Friday, 15 August 2014

यश-प्रतिष्ठा-आस्था और पहचान का प्रतीक ः ध्वज

यश-प्रतिष्ठा-आस्था और पहचान का प्रतीक ः ध्वज

मानव ने शैलाश्रय को छोड जब समूह रुप में झोपडियां आदि बनाकर रहना आरंभ किया तभी अपने समूह-टोली-कबीले की पहचान के रुप में पहले पहल झंडे या ध्वज को अपनाया जिसके तले वे एकत्रित होते थे। सबसे पहले झंडे का उपयोग भूत-प्रेत-बुरी आत्माओं से बचने के लिए किया गया। झंडे पर कबीले के ओझा द्वारा बनाया हुआ कोई जादूई चिंह या किसी भयानक पशु-पक्षी को इस विश्वास के साथ अंकित किया जाता था कि इससे बुरी आत्माएं, भूत, प्रेत आदि दूर रहेंगे। धीरे-धीरे वे विभिन्न त्यौहारों आदि पर इसी ध्वज तले एकत्रित होने लगे। विभिन्न कबीलों के भिन्न-भिन्न ध्वज बनने लगे। इसी प्रकार से समय के साथ विभिन्न देशों-राष्ट्रों के झंडों की निर्मिति हुई और इसे राष्ट्रीय सम्मान के रुप में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। 

ध्वज की महत्ता युद्धकाल से लेकर शांतिकाल तक में है। विभिन्न रंगों के झंडे विभिन्न बातों के प्रतीक के रुप में उपयोग में लाए जाने लगे। सफेद रंग को शांति का प्रतीक माना गया है। इसलिए लंबे समय से सफेद झंडा शांति और संधि का प्रतीक बना हुआ है। युद्ध के समय सफेद झंडा लेकर आनेवाले को शांतिदूत माना जाता है। काला रंग विरोध का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए विरोध प्रकट करनेवाले काले झंडे फहराते हैं या काली पट्टी बांधते हैं। पुराने जमाने में समुद्री डाकुओं के जहाज पर काले झंडे फहरते थे और वे वस्त्र भी काले ही पहनते थे। पीला रंग बीमारी का प्रतीक है इसलिए छूत की बीमारी से ग्रस्त रोगियों को लेकर जानेवाले जहाज पर पीले रंग का झंडा लहराया जाता है। झंडे को विभिन्न तरीके से विभिन्न प्रतीकों के रुप में भी उपयोग में लाया जाता है। झंडे को झुकाने का मतलब है राष्ट्रीय शोक। किसी राष्ट्रीय नेता की मृत्यु पर झंडे को झुकाया जाता है। युद्धकाल में झंडे को झुकाने का अर्थ हार को स्वीकारना होता है। झंडे को उल्टा फहराना यानी राष्ट्रीय संकट को दर्शाना होता है। प्रत्येक राष्ट्र के झंडे के पीछे कोई ना कोई कथा या राष्ट्रीय संदर्भ छुपा होता है। 

प्रारंभ से ही ध्वज का धर्म से गहरा संबंध रहा है। हमारे यहां देवताओं के प्रतीक चिंह के रुप में ध्वज शब्द को उपयोग में लाया जाता है। साधारणतया जिस देवता का ध्वज होता है उस ध्वज पर उस देवता के वाहन को अंकित किया जाता है। श्रीकृष्ण का गरुड ध्वज है तो बलराम के ध्वज पर तालवृक्ष अंकित होने के कारण वह तालध्वज कहलाता है। अग्नि का धूम्र तो सूर्य का अरुण ध्वज है। महाभारत के योद्धा उनके ध्वजों से ही विख्यात हैं जैसेकि अजुर्न कपिध्वज नाम से। भिन्न-भिन्न संप्रदायों के भिन्न-भिन्न ध्वज होते हैं। वैष्णव संप्रदाय के ध्वज पर गरुड, शैव के वृषभ तो शाक्त संप्रदाय के ध्वज पर सिंह अंकित है। झंडा, पताका, ध्वज या केतु को यश, प्रतिष्ठा, आस्था के प्रतीक के रुप में लहराया जाता है। ध्वज आकाश में उत्कृष्टता का उद्‌घोष करता है। धर्म से अटूट संबंध होने के कारण मंदिरों के शिखर पर ध्वज स्थापित किए जाते हैं।

ईसाई चर्च में ध्वज का उपयोग चौथी शताब्दी से किया जाने लगा। ऐसी अनुश्रुति है कि सम्राट कांस्टेटाईन को सपने में ध्वज पर क्रॉस नजर आया था। धर्मयुद्ध (क्रूसेड) में क्रॉस वाला ध्वज सेना के आगे रहता था। इंग्लैंड का यूनियन जैक तो विशेष रुप से धार्मिक भावना से ही प्रेरित है। इसमें तीन क्रॉस हैं। पहला सैंट जॉर्ज का जो रोमन सैनिक थे और ईसाई धर्म स्वीकारने के कारण सम्राट ने उन्हें मृत्युदंड दे दिया था। धर्म के लिए बलिदान देने के कारण उनके रेडक्रॉस को इंग्लैंड ने 1277 में राष्ट्रीय प्रतीक के रुप में स्वीकारा। दूसरे दो क्रॉस सैंट एण्ड्रयू और सैंट पैट्रिक के हैं। इन दोनो ने भी ईसाई धर्म के लिए बलिदान दिया था इसलिए इनके भी क्रॉस को इंग्लैंड के यूनियन जैक में स्थान दिया गया है। 

मुस्लिम देशों के झंडों में इस्लाम के प्रतीक के रुप में किसी ना किसी रुप में चांद-तारा और हरा रंग देखने को मिल ही जाता है। इस्लाम धर्म में क्रॉस जैसा कोई निश्चित चिंह नहीं था। मुहम्मद पैगंबर ने रोमन लोगों के गरुड चिंह (अल उकाब) को अपनी सेना के ध्वज के लिए उपयोग में लाया और उसका रंग काला था तो कभी कभी उन्होंने सफेद रंग के ध्वज को भी अपनाया। विश्व विख्यात मुस्लिम इतिहासकार इब्ने खलदून के अनुसार मुहम्मद साहब के राज्यकाल में सेना में पताकाओं का प्रयोग हुआ और इसी प्रकार से खलिफाओं के काल में भी। ... अब्बासियों की पताकाएं काले रंग की होती थी। इस प्रकार वे इस रंग से अपने वंश के शहीदों का शोक मनाते थे और इसे बनी (बनी या बनू का अर्थ के बेटे या वंशज) उमय्या की हत्या एवं उनके विनाश की स्मृति का चिंह समझते थे। अलवियों (चौथे खलीफा अली की वह संतान जो उनकी पत्नी फातिमा से अतिरिक्त है) ने अब्बासियों से शत्रुता प्रदर्शित करने के लिए अपनी पताकाएं सफेद रंग की बना ली। मामून (अब्बासी खलीफा 813-833 ई.) ने अपने राज्यकाल में पताकाओं का काला रंग त्यागकर हरा रंग ग्रहण किया और हरी पताकाएं बनवा ली। उमय्या खलीफाओं (661-750 ई.) के झंडे का रंग सफेद था। परंतु, कुख्यात आतंकवादी संगठन अल शबाब और आईएसआईएस के झंडे का रंग काला है। 1880 से 1901 तक अफगानिस्तान के अमीर के झंडे का रंग भी काला ही था। जबकि मस्कत और ओमान के ध्वज लाल सुर्ख रंग के हैं।

जो भी हो लेकिन झंडों का इतिहास बडा ही लंबा है जिसके एक छोटे से हिस्से पर ही हमने नजर डाली है। हर देश, धर्म, पंथ, संप्रदाय, संस्थाओं का अपना एक ध्वज होता है जो उनके यश, आदर्श के प्रतीक के रुप में उनके द्वारा सम्मानीय होता है। वह उनका स्फूर्ति स्थान भी होता है। जिससे उनकी विशिष्ट पहचान जुडी होती है। 

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