Saturday, 4 October 2014

नासमझ कौन मनुष्य या पशु - पक्षी

वन्य प्राणी सप्ताह 2 से 8 अक्टूबर
नासमझ कौन मनुष्य या पशु - पक्षी
world animal day 4th october

प्राचीनकाल से ही मनुष्य का पशु-पक्षियों से अटूट संबंध रहता चला आया है जो आज तक अबाध है। यह संबंध संस्कृत सुभाषितों, कहावतों, किस्से-कहानियों से लेकर मुहावरों, गीत-कविताओं से लेकर पौराणिक आख्यायनों तक में हम भारतीयों में ही नहीं तो विदेशियों तक में नजर आता है। परंतु, हम इनका उल्लेख अधिकांशतः इन्हें हीन, निर्बुद्ध समझकर ही आपस में एकदूसरे को अपमानित महसूस हो इसीको मद्देनजर रख गाली के रुप में करते हैं। उदाहरण के रुप में चिडियाघर का उल्लेख आते ही हमारी नजरों के सामने अजीबोगरीब जानवरों का जखीरा जमा हो जाता है। जबकि वहां प्रकृति की सुंदरता करिश्माई अंदाज में मौजूद होती है। जहां से हम बहुत कुछ सीख भी सकते हैं। जिराफ की गर्दन बहुत लंबी और बडी अजीब दिखती है परंतु, अधिकांश लोगों को यह मालूम ही नहीं होगा कि जिराफ और मनुष्य दोनो की गर्दन की हड्डियां समान संख्या में होती हैं। इसी प्रकार से हाथी की सूंड दिखने में बेहद बेढ़ंगी हो परंतु वह भी प्रकृति की अद्‌भुतता समेटे हुए है, वह एक साथ मुंह, नाक, कान का काम जो करती है।

'गधे के सिर से सिंग" यह मुहावरा हम तब उपयोग में लाते हैं जब कोई अचानक गायब हो जाता है। गधा हमारे यहां मूर्खता के प्रतीक के रुप में जाना जाता है जबकि किसी व्यक्ति को गधा कहना यानी उसका नहीं वरन्‌ गधे का ही अपमान करना है। क्योंकि शायद आप स्वयं नहीं जानते कि गधे की गणना बुद्धि के धनी जीवों में की जाती है और गधा सदियों से आदमियों का पालतू है और  मनुष्य का साथ निभाता चला आया है। कभी भारत, सीरिया, इजिप्त आदि में गधे बहुतायत से पाए जाते थे पर अरब देशों में इनका भारी मात्रा में शिकार किया गया और अब ये वहां करीब-करीब विलुप्त ही हो गए हैं। भारत में भी अब ये बहुत कम ही बचे हैं।

किसी मंद गति व्यक्ति को देखकर हम उसे कछुए की उपाधि बडी सहजता से दे देते हैं लेकिन विश्व में अनेक स्थानों पर कछुए का प्रतीकात्मक महत्व है उसे कहीं शुभ तो कहीं अशुभ माना जाता है। भारतीय आख्यायन के अनुसार दशावतारों में एक कूर्म  अवतार भी है। किसी को कछुआ कहने से पहले सोचिए कि आखिर कछुआ अपनी किस विशेषता के कारण दीर्घजीवी है। लकडबग्घे को हम घृणास्पद जीव समझते हैं जबकि वह तो जंगल का दरोगा है, जंगल को स्वच्छ रखनेवाला प्राणी है। वस्तुतः हमें तो उससे हमदर्दी जताना चाहिए। लेकिन अफसोस है कि लकडबग्घे के संबंध में बहुत कुछ जानकारी हमें उपलब्ध ही नहीं है। बल्कि ट्यूमर के इलाज में उसकी जीभ व गठिया में उसकी चर्बी उपयोगी होने कारण आज वह बेमौत मारा जा रहा है।

भेडिये को एक खलनायक की तरह ही पाशविकता से भरा, शोषक के रुप में दुनिया के हर तानाशाह की शक्ल में भेडिये को ही प्रस्तुत किया जाता है। हिंदी कवियों ने तो मानो भेडियों के विरुद्ध अभियान सा ही छेड रखा है। भेडियों को मारने के लिए बाकायदा पुरस्कार भी घोषित किए जाते हैं। अब भेडिये ने आदमी का कितना क्या बिगाडा है यह तो नहीं मालूम परंतु अपने आपको सभ्य कहलवाने वाले आदमी ने जरुर भेडियों का संहार करने में कोई कोरकसर बाकी नहीं छोड रखी है। तभी तो सन्‌ 1973 में स्टाकहोम में बचेखुचे भेडियों को बचाने के लिए वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों को एक सम्मेलन आयोजित करना पडा था। वास्तव में भेडिये अपनी छवि के विपरीत बेहद शर्मीले और मनुष्य से लुकछिपकर जीनेवाले, चौकस व जरा सी आहट होते ही भाग खडे होनेवाले तथा समूह में रहकर छोटे-मोटे शिकार कर पेट भरनेवाले होते हैं। अब भेडिये के दर्शन हमें चिडियाघर में ही होते हैं।

यही हाल चमगादड का है आज से लगभग छः दशक पूर्व जिस संचार सिद्धांत के द्वारा रडार का निर्माण मनुष्य ने किया उस संचार के सिद्धांत का उपयोग आज से लाखों साल पहले से चमगादड करते चले आ रहे हैं। उसकी प्राकृतिक रडार पद्धति का मुकाबला आज भी आसान नहीं। इसीलिए कई संचारिकी यांत्रिकी इस अनोखे जीव का अध्ययन करते रहते हैं। उडते समय चमगादड उच्च आवृत की ध्वनी तरंगे छोडते हैं और जब ये तरंगें किसी अवरोध या कीडे-मकोडों से टकराकर वापिस लौट आती है तो उनके कान इन्हें तत्काल ग्रहण कर लेते हैं। इस प्रकार से मार्ग के अवरोध की सूचना उन्हें पहले ही से मिल जाती है। इसी कारण यदि वे लाखों की संख्या में भी निकले तो मजाल है जो कोई किसीसे टकरा जाए। वे अपनी अपनी तरंगों के माध्यम से एक दूसरे के साथ संपर्क बनाए अपना अपना मार्गक्रमण निर्बाध करते रहते हैं। 

अन्य अनेक जीवों की तरह चमगादड भी इस समय दुनिया के सबसे अधिक खतरे में पडे हुए जीवों में से एक है। क्योंकि, गलतफहमी तथा अंधविश्वासों चलते इन्हें डरावना मान भूत-प्रेत-चुडैलों से जोडा जाता है। वास्तविकता यह है कि चमगादड विश्व के बडे भले और लाभदायक प्राणियों में से एक है और इससे हमें कोई खतरा नहीं। परंतु, दुर्भाग्यवश इन्हें कई देशों में किसी भी तरह का कोई संरक्षण ना होने के कारण इनकी कई प्रजातियां विलुप्ती की कगार पर हैं और बची-खुची प्रजातियों को संरक्षण की आवश्यकता है। उत्खनन गतिविधियों ने इनके रहवास की गुफाओं को बहुत क्षति पहुंचाई है। अंधविश्वास के चलते इनके मांस को कामेच्छावर्द्धक मान इनका शिकार व्यापारिक तौर पर हो रहा है। ये कटिबंधीय वृक्षों के प्राकृतिक संवर्द्धन के लिए अनिवार्य हैं। 'फ्रूट बेट्‌स" नस्ल का चमगादड एक रात में 60,000 तक बीज बिखेर देता है। परागण के अलावा चमदागड की बीट उसमें नत्रजन की उपस्थिति के कारण अच्छा खाद है। रात में उडनेवाले कीट-पतंगों का शिकार कर, फसलों की रक्षा एवं प्रकृति के संतुलन में हाथ बंटाता है, हमें, हमारे उपयोगी मवेशियों व फसलों को बीमारियों से बचा समूचे वातावरण को स्वच्छ रखता है। 

अब सवाल यह उठता है कि आखिर मनुुष्य को यह अधिकार किसने दे दिया कि विभिन्न पशु-पक्षियों के प्रति मिथ्या प्रचार करे, उनका संहार करे और ऐसे में नासमझ किसे समझें आदमी को या पशु-पक्षियों को। 

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