Saturday, 15 November 2014

इस्लाम एक बाह्याचारी धर्म ! !

इस्लाम एक बाह्याचारी धर्म ! !

मुसलमानी धर्म के पांच बाह्यांग हैं - नमाज, संगठन (उम्मा), धार्मिक दृष्टि से निषिद्ध वस्तुओं का त्याग, कुरान पठन और मक्का की यात्रा (हज)। बदलते समय के साथ मुसलमान इस संबंध में शिथिल होते चले गए हैं किंतु, बाह्याचार को आवश्यकता से अधिक महत्व देना कम नहीं हो सका है और अब वे इन उपर्युक्त बाह्यांगों पर अधिक बल देने के स्थान पर दाढ़ी, टोपी, बुरका, टखनों के ऊपर तक का पायजामा और घुटनों के नीचे तक का कुर्ता पहनने पर जोर देने लगे हैं फिर भले ही वे कितने भी अजीब क्यों ना दिखाई दें। 

यहां तक तो ठीक है परंतु, समस्या तब पैदा होती है जब वे अपना यह बाह्याचार दूसरों पर थोपने की कोशिश करते हैं जैसेकि  कुछ माह पूर्व एक मौलाना द्वारा सार्वजनिक रुप से मोदी को टोपी पहनाने का प्रयास करना। इसी प्रकार से सन्‌ 1992 में केरल के त्रिचूर जिले के थ्रिसूर कस्बे में कैथलिक ईसाइयों द्वारा संचालित एक स्कूल में जिसमें 1700 से अधिक छात्र थे। जो मुस्लिम छात्र परीक्षा परिणाम संतोषजनक दे नहीं सके थे टोपी पहनकर स्कूल आ गए। इसे गणवेश के नियमों का उल्लंघन मान स्कूल प्रशासन द्वारा टोपी पहन कक्षा में ना बैठें या कक्षा से बाहर चले जाएं कहा। छात्रों द्वारा ना मानने के कारण स्कूल बंद कर दिया गया। स्कूल के हेडमास्टर और मैनेजर को सिर काटने की धमकी वाले पत्र भी भेजे गए। इन मुस्लिम छात्रों को टोपी पहनकर कक्षा में बैठने की अनुमति देने पर शेष छात्रों ने बहिष्कार कर दिया था और एक लंबे समय तक स्कूल बंद रहा था।

इसी से मिलते जुलते विवाद भारत ही नहीं अन्य देशों में भी मुस्लिमों द्वारा शैक्षणिक या अन्य संस्थानों या कामकाजी एवं सार्वजनिक स्थानों पर कभी बुरके तो कभी दाढ़ी पर से खडे किए जाते हैं। बुरके से इस्लाम की पहचान को जोडना या उसे शरीअत का स्तंभ मानना, फोटोयुक्त पहचान पत्र पर बेजा बहस करना, शर्तें डालना दकियानूसीपन है, कट्टरता है। यहीं नहीं इस दकियानूसीपन, कट्टरता के चरम का प्रदर्शन पश्चिमी देशों में भी किया जा रहा है। जो ब्रिटिश मुस्लिम सांसद के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. कलाम सिद्दीकी के हिजाब पर के कथन से पता चलता है वे कहते हैं ''जब हम पुरुष सडक पर चलते हैं तो हम भीड का हिस्सा मात्र होते हैं। जब हमारी महिलाएं हिजाब पहनकर सडक पर चलती हैं तो अपने साथ इस्लाम का झंडा लिए चलती हैं। वे एक राजनीतिक उदघोष करती हैं कि यूरोपीय सभ्यता हमें अस्वीकार्य है, कि यह एक रोग है, मानवता के लिए महामारी है। वे एक प्रकार से जेहाद का उदघोष करते चलती हैं।""(हिंदू वॉइस जुलाई 2007 पृ.13)  आखिर यह सब क्या दर्शाता है यही ना कि इस्लाम एक दिखावे का, बाह्याचारी धर्म है। 

यह बाह्याचार पर जोर मात्र अपनेआपको दूसरे धर्मावलंबियों से अलग दिखाने के लिए है। उदाहरण के लिए इस हदीस को देखें - मूंछ और दाढ़ी के बारे में पैगंबर कहते हैं ''बहुदेववादियों से उल्टा काम करो - मूंछे बारीक छांटों और दाढ़ी बढ़ाओ।"" इस हदीस का मंडन करते हुए हदीस के अनुवादक कहते है ः ''इस्लाम ने आस्था और सदाचार के आधार पर एक नया भाईचारा रचा। ... चेहरों की पहचान के लिए मुसलमानों को हुक्म दिया गया है कि वे मूंछे छांटें तथा दाढ़ी बढ़ाएं, जिससे कि वे उन गैर-मुस्लिमों से अलग दिखें जो दाढ़ी साफ रखते हैं और मूंछें बढ़ाते हैं। बालों को रंगने के बारे में पैगंबर कहते हैं ः यहूदी एवं ईसाई अपने बाल नहीं रंगते, इसलिए इसका उल्टा करो।" यहां तक कि नमाज के लिए अजान यानी नमाज के लिए बुलावा का तरीका भी यहूदियों, ईसाइयों एवं अग्निपूजकों से मुसलमानी व्यवहार को अलग बनाने के लिए पुकारने की व्यवस्था प्रचलित की गई।  

इस सब के संबंध में 'हदीस के माध्यम से इस्लाम का अध्ययन" इस पुस्तक में पृ. 200,1 पर 'अंर्तमुखी भावना का अभाव" शीर्षक तले रामस्वरुप लिखते हैं - ''पैगंबर मुहम्मद की आचार संहिता में अंर्तमुखी भावना का भी अभाव है। उस संहिता में इस सत्य का संकेत तक नहीं मिलता कि मनुष्य का बाह्याचार उसके विचारों तथा उसकी आकांक्षाओं से उद्‌भूत होता है, और उसके विचार तथा उसकी आकांक्षाएं उसके अहंभाव तथा उसकी अविद्या में जड जमाए हुए हैं। यह माना कि पैगंबर से कई सौ साल पूर्व ही मध्य एशिया में बौद्ध धर्म का प्रसार हो चूकने पर भी पैगंबर मुहम्मद भारतीय योग पद्धति से अपरिचित रहे। किंतु जिस सामी परंपरा से उनका परिचय था और जिसको अनेक अंशों में उन्होंने अपनाया था, वह परंपरा अंर्तमुखी भावना से अपरिचित नहीं थी। उस परंपरा के ईसा मसीह ने उपदेश दिया था कि 'दुष्ट विचार, हत्या, व्यभिचार, झूठी गवाही और देवनिंदा का उदय 'ह्रदय में होता है।" किंतु पैगंबर मुहम्मद ने ईसा मसीह से कुछ नहीं सीखा। यह कहना पडेगा कि पैगंबर ने एक बाह्याचारी मजहब की स्थापना की। 
अंतर को शुद्ध किए बिना किसी श्रेष्ठ सदाचार की सृष्टि नहीं हो सकती। मजहबी निष्ठा कभी भी अंतर की शुद्धि, आत्मबोध और अंतर के सुसंस्कार का स्थान नहीं ले सकती। अशुद्ध ह्रदय तो मनुष्य की तृष्णा, हिंसा वृत्ति तथा कामुकता को ही आवृत कर पाती है। अशुद्ध ह्रदय निष्ठा का बाना ओढ़कर एक अल्लाह नामधारी ऐसे पिशाच की पंथमीमांसा ही प्रस्तुत कर सकता है जो काफिरों के खून का प्यासा रहता है। अशुद्ध ह्रदय में जिहाद, लूटखसोट और कर संग्रह की भूख ही भरी रहती है।

जहां दार्शनिक चिंतन का अभाव है और अंतर को सुसंस्कृत बनाने का अभ्यास नहीं किया जाता, वहां उदात्त भावों का उदय हो ही नहीं पाता। ऐसा मजहब हमारे ऊपर एक बाह्याचार ही लाद सकता है, और बाह्याचार के विरुद्ध हमारे अंतर में अनास्था और विद्रोह रहते हुए भी हमें उसका पालन करने के लिए विवश करता है।""  

यह कथन इसी बात को पुष्ट करता है कि इस्लाम एक बाह्याचारी धर्म बनकर रह गया है और जब तक मुसलमान अंतर्मुखी हो इस बात पर गौर नहीं करते और आचरण में नहीं लाते कि, पैगंबर ने मक्काकाल में हीरामठ (गुफा) में बैठकर जो चिंतन मनन किया था वह शांति और ज्ञान प्राप्ति के लिए ही किया था और जो कुरान की पहली पांच आयतें उन्हें प्राप्त हुई थी उसका पहला वाक्य ही है 'इकरा" अर्थात्‌ पढ़, पैगंबर की एक हदीस है 'ज्ञान प्राप्ति के लिए चीन भी जाना पडे तो जाओ", इस्लाम एक बाह्याचार पर जोर देनेवाला धर्म ही बना रहेगा। 

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