Friday, 11 July 2014

खलीफा और इस्लामी राज्य

THE CALIPH & ISLAMIC STATE


खलीफा  और इस्लामी राज्य

अलकायदा के सहयोगी रह चूके आतंकवादी संगठन आईएसआईएल के प्रमुख अबू बक्र अल बगदादी ने कुछ दिनों पूर्व अपने आपको खलीफा घोषित कर मुसलमानोें को पवित्र जिहाद में तब तक लडने के लिए शामिल होने को कहा है जब तक रोम को फतह नहीं कर लेते। बगदादी ने उसके द्वारा कब्जाए हुए इराक-सीरिया के क्षेत्र में इस्लामी राज्य घोषित कर उसमें आ बसने का आमंत्रण भी दे दिया है। इस प्रकार से उसकी यह घोषणा सन्‌ 1924 में तुर्कीस्तान के कमाल अतातुर्क द्वारा खलीफा और खिलाफत इस संस्था को ही रद्द कर तुर्की को सेक्यूलर राज्य घोषित कर देने के बाद एक प्रकार से खलीफा और खिलाफत को पुनर्जीवित करने के समान ही है।

खलीफा का राज्य ही इस्लामी राज्य (खिलाफत) होता है। इस्लाम प्रणीत खिलाफत एक अनन्य संस्था है जिसका आधार कुरान की (24ः55) आयत है। इस्लामी राज्य को ही 'अल्लाह का राज्य" भी कहते हैं। लेकिन सर्वसाधारणजन इस संकल्पना के बारे में कुछ भी नहीं जानते इसलिए इस्लामी राज्य क्या है यह समझ सकें इसलिए यहां उसका संक्षिप्त सार प्रस्तुत है। 

खिलाफत यानी उत्तराधिकारी अथवा प्रतिनिधि। पैगंबर की मृत्यु के बाद जो मुस्लिम समाज का नेता बना उसे ही 'खलीफा" कहते हैं। वही उस समाज का एकमेव राजप्रमुख और धर्मप्रमुख होता है। उस समय यह अपेक्षा थी कि संसार का संपूर्ण मुस्लिम समाज बंधुसमाज के रुप में एकत्र रहेगा और उन सबका मिलकर एक ही खलीफा होगा। परंतु, आगे जाकर उस समाज के राजनैतिक दृष्टि से अनेक गुट बन गए और प्रत्येक गुट के स्वतंत्र खलीफा बन गए। सारे गुटों के मिलाकर कुल 176 खलीफाओं के नाम इतिहास में दर्ज हो चूके हैं और अब बगदादी नए खलीफा के रुप में सामने आया है। 

यह इस्लामी राज्य कैसा होना चाहिए को मुस्लिम विद्वान मौ. अबू मुहम्मद इमामुद्दीन के इस भाष्य से समझा जा सकता है ः 'आजकल जिस राज्य का राष्ट्रपति और मुख्य प्रशासक मुसलमान है उस राज्य को इस्लामी राज्य कहा जाने लगा है ... वस्तुतः इस्लामी राज्य वह है जिसका संविधान कुरान और हदीस पर आधारित है एवं जिसका राष्ट्रपति और प्रधान अधिकारी इस्लाम के सिद्धांतानुसार जीवन जीता है।"" इसीलिए पैगंबर और उनके उत्तराधिकारी पहले चार खलीफाओं के राज्य को 'आदर्श इस्लामी राज्य" कहा जाता है।

इस्लामी राज्य के कानूनी स्वरुप के बारे में बतलाते हुए पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय के कानूनी विद्वान द्वारा लिखी हुई और विधि पाठ्यक्रम में समाविष्ट ग्रंथ में कहा गया है ः ''इस्लामी कानूनों का मूलाधार (कुरान और हदीस के) ईश्वरीय संदेश हैं ... इस्लाम के अनुसार (राज्य का) कानूनसम्मत सार्वभौमत्व अल्लाह का होता है .... जो व्यक्ति या संस्था स्वयं को सार्वभौम समझती है या कानूनीतौर पर वैसी मानी जाती है, वह अनेकेश्वरवाद का भयंकर अपराध करती है।"" ''इस्लाम की आज्ञा है कि, नैतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक क्षेत्र में केवल अल्लाह को ही सार्वभौम मानना चाहिए ... समाज में उसीकी आज्ञा प्रस्थापित होना चाहिए और पाली जानी चाहिए ... उसकी इच्छा ही सर्वोच्च कानून होना चाहिए।""

अब्दुल रहमान बि. हमद अल उमर ने सऊदी अरेबिया शासन की पूर्वानुमति से प्रकाशित ग्रंथ में लिखा है कि, ''सार्वभौमत्व और कानून बनाना केवल अल्लाह का विशेषाधिकार है। यह एकेश्वरवाद से अपनेआप निष्पन्न होनेवाला निष्कर्ष है। अल्लाह के कानून के विरोध में कानून बनाने का कोई सा भी अधिकार मनुष्य को नहीं है।"" (समान नागरिक संहिता का किस आधार पर विरोध किया जाता है यह इस पर से समझा जा सकता है)

संक्षेप में, इस्लामी राज्य में शासन को अल्लाह के कानून के अनुसार राज्य करना होता है, उसे उसके विरोधी कानून बनाने का  अधिकार नहीं होता है, उन कानूनों को कार्रवाई में लाने के लिए आवश्यक ऐसे पूरक उपविधि या नियम बनाने तक का ही उन्हें अधिकार होता है। 

पाश्चात्य पद्धति में जिस प्रकार से 'धर्म" और 'राज्य" अलग होते हैं, वैसा इस्लाम में नहीं। मानव जीवन का धर्म, अर्थ, समाज, राजनीति में विभाजन इस्लाम को मान्य नहीं। मानव जीवन के सभी घटक इस्लाम में अभिन्नता से समाविष्ट होते हैं। इस्लाम एक जीवन पद्धति है। अल्लाह ने समय-समय पर जो संदेश पैगंबर को दिए उनमें इस प्रकार का विभाजन नहीं। आज धर्म, कल समाज, परसों राजनीति इस प्रकार से जीवन के खाने बनाकर अल्लाह ने मार्गदर्शन किया हुआ नहीं है। इस कारण से इस्लाम में ये सारी बातें अविभाज्य और एकरुप हैं। 

धर्म और राजनीति में फर्क करो की पाश्चात्य कल्पना इस्लाम को मान्य नहीं। इस कारण जिस प्रकार से पैगंबर एक ही समय में धर्मप्रमुख, राजप्रमुख, सेनापति, न्यायाधीश, समाज सुधारक आदि सबकुछ थे उसी प्रकार से आदर्श खलीफा भी सबकुछ थे। उन्होंने दी हुई वही आज्ञा एक ओर धार्मिक तो, दूसरी ओर से राजनैतिक होती। राजादेश और धर्मादेश में कोई अंतर ना था। एम. एन. रॉय के शब्दों में 'इस्लाम मूलतः धर्म नहीं अपितु राजनैतिक आंदोलन के रुप में उदित हुआ था।"   

इस्लामी राज्य का ध्येय, मकसद, उद्देश्य और खलीफा के कर्तव्य वही थे जो पैगंबर ने आदर्श के रुप में सामने रखे थे। वह राज्य अल्लाह के कार्य के लिए स्थापित हुआ होने के कारण अल्लाह के कार्य के रुप में इस्लाम का प्रसार करना, उसे सभी मानवों तक पहुंचाना, इस्लामी राज्य का विस्तार करना, सर्वत्र अल्लाह के कानून को प्रस्थापित करना, अल्लाह का धर्म अन्य धर्मों पर प्रभावी और विजयी बनाना, संसार में प्रेम, सत्य, न्याय, समता, बंधुता, सहिष्णुता, शांति, नैतिकता, मानवता आदि इस्लामी नीतिमूल्यों की प्रतिष्ठापना करना, राज्य की प्रजा के इहलोक और परलोक के कल्याण की चिंता करना, इस्लाम की सीख के अनुसार प्रजा को व्यवहार करने के लिए बाध्य करना, कानून और सुव्यवस्था प्रस्थापित करना, गुनहगारों को दंडित करना ये सारे काम खलीफा के  कानूनसम्मत कर्तव्य तय होते थे। इन्हीं सब कर्तव्यों का निर्वाह कर आदर्श निर्मित किया इसलिए पहले चार खलीफाओं को आदर्श कहा जाता है। इन चार आदर्श खलीफाओं को इस्लाम, इस्लाम के इतिहास और मुस्लिमों के जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण एवं बहुमूल्य स्थान प्राप्त है।  

आज अलकायदा, तालिबानी, हिज्ब उत तहरीर आदि अनेकानेक कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों के धर्मयोद्धा जिस विशुद्ध इस्लामी राज्य की स्थापना के लिए संघर्षरत हैं उन सबमें आईएसआईएल के बगदादी ने स्वयं को खलीफा घोषित कर और अपने कब्जेवाले प्रदेश में इस्लामी राज्य (खिलाफत) स्थापित कर सबसे बाजी मार ली है।  

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