Friday, 2 May 2014

ब्राह्म - क्षात्र तेज के प्रतीक अवतार परशुराम

ब्राह्म - क्षात्र तेज के प्रतीक अवतार परशुराम


ऋगवेद से लेकर पुराणों तक में अनेकानेक ऋषियों के वर्णन प्राप्त होते हैं जो ज्ञान, कठोर साधना तथा वीरता के साथ ही मानवता के उद्धारकर्ता के रुप में अवतरित हुए थे। इसी ऋषि परंपरा में मंत्रदृष्टा भृगु ऋषि भी हुए जो दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ के भंगकर्ता भगवान शिव का सामना कर पाए थे। इंद्र पदासीन नहुष के अहंकार का दमन करनेवाले भृगु की वंशबेल के ऋषि जमदग्नि के अद्वितीय पुष्प थे भगवान परशुराम। जिनकी माता रेणुका इक्ष्वाकु वंश की राजपुत्री थी। माता-पिता ने उन्हें नाम दिया था 'राम", परंतु परमगुरु मंगलकारी शिवशंकर का कृपा-प्रसाद के रुप में प्राप्त परशु मिलने के पश्चात वे कहलाए 'परशुराम"। 


परशुराम भगवान विष्णु का छठा अवतार हैं। इनके पहले मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह और फिर वामन अवतार हुए हैं यानी कि जलजीव से विष्णु ने अवतार लेना प्रारंभ कर प्रगति करते हुए अपूर्णावस्थावाले छोटे वामन से पूर्णावस्थावाले मानव अवतार तक के गंतव्य तक पहुंचे।


क्षत्रियों से हुए संग्राम के पश्चात प्राप्त भूमि ऋषि कश्यप को दान देने और दान की हुई वास्तु का स्वयं उपभोग नहीं लेना चाहिए इसलिए सागर से नवभूप्रदेश प्राप्त कर वे वहां निवास के लिए गए। नवभूप्रदेश की निर्मिति यह उनके अवतार कार्य की एक विशिष्टता है। परशुराम ने दाशरथी भगवान राम से भेंटकर अपना क्षात्र तेज राघव राम में निष्क्रांत किया था। इन दोनो रामों की भेंट का रहस्य है पूर्णत्व द्वारा परिपूर्णत्व पाना। अब जयपराजय बची ही कहां? परशु के बिना राम कहां पूर्ण हुए और परशुराम के बिना दाशरथी राम भी पूरे नहीं होते।


परशुराम न केवल अपरान्त (कोंकण, पश्चिमी सीमांत) के निर्माता हैं अपितु स्वयं द्वारा निर्मित भूमि में आमंत्रित जातियों के प्रस्थापनकर्ता भी हैं। ब्राह्म और क्षात्रवृत्ती का संतुलन साधते हुए एक आदर्श समाजधारण इस नवप्रदेश में स्थापित किया। उनका यह संस्कृति पालन-पोषण का कार्य विष्णु के दशावतारों में सर्वश्रेष्ठ है। मातृहत्या के एकमेव उदाहरण के रुप में जिनकी ओर ऊंगली उठाई जाती है, वही परशुराम मातृसावर्ण्य माननेवाले केरल के परमश्रेष्ठ देवता हैं। वहां के समाज की निर्मिती परशुराम शासित होकर आज भी वहां परशुराम शक चल रहा है। सम्पूर्ण भारत के समुद्रतट से लगे प्रदेशों में परशुराम की कथा कही और सुनी जाती है। इस कारण सम्पूर्ण भारत में परशुराम क्षेत्र हैं। उडिसा, आसाम, गुजरात और पंजाब में भी परशुराम क्षेत्र हैं।


अपरान्त में विभिन्न प्रदेशों से देवताओं को लाकर उनकी स्थापना परशुरामजी ने की ही, परंतु इसके सिवाय 14 स्थानों पर पाशुपतास्त्र की सहायता से स्वयंभू ज्योतिलिंगों का निर्माण किया। इनमें से एक वालुकेश्वर महादेव की महिमा बडी न्यारी है पापक्षालन और पुनर्जन्म से मुक्ति हो इसलिए भक्तों के झुंड के झुंड इस स्थान पर आते हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज से लेकर कान्होजी आंगे्र और राघोबा पेशवा जैसे इतिहास प्रसिद्ध व्यक्ति इस यात्रा में सम्मिलित हो चूके हैं के संदर्भ गॅजेटियर में मिलते हैं।


परशुराम को धनस्य देवता के रुप में भी संबोधित किया जाता है, ऐसे परशुराम का अद्‌भुत मंदिर चिपलूण जो कोंकणस्थों का आद्य जन्मस्थान कहा जाता है के निकट स्थित है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि मंदिर हिंदुओं का, पैसा मुसलमानों का और निर्माणकर्ता हैं ईसाई। इस प्रकार से यह एकात्मता का प्रतीक है। इस मंदिर की एक विशेषता और है - लगभग 600 से भी अधिक वर्ष पूर्व जहां वर्तमान मंदिर स्थित है उस स्वयंभू स्थान पर गाय अपना पेन्हाना छोडती थी इस प्रकार से इस देव-स्थान का पता लगा। एक कुनबी (एक कृषिजीवी अब्राह्मण जाति) उस स्थान पर सेवा करता था। आज भी उस परिवार के वंशज को मंदिर में सम्मान का पहला अधिकार है।


पेढ़े-परशुराम गांव से लगभग आधा कि.मी. दूर सौ मीटर गहराई में उतरने पर परशुराम मंदिर नजर आता है। उतरने के लिए जो पत्थर की पाख बनी हुई है वह शिवाजी महाराज के जमाने में सुबेदार चंद्रराव मोरे ने निर्मित की थी। यदि यह पाख ना होती तो नीचे उतरना बडा ही कठिन होता। प्रवेशद्वार देखकर कोई भी नवागंतुक चौंक जाएगा। क्योंकि, वह दरवाजा मुस्लिम पद्धति से बना हुआ है। मुस्लिम पद्धति की कमान, ऊपर चारों कोनों पर छोटे-छोटे मुस्लिम पद्धति के मिनॅरेट्‌स हैं। प्लास्टर किया हुआ है और उसे मुस्लिम पद्धति से सफेद चूना पोता हुआ है। हिंदू पहचान के रुप में काले पत्थरों की ऊंची दीपमाला दांई ओर प्रवेश-कमान से जुडी हुई है। बांई ओर सफेदा की हुई प्लास्टर वाली ऊंची दीवार है। 


मस्जिद के प्रवेश द्वार जैसी दिखनेवाली कमान से चार-पांच सीढ़ियां उतरने के पश्चात सामने एक तालाब नजर आता है। बाकी रचना मंदिर जैसी ही है चारों ओर ऊंची-ऊंची दीवारें, खुला स्थान और अन्य मंदिरों में पेढ़े परशुराम गांव की ग्राम देवता श्रीधावजी और जाखड माता मंदिर, दत्त मंदिर, जीवित झरना, हरेभरे घने जंगल में पर्वतेश्वर मंदिर, रामजी की चरण पादुका, दुर्लभ कामधेनु मंदिर आदि निकट ही हैं। राम पादुका की स्थापना पेशवाओं के गुरु ब्रह्मेंद्रस्वामी ने दुष्ट प्रवृत्तियों की रोकथाम के लिए की थी। उस समय जंजीरा के सिद्दी ने इस स्थान को हानि पहुंचाने के असफल प्रयास किए थेे।


मंदिर के सामने के मंडप से होकर जब मंदिर में प्रवेश करते हैं तो फिर से ठिठकना पडता है। क्योंकि, मंदिर का वह भाग एक बडे लंबे-चौडे कमरे के रुप में है। पत्थरों से निर्मित और मुस्लिम पद्धति की कमान वाली साथ ही सारी दीवारों को सफेदी पोती हुई और उस पर नीले रंग से निकाली हुई बेल-बुटी यानी सब कुछ मुस्लिम पद्धति का। हिंदुओं का कैसे कहें ऐसे हालात, अंदर न तो खोदा या कुरेदा हुआ काम, न तो कोई मनुष्याकृति ना ही कोई पशु-पक्षी कुरेदे हुए। बस प्रवेश करते ही सामने की दीवार पर एक भवन नीले रंग में चित्रित वह भी ग्रीक या रोमन लगे ऐसा। छत का गुंबद यूरोपीयन पद्धति का। 


गर्भगृह में तीन मूर्तियां हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश (काम, परशुराम, काल) की गहरे काले रंग की अत्यंत सुंदर-सुडौल। काम यानी वासना (इच्छा देवता), परशुराम यानी निरीच्छ होकर इस स्थान पर निवास कर रहे हैं। इसलिए काम और काल प्रतीक के रुप में स्थापित किए गए हैं। तीनों मूर्तियां चतुर्भुज हैं। पहली मूर्ति ब्रह्मा यानी काम के दो हाथों में दंड, कमंडल होकर दो वरद हस्त हैं। बीचवाली मूर्ति विष्णु अवतार परशुराम की होकर दायां हाथ अभय हस्त है। बाकी बचे तीन हाथों में बाण, धनुष्य और परशु हैं। तीसरी मूर्ति शंकर भगवान की होकर दो हाथ वरद हस्त तो दो हाथों में परशु और मृग (हरिण) हैं। 


उनके आसपास उत्तम लकडी का कुरेदा हुआ मंडप। इन सबको छोड दिया जाए तो सबकुछ जैसेकि नीले रंग की बेल बुटी, खोदा हुआ काम न होना, सफेद चूना पुता होना आदि। मुस्लिम पद्धति का होने के कारण कोई यह भी सोच सकता है कि, कहीं मस्जिद को तोडकर तो मंदिर नहीं बना दिया गया। परंतु, हिंदू परंपरा-इतिहास को देखते हुए यह तो असंभव ही है। तो, इसका कारण आखिर क्या है? तो, इसका कारण है - जंजीरा के राज्यकर्ता सिद्दी हब्शी ने इस मंदिर का निर्माण किया है तो स्वाभाविक ही है कि मुस्लिम पद्धति नजर आएगी ही।


चौदहवीं शताब्दी में परशुरामजी को माननेवाले बीजापुर की आदिलशाही के मुस्लिम राज्यकर्ता की सहायता से इस मंदिर का निर्माण हुआ। इसके तीनसौ वर्ष पश्चात ब्रह्मेंद्रस्वामी ने इस स्थान को अपना निवास बनाया। उस समय जंजीरा के हब्शी सिद्दी का दामाद और लडकी समुद्र यात्रा पर थे उसी दौरान उनका जहाज गायब हो गया। हब्शी सिद्दी ब्रह्मेंद्रस्वामी की शरण में आया। स्वामी ने कहा इस मंदिर का जीर्णोद्धार कर, बेटी-दामाद वापिस आ जाएंगे। सिद्दी राजी हो गया। लडकी और दामाद के सकुशल लौट आने पर जंजीरा के सिद्दी ने अपने पैसे से इच्छानुसार इस मंदिर का निर्माण किया इसलिए इस मंदिर में मुस्लिम पद्धति दृष्टिगोचर होती है। 


यूरोपीयन पद्धति के गुंबज का कारण उस समय निर्माण कार्य करनेवाले सभी कारीगर ईसाई थे और पुर्तगालियों के लिए निर्माण कार्य करते-करते वे यूरोपीयन पद्धति सीख गए थे। मंदिर के सामने स्थित पहाडी को ईसाइयों का पठार कहते हैं। इस प्रकार से यह अनोखा परशुराम मंदिर हिंदू-मुस्लिम-ईसाई तीन धर्मियों के आपसी समन्वय-मेल के रुप में मंदिर-मस्जिद-चर्च तीनो के ही स्थापत्यकला के सौन्दर्य एकत्रित रुप को दर्शानेवाला तीर्थस्थल है। इस देवस्थान का प्रमुख उत्सव (अक्षय तृतीया) परशुराम जयंती है। जो तीन दिन तक मनाया जाता है जिसमें श्रद्धालुजन जागृत स्थान होने के कारण भाग लेने आते हैं, मनौतियां मानते हैं और मनौती पूर्ण होने पर मन्नत उतारने फिर से आते हैं।


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