हजम नहीं हुए तभी तो आज परमाणु युग में भी जनता का झुकाव विध्वंसक, घातक अंधश्रद्धाओं की ओर ही है।

इन अंधश्रद्धाओं और ढ़ोंगी बाबाओं के तिलिस्म में फंसे लोगों का मजाक उडाने, उन पर तरस खाने की अपेक्षा सामाजिक दृष्टि से घातक अंधश्रद्धाओं के संहार के लिए विज्ञानवादी, तार्किक-बुद्धिनिष्ठ, विवेकशील दृष्टिकोण की जडें समाज में जमाना आवश्यक है। इसके लिए जनशिक्षा और सामाजिक प्रबोधन पर बल देना होगा। शैक्षणिक पाठ्यक्रम में शास्त्रीय विश्लेषण सीखानेवाली चिकित्सक प्रवृत्ति निर्मित करने, उसको बढ़ावा देने पर बल देना पडेगा(उदाहरण के लिए प्रेमचंद की कहानियां)। देश के विकास एवं प्रगति के लिए अंधश्रद्धा निर्मूलन आवश्यक है चाहें तो इसके लिए कानून बनाएं और समाज को इन ढ़ोंगी गुरुओं, बाबाओं से बचाना समय की मांग है। इस संबंध में यह कहावत बहुत सटीक है जो नारु उन्मूलन के दौर में सरकार ने प्रचारित की थी - 

'पानी पीयो छान के, गुरु करो जान के।""

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