Friday, 4 July 2014

कथा शौचालयों की

कथा शौचालयों की 

पूरे देश में हम कहीं भी घूमकर देख लें एक बात हमारे ध्यान में सहज ही आ जाएगी कि कहीं भी सरलता से सुलभ हो सके ऐसा साफ-स्वच्छ शौचालय मिलना अत्यंत ही दुर्लभ है। कोई विचार करे ना करे किंतु मैं अवश्य शौचालय के बारे में रोज विचार करता ही हूं क्योंकि, मनुष्य के लिए जितनी भोजन एवं नींद की आवश्यकता है उतनी ही शौचालय की भी। और इस संबंध में मेरा वर्षों का अनुभव यही कहता है कि सार्वजनिक स्थानों पर के शौचालय ऐसे होते ही नहीं हैं कि वहां जाकर कोई आनंद का अनुभव कर सके। जबकि कोई भी व्यक्ति जब तक मल-मूत्र विसर्जन व्यवस्थित ढ़ंग से ना कर ले वह आराम महसूस कर ही नहीं सकता। फिर भी शौचालय यह शब्द हमारे लिए इतना उपेक्षित है कि उस बारे में सोचना या बोलना भी मानो वर्ज्य है। क्योंकि, शौचालय यानी कोई घिनौनी बात है एवं वह अस्वच्छ ही होना चाहिए तथा वहां जाने की बात करना या उस संबंध में चर्चा यानी कोई पापकर्म है।

लेकिन मैं इस विषय पर इसलिए चर्चा करता हूं क्योंकि यह मनुष्य की एक मूलभूत आवश्यकता है और इस संबंध में मुझे आए हुए अनुभव बडे ही विचित्र हैं और इस संबंध में विशेषता यह है कि बीते चालीस वर्षों के अनुभवों में विशेष ऐसा कोई बदलाव आज भी आया हुआ दिखता नहीं है। हां, फर्क केवल इतना आया है कि अब वे देसी शौचालय नजर नहीं आते जिनका उल्लेख करने मात्र से वे लोग जिन्होंने उन्हें देखा है उनका उपयोग किया है वे घिन से भर उठेंगे और चूंकि मैं किसी के भी मन में जुगुप्सा फैलाना नहीं चाहता इसलिए उनका उल्लेख करुंगा भी नहीं और आजकल के लोग तो उन शौचालयों की कल्पना भी नहीं कर सकते। तो, मैं मेरे अनुभवों पर आता हूं -

एक समय में मैं विभिन्न कारणों से बहुत घूमा भी हूं और कई स्थानों पर रहा भी हूं। सन्‌ 1978 के आसपास की बात है मेरे पिता सरकारी नौकरी में होने के कारण धार जिले के एक छोटे से गांव में पदस्थ थे और मैं उनके पास गर्मी की छुट्टियों में रहने के लिए गया। वहां हमारे निवास का शौचालय घर के पिछवाडे में था और वहां जाने के लिए पहले एक छोटा सा चौक जहां कपडे आदि धोने की व्यवस्था थी के बाद गाय-भैंस बांधने की गोठ थी को पार करके जाना पडता था। वहां अंधेरा और बदबू का साम्राज्य छाया रहता था। आज जब मैं उस अनुभव के बारे में सोचता हूं तो मेरे रोंगटे खडे हो जाते हैं कि कैसे मैं उस शौचालय में जाता था। अब भी मानसिकता कैसे बदली नहीं है मैं उस पर आता हूं। सन्‌ 2006 में इंदौर से पचास एक कि.मी. दूर खरगोन जिले के एक गांव में स्थित धार्मिक मठ में किसी कारणवश जाना पडा। वहां पर भी शौचालय की स्थिति बहुत कुछ वैसी ही थी जैसीकि मैंने ऊपर वर्णित की है।

अब उज्जैन के धार्मिक स्थल पर सन्‌ 2013 में जो अनुभव आया वह बतलाता हूं। वहां निर्मित हॉल में कर्मकांड और भोजन आदि की व्यवस्था बडी अच्छी थी परंतु, जब बारी शौचालय जाने की आई तो वहां की स्थिति भयावह थी। हॉल के पिछवाडे में कतार से शौचालय बने हुए थे। जिन तक पहुंचने के लिए एक छोटी सी पगडंडी से होकर गुजरना पडा दोनो तरफ घास उगी हुई थी शौचालयों की छत गर्डर-फर्शी की थी उस पर भी और आसपास भी ऊंची-ऊंची घास और खरपतवार उगी हुई थी। ऐसे शौचालयों का उपयोग करने की कल्पना करना तक कितना भयोत्पादक है तो उपयोग में लाना कितना मुश्किल होगा, जरा सोचिए। शौचालयों की यह अवस्था देखकर हॉल के निकट स्थित सार्वजनिक मूत्रालय में गया तो वहां की गंदगी देखकर लौट आया। पूछताछ करने पर सलाह मिली की कहीं भी खडे हो जाओ। लेकिन महिलाएं क्या करें?  

यह हाल उज्जैन ही क्यों इंदौर में भी है। इंदौर के एक मंदिर में एक कार्यक्रम में लगभग चार वर्ष पूर्व गया था तब इससे भी अधिक भयानक अनुभव आया। पेशाब करने गया तो कीचड-पानी में से होकर एक पगडंडी से गुजरना पडा वहीं एक गाय बंधी हुई थी। जिसने सिंग मारने की कोशिश की, कूदकर वह बाधा पार करना पडी, तब कहीं जाकर निवृत हो पाया, आते समय भी वही क्रिया दोहराना पडी। अभी कुछ ही माह पूर्व उसी स्थान पर जाने का अवसर आया। अब परिस्थिति थोडी बदली हुई नजर आई वह मरखनी गाय तो नहीं थी किंतु शौचालयों की हालत उज्जैनवाले हालात से मिलती-जुलती ही थी।

विभिन्न स्थानों के सार्वजनिक शौचालयों एवं बस स्थानकों, रेल्वे स्टेशनों के शौचालय या रेल के डिब्बों के शौचालयों के हालात कैसे होते हैं इस संबंध में सभी जानते हैं और उनका वर्णन पिछले शौचालयों से संबंधित लेखों में मैं कर ही चूका हूं। लेकिन पराकाष्ठा तब हो गई जब विमान यात्रा के दौरान भी विमान की लैवट्‌री में कमोड को पेशाब से लबालब भरा पाया। वास्तव में यात्रा से पूर्व एअर होस्टेस यात्रियों को सीट बेल्ट बांधने आदि के बारे में अभिनय सहित बतलाती है। परंतु, लैवट्‌री के संबंध में कुछ भी नहीं बतलाती। जबकि कई यात्री वायुयान में पहली बार ही यात्रा कर रहे होते हैं और उन्हें इस संबंध में कोई जानकारी ही नहीं होती। यह सब यही दर्शाता है कि शौचालय कहीं के भी हों उन्हें हम उपेक्षित ही रखते हैं।

दूसरी बात आजकल विमान यात्रा कोई बडी बात नहीं रही और उसमें ऐसे भी कई यात्री होते हैं जिन्हें छोटी-छोटी बातें तक मालूम नहीं होती, ना ही उन्हें अंग्रेजी आती है ना ही वे विशेष पढ़े-लिखे होते हैं। वो तो विमान में इस कारण यात्रा कर रहे होते हैं क्योंकि उनके बच्चे जो उच्चशिक्षा ग्रहण कर संपन्न हो चूके हैं वे ही उन्हें हवाई यात्रा करवा रहे होते हैं। 

लेकिन अब हालात देर से ही सही किंतु, कुछ बदलेंगे ऐसा लगने लगा है। सरकारें निर्मल भारत योजना के तहत शौचालयों को प्रोत्साहन दे रही हैं, शौचालयों के संबंध में लोग जागृत हों इसके लिए विशेष अभियान भी चलाए जा रहे हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शौचालयों के महत्व को प्रतिपादित करने के लिए कह चूके हैं कि 'पहले शौचालय फिर देवालय"। वे तो यह भी कह चूके हैं कि देवालयों के निकट स्वच्छता बनी रहे इसलिए शौचालय भी बनवाए जाने चाहिएं। वरिष्ठ राजनेता लालकृष्ण आडवाणी भी अपने ब्लॉग में लिख चूके हैं कि 'आईए सारे सांसद सम्पूर्ण सैनिटेशन का अभियान चलाएं"। अब सवाल यह बच रहता है कि क्या हम सैनिटेशन के संबंध में जागरुक होंगे या चाहे जहां, हर जगह गंदगी फैलाने का यह ढ़र्रा ऐसे ही हम नहीं सुधरेंगे की तर्ज पर बदस्तूर जारी रहेगा। 

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