Tuesday, 23 September 2014

विश्व भर की संस्कृतियों में महत्व है मातृ-पूजा का

नवदुर्गोत्सव 
विश्व भर की संस्कृतियों में महत्व है मातृ-पूजा का 

मोहनजोदडों की खुदाई में प्राप्त हुई मूर्तियों से शक्ति पूजा के प्रमाण मिलते हैं। वैदिक साहित्य में शक्ति उपासना के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। ब्रह्म का आदि संकल्प 'एकोहंबहुस्यम्‌" को ही आद्यशक्ति अथवा महाविद्या कहा गया है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश इसी आद्यशक्ति से उद्‌भूत हुए हैं। योगशास्त्र की कुंडलिनी भी वह आद्यशक्ति ही है। भक्तिमार्ग के इष्टदेवों की अर्धांगिनी भी यही आद्यशक्ति  है। बौद्धों की ज्ञान की देवी प्रज्ञापरमिता आद्यशक्ति का प्रतीक है। प्राचीनतम बौद्धागमों में वर्णित महामुद्रा को ही शाश्वत नारी अथवा महाभगवती प्रज्ञापारमिता के रुप में परिभाषित किया गया है। बौद्धतंत्र की अधिष्ठात्री देवी भगवती तारा है। तिब्बती भाषा में प्रज्ञा की प्रकाशरुपिणी विश्वमाता को 'दाम-त्शिंग-उलमा" नाम से जाना और पूजा जाता है। चीन की सभ्यता-संस्कृति भी बडी प्राचीन है।  चीनी दार्शनिक सिद्धांतों में यांग (चियेन) और चिंग (कुन) को भारतीय पुरुष और प्रकृति के समान मान्यता प्राप्त है। चीनी मान्यता है ताओ ने एक को पैदा किया उस एक ने दो को तथा दो ने तीन को पैदा किया और तीन से ही संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति हुई। जो हो हम कह सकते हैं कि चिएन और कुन ही सारी शक्तियों के माता-पिता हैं। श्रीलंका में देवी कात्यायनी की पूजा की जाती है। रावण भी इसकी उपासना करता था। जैन धर्म में चक्रेश्वरी, अंबिका, पद्मावती, और सिद्धायिका की पूजा की जाती है। 

सुमेरियन संस्कृति में मातृ देवता के रुप में देवी निन्नी को पूजा जाता था। असीरियन इश्तार के रुप में तो ग्रीक अफ्रोडाइटी और व्हीनस और मिनर्वा रोमन स्त्री देवता प्रसिद्ध हैं। अफ्रीका की आदिम जातियों में शक्ति पूजा किसी ना किसी रुप में विद्यमान रही है। नाइजीरिया के पूर्वी प्रदेशों में शक्ति की देवी 'डायना" की उपासना सात दिनों तक की जाती थी फिर आठवें दिन मिट्टी की एक मूर्ति बनाकर इसमें मंत्र पढ़ते हुए जंगली फल-फूल भरकर इस मूर्ति को बाज के रक्त से नहलाकर पवित्र करते। आदिवासी अपने वस्त्र उतारकर मूर्ति की बारी-बारी से परिक्रमा कर पहले अपना सिर फोडते फिर घाव में मूर्ति की मिट्टी भरते। इसके पीछे मान्यता यह थी कि इससे शरीर में घाव के माध्यम से शक्ति का प्रवेश होता है। सूडान में शक्ति की देवी दुर्गा का रुप 'डिनो देवी" को मिला है। इसकी मुखाकृति बिल्ली जैसी होती है। यह बहुत पानी बरसाती है।   

विश्व की एक और प्राचीन संस्कृति इजिप्त की है। इजिप्त के अति प्रारंभिक देवताओं में मातृ साधना की उपासना को मान्यता प्राप्त थी। इस आइसिस देवी को विभिन्न नामों और रुपों में पूजा जाने लगा। ग्रीक पौराणिक आख्यायनों के अनुसार हेरा देवी प्रेम और विवाह की देवी है। अर्तेमिस पशुओं की देवी है। तो, अहेना पुरुष और नारी दोनो ही रुपों में पूजित है। अनोन्का को आंतरिक शक्ति के समान मान्यता प्राप्त है। इस्लाम के आगमन के पूर्व अरब लोग जिन पर बहुत श्रद्धा रखते थे ऐसी तीन देवियां थी - (अल) उज्जा, लात और मनात। ये देवियां प्रसन्न होने पर भक्त की इच्छा पूरी करती हैं इस पर अरबों की दृढ़ श्रद्धा थी। ये तीन देवियां अल्लाह की कन्याएं थी ऐसा माना जाता था।

बाइबल में ईश्वर की आत्मा को स्त्रीलिंगी रुप में दर्शाया गया है। ईसाई धर्म के अनुयायी माता मरियम की उपासना ईश्वर की मां के रुप में करते हैं। ईसा का जन्म मेरी से बिना जोसफ के साथ संसर्ग हुए हुआ यह कथा ईसा पूर्व आदिमाता के स्वरुप की ओर इंगित करती है। रोमन कैथलिक ईसाई माता मरियम की प्रार्थना बडी श्रद्धा के साथ करते हैं। प्रोटेस्टंट ईसाई मरियम को जीसस की भौतिक माता के रुप में मान्यता देते हैं परंतु, पूज्य भाव से नहीं।  इस प्रकार हम देखते हैं कि पूरे विश्व में सर्वत्र किसी ना किसी रुप में मातृ उपासना मिल ही जाती है। 

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