Saturday, 16 August 2014

कृष्ण भक्त मुस्लिम कवि

Lord Krishna's Muslim worsipper

कृष्ण भक्त मुस्लिम कवि


साहित्यकारों ने भगवान कृष्ण जो योगीराज भी हैं के विभिन्न रुपों का वर्णन किया है जिनपे वे मोहित हुए थे। कोई उनके बालरुप पर मोहित है तो, कोई उनके सुंदर स्वरुप पर तो, कोई उन्हें महाभारत के सूत्रधार कहता है। कोई उन्हें महान कूटनीतिज्ञ। इस प्रकार से भगवान कृष्ण के अनेकानेक रुपों पर देशी-विदेशी अनेक साहित्यकारों ने अपनी लेखनी चलाकर भारतीय वाङमय को समृद्ध किया है। इनमें भारतीय मुस्लिम कवि भी शामिल हैं जो उन पर भक्ति भाव से मुग्ध हो गए। सम्राट अकबर ने भी श्रीकृष्ण के चरित्र पर लेखन किया है।


गुजरात के एक पठान परिवार में 1892 में जन्में अब्दुल सत्तार भगवान कृष्ण के प्रेम में इतने डूब गए थे कि सत्तारदास बन वे कह उठे,' नात-जात छोडी और तात-मात छोडे, हो गई फजैत मैंने लोक-लाज खोई। प्रेम में प्रभु के मैं तो हो गई दीवानी, कहते 'सत्तारदास" होनी थी सो होई।'' वे स्वयं को मीराबाई और एक गोपी के स्थान पर रखकर कहते थे, 'अब तो मैं प्रभु के प्रेम में दीवानी हो गई हूं।" इस कृष्ण प्रेम के कारण वे न केवल गुजरात बल्कि पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गए। जो कभी अनाथ थे वे इस कृष्ण भक्ति और प्रेम के कारण सनाथ हो गए।


ये बातें मुगल शासन काल की हैं जब हिंदुओं की जनेऊ उतरवाकर उनसे जबरदस्ती कलमा पढ़वाया जा रहा था। उस समय कृष्ण भक्त मुसलमान कवि 'आदिल" ने लिखा था 'आदिल की पुकार" - 'आदिल सुजान रुप-गुन के निधान कान्ह, बांसुरी बजाय जन तपन बुझाव रे। नंद के किसोर-चित्तचोर मोर पंखवारे! बंसीवारे-सांवरे पियारे, इत आवरे।। 16 वीं शताब्दी के सैयद निजामुद्दीन उर्फ 'मीरमधनायक" कहते हैं ः 'हमारे हरि बिनु और न कोय।"


जन्म से हिंदू परंतु बाद में इस्लाम स्वीकारनेवाले कृष्णभक्त कवि आलम की प्रियतमा शेख भी कवियित्री होकर वह भी कृष्णभक्त थी। दिव्य भाव धारा में डूब शेख कृष्ण वर्णन करती है - जब ते गोपाल मथुरा को सीधारे माई, मधुबन भयौं मधुदानव विषम सौं। 'शेख" कहे सारिका, शिखंडी खंजरीट सुक मिलि के कलेस कीन्हीं कालिंदी कदम सौं। मुस्लिम कवियित्री ताज खां बेगम तो श्रीकृष्ण के जीवन पर इतनी अनुरक्त हो गई थी कि कह बैठी ः हौं तो मुगलानी किंतु हिन्दुवानी हवै रहुंगी मैं (मैं धर्म से मुसलमान हूं तो भी तेरे लिए मेरा धर्म छोडने के लिए तैयार हूं)। अपने व्याकुल प्राणों की पीडा जो उसने इन शब्दों में व्यक्त की है वह हिंदी साहित्य की गरिमा बने हुए हैं ः 'सुनो दिलजानी! मेरे दिल की कहानी, तेरे हाथ हूं बिकानी, बदनामी भी सहूंगी मैं। देव-पूजा ठानी, तजे कलमा-कुरान, मैं नमाज हूं भुलानी तेरे गुनन गहूंगी मैं। .... आशिक-दिवानी बन, श्याम-पद पूजि-पूजि, प्रेम में पगानी राधिकी सी बन जाउंगी।।""कवि मुबारक के उद्‌गार हैं ः हरि हो, हरि हो, हरि हो गति मेरी! नजीर बनारसी (25 नवंबर 1909 से 23 मार्च 1996) ने लिखा है 'नजीर बनारसी के कृष्ण"ः 'मोहन की बांसुरी के, मैं क्या कहूं जतन। .... सब सुनने वाले कह उठे - ''जै जै हरी-हरी।"" ऐसी बजाई कृष्ण कन्हैया ने बांसुरी।। ऐसा कृष्ण प्रेम भरा जीवन पूरे भारत के लिए प्रेरणादायी है और ऐसे कृष्ण भक्ति में लीन कवियों को भला कौन बेगाना कह सकता है।

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