Wednesday, 28 May 2014

यात्रा वृतांत - आधुनिक तीर्थक्षेत्र ः 'अंदमान की सेल्यूलर जेल"

28 मई वीर सावरकर जयंती

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यात्रा वृतांत - आधुनिक तीर्थक्षेत्र ः 'अंदमान की सेल्यूलर जेल"


'वनवास" शब्द का उच्चारण करते ही जिस प्रकार से हर हिंदू के मानस में भगवान श्रीरामचंद्रजी का स्मरण हो आता है, ठीक उसी प्रकार से 'अंदमान" शब्द सुनते ही स्वातंत्र्यवीर सावरकरजी का स्मरण हो आता है। ऐसे इस अंदमान की यात्रा करने का सौभाग्य अचानक मुझे मिला इसका श्रेय माननीय राज्यसभा सदस्य (सांसद) श्री अनिल माधव दवेजी को जाता है। जिन्होंने बीते कुछ वर्षों से यह नियम सा बना रखा है कि प्रतिवर्ष कुछ लोगों को अंदमान की यात्रा पर ले जाकर वे वहां क्रांतिकारियों का महातीर्थ सेल्यूलर जेल की 'सावरकर कोठरी" (सावरकरजी ने अपने काव्य 'सप्तर्षी" में इस कोठरी का उल्लेख 'एकलकोंडी" (एकांतवासी) के रुप में किया है) के दर्शन उन्हें कराते हैं। जिससे कि यात्रीगण उन कष्टों, भीषण यंत्रणाओं के ताप की कल्पना कर सकें, जो उन्होंने वहां सहे, भोगे। उनके त्याग को महसूस कर सकें जो उन्होंने देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किए। देश को स्वतंत्रता ऐसे ही नहीं मिल गई। इसके पीछे क्रांतिकारियों का त्याग, बलिदान भी अहम्‌ था। इस सेल्यूलर जेल में अनेक क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की यंत्रणाएं सहते हुए, उनका विरोध करते हुए हौतात्म्य स्वीकारा। सावरकर ठीक ही कहते थे - क्रांतिकारियों की हड्डियों पर बसा है अंदमान।


हमारी यात्रा 26 अप्रैल को प्रातः प्रारम्भ हुई। हम कुल 9 लोग थे। 9 बजे दिल्ली विमानतल से हमने जेट एयरवेज द्वारा अंदमान के लिए प्रस्थान किया और लगभग 2 बजे दोपहर को अंदमान की राजधानी पोर्टब्लेयर के 'वीर सावरकर विमानपत्तन" पर पहुंचे। वहां से हम होटल सरोवर पोर्टिको पहुंचे जो शहर से दूर स्थित होकर सामने ही 'सी बीच" है। जहां हम हर रात को भोजनोपरांत जाकर कुछ समय तक समुद्री लहरों के उतार-चढ़ाव, उनकी गर्जनाओं को सुनते बैठे रहते। कहते हैं व्यक्ति हर चीज से कुछ समय के पश्चात ऊब जाता है, परंतु समुद्र तट पर बैठकर समुद्री लहरों की ओर देखते यदि हम घंटों बैठे रहें तो भी ऊबते नहीं। हर बार एक नएपन की अनुभूति होती रहती है।


भोजनादि से निपटने में हमें लगभग चार बज गए। चूंकि, इतनी देर बाद हम कहीं जा नहीं सकते थे अतः उस दिन शाम को समुद्र स्नान और बाद में रात्रि-भोजन के पश्चात समुद्र तट पर लहरों का आनंद लेने जा पहुंचे। उसी समय मुझे यह स्मरण हुआ कि इसी प्रकार से इंग्लैंड में एक शाम जब वीर सावरकर अपने मित्र के साथ समुद्र तट पर उदास एवं विमनस्क अवस्था में बैठे हुए थे तभी अचानक उनके मुख से 'सागरा प्राण तळमळला" इस अजरामर गीत की पंक्तियां फूट पडी। यह मान्यता है कि यदि वीर सावरकर ने अपने जीवन में इस गीत की रचना के अलावा और अन्य कोई महत्वपूर्ण कार्य ना भी किया होता तो भी इस रचना के कारण वे अमर हो गए होते। उनके विषाद का कारण था उनके अनुयायी मदनलाल धींगरा को फांसी की सजा और छोटे बंधु डॉ. नारायण सावरकर के कारावास की सूचना।


दूसरे दिन यानी दिनांक 27 को प्रातः 9 बजे हमने सेल्यूलर जेल के लिए प्रस्थान किया। जिसके लिए हम विशेष रुप से आए थे। आगे बढ़ने से पूर्व यह बता दूं कि 1947 में सरदार पटेल ने बडी दूरदर्शिता से इन द्वीपों को पाकिस्तान के अधिकार में जाने से बचाया था। उन्होंने एक जहाज को तिरंगा झंडा फहराने के लिए भेजा जिससे यह प्रमाणित हो सके कि यह भारत का क्षेत्र है। कुछ घंटों बाद वहां पाकिस्तान के जहाज देखे गए। उनकी आशंका सच निकली। भूगर्भ शास्त्रियों का कहना है कि, कभी ये द्वीप भारत की मुख्य भूमि से जुडे थे। इनका सबसे पहला उल्लेख दूसरी सदी के टोलमी ने किया है। मार्कोपोलो के यात्रा वर्णनों में भी इनका उल्लेख है। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने 'मत्स्य पुराण" और 'वायुपुराण" संदर्भ से इन्हें 'इंद्र द्वीप" और 'नाग द्वीप" नाम दिया था।


अंडमान निकोबार को सच्चे अर्थों में 'लघु भारत" कहा जा सकता है। (यह एक अन्य लेख का विषय है) यहां प्रायः सभी राज्यों, धार्मिक परंपराओं, रीतिरिवाजों और भाषाओं के लोग बडे सौहार्द से रहते हैं। यहां न तो सांप्रदायिकता है ना ही धार्मिक संकीर्णता। इसका कारण है देश के विभिन्न अंचलों के लोग जो जेलों में बंद थे बाद में कैदी बस्तियों में रहने लगे उनके बीच विवाह संबंध हो गए। एक नए समाज का जन्म हुआ जिन्हें अंगे्रजों ने लोकल (भूमिपुत्र) नाम दिया। यहां की संपर्क भाषा हिंदी है। यहां की हिंदी का स्वाभाविक प्रचलन भले ही टूटा-फूटा हो परंतु, भारत की मुख्य भूमि के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करता है जहां आज भी हिंदी को स्वीकारने में न नुच की जाती है।


भारत प्रायद्वीप के पूर्व में गंगा-सागर (बंगाल की खाडी) में कोलकाता से 1255 कि.मी. और चेन्नई से 1190 कि.मी. की दूरी पर छोेटे-बडे 554 द्वीपों का पन्ने सा चमचमाता द्वीप-पुंज है 'अंदमान-निकोबार"। मुख्य भूमि से अतिदूर, निर्जन, उपेक्षित इस प्रदेश से आधुनिक विश्व तब परिचिय हुआ, जब ब्रिटिश शासकों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के लिए एक सुरक्षित कारागार के रुप में सेल्यूलर जेल की स्थापना 10 मार्च 1858 को जब आगरा (उत्तरप्रदेश) का कुख्यात कारा अधीक्षक डॉ. जेम्स पेटीशन वाकर 500 भारतीय स्वाधीनता सेनानियों (बंदियों) को लेकर इस बीयाबान पर उतरा। बंदियों को दहशत में रखने तथा किसी प्रकार पलायन के अवसर शून्य होने के कारण साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासकों ने सेल्यूलर जेल के फैलाव की सतत कोशिशें की। वीर बलिदानियों के जत्थे यहां सतत आते रहे। इसी क्रम में लंदन में बेरिस्टरी को निमित्त बनाकर परंतु स्वाधीनता संघर्ष के मंतव्य से पहुंचनेवाले इस वीर को अंग्रेजों ने 4 जुलाई 1911 को अंदमान के कारावास में पहुंचा दिया। यहीं पर अंदमान का राष्ट्रीय दृष्टि में एक उज्जवल रुप सावरकरजी के मनमस्तिष्क में उभर कर मानो साकार हुआ उसका वर्णन सावरकरजी की आत्मकथा 'आजन्म कारावास" में शब्दबद्ध है।


इस कारागार का निर्माण कार्य 1896 से 1906 तक चला। इस कारागार में सौ-सौ कोठरियों की तीन मंजिला इमारतों की सात पंक्तियों का समूह है। इसका आकार एक तारे के समान है। इसका निर्माण बडी ही होशियारी से किया गया है। सारी इमारतें एक मध्यवर्ती टॉवर से जोडी हुई हैं। इनमें से एक इमारत का आगे का भाग और दूसरी इमारत का पीछे का भाग एकदूसरे के सामने हैं। इस कारण कैदी एक दूसरे को देख नहीं पाते थे। इसी कारण पहले सावरकरजी को पता ही नहीं चला कि उनके बडे भाई गणेश दामोदर सावरकर (बाबाराव सावरकर) भी यहां सजा काट रहे हैं। एक दिन अचानक वे उनके सामने आ गए और वे अवाक्‌ रह गए। सबसे छोटा भाई भी एक बमकांड में गिरफ्तार होकर जेल में था। इस प्रकार तीनों भाई कारावास में थे ऐसा उदाहरण दूसरा कोई नहीं मिलता। वर्तमान में मात्र तीन इमारतें ही शेष बची हैं। बाकी की चार इमारतें 1942 के जापानी हमले में ध्वस्त हो गई। वर्तमान में वहां एक हॉस्पिटल है।


स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान की स्मृति और सम्मान में 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. मोरारजी देसाई ने सेल्यूलर जेल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया। ऐसे इस जेल के परिसर में हम एक भव्य प्रवेश द्वार से प्रविष्ट हुए। अंदर दीवारों पर जेल की ऐतिहासिक जानकारी दी गई है। हमें गाईड की कोई आवश्यकता ही नहीं थी क्योंकि, हमारे साथ श्रीअनिलजी जो थे जो प्रतिवर्ष यहां आते ही हैं। यहां एक छोटासा संग्रहालय है जो बलिदानियों की स्मृतियों को आनेवालों के मस्तिष्क में ताजा कर देता है।

संग्रहालय से बाहर आने पर एक खुले परिसर में हम आते हैं जहां सामने ही एक बडा पीपल का पेड है जो सेल्यूलर जेल के निर्माण के पूर्व से ही है। कुछ समय पूर्व यह गिर गया था, परंतु सरकार ने दस लाख रुपये खर्च कर इसे पुनर्जीवित कर दिया। वीर सावरकर सहित कई स्वतंत्रता के सेनानियों के हौतात्म्य का यह साक्षी है। बांई ओर एक बडे चबूतरे पर हुतात्माओं की स्मृतियों को जागृत रखनेवाला एक स्मारक स्तंभ है। उसके निकट ही पवित्र क्रांतिज्वाला स्थापित है से वीर सावरकर के उद्‌गारों को दुराग्रहपूर्वक तत्कालीन मंत्री मणिशंकर अय्यर ने कुछ वर्ष पूर्व मिटा दिया था। उन पंक्तियों का भावार्थ इस प्रकार से है -

'हमने (देशभक्ति का) यह व्रत नासमझी से नहीं, तो हमारे स्वभावानुसार इतिहास के प्रकाश में सोच समझ कर लिया है। जो निश्चय ही दिव्य दाहक है, ऐसा यह असिधाराव्रत हमने परस्पर अपनाया है।" इन पंक्तियों में अनुचित कुछ भी नहीं परंतु राजनीति की माया देखिए कि इन्हें भी मिटा दिया गया।


हम आगे बढ़े और पहले जेल के मध्य स्थित टॉवर जिससे सातों इमारतों में जाने का मार्ग था में आए। इस टॉवर में बैठकर एक ही कर्मचारी सभी इमारतों के कैदियों पर नजर रख सकता था। क्योंकि, कैदी आखिर भागकर जाता भी तो कहां? चारों ओर घना जंगल और समुद्र के सिवा कुछ ना था। (वैसे यहां भी एक अपवाद है और वह एक कैदी था दूधनाथ तिवारी जिसके बारे में जानकारी किसी ओर लेख द्वारा दूंगा) इस टॉवर की दीवारों पर प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों के नाम उकेरे हुए हैं। हम सब लोग एक असीम इच्छा से उस कोठरी क्रमांक 123 जो तीसरी मंजिल पर स्थित है की ओर दर्शन की अभिलाषा से बढ़े जहां वीर सावरकर को दोहरा आजन्म कारावास (50 वर्ष) भुगतने के लिए रखा गया था। जब देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्रप्रसाद यहां आए थे तो प्रतिकात्मक स्मारक कोठरी न. 42 में बनाया गया था। मन में यह जानने की उत्सुकता थी कि, कैसी होगी वह कोठरी? उस कोठरी की दीवारों पर 'कमला काव्य" की पंक्तियां क्या अद्याप भी हैं? दिल की धडकनें बढ़ने लगी। कोठरी को दो दरवाजे और दो ताले थे जिनकी रचना एकदम अलग थी। सावरकर डेंजरस कैदी जो थे, उनके गले में 'डी-डेंजरस" का बिल्ला भी लटका रहता था।


उस स्वातंत्र्य वीर के मंदिर रुपी गर्भगृह की दीवार पर सावरकरजी का कैदी के रुप में छायाचित्र लगा है। उस पर अमर काव्य 'कमला" की दो पंक्तियां उद्‌धृत हैं। लेकिन दीवारों पर कोई पंक्ति अब नजर नहीं आती, दीवारें बिल्कूल सामान्य दीवारों की तरह ही हैं। कमरे में दो तसले रखे हुए थे जिनमें से एक सावरकरजी भोजन के लिए और दूसरा शौच के लिए उपयोग में लाते थे। जब उन्हें आंव हुई थी तब उन्होंने दोनो ही तसलों का उपयोग शौच के लिए किया था, परंतु उन्हें कोई अन्य सुविधा नहीं दी गई। अमानवीय घोर यंत्रणाओं की यह पराकाष्ठा है। सन्‌ 1943 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने इस जेल को भेंट दी थी। यहां हम कुछ देर स्तब्ध से खडे रहे फिर कुछ समय तक हम शांत बैठे रहे। कुछ ही देर में हम पसीने से भीग गए।


नीचे उतरकर हम फांसीघर की ओर बढ़े जो वीर सावरकर की कोठरी के सामने होकर सहज ही नजर आती है। यहां एक साथ तीन लोगों को फांसी पर चढ़ाया जाता था। निकट ही फांसी पूर्व स्नान और अंतिम क्रिया की व्यवस्था थी । वीर सावरकर का नैतिक बल और धैर्य को समाप्त करने तथा कैदियों का आक्रोश उनके कानों पर पडे इस उद्देश्य से उनकी कोठरी जानबूझकर फांसीघर के निकट रखी गई थी। परंतु, वे दृढ़ इच्छा शक्ति के स्वामी थे उन्होंने इन अत्याचारों को भी सह लिया और अपनी काव्य प्रतिभा को मरने नहीं दिया उसीका फल था उनका महाकाव्य 'कमला" जिसकी दस हजार पंक्तियां जो उन्होंने नाखुनों और खिलों से दीवारों पर उकेरी थी। जेल की भव्यता देख कोई भी चकित हो सकता है। जेल परिसर में ही एक पत्रे का शेड है। इस कार्यशाला में तेल की घानी घूमाकर कैदियों से तेल निकलवाया जाता था। नारियल के रेशों को कूटकर रस्सी गूंथवाई जाती थी। शेड में पुराना 'कोल्हू" रखा हुआ है इसी प्रकार से नारियल के रेशों से रस्सी बनाने का यंत्र भी यहां है।


शाम को हम फिर यहां 'लाइट एंड साउंड" कार्यक्रम देखने के लिए आए। उसमें क्रुर जेलर बारी द्वारा कैदियों को दी गई भयानक यातनाओं का वर्णन सुना। यह पूरा कार्यक्रम उसी पीपल के पेड और सर्वसाक्षी सूर्य को रखकर बनाया गया है जिसका उल्लेख हम पूर्व में ही कर चूके हैं। लेकिन इस कार्यक्रम में खलनेवाली बात यह है कि वीर सावरकर को उतना महत्व जिनके कारण ही अंदमान को पहचाना जाता है नहीं दिया गया है जितना की दिया जाना चाहिए था। इसमें संशोधन की आवश्यकता है। हमारा अंदमान आने का उद्देश्य पूर्ण हो चूका था। इसके बाद हम एक दिन और रुके हमारे साथ के कुछ ने नार्थ बे द्वीप पर जाकर स्कूबा डायविंग का आनंद उठाया और 29 तारीख को हमने वापसी की यात्रा प्रारंभ की। हम भले ही अधिक नहीं घूमे परंतु पर्यटकों के लिए यहां बहुत कुछ है परंतु लेख की भी सीमा है इसलिए मैं यहीं विराम देता हूं। 

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