Saturday, 9 August 2014

विदेशी भाषाओं में संस्कृत शब्द दर्शाते हैं संस्कृत के विलक्षण वैभव को

श्रावण पूर्णिमा ः संस्कृत दिवस विशेष

विदेशी भाषाओं में संस्कृत शब्द दर्शाते हैं संस्कृत के विलक्षण वैभव को

संस्कृत संसार की समृद्धतम भाषा है। परंतु, भारत द्वेषी अंगे्रजों ने यह भ्रांत धारणा फैलाई कि संस्कृत सीखने और समझने की दृष्टि से अत्यंत कठिन है एवं हम भी इसी भ्रांत धारणा को फैलाने में सहभागी हो गए। जबकि सभी भारतीय भाषाओं एवं अनेक विदेशी भाषाओं को तक संस्कृत ने अपनी शब्द राशी प्रदान की है।

उदाहरणार्थ हम अंगे्रजी की संख्याओं पर दृष्टि डालें तो वे संस्कृत से ही निकले हुए दिख पडेंगे जो लैटिन भाषा के माध्यम से वहां पहुंचे हैं। 'द्वि" से टू, त्रि से थ्री, सप्तम, अष्टम, नवम और दशम सेप्टम, ऑक्ट, नोवेम और डेसम हो गए हैं। इन्हीं से सेप्टेम्बर, ऑक्टोबर, नोवेम्बर व डिसम्बर बने हैं। मनुष्य या मानव शब्द का उद्‌भव आदि पुरुष मनु से हुआ है इसीसे अंगे्रजी का 'मैन" और आदि से अरबी का आदम (मूल पुुरुष), आदमी और अंगे्रजी के 'एडम" शब्द की उत्पत्ति हुई है। ओम (ऊँ) से ही अंगे्रजी का ओमन्‌ (भविष्य में होनेवाली बात का संकेत, शगुन, सगुन), अरबी का 'आमीन" (एवमस्तु, तथास्तु) शब्द बने हैं। 'ओमन्‌" से 'ओमनी" शब्द बना है जिसका अर्थ होता है सर्व, बहु। अब ओमनी से निकले हुए शब्द देखें ः ओमनीसिअन्ट-सर्वज्ञ, ओमनीव्होर-सर्वभक्षी पशु, ओमनीव्होरस- सर्वभक्षी, सर्वसमावेशी, सर्वसंग्रही, ओमनी प्रेजेन्ट- सर्वव्यापी, ओमनी पोटेन्ट- सर्वशक्तिमान।

संस्कृत के पितृ, मातृ और भ्रातृ शब्द लैटिन में रुपांतरित होकर पेटर, मेटर और फाटर हो गए और अंगे्रजी के फादर, मदर और ब्रदर शब्द लैटिन से ही निकले हैं अर्थात्‌ ये संस्कृतोद्‌भव शब्द ही हैं। ठंड के दिनों में हम जिस स्वेटर को पहनते हैं उसकी उत्पत्ति संस्कृत के स्वेद से हुई है। स्वेद का अर्थ होता है पसीना और अंगे्रजी के स्वेट का अर्थ भी पसीना ही होता है जो स्वेद का ही परिवर्तित रुप है और इसीसे बना है स्वेटर। इन्हीं दिनों में हमें खांसी भी होती है और हम खंखारते भी हैं इसे अंगे्रजी में 'कफ" कहते है जो मूलतः संस्कृत शब्द है। अंगे्रजी का कैश संस्कृत के कोष का परिवर्तित रुप है। नाम का परिवर्तित रुप है अंगे्रजी का 'नेम"।

ये तो हुए अंगे्रजी शब्द अब कुछ संस्कृतोद्‌भव अरबी-फारसी शब्द भी देख लें - फारसी का अंगुश्त यानी उँगली, अंगुली संस्कृतोद्‌भव है। संस्कृत में 'अंगुल" अंगूठे को कहते हैं। अरबी का अस्वद - अश्वेत, काला या बहुत काला और श्वेत का फारसी रुपांतरण है सफेद। कर्पास (फा.) मोटा कपडा, संस्कृत 'कपट" का अपभ्रंश। गंदुम (फा.अ.)- गोधूम, गेंहू। चत्र (फा.)- छत्र, छाता जो राजाओं के सर पर लगाया जाता है। चुम्चः (तुर्की)- चमचा ('चमस" संस्कृतोद्‌भव) परंतु उर्दूवाले 'चम्चः" बोलते हैं। चर्म (फा.) चमडा, चर्म (संस्कृत का फार्सी में प्रचलित तत्सम रुप)। चहार (फा.)- चार, चार की संख्या (संस्कृतोपन्न)। चहारदह (फा.) चौदह, चतुर्दश (फारसी में 'स" का 'ह" हो जाता है) जात (अ.) कुल, वंश, नस्ल, जाति, बिरादरी (संस्कृतोद्‌भव) 

इस प्रकार के अनेकानेक शब्द हमें मिल जाएंगे जो संस्कृत से उत्पन्न हुए हैं जो संस्कृत के वैभव को दर्शाते हैं और कई लोग जो संस्कृत को देवभाषा कहकर संस्कृत को विश्व की अधिकांश भाषाओं की जननी यदि कहते हैं तो इसमें कुछ अतिश्योक्ति नहीं लगती। इस संस्कृत के द्वारा हमारे पराक्रमी पूर्वज पूरे विश्व को जब सुसंस्कृत करने निकले थे तभी उन्होंने विभिन्न भाषाओं की नींव डाली। 

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