Friday, 25 July 2014

हिंदू धर्म में संरक्षण प्राप्त है पशु-पक्षियों

Animal's safeguard in Hindu Dharma

हिंदू धर्म में संरक्षण प्राप्त है पशु-पक्षियों


पशु-पक्षियों को हमारे धर्म ग्रंथों, धार्मिक संस्कारों में एक सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त है। संस्कृत सुभाषितों में कई सुभाषित पशु-पक्षियों से संबंधित होकर वे हमें कई रोचक एवं महत्वपूर्ण शिक्षाप्रद संदेश भी देते हैं। कई पशु-पक्षियों को देवी-देवताओं से भी संलग्न किया गया है। इन सबके पीछे जीव दया एवं पर्यावरण संरक्षण की भावना है। इनके महत्व को देखते हुए ही बाघ को राष्ट्रीय पशु तो, मोर को राष्ट्रीय पक्षी का गौरव प्रदान किया गया है।


समुद्र मंथन में कामधेनु, कल्पवृक्ष और कौस्तुभ मणि आदि 14 अमूल्य रत्न प्राप्त हुए उनमें एक रत्न हलाहल (विष) भी प्राप्त हुआ था। इस विष को गले में धारण कर शिवजी ने सबकी रक्षा की। इस विष के कारण उनके गले पर नीली धारी बन गई। नीलकंठ पक्षी जिसकी गर्दन के चारों ओर हल्की नीले रंग की धारी होती है को शिवजी के नीलकंठी स्वरुप का प्रतीक माना जाता है और उसके दर्शन को शुभ मानते हैं इसलिए उसे संरक्षण प्रदान किया गया है। हनुमानजी ने सीता को ढूंढ़ने और राम-रावण युद्ध में भगवान राम की सहायता की थी। इसलिए हनुमानजी को हमारे घरों में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है, घर-घर में हनुमान चालीसा का पाठ किया जाता है। यह उनकी सेवाभावना का सम्मान है। बंदरों के सेनापति के रुप में सुग्रीव को धार्मिक रुप से पूज्य माना जाता है। उनके साथी जांबवान ने युद्ध में भालुओं का प्रतिनिधित्व किया था इसलिए उन्हें भी पूज्य माना जाता है। इस प्रकार से बंदरों एवं भालुओं को संरक्षण दिया गया है।


सावन के महीने में नाग जो कि किसानों का मित्र है की पूजा नागपंचमी के दिन करने का विधान है। गांवों में विषहरी स्थान होता है। जहां सार्वजनिक रुप से विषधर की पूजा की जाती है। दशावतारों में कूर्म, मत्स्य और वराह अवतार शामिल है। इस प्रकार से इन्हें भी पूज्य माना गया है। न इन्हें अवतारों के रुप में पूज्य माना गया है बल्कि कई पशु-पक्षियों को विभिन्न देवी-देवताओं के वाहनों के रुप में स्थान देकर उन्हें भी अवध्य कर दिया गया है। जैसेकि मोर जो देवताओं के सेनापति कार्तिकेय का वाहन है। मोर पंखों को भगवान कृष्ण अपने मुकुट में सजाते थे। बैल कृषि कार्य में उपयोगी होने के कारण उसकी शिवजी के वाहन के रुप में पूजा की जाती है। सांड को साक्षात शिवशंकर मान कुछ लोग उसे छुट्टा छोड देते हैं और वह जहां जाता है उसे मुफ्त आहार दिया जाता है। प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए छोटे-बडे सभी प्राणियों का महत्व है इसीको देखते हुए चूहे जैसे छोटे प्राणि को सबसे पहले पूजे जानेवाले गणेशजी के वाहन के रुप में मान्यता दी गई है। जगतजननी जगदंबा को सिंह पर सवार चित्रित किया जाता है। देवी स्वयं भी शक्ति स्वरुपा है और सिंह भी शक्ति का प्रतीक है। भारत माता को भी सिंह के साथ ही दर्शाया जाता है। भगवान विष्णु ने अपने एक अवतार (नरसिंह) के रुप में सिंह को ही चुना था। मंदिरों में सिंह को रक्षक के रुप में स्वीकारा गया है।


धनवान लोग अधिकांशतः धन के मद में अंधे रहते हैं इसीलिए संभवतः धन-संपत्ति की दात्री देवी लक्ष्मी का वाहन उल्लू है जिसे दिन में दिखाई नहीं देता को लक्ष्मी के सवारी के रुप में मान्यता देकर संरक्षण प्रदान किया गया है। उल्लू हमारे लिए अत्यंत हितकारी है वह अकेले ही इतने चूहों को खा सकता है जो पूरे वर्षभर में एक टन अनाज का सफाया कर दें। ज्ञानदात्री के रुप में पूजी जानेवाली देवी श्वेतांबरा सरस्वती का वाहन है विमान रुपी हंस जिस पर बैठकर वह ज्ञान का आलोक फैलाती फिरती है। नदियां जीवनदायिनी होने के कारण उनको भी देवी स्वरुपा मान प्रातः स्मरणीय स्तोत्रों में उनका आवाहन किया जाता है, उनको धार्मिक स्थान दिया गया है। नदियों की स्वच्छता के लिए जलचर होना आवश्यक है इसलिए नदियों में पाए जानेवाले घडियाल को गंगा का वाहन बनाया गया है। मछली पर भी देवी स्वरुपा नदी को दर्शाया गया है।


उद्योग के देवता के रुप में विश्वकर्मा पूजे जाते हैं उनकी सवारी है हाथी। जो भारीभरकम उत्तरदायित्व की भांति स्वयं भी भारीभरकम है। देवराज इंद्र का वाहन ऐरावत नामका श्वेत हाथी है। हाथी को तो इतना महत्व प्राप्त है कि देवी लक्ष्मी के चित्र में हाथी को कमल का फूल या स्वर्ण कलश से जलाभिषेक करते हुए बतलाया जाता है। महाभारत के 'अश्वत्थामा हतो" की कथा तो सभी को मालूम है। बौद्ध ग्रंथों में भी वर्णन है कि महात्मा बुद्ध के जन्म के पूर्व उनकी माता माया को सपने में सफेद हाथी के दर्शन हुए थे। हाथी का चित्रण राजाओं के राजसी ठाटबाट के प्रमाण के रुप में किया गया है। उन्हें युद्ध में भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।


वन्य पशु ही नहीं घरेलु पालतू पशु-पक्षियों को भी धार्मिक संरक्षण प्राप्त है। गाय को कितनी महिमा प्रदान की गई है यह तो सभी को ज्ञात है इसलिए उसके बारे में बतलाना मतलब सूरज को दिया दिखलाने के समान होगा। हर गली में नजर आनेवाले कुत्ते को भैरवदेव की सवारी माना गया है। भगवान दत्तात्रय के साथ गाय और कुत्ते अवश्य होते हैं। कई घरों मेंं प्रतिदिन एक रोटी गाय और कुत्ते के लिए अवश्य निकाली जाती है। कई बार पंडितों-ज्योतिषियों के कहने पर भी यह कार्य धार्मिक कृत्य के रुप में किया जाता है। गधे के श्रम का सम्मान करते हुए उसे शीतलादेवी के वाहन के रुप में मान्यता है। भैंसे को महाकाल की सवारी के रुप में मान्यता प्राप्त है।


वस्तुतः भारत एक धर्मप्रधान देश है और हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने व इसमें पशु-पक्षियों की महत्ता और उपयोगिता को समझ इनके संरक्षण के लिए इन्हें हमारे धर्म-संस्कृति, साहित्य में अटल स्थान दिया जिससे कि इनका संवर्धन और इनकी रक्षा हो सके।

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