Wednesday, 9 April 2014

कमल - भारतीय संस्कृति का प्रतीक

कमल - भारतीय संस्कृति का प्रतीक

कमल के फूल और भारतीय संस्कृति में बहुत साम्य है। वैदिक वाड्‌मय कमल का गुणगान करते हैं। भारतीय संस्कृति प्रकाशोपासक है। हमारी संस्कृति की आरती है - 'तमसो मा ज्योतिर्गमय" और कमल का मुंह अनंत प्रकाश और ऊर्जा के स्त्रोत सूर्य की ओर ही रहता है। प्रकाश को देखते ही वह फूल उठता है और प्रकाश के समाप्त होते ही वह बंद हो जाता है। प्रकाश मानो कमल का प्राण है। कमल शतपत्र है, सहस्त्र पत्र है। भारतीय संस्कृति भी तो शत-सहस्त्र पंखुडियोंवाली है। अनेकानेक जातियां, वंश, धर्म-पंथ, सभी को स्वीकारते हुए, सभीका सार ग्रहण करते हुए नीत नई पंखुडी जोडते हुए वह अविरत बढ़ रही है। भारतीय संस्कृति का कमल अभी भी पूरी तरह से खिला नहीं है, वह अभी खिल रहा है। अनन्त काल तक वह फूलता रहेगा। भारतीय संस्कृति अनन्त पंखुडियों का पुष्प बनेगी। क्योंकि, पृथ्वी अनन्त है, काल अनन्त है, ज्ञान अनन्त है। 

खिले हुए कमल पुष्प को देखकर गुनगुनाते हुए सैंकडों भ्रमर आते हैं, लेकिन कमल उनकी ओर ध्यान नहीं देता। भारतीय संस्कृति स्वयं के गीत गाते नहीं बैठती, हां संसार अवश्य उसकी प्रशंसा के गीत गाता है। हमारी भारतीय संस्कृति बिना किसी कोलाहल के शांति से पल्लवित-पुष्पित होती रही है, होती रहेगी। भगवान कृष्ण ने भी तो गीता में कमल को आदर्श मान जीने का उपदेश दिया है। संसार को ही गीता की स्तुती करने दीजिए, युद्ध की महिमा गाने दीजिए। हमारे तपस्वी-ऋषियों को महर्षि कहने दीजिए। परन्तु, हमें तो हमारी भारतीय संस्कृति के अनुसार निरंतर कर्मरत रहना है, निन्दा-स्तुती को छोड अपने ध्येय के साथ एकाकार होना है। यदि हम स्वकर्म में इतने तल्लीन हो जाएंगे तो, अपनेआप संसार हमारी प्रशंसा के गीत गाएगा।

मनुष्य परिस्थितियों के अधीन अवश्य है परंतु इससे निराश होने की आवश्यकता नहीं संयोगवश मनुष्य का जन्म बुरी परिस्थितियों, बुरे वातावरण में भी हुआ हो तो भी यदि मनुष्य स्वयं का ध्येय और दृष्टि उच्चरख प्रयत्न करे तो मांगल्य की ओर अग्रसर हो सकता है। यह है हमारी भारतीय संस्कृति की धारणा। कमल का फूल हमारे सामने यही आदर्श कीचड में खडे रहकर भी सूर्य की ओर दृष्टि लगाए रखता है, परिस्थितियों से निरपेक्ष रहकर जीने का आदर्श प्रस्तुत करता है।

कमल भारतीय संस्कृति का प्रधान प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में कमल की सुगन्ध व्याप्त है। महान पुुरुषों के सारे अवयवों को हम कमल की ही उपमा देते हैं- कमलनयन, कमलवदन, करकमल, चरणकमल, ह्रदयकमल। विष्णु की नाभी से निकली नाल से कमल से सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी का जन्म हुआ देवी लक्ष्मी भी कमलजा ही हैं। चतुर्भुज विष्णु के एक हाथ में कमल है। देवी दुर्गा को भी कमल पुष्प प्रिय है। सभी मंदिरों में कमल पुष्प के चित्र पाए जाते हैं। बौद्ध और जैन धर्म में भी कमल को सांस्कृतिक महत्व प्राप्त है। भगवान बुद्ध भी कमलासीन हैं। कमल हमारे देश का राष्ट्रीय पुष्प होकर पूजा और श्रृंगार में इसको महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

 योगशास्त्र में मूलाधार, मणिपुर आदि जो षष्ट चक्र दर्शाए गए हैं वे कमलाकार ही हैं। कमल के फूल को आयुर्वैदिक और एलोपैथिक औषधियों में प्रयोग में लाया जाता है। इसके बीजों को भूनकर मखाने बनाए जाते हैं। कमल का मधु (शहद) अत्यंत लाभकारी होता है। फूल ठंडे और स्तंभक होकर अतिसार और विषूचिका (हैजा), ज्वर और यकृत (लीवर) रोगों में उपयुक्त और ह्रदय के लिए बलवर्धक हैं। बीज उल्टियों की रोकथाम तथा चर्मरोगों में ठंडक के लिए उपयोगी। आमांश, अग्निमांद्य और बवासीर में जडों का चूर्ण लाभकारी होता है।

कमल में अलिप्तता है। वह बुराई से अच्छाई ग्रहण करने का प्रतीक है। कीचड में रहकर भी रमणीयता ग्रहण करता है। पानी और कीचड में रहकर भी पानी और कीचड के ऊपर रहता है। कमल अनासक्त है। कमल हमें सीखाता है - अनासक्त रहो। प्रकाश की उपासना करो। अमंगल से मंगल ग्रहण करो। तपस्या करना सीखो। सत्कर्म करो। नई-नई बातें ग्रहण करते रहो। यदि कोई पूछे कि भारतीय संस्कृति का अर्थ क्या है, तो उत्तर होगा 'कमल"। 

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