Wednesday, 23 April 2014

प्रथम विश्व युद्ध की भीषण त्रासदी - रासायनिक हथियार

प्रथम विश्व युद्ध की भीषण त्रासदी - रासायनिक हथियार

प्रथम विश्वयुद्ध 1 अगस्त 1914 को प्रारंभ होकर 11 नवंबर 1918 को समाप्त हुआ। (28 जुलाई को सर्वप्रथम ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध शुरु किया था।) यह युद्ध ब्रिटेन की अगुवाई में मित्र राष्ट्रों (फ्रांस, रशियन साम्राज्य, इटली, अमेरिका के संयुक्त संस्थान) और आस्ट्रिया-हंगरी-प्रशिया (वर्तमान जर्मनी) बल्गेरिया और उस्मानी साम्राज्य (तुर्की) के बीच हुआ था। इसमें मित्र राष्ट्र विजयी हुए थे। इस वर्ष इस विश्वयुद्ध के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस संदर्भ में ब्रिटेन में हुए एक सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि वहां की वर्तमान पीढ़ी को इस युद्ध के संबंध में कोई विशेष जानकारी नहीं है। 

हमारे यहां भी हालात कुछ इससे अलग नहीं जबकि भारत ने ब्रिटिश उपनिवेश के रुप में इस विश्वयुद्ध में भाग लिया था और हमारे भारतीय सैनिक भी इस विश्वयुद्ध में शामिल हुए थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के संबंध में जरुर कुछ जानकारी हमारे यहां के लोगों के है क्योंकि इस दौरान भारत की स्वतंत्रता की लडाई चरम की ओर बढ़ रही थी। इस युद्ध मे भी भारत ने ब्रिटिश उपनिवेश के रुप में भाग लिया था। इन विश्वयुद्धों का हमसे संबंधित एक और मुद्दा है- गांधीजी ने प्रथम विश्वयुद्ध के समय भारतीय ब्रिटिश सेना में भर्ती हों को प्रोत्साहन दिया था और एक अभियान सा छेड दिया जबकि दूसरे विश्वयुद्ध के समय उन्होंने भारतीयों के सेना में प्रवेश का विरोध किया था। जबकि वीर सावरकर ने भारतीयों के सेना में प्रवेश का आवाहन कर सैनिकीकरण का नारा दिया था। 

इस प्रथम विश्वयुद्ध का सबसे नृशंस अमानवीय पहलू यह है कि इस युद्ध में रसायनों का हथियार के रुप में किया गया प्रयोग जिसके कारण हजारों लोग बहुत बुरी तरह मारे गए थे। बडी-बडी कंपनियां जैसेकि बायर, हेक्सट आदि तक इस रासायनिक युद्ध में संलग्न थी। ये जर्मन कंपनियां थी और इनके कुछ रसायनज्ञ तो जर्मन सरकार के युद्ध सलाहकार के रुप में भी कार्य करते थे। परंतु, इसका मतलब यह नहीं कि रासायनिक हथियारों का विश्वयुद्ध में प्रयोग सबसे पहले जर्मनों ने किया था। सबसे पहला प्रयोग फ्रांस ने अगस्त 1914 में जर्मनी के विरुद्ध इथाइल ब्रोमोएसिटेट के बम फेंक कर किया था। यह शस्त्र कोई विशेष घातक नहीं था इससे शत्रुपक्ष को केवल छींकें आती थी और वह हैरान हो बंदूकों से निशाना साध नहीं पाता था बस। इस कारण इसकी कोई विशेष  दखल युद्ध इतिहास में ली नहीं गई। 

जिस आंसू गैस का उपयोग दंगाइयों के विरुद्ध करते हुए हम पुलिस को देखते हैं उसका सबसे पहला प्रयोग हथियार के रुप में 31 जनवरी 1915 को जर्मनी ने रशिया के विरुद्ध किया था परंतु यह प्रयोग प्रभावी ना रहा। आपको आश्चर्य होगा कि इस अमानवीय कृत्य को बढ़ावा देने में उद्योगपति भी सक्रिय थे और उनका साथ दे रहे थे यहूदी मूल के नोबल पुरस्कार प्राप्त फ्रिट्‌ज हेबर। जिनकी यहूदी जाति के लाखों लोगों को हिटलर ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान गैस चैम्बर में ढ़केलकर बहुत बुरी मौत मारा था। और सबसे बडे आश्चर्य की बात यह है कि इस हेबर को जिसको जर्मनी के राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया था उसीको आगे चलकर हिटलर ने 1934 में यहूदी होने के कारण जर्मनी से भगा दिया। इसी हेबर ने अपने घातक हथियार के रुप में क्लोरिन का उपयोग करना तय किया और 22 अप्रैल 1915 को बेल्जियम के एप्रेस नामक स्थान पर शाम को मित्र राष्ट्रों की फौज के विरुद्ध यह गैस छोडी गई। पहले तो कुछ अजीब सी गंध महसूस हुई। सैनिक कुछ समझते इसके पूर्व ही हरे-पीले बादल उनके सिरों पर मंडराने लगे उनका सांस लेना दुभर हो गया, ऐसा लगने लगा मानो उनका गला कोई घोंट रहा है। जानलेवा खांसी के साथ खून आने लगा और मुंह से झाग निकलने लगा और देखते ही देखते हजारों सैनिक काल के गाल में समा गए। 

इस रासायनिक युद्ध के विरुद्ध ब्रिटेन चुप ना रहा जनाक्रोश रोकने के लिए पहले तो उसने बचाव के लिए मुखौटे तैयार किए परंतु यह निरुपयोगी नजर आने पर उसने बडी संख्या में रसायनज्ञों को भर्ती करना शुरु किया। क्लोरिन का निर्माण किया गया और बेल्जियम स्थित जर्मनों पर इस क्लोरिन से हमला करना तय किया। परंतु, प्रकृति ने साथ नहीं दिया हवा उल्टी दिशा में बहने से गैस जर्मनों को हानि पहुंचाने के स्थान पर ब्रिटिश सैनिकों पर ही कहर ढ़ाने लगी, जर्मनों के यह बात ध्यान में आते ही उन्होंने गोलाबारी प्रारंभ कर दी और दोहरी हानि उठा ब्रिटिश सेना को पीछे हटना पडा। मित्र राष्ट्रों ने भी ईंट का जवाब पत्थर से देना तय कर रासायनिक हथियार तैयार करने की प्रयोगशालाएं खडी करना और वहां प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया। इस प्रयोग में इतने मनुष्यों को हानि पहुंची, दुष्परिणाम भोगने पडे कि, सेना के अधिकारियों में ही क्रोध निर्मित होने लगा साथ ही प्रयोग के लिए मनुष्य भी मिलना दुश्वार हो गया। अंततः कुत्ता, बिल्ली आदि जो मिले उस जानवर पर प्रयोग किए गए। यह बात अलग है कि न चाहते हुए भी इन जानवरों को इकट्ठा करने का काम जरुर कुछ लोगों को मिल गया। 
इसी दौरान जर्मनी जिसका की रसायन उद्योग पर एक प्रकार से एकाधिकार सा ही था ने फॉस्जेन जैसा घातक रासायनिक हथियार तैयार कर लिया। 19 दिसंबर 1915 को इसका प्रयोग मित्र राष्ट्रों पर किया गया। क्लोरिन को तो गंध होती है परंतु, फॉस्जेन तो गंधरहित होकर क्लोरिन से कई गुना घातक भी था। इसको सूंघते ही कुछ ही क्षणों में गले में खराश, आँखों में जलन होने लगती है कुछ घंटों के बाद पीडित मनुष्य के फेंफडों में पानी भरने लगता है और इसके बाद उसके लिए थोडी सी भी हलचल नामुमकिन हो जाती है, ब्लडप्रेशर बढ़ जाता है, नाडी व दिल तेज गति से धडकने लगते हैं और प्राण निकल जाते हैं।

मित्र राष्ट्र भी पीछे न रहे उन्होंने भी फॉस्जेन का निर्माण कर लिया एवं उसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिए उसमें क्लोरिन को मिला दिया। और 16 जून 1916 में इस का उपयोग जर्मनों के विरुद्ध एक घातक हथियार के रुप में सोम की लडाई में किया। यह हथियार इतना घातक सिद्ध हुआ कि प्रभावित क्षेत्र के मनुष्य तो मनुष्य पशु-पक्षी, कीडे-मकोडे तक मर गए। यहां तक कि झाडियां तक जल गई। इसकी घातकता को देख सैनिक तो क्या नागरिकों तक के दिलों में दहशत बैठ गई। लेकिन सेनाधिकारी इसके बगैर चारा नहीं यही तर्क प्रस्तुत करते रहे। कई टन फॉस्जेन मित्र राष्ट्रों ने उपयोग में लाया। 

जर्मनों की मगरुरी दूर करने के लिए ब्रिटेन ने लिव्हन्स प्रोजेक्टर नामका एक अत्यंत सस्ता यंत्र बनाया जिसकी कीमत उस जमाने में मात्र 16 शिलिंग थी। जिसके माध्यम से फॉस्जेन गैस के बम जर्मनों पर अप्रैल 1917 से लेकर युद्ध समाप्त होने तक लगातार बरसाए गए। यह इतने संहारक थे कि देखते ही देखते गांव के गांव साफ हो गए। कभी - कभी तो मात्र दहशत फैलाने के लिए गैस के स्थान पर इन बमों में भयंकर बदबूदार बोन ऑइल या एमाइल एसिटेट भरकर फैंके जाते थे। जर्मन डर के मारे इधर-उधर भागते फिरते। उपर्युक्त प्रकार के गैस के बम करोडों की संख्या में जर्मनों पर फैंके गए।

जब मित्र राष्ट्रों ने सारी नैतिकता, नियम त्याग दिए तो जर्मन भी भला क्यों पीछे रहते जर्मनों ने इससे भी अधिक भयानक अतिसंहारक अस्त्र का निर्माण कर लिया। वह था बदनाम सबसे जहरीला मस्टर्ड गैस (यानी डायक्लोरेथाइल सल्फाइड)। फिर से उसी एप्रेस को प्रयोग स्थली बनाया गया जहां से इस भयानक रासायनिक युद्ध की शुरुवात हुई थी। इस गैस का परिणाम यह होता था कि जो भी इसके संपर्क में आता इसके प्रकोप से बच नहीं पाता था। इसका द्रव्य रुप शरीर के जिस भाग को स्पर्श करता वह भाग फूल जाता मरणांतक पीडा होती, बगल में, जांघों में फफोले से आ जाते, पीडित को उलटियां होने लगती, फफोलों की लाली जाने के बाद पीलापन आ जाता, आवाज चली जाती, वेदनाएं बढ़ती ही चली जाती। इसकी सबसे बडी भयंकरता यह थी कि यह रंगरुप विहीन द्रव्य रुप में जमीन पर पडा रहता संपर्क में आनेवाले को चपेट में ले लेता। ठंड के दिनों में यह जम जाता और वर्ष भर प्रभावी बना रहता। यह इतना भयंकर था कि यदि दूर से भी कोई इसे सूंघ ले तो इसके प्रकोप से बच नहीं सकता था। रोगी का इलाज करनेवाले डॉक्टर, नर्सेस तक इसकी चपेट में आ जाते थे। 

मित्र राष्ट्रों ने भी युद्ध समाप्त होने के दो माह पूर्व सितंबर 1918 में मस्टर्ड गैस तैयार कर लिया परंतु उसके पूर्व उन्होंने टनों से फॉस्जेन गैस का उपयोग जर्मनों के विरुद्ध किया। जर्मनी ने भी मस्टर्ड गैस का अंधाधुंध प्रयोग कर अपनी बढ़त बनाए रखी। अंततः अमेरिका के आ जाने और मित्र राष्ट्रों द्वारा मस्टर्ड गैस के प्रयोग से और अनेक मोर्चों पर युद्ध प्रारंभ हो जाने के कारण अंत में जर्मनी की पराजय हुई। इस प्रकार से रसायन शास्त्र के बलबूते मित्र राष्ट्र विजयी हुए साथ ही लाखों लोग इन घातक रसायनों के शिकार होकर अपाहिज हो गए। हजारों लोगों को अपने प्राणों से हाथ धोना पडा। परंतु, इन अमानवीय कृत्यों के लिए किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया गया उलटे नए-नए रासायनिक हथियारों की होड लग गई जो द्वितीय विश्वयुद्ध में उपयोग में लाए गए। युद्धोपरांत 1919 में हेबर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। काहे के लिए तो रसायन शास्त्र की सेवा के लिए।

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