Tuesday, 23 September 2014

विश्व भर की संस्कृतियों में महत्व है मातृ-पूजा का

नवदुर्गोत्सव 
विश्व भर की संस्कृतियों में महत्व है मातृ-पूजा का 

मोहनजोदडों की खुदाई में प्राप्त हुई मूर्तियों से शक्ति पूजा के प्रमाण मिलते हैं। वैदिक साहित्य में शक्ति उपासना के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। ब्रह्म का आदि संकल्प 'एकोहंबहुस्यम्‌" को ही आद्यशक्ति अथवा महाविद्या कहा गया है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश इसी आद्यशक्ति से उद्‌भूत हुए हैं। योगशास्त्र की कुंडलिनी भी वह आद्यशक्ति ही है। भक्तिमार्ग के इष्टदेवों की अर्धांगिनी भी यही आद्यशक्ति  है। बौद्धों की ज्ञान की देवी प्रज्ञापरमिता आद्यशक्ति का प्रतीक है। प्राचीनतम बौद्धागमों में वर्णित महामुद्रा को ही शाश्वत नारी अथवा महाभगवती प्रज्ञापारमिता के रुप में परिभाषित किया गया है। बौद्धतंत्र की अधिष्ठात्री देवी भगवती तारा है। तिब्बती भाषा में प्रज्ञा की प्रकाशरुपिणी विश्वमाता को 'दाम-त्शिंग-उलमा" नाम से जाना और पूजा जाता है। चीन की सभ्यता-संस्कृति भी बडी प्राचीन है।  चीनी दार्शनिक सिद्धांतों में यांग (चियेन) और चिंग (कुन) को भारतीय पुरुष और प्रकृति के समान मान्यता प्राप्त है। चीनी मान्यता है ताओ ने एक को पैदा किया उस एक ने दो को तथा दो ने तीन को पैदा किया और तीन से ही संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति हुई। जो हो हम कह सकते हैं कि चिएन और कुन ही सारी शक्तियों के माता-पिता हैं। श्रीलंका में देवी कात्यायनी की पूजा की जाती है। रावण भी इसकी उपासना करता था। जैन धर्म में चक्रेश्वरी, अंबिका, पद्मावती, और सिद्धायिका की पूजा की जाती है। 

सुमेरियन संस्कृति में मातृ देवता के रुप में देवी निन्नी को पूजा जाता था। असीरियन इश्तार के रुप में तो ग्रीक अफ्रोडाइटी और व्हीनस और मिनर्वा रोमन स्त्री देवता प्रसिद्ध हैं। अफ्रीका की आदिम जातियों में शक्ति पूजा किसी ना किसी रुप में विद्यमान रही है। नाइजीरिया के पूर्वी प्रदेशों में शक्ति की देवी 'डायना" की उपासना सात दिनों तक की जाती थी फिर आठवें दिन मिट्टी की एक मूर्ति बनाकर इसमें मंत्र पढ़ते हुए जंगली फल-फूल भरकर इस मूर्ति को बाज के रक्त से नहलाकर पवित्र करते। आदिवासी अपने वस्त्र उतारकर मूर्ति की बारी-बारी से परिक्रमा कर पहले अपना सिर फोडते फिर घाव में मूर्ति की मिट्टी भरते। इसके पीछे मान्यता यह थी कि इससे शरीर में घाव के माध्यम से शक्ति का प्रवेश होता है। सूडान में शक्ति की देवी दुर्गा का रुप 'डिनो देवी" को मिला है। इसकी मुखाकृति बिल्ली जैसी होती है। यह बहुत पानी बरसाती है।   

विश्व की एक और प्राचीन संस्कृति इजिप्त की है। इजिप्त के अति प्रारंभिक देवताओं में मातृ साधना की उपासना को मान्यता प्राप्त थी। इस आइसिस देवी को विभिन्न नामों और रुपों में पूजा जाने लगा। ग्रीक पौराणिक आख्यायनों के अनुसार हेरा देवी प्रेम और विवाह की देवी है। अर्तेमिस पशुओं की देवी है। तो, अहेना पुरुष और नारी दोनो ही रुपों में पूजित है। अनोन्का को आंतरिक शक्ति के समान मान्यता प्राप्त है। इस्लाम के आगमन के पूर्व अरब लोग जिन पर बहुत श्रद्धा रखते थे ऐसी तीन देवियां थी - (अल) उज्जा, लात और मनात। ये देवियां प्रसन्न होने पर भक्त की इच्छा पूरी करती हैं इस पर अरबों की दृढ़ श्रद्धा थी। ये तीन देवियां अल्लाह की कन्याएं थी ऐसा माना जाता था।

बाइबल में ईश्वर की आत्मा को स्त्रीलिंगी रुप में दर्शाया गया है। ईसाई धर्म के अनुयायी माता मरियम की उपासना ईश्वर की मां के रुप में करते हैं। ईसा का जन्म मेरी से बिना जोसफ के साथ संसर्ग हुए हुआ यह कथा ईसा पूर्व आदिमाता के स्वरुप की ओर इंगित करती है। रोमन कैथलिक ईसाई माता मरियम की प्रार्थना बडी श्रद्धा के साथ करते हैं। प्रोटेस्टंट ईसाई मरियम को जीसस की भौतिक माता के रुप में मान्यता देते हैं परंतु, पूज्य भाव से नहीं।  इस प्रकार हम देखते हैं कि पूरे विश्व में सर्वत्र किसी ना किसी रुप में मातृ उपासना मिल ही जाती है। 

Sunday, 21 September 2014

महाराष्ट्रीय साधु - संतांचे राष्ट्रीय कार्य !

महाराष्ट्रीय साधु - संतांचे राष्ट्रीय कार्य !

भारताच्या इतिहासाचा अभ्यास करताना आढ़ळते की आमच्या देशातील साधु-संतांनी धर्मप्रचारा बरोबरच विविधरुपेण सामाजिक, साहित्यिक, राजकारणी व शिक्षणासंबंधी कार्य करुन देशाच्या उन्नतीस हातभार लावला आहे. बौद्धधर्माला सम्राट अशोकाचा राजाश्रय मिळाल्यामुळे त्यास अंतरराष्ट्रीय स्वरुप प्राप्त झाले. हिंदुचीन (इंडोचायना), हिंदुएशिया (इंडोनेशिया), बाली, बोर्नियोचे हिंदु आपला गोत्रपुरुष कौंडिण्य ऋषी सांगतात. अशामुळे भारतीय सभ्यतेचा प्रभाव दूरपर्यंत स्थापित झाला.  

मध्ययुगात धार्मिक नेत्यांचा राज्यशासकांवर चांगलाच प्रभाव होता. देवगिरीच्या यादवांवर पंडित हेमाद्रि व बोपदेव, विजयनगर साम्राज्याचे संस्थापक स्वामी विद्यारण्य व महाराष्ट्राचे ज्ञानेश्वर, तुकाराम, एकनाथ, रामदास आदी संत, बंगालात श्रीकृष्ण चैतन्य, आसामात शंकरदेव, आजच्या उत्तरप्रदेशात सुरदास, तुलसीदास, कबीर आदी, गुजराथात नरसीमेहता, स्वामीनारायण व बुंदेलखंडात स्वामी प्राणनाथ, पंजाबात गुरुनानकदेव, आदी साधुसंतांनी भारतीय सभ्यतेचे रक्षण, प्रचार व प्रभाव वाढ़विण्यास, स्थायी करण्याचे जे गौरवास्पद कार्य केले तो भारतीय इतिहासाचा एक विलक्षण अभिमानास्पद अध्याय आहे.

पण महाराष्ट्राच्या इतिहासात राजकीय व धार्मिक उन्नतीची एक बेमालूम सांगड बनली आहे. त्यामुळे राष्ट्रोद्धाराचे कार्य केवळ महाराष्ट्रातच उत्तमप्रकारे संपन्न झाले. महाराष्ट्रीय साधुसंतांनी धार्मिक, सामाजिक, राजकीय, साहित्य व शिक्षणविषयी अद्‌भुतकार्य केले व निस्संदेह हे म्हटले जाऊ शकते की यांच कार्यांच्या आधारावरच पुण्यश्लोक छत्रपती शिवाजी महाराज आपले हिंदवी स्वराज्य स्थापित करु शकले. राज्याकडून साधुसंत व गुणीजनांना आश्रय दिला जात असे. मुसलमानांच्या आक्रमणकाळापासून म्हणजे 12व्या शतकांपासून सतत मराठाशाहीच्या शेवटच्या काळापर्यंत महाराष्ट्रीय साधुसंतांनी देशाच्या संपूर्ण उन्नती करण्यात काही कसर सोडली नाही.

महाराष्ट्राचे शेवटचे हिंदुराजे देवगिरीचे यादवराजा साधु-संत व विद्वानांचे मोठे पोषक राहिले. तेव्हांच ज्ञानेश्वरांनी भगवद्‌गीतेवरील आपली प्रसिद्ध 'ज्ञानेश्वरी" टीका लिहिली. बल्लाळराजांचे वेळी मुकुंदराज प्रसिद्धीस आला. त्याचवेळी त्याने आपला प्रसिद्ध ग्रंथ 'विवेकसिंधु" लिहिला. 12व्या शतकांत मराठींत जे जे ग्रंथ प्रसिद्ध झाले, त्यांत ह्या मुकुंदराजाचे ग्रंथास अग्रस्थान दिले पाहिजे. पुढ़े मुसलमानांच्या स्वाऱ्यांना सुरुवात झाली व जसेच मुसलमान राज्यसत्तेचा आधार महाराष्ट्रात निर्माण झाला तसेच परक्या धर्मापासून जनतेला वाचविण्याकरिता महाराष्ट्रातल्या साधुसंतांनी पण एकेश्वरवाद, समताभाव आदींचा प्रचार करुन हिंदुधर्माच्या उज्जवलतेला कायम राखिले.

त्याकाळात महाराष्ट्रात भागवतधर्म तथा भक्तीमार्गाचा अधिक प्रचार झाला. या धार्मिक जागृतिच्या कार्यात सगळ्या जातींनी म्हणजे  ब्राह्मण, मराठा, कुणबी, माळी, शिंपी, सोनार, कासार, कुंभार, आदी. स्त्री, दासींपासून मेहतरांनी सुद्धा हातभार लावला होता. त्यामुळे सर्वसाधारण जनतेवर भारतीय सभ्यतेचा स्थायी प्रभाव पडून परकी धर्माची मूळे दक्षिणेत जोर पकडू शकली नाहीत. याउलट शेखमहमंद सारखे कित्येक मुसलमान पण त्या धार्मिक चळवळीत हिंदुतत्त्वज्ञानाच्या रंगात रंगून गेले. ज्ञानेश्वरांच्या काळातच बौद्धधर्माचे परिवर्तित व संशोधित स्वरुप महानुभाव तथा जयकृष्णी पंथाचा प्रचार झाला व त्याने नंतर पंजाब आणि अतिदूर काबुल पर्यंत मठ स्थापित करुन आपल्या सिद्धांतांना पसरविले.

ज्ञानेश्वरांनी लोकांना स्पष्टपणे समझविले की ः देवाच्या दरबारात उच्चनीचचा भेद नसतो. नीचांच्या स्पर्शाने न तर गंगा अपवित्र होते व वायु देखील खराब होत नाही तसेच पृथ्वी पण अस्पृश्य होत नाही. त्यांच्या परंपरेचे महात्मा एकनाथ होते. जे आपल्या धार्मिक आचरणां व उदार विचारांमुळे आदर्श साधु म्हणविले गेले. एकदा त्यांनी श्राद्धाचे अन्न एका भंग्याला खावयास देऊन दिले यावर ब्राह्मण कोपले तेव्हां एक अपूर्व चमत्कार दाखवून त्यांनी सगळ्यांना संतुष्ट केले होते. आपल्या उदार विचारांनी व आदर्श आचरणानी एकनाथांनी समाजाला धर्माचे निश्चित स्वरुप दाखवून अस्पृश्याना देखील आत्मसात करुन कृतिमतेला दूर हाकलले.

तुकारामांनी पण मोठे उदार विचार प्रकट केले आहेत ः उंच नीच कांही, नेणे हा भगवंत। तिष्ठे भाव भक्त, देखोनिया।। अर्थात्‌ देव उच्च-नीच बघत नाही, भक्ताच्या भावनांनाच बघतो. अशाप्रकारचा उपदेश करुन समता व भक्तीचा प्रचार केला. आज देखील महाराष्ट्रात वारकरी पंथात भेदभावावांचून सगळ्यांचा समावेश होतो. याप्रकारे परकी सत्तेचे आधिपत्य आणि त्यांच्या सभ्यतेस रोखण्या करिता परधर्मींवर पण प्रभाव स्थापिण्याकरिता या संतांनी स्वभाषा, स्वधर्म व स्वदेशाच्या उचित स्थितिचे विवेचन करुन लोकांच्या मनात स्वराज स्थापित करण्याची आशा संचारून छत्रपती शिवाजी महाराजांकरिता कार्यक्षेत्र तयार केले होते.

छत्रपतींच्या भावी कार्याचे महत्व मुक्तेश्वरांनी अशाप्रकारे दाखविले आहे - साधलिया स्वराज्य संपत्ति। यज्ञीं देव तृप्त होती।। श्राद्धीं पितृगण अतिथि। अन्नदानें तोषती। जैसे कंटक मर्दावे पायी। तेंवी दुर्जन दंडावे।।

याप्रकारे ज्ञानेश्वरांपासून शिवाजी महाराजांच्या पूर्ववर्ती एकनाथ, तुकाराम सारख्या संतांनी अदमासे 300 वर्षांपर्यंत स्वधर्म व स्वाभिमानाच्या विचारांना प्रसृत करुन देशाची अद्‌भुत सेवा केली.

Saturday, 13 September 2014

निज भाषा हिन्दी

हिन्दी दिवस 
निज भाषा हिन्दी

'मैं भारत से उसी प्रकार बंधा हुआ हूं, जिस प्रकार कोई बालक अपनी मां की छाती से चिपटा रहता है। क्योंकि, मैं अनुभव करता हूं कि वह मुझे मेरा आवश्यक आध्यात्मिक पोषण देता है। उसके वातावरण से मुझे अपनी उच्चतम आकांक्षाओं की पुकार का उत्तर मिलता है।" मातृभूमि के प्रति विशुद्ध (संस्कृतनिष्ठ) मातृभाषा हिन्दी में यह वचन और किसी के नहीं तो श्रीमन्‌ मोहनदास करमचंद गांधी के हैं जो उनके अपने पत्र यंग इण्डिया (young india)(6 अप्रैल 1921  April 6th 1921) में प्रकाशित हैं।

 तथापि, इतिहास को यदि 'इति-ह-आस" के रुप में देखा जाए तो कहना होगा कि, हिंदू-मुस्लिम एकता का गांधीजी का आत्यन्तिकता का भाव  इस चरमावस्था पर पहुंच चूका था कि, इस हेतु वे किसी बडे से बडे त्याग और बलिदान के लिए तत्पर हो चूके थे। गांधीजी की इसी दृष्टि ने 'हिन्दी" के स्थान पर 'हिन्दुस्तानी" को प्रतिष्ठित करके छोडा। और जब राजनीति प्रभावित भारतीय जीवन गांधी की आंधी के वशीभूत हुआ तो जैसाकि होता है सावरकरजी के तर्क को कि 'हमारी भारतीय भाषाओं में अरबी, फारसी, अंग्रेजी आदि के जो शब्द हैं, उन्हें ना तो हमने आत्मसात किया है, ना ही उन्हें अपनी भाषाओं में होनेवाले विभाषाओं के वे शब्द हमारी विजय के चिन्ह नहीं तो हमारी देह पर हुए प्रहारों के घाव हैं" को अनसुना कर दिया गया। ऐसे में सत्तर वर्ष पूर्व की वह हिन्दी जिसके वर्तमान रुप को हम नाममात्र के लिए भलेही हिन्दी कहें, पर यथार्थ में वह हिन्दुस्तानी है - हिन्दी, अरबी, फारसी का मिलाजुला रुप है। इतना ही नहीं तो उससे बढ़कर है। 'हिन्दुस्तानी" के रुप में जब मुक्त द्वार की नीति अपनाई गई तो स्वच्छंदियों ने उसमें अंग्रेजी भाषा के शब्द घुसेडने में किसी संकोच का अनुभव नहीं किया और उसी निःसंकोच भाव के फलस्वरुप आज क्या दूरदर्शन, क्या समाचार पत्र और क्या साहित्य सभी में एक संकर भाषा को देख, पढ़, सुनने पर समाज विवश है, फिर जीवन के सामान्य व्यवहार की भाषा का तो कोई प्रश्न ही नहीं। 

बानगी के लिए एक आयोजक के वचन देखिए - 'देवियों और सज्जनों, आज के प्रोग्राम के चीफ गेष्ट मिष्टर .... का भाषण आपने सांति से सुना इसलिए हम आपके तहेदिल से शुक्रगुजार हैं।" अपने इन्हीं भावों को आयोजक इन शब्दों में व्यक्त कर सकते थे - 'देवियों और सज्जनों, आजके कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सम्माननीय....  के विचार आपने शांतिपूर्वक सुने इस हेतु हम आपके ह्रदय से आभारी हैं।" ऐसा करने में किसी भाषा की उपेक्षा, अपमान का कोई प्रश्न ही नहीं। सभी भाषाओं का अपना-अपना क्षेत्र होता है, वहां उनका प्रयोग होना चाहिए। स्पष्ट है कि इस प्रकार यथासंभव शुद्ध भाषा का प्रयोग किसी अन्य समाज या भाषा के विरोध या अपमान के लिए नहीं तो अपनी भाषा पर गर्व के अस्मिता भाव से करने का आग्रह है, दुराग्रह नहीं। 

गांधीजी ने राष्ट्रभाषा के जो पांच प्रमुख लक्षण बताए हैं उनमें तीसरा लक्षण उस भाषा का अधिकतर लोगों द्वारा प्रयोग। वीर सावरकरजी ने भी हिन्दी के राष्ट्रभाषा होने के प्रमाण में यही कहा है कि समग्र रुप में हिन्दी भाषा सम्पूर्ण भारत के बहुजन समाज में अन्य किसी भी भाषा से अत्यधिक प्रमाण में बोली जाती है, समझी जाती है और लिखी जाती है। हिन्दी के राष्ट्रभाषा होने का एक अन्य महत्वपूर्ण तत्त्व यह भी है कि यह किसी विदेशी, विधर्मी, विजातीय, संस्कृति द्वारा हम पर थोपी नहीं गई है अपितु इसी भूमि की प्राचीन सम्पन्न भाषा संस्कृत से इसका उद्‌भव हुआ है। संस्कृत से प्राकृत भाषाओं के उद्‌भव का इतिहास लगभग एक सहस्त्र वर्ष तक पीछे जाता है। वैसे हिन्दी भाषारुपी सरस्वती की सुप्त धारा की शोध की जाए तो कुछ आश्चर्यजनक तथ्य इस प्रकार प्रकट होता है कि जैन और बौद्ध मत के प्रचारक जब इनके उद्‌भवस्थल पूर्वी भारत से ठेठ दक्षिणी भारत पहुंचे तो ईसा की द्वितीय शती से छठी शती के उस काल में जैन बौद्ध मत के मूलतः पाली, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं के साहित्य ने उत्तर तथा दक्षिण में भाषा सेतु का महनीय काम किया। उसी प्रकार आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, वल्लभाचार्य, निम्बार्काचार्य और मध्वाचार्य जैसे आध्यात्मिक चिन्तकों के देशाटन से भाषाएक्य का सूत्र प्रबल बना। क्या आश्चर्य की शताब्दियों पूर्व दक्षिण की इन महान विभूतियों की विचारधाराओं का निरुपण हिंदी साहित्य में हुआ। 

भारत के लिए एक सम्पर्क भाषा के रुप में अंग्रेजी को अनिवार्य बतानेवालों को यह कौन बतलाए कि उस प्राचीनकाल में दक्षिण द्राविडभाषी जन तीर्थाटन हेतु अविरतरुप से उत्तरी भारत आते थे और तत्कालीन प्राकृत भाषाओं के माध्यम से ही उनका संवाद सम्पर्क निर्बाध रुप से होता रहता था।  यहां तक की मुस्लिम आक्रमण और शासनकाल के आरंभिक दिनों में मुसलमानों ने भी हिन्दी को संपर्क भाषा के रुप में अपनाया। और यह भी इतिहास ही है कि इन्हीं मुस्लिम आक्रांताओं के साथ हिन्दी तब दक्षिणी हिन्दवी, खडी बोली के रुप में दक्षिण में भावाभिव्यक्ति का माध्यम बनी। 

भारत की एक राष्ट्रीयता की धारणा के अनुसार ही एक राष्ट्रभाषा की भावना भी समय के साथ स्पष्ट हुई। राजा राममोहन राय, केशवचन्द्र सेन, बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय आदि ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने की भावना को सर्वप्रथम अभिव्यक्ति देकर मानो इस पुनीत घोषणा करने का सम्मान बंगाल को प्राप्त करा दिया। 1905 में नागरी प्रचारिणी भाषा सभा काशी के तत्वाधान में आयोजित सम्मेलन में लोकमान्य तिलक ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा और देवनागरी लिपि को राष्ट्रलिपि घोषित किया। और इस प्रकार इस राष्ट्र की स्वतन्त्रता को प्राप्त करने हेतु चलायमान संघर्ष में मानो एक उमंग भर दी। 1910 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना के साथ ही राष्ट्रभाषा और राष्ट्रलिपि की प्रतिष्ठापना हेतु संगठित प्रयास आरम्भ हुए।

1918 में गांधीजी की अध्यक्षता में इन्दौर में सम्पन्न हिन्दी साहित्य सम्मेलन के आठवे अधिवेशन के साथ ही दक्षिण भारत में हिन्दी प्रसार यज्ञ का शुभारम्भ हुआ। 1937 में राजगोपालाचारी का अन्तरिम शासन जब तमिलनाडु अर्थात्‌ तत्कालीन मद्रास प्रांत में था तब उन्होंने पूरे प्रांत में माध्यमिक स्तर तक विद्यालयों में हिन्दी को अनिवार्य विषय बना दिया था। इस प्रकार तब राष्ट्रभाषा समझी जानेवाली हिन्दी का रथ अबाध गति से दौड रहा था। दाल में काला उजागर तब हुआ जब देश के स्वतंत्र हो जाने पर संविधान सभा की राष्ट्रभाषा समिति की बैठक में 12 दिसम्बर 1949 को राजभाषा के प्रश्न पर हुए मतदान में हिन्दी के पक्ष-विपक्ष में समान मत आने पर डॉ. राजेन्द्रप्रसाद के अध्यक्षीय मत से हिन्दी विजयी हो पाई। वैसे 1944 में तमिलनाडु में ई. पी. रामस्वामी नायकर जो मूलतः हिन्दी समर्थक और सेवक थे के द्वारा द्रविड कषगम पार्टी का गठन और उसके तत्वाधान में 'रेस्पेक्ट मूवमेंट" चलाकर पहली बार हिन्दी विरोध का शंखनाद किया। इस हिन्दी विरोध के पीछे नायकर का तर्क यह था कि हिन्दी के प्रबल होने से दक्षिण पर ब्राह्मणों और उत्तर भारतीयों का शासन हो जाएगा। सी. एन. अन्नादुराई ने तो हिन्दी विरोध को ही प्रमुख प्रश्न बनाते हुए द्रविड कषगम से अलग द्रविड मुनेत्र कषगम की स्थापना की थी और दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु में हिन्दी विरोध प्रबलतम हो गया था। फिर भी संविधान समिति में जो स्थिति उजागर हुई थी वह अकल्पनीय थी।

हमारे संविधान के भाग 17 अनुच्छेद 343 में हिन्दी को राजभाषा मानते हुए यह निश्चय किया गया कि हर पांच वर्ष में एक-एक आयोग इस तरह तीन आयोग बनाकर 1965 तक हिन्दी और अंग्रेजी का समानान्तर स्वरुप चलाते हुए उस वर्ष अंग्रेजी को बिदा किया जाए। पर लगता है सहेतुक रुप से ढ़ील दी गई और 1963 में एक नवीन राजभाषा विधेयक के माध्यम से यह निर्णय किया गया कि जब तक हिन्दी अंग्रेजी का स्थान लेने में सक्षम नहीं हो जाती अंग्रेजी चलती रहेगी और 1967 में राजभाषा विधेयक में एक संशोधन के द्वारा यह प्रावधान कर दिया गया कि जब तक एक भी अहिन्दी भाषा राज्य चाहेगा संघ शासन का कार्य अंग्रेजी से चलता रहेगा। इस प्रकार जनतन्त्र की घुमावदार गलियों में हिन्दी को घुमाफिराकर लगता है मूलस्थान पर पहुंचाने की चेष्टाएं चल रही हैं। हिन्दी के साथ इस तरह का खिलवाड राजनीति द्वारा किया जा रहा है तो उधर हिंदी सेवी कहलानेवाले अपना सम्मान करवाने तथा अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियां बताने में लगे रहे और हिन्दी के प्रति अपना दायित्व नहीं निभाया। परिणामतः एक समय बना हिन्दी का माहौल जाता रहा और नवीन पीढ़ियां स्वार्थवश अंगे्रजी की ओर पग बढ़ा रही हैं। अपनी रानी बिटिया को गुलाब को पिंकी, गुडिया को डॉली, सोनिया को गोल्डी बनाकर स्वयं मम्मी-पापा बना रही है।

कहना अनावश्यक है कि राष्ट्रभाषा कहलाए जानेवाली हिन्दी के संबंध में अनेक प्रमाण जो हम विस्तारभयावश दे नहीं रहे हैं यह सिद्ध करते हैं कि स्थिति चिंताजनक और चिंतनीय है। परंतु, स्थिति चिंताजनक है कहकर मुंह लटका कर बैठने हताश होने से कोई सुधार सम्भव नहीं और जो कुछ सम्मुख है उसे कोसने से समस्या का समाधान तो निकलनेवाला है नहीं। समस्या का समाधान तो यही है कि निज भाषा हिन्दी की उन्नति और उत्थान के लिए यथार्थ में राष्ट्रभाषा में रुप में हिन्दी को सम्मानित स्थान दिलवाने के लिए नए सिरे से कार्य प्रारम्भ किया जाए। 'गतं न शोच्य" की भावना से एक नई पट्टी पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा की गरिमा प्रदान करने का श्रीगणेश करें।

Wednesday, 10 September 2014

दुनिया भर में प्रचलन में है पितृ पक्ष पर्व

दुनिया भर में प्रचलन में है पितृ पक्ष पर्व

भारतीय परंपरा में प्रतिदिन पांच महायज्ञ ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ और नृयज्ञ करने का नियम निर्धारित किया गया है। आज भी कई धर्मनिष्ठ सनातनी इनका पालन कर स्वयं को धन्य समझते हैं। इन्हीं पांच में से एक पितृयज्ञ ही पितृ पक्ष का मूल है। यह पितृ पूजा की परंपरा विश्व में प्राचीनकाल से प्रचलन में है ना केवल हिंदू धर्म में ही अपितु मुसलमान, ईसाई, यहूदी, पारसी धर्म में भी किसी ना किसी रुप में अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान-कृतज्ञता प्रकट करने की परंपरा है। 

हिंदू पितृ पक्ष मानते हैं तो मुसलमान शब ए बरात। यह त्यौहार इस्लामी कैलेंडर के शाबान महीने की 14वीं एवं 15वीं तारीख को मध्यरात्री में मनाया जाता है। शब का शाब्दिक अर्थ है 'रात" और बरात का अर्थ है बरी किया जाता है। इसे शब ए कद्र भी कहते हैं। इस दिन रोजा रखा जाता है और कब्रिस्तान जाना, वहां फातेहा पढ़ना तथा अपने उन बुजुर्गों के लिए जो खुदा को प्यारे हो चूके हैं को जन्नत नसीब होने और उनके गुनाहों को माफ करने की दुआ मांगते हैं।

ईसाई ऑल सोल्स डे मनाते हैं जो 998 एडी से सार्वत्रिक रुप से ईसाई जगत में 2 नवंबर से मनाया जाने लगा। पूरे यूरोप में यह उतनी ही श्रद्धा से मनाया जाता है जितनी श्रद्धा से भारतवासियों द्वारा। बेल्जियम में मृतकों की कब्रों पर दीप जलाए जाते हैं। जर्मनी में कब्रों की साफ-सफाई एवं पुताई कर उन पर लाल रंग के बेरों से चित्रसज्जा की जाती है। फिर गेंदे के फूलों व नारंगी रंग की कलियों के हार से कब्रों को ढ़क दिया जाता है। प्रत्येक परिवास से एक थाली भोजन की गिरजाघर की वेदी पर रखते हैं। इसके पिछे मान्यता यह है कि यह भोजन पुरखों तक पहुंचता है। फ्रांस में तो इस संबंध में कुछ विशेष नियमों का पालन किया जाता है। रात में गिरजाघर में प्रार्थना समाप्ति के पश्चात लोग अपने पितरों से इस प्रकार से बात करते हैं मानों वे सशरीर वहां उपस्थित हों। सिसली में मृतात्म दिवस मनाया जाता है। जब बच्चे सो जाते हैं तब उनके माता-पिता उनके सिरहाने उपहार रखते हैं और कहते हैं उनके दादा-दादी उनके लिए छोड गए हैं।

चीनी क्विंग मिंग या चिंग मिंग या टाम्ब स्वीपींग डे के नाम से इस पूर्वज दिवस को 4-5 अप्रैल को मनाते हैं। यह चीन का महत्वपूर्ण त्यौहार है। इसे प्रकाश दिवस भी कहते हैं। इस दिन लोग अपने पूर्वजों की समाधियां साफ करते हैं, हार-फूल चढ़ाते हैं। ताईवान, मकाऊ और हांगकांग में भी श्राद्ध समारोहित किया जाता है और इस पर्व पर सार्वजनिक छुट्टी होती है। लाओस, वियतनाम, कम्पूचिया में तो यह उत्सव बहुत ही शानदार ढ़ंग से समारोहित किया जाता है।

सिंगापूर में चीनी मूल के लोगों द्वारा अगस्त-सितंबर में रुहों का महीना आयोजित किया जाता है। घरों के द्वार रुहों के लिए खुले रखे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि मर चूके लोगों की रुहें निर्द्वंद जीवितों के बीच घूमती हैं और उन तमाम सुविधाओं का उपयोग करती हैं जिनका की हम। पर जिनका कोई उत्तराधिकारी नहीं या जीवित रहते जिन्हें उनके रिश्तेदारों ने काफी परेशान किया वे गलियों में भूखी-प्यासी घूमती हैं और अगर उनकी क्षुधा को शांत न किया गया तो वे अवरोध उत्पन्न कर सकती हैं। रुहों के मनोरंजन के लिए पूरा महीना सिंगापूर के खुले थियटरों और मैदानों में संगीत-नाटक आदि के कार्यक्रम होते हैं। सार्वजनिक भोज होते हैं जिनमें रुहों को भोजन के लिए आमंत्रित किया जाता है। पुरखों की पूजा करनेवाले पुजारी दिखावटी नोट जलाते हैं जो नरक बैंक द्वारा जारी किए गए होते हैं। पूरे महीने नरक या स्वर्ग के द्वार खुले रहते हैं लेकिन कोई चिंतित नहीं होता। पूरा शहर शाम को धूप व अगरबत्तियों की महक से महकता रहता है। सिंगापूर सरकार इसका उपयोग पर्यटकों के आकर्षण के लिए करती है।
जापान में इस समारोह को अगस्त माह के पहले दिन दीपोत्सव के रुप में मनाया जाता है और प्रतीक स्वरुप नगरों, ग्रामों, घरों में असंख्य द्वीप प्रज्जवलित किए जाते हैं। जापानियों की मान्यता के अनुसार जब तक वह लोग अपने पूर्वजों को रौशनी नहीं दिखाएंगे तब तक वह अपने वंशजों के घर का मार्ग ढूंढ़ नहीं सकते। इसीलिए इन दिनों कब्रों के चारों ओर बांस गाडकर उन पर विभिन्न रंगों की लालटेनें टांगी जाती हैं और मोमबत्तियों की रौशनी में मृतात्माओं का आवाहन किया जाता है। जापान में जितने हर्षोल्लास से इस त्यौहार को मनाया जाता है उसके बिल्कूल उलट रोने-चिल्लाने के साथ बर्मावासियों द्वारा अगस्त के अंत में या सितंबर के पहले सप्ताह में मनाया जाता है। 

अमेरिका रेड इंडियन बडे ही अनोखे ढ़ंग से श्राद्ध पर्व को मनाते हैं जो फरवरी मास में आता है। इस अवधि में वे आमिष भोजन को त्याग देते हैं। प्रत्येक दिन विभिन्न जनपदों के निवासी दूसरे जनपदों के अतिथि होते हैं। रेडइंडियन विभिन्न रंगों से अपने शरीरों को रंगते हैं। विभिन्न प्रकार के पक्षियों से अपनी रुप सज्जा करते हैं। नए वस्त्र धारण कर नाचते-गाते पडौसी गांव में अधिकतर रात्री में ही जाते हैं। प्रत्येक के हाथ में चीड के वृक्ष की जलती मशाल रहती है जिससे कि उनके आगमन की सूचना मेजबान को मिल जाए। प्रत्येक जनपद पडौसी जनपद के लोगों को अपना पुरखा समझ उनके प्रति प्रेम प्रकट करते हैं। सहभोज के बाद संगीत-नृत्य का आयोजन किया जाता है। पूरी तरह से तृप्त होने के बाद अतिथिगण अपने घरों को लौटते हैं।

उपर्युक्त पर से स्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर होता है कि पूरे विश्व के अन्यान्य अंचलों में इस प्रकार से किसी ना किसी रुप में पितृ पक्ष पर्व प्रचलन में है और तत्संबंधी तिथियां-मास उनके लिए बहुत महत्व रखते हैं।  

Sunday, 7 September 2014

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हिन्दुत्व का अहं - विनायक दा. सावरकर

'हिन्दू" और 'हिन्दुस्थान" ये शब्द विदेशी ना होकर हमारे अपने ही हैं। उनका प्रयोग करने में किसी प्रकार की हीनता नहीं है। मनुष्य की शक्ति का मूल उसके अहं की प्रतीती मेें है। मनुष्य का एक हाथ टूट गया, उंगलियां टूटी जख्म हुआ, खून बहा तो भी जब तक उसका अहं है तब तक उस मनुष्य का स्वतंत्र अस्तित्व रहता ही है। मनुष्य के राम कृष्ण जैसे सार्थक और टुंडा, मंटू जैसे निरर्थक नाम बदले भी जा सकते हैं, किंतु उसका अहं नहीं बदला जा सकता। उसकी सही-सही स्थिति अपरिवर्तनीय है तथा उसके जीवन से पूरी तरह से जुडा हुआ उसका नाम उसका अहं ही है। अहं के समाप्त होते ही वह मनुष्य समाप्त हो जाता है।

हमारे देश को और राष्ट्र को ऋगवेद काल से हम सप्त सिन्धु या सिन्धु अभिधान लगाया करते हैं। इस बात के लिए बाहरी प्रमाण भी अत्यंत निर्विवाद रुप से उपलब्ध हैं। जिंद-अवेस्ता पारसीक आर्यों का धर्मग्रन्थ है। इसके समय को सातवीं शती के इस ओर नहीं खींचा जा सकता है। उस ग्रंथ में भी हमारे राष्ट्र को हप्त-हिन्दवः ही कहा गया है। हप्त हिन्दु या हिन्दु ये शब्द सप्त सिन्धु या सिन्धु आदि नामों का ही पारसी उच्चारण है। पारसीयों के 'दसा तीर" नामक धर्मग्रन्थ के एक विभाग में निम्नलिखित वाक्य हैं - 

'अकन विहरमने व्यास अज-हिन्द आनद बसदाना के अकल चुनानस्त" (जरथुस्त्र की 65वीं आयत) अर्थ-व्यास नाम से एक ब्राह्मण पंडित हिन्द से आए। उन जैसा विद्वान बिरला ही है।

अरब देश में मुहम्मद पैगम्बर का जन्म होने के एक हजार वर्ष पूर्व शिव पूजा प्रचलित थी। मुहम्मद के समय तक भी कहीं-कहीं चलती रही है। मुहम्मद पूर्व उस एक हजार वर्ष के संधिकाल में रची हुई कविता आज उपलब्ध है। उसमें हमारे देश का नाम हिन्द और हमारे समाज का हिन्दू नाम ही उल्लिखित है। वह किसी बुरे अर्थ में नहीं अपितु एक विशेष नाम के रुप में ससम्मान प्रयुक्त किया गया है। उदाहरण के लिए लबीबीने अरब तकबीने तुर्का, इस दो हजार वर्ष पूर्व के, जब मुसलमान धर्म का अता पता तक नहीं था, अरबी कवि की निम्नलिखित पंक्तिया देखिए - 

अया मबारक अर्जे यो शैयेनतेता मिनल हिन्दे। वा अरा वक्कला हो मंइओ नज्जेला जिक्रनुन।।

उस कविता के अन्य चरणों में हिन्द, हिन्दू इन शब्दों का ही नहीं अपितु वेद, ऋक्‌ यजुर, अथर्व इनका भी स्पष्ट उल्लेख है। यह उदाहरण पैगम्बर पूर्व एक हजार वर्ष का है। पच्चीस सौ वर्ष पूर्व प्राचीन बाबोलिनियन समाज में प्राकृत हिन्दू रुप ही नहीं तो हमारे राष्ट्र और देश का मूल संस्कृत सिन्धु नाम उसी शुद्ध रुप में ही प्रचलित था। हमारे देश का अत्यन्त महीन कपडा जो उस देश में जाया करता था, उसे वे लोग सिन्धु ही कहा करते थे। प्राचीन ग्रीक समाज में भी होमर के समय से हमारे देश की तथा यहां के कला एवं कुशलता की पूर्ण प्रसिद्धि थी।

Thursday, 4 September 2014

अभिवंदन के विलक्षण तरीके

अभिवंदन के विलक्षण तरीके

अभिवंदन अथवा अभिवादन की प्रथा का प्रारंभ संभवतः जब मनुष्य सभ्य, सुसंस्कृत होने लगा तब आपस में परिचित लोगों में एक दूसरे के प्रति स्नेह, आदर, आत्मीयता प्रकट करने के लिए हुआ होगा, ऐसा लगता है। जिस तरह से पूरे विश्व के भिन्न-भिन्न देशों में विभिन्न प्रकार के रीति-रिवाज, प्रथाएं, जीवन पद्धतियां, उत्सव आदि में अंतर होता है उसी प्रकार से सारे संसार में अभिवादन के तौर-तरीकों में भी अंतर होता है। हमें आश्चर्य हो सकता है किंतु अभिवादन के कई विलक्षण तरीके, प्रथाएं विश्व के विभिन्न देशों में प्रचलन में हैं। आइए, हम उन विभिन्न तरीकों, प्रथाओं पर एक दृष्टि डालें-

पश्चिमी देशों में अभिवादन चुंबन के माध्यम से किया जाता है। पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे के होठों या हाथों का चुंबन लेते हैं। मित्र गालों का तो बुजुर्ग या बडे लोग आशीर्वाद स्वरुप माथे पर चुंबन प्रदान करते हैं। पडौसी देश म्यांमार की प्रथा भी बडी अनोखी है वहां जब दो परिचित या मित्र मिलते हैं तो वे पहले हाथ जोडते हैं फिर एक दूसरे का मुंह चूमते हैं। मंगोलियनों का तरीका तो और भी अजीब है वे एक दूसरे को सूंघकर अभिवादन करते हैं। एस्कीमों में नाक से नाक रगडकर अभिवादन की प्रथा है।

इंग्लैंड में अभिवादन के लिए अपना हैट उतारकर सिर झुकाने की प्रथा है। हमारे पडौसी देश तिब्बत में भी अभिवादन करते समय अपने सिर की टोपी उतार लेते हैं परंतु, साथ ही जीभ भी बाहर निकालते हैं। अंडमान द्वीप समूह में लोग अपने मित्रों से मिलते समय लिपट-लिपटकर रोते हैं। ठीक इसी तरह अफ्रीका में भी लंबे समय बाद मिलने या बिछुडने पर लोग रोते हैं। मॉरिशस भी एक अफ्रीकी देश है परंतु, वहां फ्रेंच संस्कृति का प्रभाव बहुत अधिक है। वहां अभिवादन के समय पश्चिमी पद्धति से चुंबन आदान-प्रदान की प्रथा है। मेरे एक संबंधी वहां पदस्थ हैं वे इस रिवाज से बडे बेजार हैं परंतु, क्या करें वहां रहना है तो उनके सद्‌भाव का प्रत्युत्तर तो देना ही पडेगा वह भी सद्‌भाव से आदर दिखाते हुए तो, उनके रिवाजों को निभाना ही पडेगा भले ही आपको लाख कोफ्त महसूस होती हो। लेकिन स्पेन और इटली में अभिवादन का जो तरीका प्रचलित है वह भारत तो क्या शायद पूरे एशिया में अपनाना बडा ही महंगा साबित हो सकता है। स्पेन और इटली में युवा लडके किसी अजनबी युवती से परिचय पाने के लिए उसके कूल्हे पर चिकोटी काटते हैं और वहां की लडकियां इसका बुरा भी नहीं मानती। 

सुमात्रा द्वीप और फिलीपाइन्स द्वीप समूह के अभिवादन के तरीके तो किसी कसरत से कम नहीं लगेंगे। सुमात्रा में जब दो परिचित मिलते हैं, तो दोनों ही घुटनों के बल बैठ जाते हैं। इसके पश्चात अपने साथी का बांया पैर पहले सिर पर, फिर ललाट पर और फिर सीने पर तथा अंत में घुटनों पर रखते हैं। इस सारी प्रक्रिया के बाद दोनों कुछ देर के वास्ते जमीन पर लेट जाते हैं।  जबकि फिलीपाइन्स द्वीप समूह के लोग अभिवादन के लिए अपने कानों को छूकर दायां पैर ऊपर उठाते हैं।  घुटने टेककर नतमस्तक होना हिबू्र यानी यहूदी तरीका है। अरब तथा अन्य मुस्लिम देशों में लोग मिलते समय एक दूसरे के सीने पर हाथ रखकर परस्पर अभिवादन करते हैं। जापान के ग्रामीण भागों में रहनेवाले लोग आपस में मिलते समय अपने जूते को उतारकर सम्मान प्रकट करते हैं। रेड इंडियन (अमेरीकन) अभिवादन के समय एक दूसरे से अपना सिगार बदल लेते हैं।

हाथ मिलाकर अभिवादन करने का तरीका पूरे विश्व में सर्वाधिक लोकप्रिय एवं प्रचलन में है और लगभग सभी देशों में हाथ मिलाने की परंपरा बहुत लंबे समय से चली आ रही है। यह परंपरा मूलतः इंग्लैंड की है, जिसे पूरी दुनिया में पसंद भी किया गया है। म. प्र. के झाबुआ जिले के आदिवासी भी हाथ मिलाकर ही एक दूसरे का अभिवादन करते हैं साथ ही राम-राम भी कहते हैं। भारत में जनजातियों में अभिवादन के अपने अलग कई तौर-तरीके हैं जो एक अलग लेख का विषय हो सकते हैं। प्राचीनकालीन रोम में दो पक्षों में समझौता अथवा अनुबंध हो इसके लिए हस्तांदोलन किया जाता था। प्राचीन आर्य भी हाथ जोडकर अथवा आलिंगन कर या हस्तांदोलन कर अभिवादन करते थे।

हाथ मिलाना भले ही अभिवादन की एक पद्धति हो किंतु इसके भी अपने कुछ खतरे हैं। लॉर्ड मांटगूमरी को अपनी ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान इस परंपरा के दुष्परिणाम का सामना तब करना पडा जब वे लोगों से हाथ मिलाते-मिलाते अपना हाथ जख्मी कर बैठे। इसी तरह श्रीलंका की उच्चायुक्त की पत्नी के हाथ की हड्डी भोज में आए अतिथियों से हाथ मिलाते-मिलाते उतर गई थी। कुछ ऐसे ही हालातों का सामना रोम में अमेरिका की राजदूत श्रीमती क्लेयर की हुई थी जब एक रात्रिभोज में उन्हें करीब दो हजार लोगों से हाथ मिलाना पडा था। वैसे अमेरिका के राष्ट्रपति रुजवेल्ट के नाम हाथ मिलाने का रिकॉर्ड दर्ज है। जो उन्होंने एक ही दिन में आठ हजार पांचसौ लोगों से हाथ मिलाकर बनाया था।

अब तो पश्चिमी विज्ञानी भी हाथ मिलाने की प्रथा को नकारने लगे हैं। उनका कहना है कि हाथ मिलाते समय एक के हाथ के विषाणु दूसरे में प्रविष्ट हो जाते हैं। जब स्वाइन फ्लू फैला था तब हाथ मिलाना तो दूर रहा लोग अभिवादन की एक पद्धति गाल से गाल को छुआना से भी कतराने लगे थे। तब सलाह दी गई थी कि तीन से पांच फीट दूर रहकर ही अभिवादन करें।

 स्पष्ट है कि हमारी हाथ जोडकर नमस्कार या नमस्ते कहने की पद्धति ही श्रेष्ठ है। नमस्कार या नमस्ते का अपना एक अलग महत्व है जो एक अन्य लेख का विषय है। अतः रहीम के इस दोहे से इस लेख का समापन करता हूं।
 - सब को सब कोऊ करै, कै सलाम कै राम। हित रहीम तब जानिए, जब कुछ अटकै काम।। अर्थात्‌ सब एक दूसरे को सलाम और राम-राम कहकर अभिवादन तो सभी करते हैं परंतु, मित्र तो उसे ही मानिए जो समय पर काम आए।