Wednesday, 23 April 2014

प्रथम विश्व युद्ध की भीषण त्रासदी - रासायनिक हथियार

प्रथम विश्व युद्ध की भीषण त्रासदी - रासायनिक हथियार

प्रथम विश्वयुद्ध 1 अगस्त 1914 को प्रारंभ होकर 11 नवंबर 1918 को समाप्त हुआ। (28 जुलाई को सर्वप्रथम ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध शुरु किया था।) यह युद्ध ब्रिटेन की अगुवाई में मित्र राष्ट्रों (फ्रांस, रशियन साम्राज्य, इटली, अमेरिका के संयुक्त संस्थान) और आस्ट्रिया-हंगरी-प्रशिया (वर्तमान जर्मनी) बल्गेरिया और उस्मानी साम्राज्य (तुर्की) के बीच हुआ था। इसमें मित्र राष्ट्र विजयी हुए थे। इस वर्ष इस विश्वयुद्ध के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस संदर्भ में ब्रिटेन में हुए एक सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि वहां की वर्तमान पीढ़ी को इस युद्ध के संबंध में कोई विशेष जानकारी नहीं है। 

हमारे यहां भी हालात कुछ इससे अलग नहीं जबकि भारत ने ब्रिटिश उपनिवेश के रुप में इस विश्वयुद्ध में भाग लिया था और हमारे भारतीय सैनिक भी इस विश्वयुद्ध में शामिल हुए थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के संबंध में जरुर कुछ जानकारी हमारे यहां के लोगों के है क्योंकि इस दौरान भारत की स्वतंत्रता की लडाई चरम की ओर बढ़ रही थी। इस युद्ध मे भी भारत ने ब्रिटिश उपनिवेश के रुप में भाग लिया था। इन विश्वयुद्धों का हमसे संबंधित एक और मुद्दा है- गांधीजी ने प्रथम विश्वयुद्ध के समय भारतीय ब्रिटिश सेना में भर्ती हों को प्रोत्साहन दिया था और एक अभियान सा छेड दिया जबकि दूसरे विश्वयुद्ध के समय उन्होंने भारतीयों के सेना में प्रवेश का विरोध किया था। जबकि वीर सावरकर ने भारतीयों के सेना में प्रवेश का आवाहन कर सैनिकीकरण का नारा दिया था। 

इस प्रथम विश्वयुद्ध का सबसे नृशंस अमानवीय पहलू यह है कि इस युद्ध में रसायनों का हथियार के रुप में किया गया प्रयोग जिसके कारण हजारों लोग बहुत बुरी तरह मारे गए थे। बडी-बडी कंपनियां जैसेकि बायर, हेक्सट आदि तक इस रासायनिक युद्ध में संलग्न थी। ये जर्मन कंपनियां थी और इनके कुछ रसायनज्ञ तो जर्मन सरकार के युद्ध सलाहकार के रुप में भी कार्य करते थे। परंतु, इसका मतलब यह नहीं कि रासायनिक हथियारों का विश्वयुद्ध में प्रयोग सबसे पहले जर्मनों ने किया था। सबसे पहला प्रयोग फ्रांस ने अगस्त 1914 में जर्मनी के विरुद्ध इथाइल ब्रोमोएसिटेट के बम फेंक कर किया था। यह शस्त्र कोई विशेष घातक नहीं था इससे शत्रुपक्ष को केवल छींकें आती थी और वह हैरान हो बंदूकों से निशाना साध नहीं पाता था बस। इस कारण इसकी कोई विशेष  दखल युद्ध इतिहास में ली नहीं गई। 

जिस आंसू गैस का उपयोग दंगाइयों के विरुद्ध करते हुए हम पुलिस को देखते हैं उसका सबसे पहला प्रयोग हथियार के रुप में 31 जनवरी 1915 को जर्मनी ने रशिया के विरुद्ध किया था परंतु यह प्रयोग प्रभावी ना रहा। आपको आश्चर्य होगा कि इस अमानवीय कृत्य को बढ़ावा देने में उद्योगपति भी सक्रिय थे और उनका साथ दे रहे थे यहूदी मूल के नोबल पुरस्कार प्राप्त फ्रिट्‌ज हेबर। जिनकी यहूदी जाति के लाखों लोगों को हिटलर ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान गैस चैम्बर में ढ़केलकर बहुत बुरी मौत मारा था। और सबसे बडे आश्चर्य की बात यह है कि इस हेबर को जिसको जर्मनी के राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया था उसीको आगे चलकर हिटलर ने 1934 में यहूदी होने के कारण जर्मनी से भगा दिया। इसी हेबर ने अपने घातक हथियार के रुप में क्लोरिन का उपयोग करना तय किया और 22 अप्रैल 1915 को बेल्जियम के एप्रेस नामक स्थान पर शाम को मित्र राष्ट्रों की फौज के विरुद्ध यह गैस छोडी गई। पहले तो कुछ अजीब सी गंध महसूस हुई। सैनिक कुछ समझते इसके पूर्व ही हरे-पीले बादल उनके सिरों पर मंडराने लगे उनका सांस लेना दुभर हो गया, ऐसा लगने लगा मानो उनका गला कोई घोंट रहा है। जानलेवा खांसी के साथ खून आने लगा और मुंह से झाग निकलने लगा और देखते ही देखते हजारों सैनिक काल के गाल में समा गए। 

इस रासायनिक युद्ध के विरुद्ध ब्रिटेन चुप ना रहा जनाक्रोश रोकने के लिए पहले तो उसने बचाव के लिए मुखौटे तैयार किए परंतु यह निरुपयोगी नजर आने पर उसने बडी संख्या में रसायनज्ञों को भर्ती करना शुरु किया। क्लोरिन का निर्माण किया गया और बेल्जियम स्थित जर्मनों पर इस क्लोरिन से हमला करना तय किया। परंतु, प्रकृति ने साथ नहीं दिया हवा उल्टी दिशा में बहने से गैस जर्मनों को हानि पहुंचाने के स्थान पर ब्रिटिश सैनिकों पर ही कहर ढ़ाने लगी, जर्मनों के यह बात ध्यान में आते ही उन्होंने गोलाबारी प्रारंभ कर दी और दोहरी हानि उठा ब्रिटिश सेना को पीछे हटना पडा। मित्र राष्ट्रों ने भी ईंट का जवाब पत्थर से देना तय कर रासायनिक हथियार तैयार करने की प्रयोगशालाएं खडी करना और वहां प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया। इस प्रयोग में इतने मनुष्यों को हानि पहुंची, दुष्परिणाम भोगने पडे कि, सेना के अधिकारियों में ही क्रोध निर्मित होने लगा साथ ही प्रयोग के लिए मनुष्य भी मिलना दुश्वार हो गया। अंततः कुत्ता, बिल्ली आदि जो मिले उस जानवर पर प्रयोग किए गए। यह बात अलग है कि न चाहते हुए भी इन जानवरों को इकट्ठा करने का काम जरुर कुछ लोगों को मिल गया। 
इसी दौरान जर्मनी जिसका की रसायन उद्योग पर एक प्रकार से एकाधिकार सा ही था ने फॉस्जेन जैसा घातक रासायनिक हथियार तैयार कर लिया। 19 दिसंबर 1915 को इसका प्रयोग मित्र राष्ट्रों पर किया गया। क्लोरिन को तो गंध होती है परंतु, फॉस्जेन तो गंधरहित होकर क्लोरिन से कई गुना घातक भी था। इसको सूंघते ही कुछ ही क्षणों में गले में खराश, आँखों में जलन होने लगती है कुछ घंटों के बाद पीडित मनुष्य के फेंफडों में पानी भरने लगता है और इसके बाद उसके लिए थोडी सी भी हलचल नामुमकिन हो जाती है, ब्लडप्रेशर बढ़ जाता है, नाडी व दिल तेज गति से धडकने लगते हैं और प्राण निकल जाते हैं।

मित्र राष्ट्र भी पीछे न रहे उन्होंने भी फॉस्जेन का निर्माण कर लिया एवं उसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिए उसमें क्लोरिन को मिला दिया। और 16 जून 1916 में इस का उपयोग जर्मनों के विरुद्ध एक घातक हथियार के रुप में सोम की लडाई में किया। यह हथियार इतना घातक सिद्ध हुआ कि प्रभावित क्षेत्र के मनुष्य तो मनुष्य पशु-पक्षी, कीडे-मकोडे तक मर गए। यहां तक कि झाडियां तक जल गई। इसकी घातकता को देख सैनिक तो क्या नागरिकों तक के दिलों में दहशत बैठ गई। लेकिन सेनाधिकारी इसके बगैर चारा नहीं यही तर्क प्रस्तुत करते रहे। कई टन फॉस्जेन मित्र राष्ट्रों ने उपयोग में लाया। 

जर्मनों की मगरुरी दूर करने के लिए ब्रिटेन ने लिव्हन्स प्रोजेक्टर नामका एक अत्यंत सस्ता यंत्र बनाया जिसकी कीमत उस जमाने में मात्र 16 शिलिंग थी। जिसके माध्यम से फॉस्जेन गैस के बम जर्मनों पर अप्रैल 1917 से लेकर युद्ध समाप्त होने तक लगातार बरसाए गए। यह इतने संहारक थे कि देखते ही देखते गांव के गांव साफ हो गए। कभी - कभी तो मात्र दहशत फैलाने के लिए गैस के स्थान पर इन बमों में भयंकर बदबूदार बोन ऑइल या एमाइल एसिटेट भरकर फैंके जाते थे। जर्मन डर के मारे इधर-उधर भागते फिरते। उपर्युक्त प्रकार के गैस के बम करोडों की संख्या में जर्मनों पर फैंके गए।

जब मित्र राष्ट्रों ने सारी नैतिकता, नियम त्याग दिए तो जर्मन भी भला क्यों पीछे रहते जर्मनों ने इससे भी अधिक भयानक अतिसंहारक अस्त्र का निर्माण कर लिया। वह था बदनाम सबसे जहरीला मस्टर्ड गैस (यानी डायक्लोरेथाइल सल्फाइड)। फिर से उसी एप्रेस को प्रयोग स्थली बनाया गया जहां से इस भयानक रासायनिक युद्ध की शुरुवात हुई थी। इस गैस का परिणाम यह होता था कि जो भी इसके संपर्क में आता इसके प्रकोप से बच नहीं पाता था। इसका द्रव्य रुप शरीर के जिस भाग को स्पर्श करता वह भाग फूल जाता मरणांतक पीडा होती, बगल में, जांघों में फफोले से आ जाते, पीडित को उलटियां होने लगती, फफोलों की लाली जाने के बाद पीलापन आ जाता, आवाज चली जाती, वेदनाएं बढ़ती ही चली जाती। इसकी सबसे बडी भयंकरता यह थी कि यह रंगरुप विहीन द्रव्य रुप में जमीन पर पडा रहता संपर्क में आनेवाले को चपेट में ले लेता। ठंड के दिनों में यह जम जाता और वर्ष भर प्रभावी बना रहता। यह इतना भयंकर था कि यदि दूर से भी कोई इसे सूंघ ले तो इसके प्रकोप से बच नहीं सकता था। रोगी का इलाज करनेवाले डॉक्टर, नर्सेस तक इसकी चपेट में आ जाते थे। 

मित्र राष्ट्रों ने भी युद्ध समाप्त होने के दो माह पूर्व सितंबर 1918 में मस्टर्ड गैस तैयार कर लिया परंतु उसके पूर्व उन्होंने टनों से फॉस्जेन गैस का उपयोग जर्मनों के विरुद्ध किया। जर्मनी ने भी मस्टर्ड गैस का अंधाधुंध प्रयोग कर अपनी बढ़त बनाए रखी। अंततः अमेरिका के आ जाने और मित्र राष्ट्रों द्वारा मस्टर्ड गैस के प्रयोग से और अनेक मोर्चों पर युद्ध प्रारंभ हो जाने के कारण अंत में जर्मनी की पराजय हुई। इस प्रकार से रसायन शास्त्र के बलबूते मित्र राष्ट्र विजयी हुए साथ ही लाखों लोग इन घातक रसायनों के शिकार होकर अपाहिज हो गए। हजारों लोगों को अपने प्राणों से हाथ धोना पडा। परंतु, इन अमानवीय कृत्यों के लिए किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया गया उलटे नए-नए रासायनिक हथियारों की होड लग गई जो द्वितीय विश्वयुद्ध में उपयोग में लाए गए। युद्धोपरांत 1919 में हेबर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। काहे के लिए तो रसायन शास्त्र की सेवा के लिए।

Friday, 18 April 2014

सदा रहे हैं रसाल के रसिक

सदा रहे हैं रसाल के रसिक

विश्व के पांच प्रमुख फलों में आम को गिना जाता है। भारत ने इसे राष्ट्रीय फल का सम्मान दिया है। आम फलों का राजा होकर भारत का प्राचीनतम फल है। आम भारतीय सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है। यह समृद्धि का प्रतीक भी है। संस्कृत साहित्य में इसका वर्णन आम्र, कल्पतरु, अतिसौरभ आदि नामों से है। आम का राजसी नाम रसाल है। अंगे्रजी का मैंगो समरबहिश्त, किशनभोग, हरदिल अजीज, मिठुआ जैसे प्रेम भरे शब्दों से भी पुकारा जाता है। आम्रवृक्ष का उल्लेख सदाहरित के रुप में भी किया जाता है।

आम भारत भूखण्ड की पैदावार होकर कहते हैं चार हजार वर्ष पहले चटगांव की निचली पहाडियों में प्रकृति के अनमोल वरदान के रुप में अपनेआप पैदा हुआ। भारत से यह उष्ण जलवायुवाले भूभागों में फैला। अफ्रीका में लगभग 1000 वर्ष पूर्व आम का आगमन हुआ तो वेस्टइंडीज में लगभग 350 वर्ष पूर्व। सुप्रसिद्ध अल्फांसो आम या हापुस जिसका शोध एक पुर्तगाली ने लगाया था भी 400 वर्ष पूर्व का है। वैश्विक स्तर पर आम की तीन जातियां हैं। भारतीय, इंडो चायनीज और दक्षिण अमेरिकीन। पहली दो प्रमुख होकर दक्षिण अमेरिकी अपने उग्र दर्प के कारण अखाद्य समझी जाती है। भारतीय फल के गुदा में तंतुमय पदार्थ नहीं होते और रंग आकर्षक होता है जबकि इंडो चायनीज में तंतु होते हैं और रंग भी आकर्षक नहीं होता।

भारतीय आम में विभिन्न रंग-रुप, स्वाद, मिठास और किस्म पाई जाती है जैसेकि भारत की विभिन्न प्रदेशों की वेशभूषा, बोलियां, भाषाएं। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों, संस्कृत-साहित्य में आम का उल्लेख मिलता है। कालिदास की रचनाओं में आम प्रतीक बनकर उभरा है जैसेकि मेघदूत में पर्वत को आम्रकूट कहा गया है। आम की बौरों को मदन बाण और फल को प्रेम की परिपक्वता का प्रतीक माना है। व्याकरणाचार्य पाणिनी ने मनुष्यों का आम्रपाल और आम्रपाली एवं नगरों के लिए आम्रपुर की संज्ञाओं का प्रयोग किया है। रामायण और महाभारत में आम की गुणगाथा और आम्रवनों का संदर्भ उस काल में इस फल के प्रचलित और लोकप्रिय होने का द्योतक है। शतपथ ब्राह्मण में इसे वैदिक काल का फल बताया गया है। बौद्धकालीन 'अमरकोश" में भी आम का विवरण मिलता है।

पंचपल्लवों में आम्रवृक्ष का प्रमुख स्थान है। धार्मिक कार्यक्रमों में, मंगल कलशों, तोरणद्वार, विवाह मण्डपों में आम्र पल्लवों का उपयोग एवं कई पूजा-विधानों में भी इसका प्रमुख स्थान है। कवियों ने आम की प्रशंसा करते हुए इसे पिकवल्लभ, मधुदूत आदि कहा है। आम को कल्पवृक्ष अथवा मनोकामना पूर्ण करनेवाला वृक्ष माना गया है। कलाकारों ने भी आम का जीभर अंकन किया है। ईसा से 150 वर्ष पूर्व निर्मित सांची के स्तूपों में आम के वृक्ष और फलों के प्रस्तर उत्कीर्ण उत्कृष्ट भारतीय कला के प्रमाण हैं।  

स्वाद, सुंदरता, सुगंध से संपन्न यह अनूठा फलवृक्ष उपयोगिता की दृष्टि से भी कहीं से कहीं तक कमतर नहीं पडता। आम वृक्ष से मिलनेवाली हर चीज किसी ना किसी रुप में उपयोगी है। इसीलिए तो आम से संबंधित कहावत है 'आम के आम गुठलियों के दाम"। कच्चे आम के फलों का उपयोग चटनी, मुरब्बे, अचार, अमचूर बनाने के लिए किया जाता है। आम एक नाशवंत फल होने के कारण इसके टिकाऊ पदार्थ बनाकर रस, चूर्ण आदि बनाकर विदेशों में निर्यात किया जाता है। आम की गरी का पशु आहार के रुप में उपयोग किया जाता है। आम की लकडी मध्यम दृढ़ता वाली मानी जाती है। इससे हल की लोढ़, खुरपी, हंसिया आदि के हत्थे बनाए जाते हैं। आम की छाल से चमडा पकाने के लिए टेनिन निकाला जाता है।

सर्वप्रिय आम की मधुरता और रुची इसमें कितनी शर्करा उपलब्ध है इस पर अवलंबित रहती है। पक्वता के अनुसार इसमें  ग्लुकोज, फ्रुकटोज, माल्टोज और सुक्रोज इन चारों ही शर्कराओं का एकदूसरे के साथ क्या अनुपात है इस पर रुची अवलंबित रहती है। आम में औषधीय गुण भरपूर होने के कारण इसका आयुर्वेदिक महत्व भी बहुत है। चरक संहिता में आम के अनेक स्वास्थ्यवर्धक एवं औषधीय गुणों का वर्णन है। भावप्रकाश में आम्रमंजरियों को अतिसार, कफ, पित्त और दुष्ट रक्तनाशक कहा गया है। कच्ची अमिया वात एवं कफ के दोषों को उत्पन्न करनेवाली और पित्तकारक है। कच्चे बडे आम के सेवन से त्रिदोष एवं रक्त विकार उत्पन्न होते हैं। परंतु, यदि कच्चे आम के टुकडों को धूप में सुखाकर अमचूर के रुप में उपयोग में लाएं तो यह स्वादिष्ट अमचूर कफ, वात हारक होकर इमली से अधिक गुणकारी है।

आम का फल डाली से तोडते समय जो चिपचिपा पदार्थ निकलता है वह बिच्छू अथवा अन्य किसी विषैले कीट का जहर उतारने की अमोघ औषधी है। आम की छाल को उबालकर बनाए गए काढ़े से गले और जबडे में होनेवाले दर्द में आराम मिलता है। आम की पत्तियों का धुंआ, खांसी और श्वास संबंधी रोगों में लाभकारी है। आम का तेल पांवों की बिवाई की औषधी एवं मुख रोगों में हितकारी है। आम का पना पीने से लू नहीं लगती। पौष्टिक फल आम मेंं विटामिन अ, ब, और क एवं शर्करा तथा प्रथिन हैं। पका आम मधुर, स्निग्ध, बल एवं वीर्यवर्धक तथा वर्ण को सुंदर करता है। नेत्र और ह्रदय के लिए लाभकारी तथा व्रणश्लेष्म और रक्तविकारो को हरता है। आयुर्वेद में कुछ रोगियों को केवल आम का ही आहार देकर उन्हें स्वस्थ और पुष्ट बनाया जाता है। इस चिकित्सा विधि को आम्रकल्प कहते हैं। इस प्रकार से अनेक गुणों से भरपूर आम फल को विचारकों ने मांगल्य का प्रतीक मानते हुए कल्पवृक्ष के रुप में गौरवान्वित किया है। 

Wednesday, 9 April 2014

कमल - भारतीय संस्कृति का प्रतीक

कमल - भारतीय संस्कृति का प्रतीक

कमल के फूल और भारतीय संस्कृति में बहुत साम्य है। वैदिक वाड्‌मय कमल का गुणगान करते हैं। भारतीय संस्कृति प्रकाशोपासक है। हमारी संस्कृति की आरती है - 'तमसो मा ज्योतिर्गमय" और कमल का मुंह अनंत प्रकाश और ऊर्जा के स्त्रोत सूर्य की ओर ही रहता है। प्रकाश को देखते ही वह फूल उठता है और प्रकाश के समाप्त होते ही वह बंद हो जाता है। प्रकाश मानो कमल का प्राण है। कमल शतपत्र है, सहस्त्र पत्र है। भारतीय संस्कृति भी तो शत-सहस्त्र पंखुडियोंवाली है। अनेकानेक जातियां, वंश, धर्म-पंथ, सभी को स्वीकारते हुए, सभीका सार ग्रहण करते हुए नीत नई पंखुडी जोडते हुए वह अविरत बढ़ रही है। भारतीय संस्कृति का कमल अभी भी पूरी तरह से खिला नहीं है, वह अभी खिल रहा है। अनन्त काल तक वह फूलता रहेगा। भारतीय संस्कृति अनन्त पंखुडियों का पुष्प बनेगी। क्योंकि, पृथ्वी अनन्त है, काल अनन्त है, ज्ञान अनन्त है। 

खिले हुए कमल पुष्प को देखकर गुनगुनाते हुए सैंकडों भ्रमर आते हैं, लेकिन कमल उनकी ओर ध्यान नहीं देता। भारतीय संस्कृति स्वयं के गीत गाते नहीं बैठती, हां संसार अवश्य उसकी प्रशंसा के गीत गाता है। हमारी भारतीय संस्कृति बिना किसी कोलाहल के शांति से पल्लवित-पुष्पित होती रही है, होती रहेगी। भगवान कृष्ण ने भी तो गीता में कमल को आदर्श मान जीने का उपदेश दिया है। संसार को ही गीता की स्तुती करने दीजिए, युद्ध की महिमा गाने दीजिए। हमारे तपस्वी-ऋषियों को महर्षि कहने दीजिए। परन्तु, हमें तो हमारी भारतीय संस्कृति के अनुसार निरंतर कर्मरत रहना है, निन्दा-स्तुती को छोड अपने ध्येय के साथ एकाकार होना है। यदि हम स्वकर्म में इतने तल्लीन हो जाएंगे तो, अपनेआप संसार हमारी प्रशंसा के गीत गाएगा।

मनुष्य परिस्थितियों के अधीन अवश्य है परंतु इससे निराश होने की आवश्यकता नहीं संयोगवश मनुष्य का जन्म बुरी परिस्थितियों, बुरे वातावरण में भी हुआ हो तो भी यदि मनुष्य स्वयं का ध्येय और दृष्टि उच्चरख प्रयत्न करे तो मांगल्य की ओर अग्रसर हो सकता है। यह है हमारी भारतीय संस्कृति की धारणा। कमल का फूल हमारे सामने यही आदर्श कीचड में खडे रहकर भी सूर्य की ओर दृष्टि लगाए रखता है, परिस्थितियों से निरपेक्ष रहकर जीने का आदर्श प्रस्तुत करता है।

कमल भारतीय संस्कृति का प्रधान प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में कमल की सुगन्ध व्याप्त है। महान पुुरुषों के सारे अवयवों को हम कमल की ही उपमा देते हैं- कमलनयन, कमलवदन, करकमल, चरणकमल, ह्रदयकमल। विष्णु की नाभी से निकली नाल से कमल से सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी का जन्म हुआ देवी लक्ष्मी भी कमलजा ही हैं। चतुर्भुज विष्णु के एक हाथ में कमल है। देवी दुर्गा को भी कमल पुष्प प्रिय है। सभी मंदिरों में कमल पुष्प के चित्र पाए जाते हैं। बौद्ध और जैन धर्म में भी कमल को सांस्कृतिक महत्व प्राप्त है। भगवान बुद्ध भी कमलासीन हैं। कमल हमारे देश का राष्ट्रीय पुष्प होकर पूजा और श्रृंगार में इसको महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

 योगशास्त्र में मूलाधार, मणिपुर आदि जो षष्ट चक्र दर्शाए गए हैं वे कमलाकार ही हैं। कमल के फूल को आयुर्वैदिक और एलोपैथिक औषधियों में प्रयोग में लाया जाता है। इसके बीजों को भूनकर मखाने बनाए जाते हैं। कमल का मधु (शहद) अत्यंत लाभकारी होता है। फूल ठंडे और स्तंभक होकर अतिसार और विषूचिका (हैजा), ज्वर और यकृत (लीवर) रोगों में उपयुक्त और ह्रदय के लिए बलवर्धक हैं। बीज उल्टियों की रोकथाम तथा चर्मरोगों में ठंडक के लिए उपयोगी। आमांश, अग्निमांद्य और बवासीर में जडों का चूर्ण लाभकारी होता है।

कमल में अलिप्तता है। वह बुराई से अच्छाई ग्रहण करने का प्रतीक है। कीचड में रहकर भी रमणीयता ग्रहण करता है। पानी और कीचड में रहकर भी पानी और कीचड के ऊपर रहता है। कमल अनासक्त है। कमल हमें सीखाता है - अनासक्त रहो। प्रकाश की उपासना करो। अमंगल से मंगल ग्रहण करो। तपस्या करना सीखो। सत्कर्म करो। नई-नई बातें ग्रहण करते रहो। यदि कोई पूछे कि भारतीय संस्कृति का अर्थ क्या है, तो उत्तर होगा 'कमल"। 

Tuesday, 8 April 2014

कणाद: राम प्रेमी मुसलमान कविभारतीय संस्कृति के प्रतीक र...

कणाद: राम प्रेमी मुसलमान कवि
भारतीय संस्कृति के प्रतीक र...
: राम प्रेमी मुसलमान कवि भारतीय संस्कृति के प्रतीक राम के बारे में रावण के मामा मारिच ने कहा था - रामोविग्रहवान धर्मः अर्थात्‌ श्रीराम त...

Monday, 7 April 2014

राम प्रेमी मुसलमान कवि

राम प्रेमी मुसलमान कवि

भारतीय संस्कृति के प्रतीक राम के बारे में रावण के मामा मारिच ने कहा था - रामोविग्रहवान धर्मः अर्थात्‌ श्रीराम तो मूर्तिमान धर्म हैं। राम के प्रति आदर, प्रेम, भक्ति का भाव देश-विदेश में फैला हुआ है। राम बौद्ध जातकों, जैन ग्रंथों में भी हैं। गुरु गोविंदसिंह का 'रामावतार" तो प्रसिद्ध ही है। राम मिस्त्र की लोककथाओं में भी है और वियतनाम तथा कंपूचिया तक में। मुसलमान भी इससे अछूते नहीं रह सके हैं। रामकथा को सबसे पहले सचित्र प्रस्तुत करने का श्रेय जाता है अकबर को। इंडोनेशिया जैसे मुस्लिम देश से लगाकर कई बौद्ध देशों और आग्नेय देशों से लगाकर रशिया तक में रामायण अत्यंत लोकप्रिय है। 

तुलसीदास और 'रामचरित्‌ मानस" के बारे में विख्यात मुस्लिम कवि मुहम्मद फैयाजुद्दीन अहमद खां ने निकाले हुए प्रशंसोद्‌गार हैं - यह राम नाम से है उनके प्यार की महिमा। कि सिर पे रखती हैं दुनिया कलाम तुलसी का।। कवियित्री आसिया खातून सिद्धिकी ने राम की वंदना करते हुए लिखा है - 'रोम रोम में रमा हुआ जे राम है, निर्गुण भी है सगुण और अभिराम है। ह्रास धर्म का देख कि जो प्रकटित हुआ उस विभूति को श्रद्धासहित प्रणाम है।" शाह जलालुद्दीन वसाली एक ऐसे मुस्लिम संत थे जो रामकथा मात्र सुनकर 'वसाली" (जो ईश्वर से जुड गया हो) बन गए। शाह जलालुद्दीन मुल्तान नगर में पंडित टेकचंद से श्रीरामकथा सुना करते थे, जो उस जमाने में अत्यंत कठिन काम था। इन्हीं जलालुद्दीन की कृपा से अयोध्या में पंडित टेकचंद को श्रीराम के दर्शन हुए और वे 'वलीराम" बन गए। फारसी के केवल तीन शेर पढ़कर वे अद्‌भुत विद्वान हो गए। उनका लिखा 'दीवाने वलीराम" बडा प्रसिद्ध गं्रथ है।

मुस्लिम साहित्यकारों और कवियों ने रामायण और तत्संबंधी काव्यरचनाएं की। 'रामायण फैजी" संभवतः पहिली रचना होना चाहिए। अब्दुल कादिर बदायूंनी की रामायण फारसी और सादउल्लाह मसीहकृत 'दास्ताने रामोसीता" ये अनुवाद क्रमशः 1589 और 1623 में प्रकाशित हुए। 'दास्ताने रामोसीता" तो फारसी भाषी जनता में बहुत लोकप्रिय हुआ। अकबर के प्रिय अब्दुल रहीम खानखाना तो पूरी तरह से राममय थे। दुख एवं कष्टों के क्षणों में उन्होंने लिखा था - 'भजि मन राम सियापति, रघुकुल ईस। दीनबंधु दुखटारन कोसलधीस।" अपने उद्धार की प्रार्थना करते हुए वे लिखते हैं - 'वेद पुरान खानत अधम उधार। केहि कारण करुनानिधि करत विचार।' 'रामचरित्‌ मानस" का पहला अनुवाद उर्दू में सन्‌ 1860 में प्रकाशित हुआ। यह अनुवाद इतना लोकप्रिय हुआ कि उर्दू में उसके सोलह संस्करण निकले। उर्दू में एक और अनुवाद 1866 में 'रामायन-ए-फरहत नज्म-हर्फ व हर्फ" प्रकाशित हुआ। वह भी बहुत लोकप्रिय हुआ और सात संस्करण उसके भी निकले।

आधुनिक रसखान के नाम से विख्यात उत्तरप्रदेश के रायबरेली के अब्दुल रशीद खान ने स्कूल के पाठ्यक्रम में सुंदरकांड पढ़ा और उससे इतने प्रभावित हुए कि रामभक्त बन गए। रामायण के अहिल्योद्धार, शिवधनुषभंग, राम का वनगमन, शबरी भेंट आदि प्रसंगों पर उन्होंने काव्य रचना की। पाकिस्तान के कवि जफर अली खां के अनुसार हिंदू सभ्यता और भारतीय संस्कृति के रुप में राम का स्वरुप सारी दुनिया के लिए आदर्शवत है। जफर कहते हैं - नकाशे तहजीबे हुनूद अपनी नुमाया है अगर तो वे सीता से है लक्ष्मन से है राम से है।"  वे बिना किसी दिक्कत के आगे कहते हैं - 'मैं तेरे शोज ः ए तसलीम पे सिर धुनता हूं कि। यह इक दूर की निसबत तुझे इस्लाम से है।" बांग्लादेश के राष्ट्रकवि नजरुल इस्लाम ने रावण की कैद में सीता को उद्देशित कर दुखी होकर लिखा है- 'किस सुदूर अशोक कानन में बंदिनी तुम सीता और कब तक जलेगी मेरे वक्ष में विरह की चिंता सीता ओ सीता।"

उत्तरप्रदेश कानपुर के प्रसिद्ध रामकथाकार बद्रिनारायण तिवारी के मंच मानस संगम द्वारा प्रकाशित 'रामकथा और मुस्लिम साहित्यकार" जिसके कई संस्करण छप चूके हैं में दसियों मुस्लिम विद्वानों के लेखों को इकट्ठा किया गया है जैसेकि शैलेश जैदी, महफूज हसन रिजवी, डॉ रहमतउल्लाह, डॉ. नूरजहां बेगम आदि जिन्होंने रामकथा की धारा में डूबकी लगाई है। रामकथा के रससाहित्य में सराबोर हो नथूर वाहिदी लिखते हैं - 'तुलसीजी के सुंदर सपने संत कबीर के पास कहां। मन मंदिर के बंद पटों में जीवन का इतिहास कहां। ध्यान के गहरे सागर में प्रेम जो डूब गया वो डूब गया। उनकी नजर में पे्रम नगर में सीता का बनवास कहां।"  डॉ. जलाल अहमद खां 'तनवीर" रामचरित मानस जैसे महाकाव्य और तुलसीदास के विषय बिल्कूल सहजता से लिखते हैं - 'कर रहे हैं हर अधर, गुणगान सीता राम के। चल रही हर ओर चर्चा राम की अविराम है।।" कबीर जैसे क्रांतिकारी संत ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को 'बापराम" या 'बापरामराय" स्वीकारते हुए कहा था - 'राम राई मेरा कहना सुनीजै। पहले बकसि, तब लेखा लीजै।" 'हे मेरे रामराय! मेरी बात सुनिये तथा क्षमा करिये ... अब मैं तेरी शरण में आ गया हूं।  
  
परंतु, रामकथा के प्रेमी, रामरस में डूबे इन मुस्लिमों की दशा बडी ही दयनीय रहती है। कट्टर मुसलमान इनके विरोधी रहते हैं इनके रामप्रेम को कुफ्र करार देते हैं। तो, हिंदू भी इन्हें विधर्मी मुसलमान ही मान दिल से सम्मान नहीं देते, इनके कार्यों पर गौर नहीं करते। ये भले ही शिकायत ना करें परंतु हालात बयां करते हैं। रहीम की बदनसीबी देखिए, मुसलमान उन्हें इसलिए नहीं मानते कि उन्होंने राम, कृष्ण, शिव, गंगा आदि हिंदू देवताओं का गुणगान किया और हिंदू इसलिए कि वे उनके बारे में अज्ञानी हैं। तभी तो आज निजामुद्दीन में उनकी मजार उपेक्षित पडी है। वहां चादर चढ़ाने कोई नहीं आता। जबकि अमीर खुसरो के उर्स होते हैं, रात-रात भर कव्वालियां गाई जाती हैं। क्या कभी कोई दिन भी आएगा जब दिन फिरेंगे शायद फिर भी जाएं तब तक रहीम के इस दोहे पर ही मनन करें- 'रहिमन चुप है बैठिए देखि दिनन को फेर। जब नीके दिन आइ हैं बनतन लागै बैर।।" 

Thursday, 3 April 2014

चंदनं न वने वने

चंदनं न वने वने

संस्कृत में एक सुभाषित है- ''शैले शैले न माणिक्यं, मौक्तिकं न गजे गजे। साधवो न हि सर्वत्र, चंदनं न वने वने।"" अर्थात्‌ प्रत्येक पर्वत पर हीरे-माणिक नहीं मिलते; प्रत्येक हाथी के गंडस्थल में मोती मिलता ही है, ऐसा नहीं; सभी ओर सज्जन मनुष्य नहीं होते और प्रत्येक वन में भी चंदन वृक्ष मिलता ही है, ऐसा नहीं। यानी संसार में श्रेष्ठ चीजें अत्यंत दुर्लभ होती हैं।

चंदन का वृक्ष श्रेष्ठ एवं दुर्लभ होने के कारण ही संस्कृत के ग्रंथों में इसकी महत्ता गाई गई है। संस्कृत ग्रंथों में चंदन के कई नाम मिलते हैं। जैसेकि, 'गंधसार", 'श्रीखंड", 'मलयज", आदि। आजादी की लडाई के महामंत्र 'वंदेमातरम्‌" की एक पंक्ति में 'मलयज" शब्द अपने गुण 'शीतलाम्‌" के साथ आया हुआ है। कालिदास से लेकर महाभारत-रामायण तक में चंदन का वर्णन मिलता है। कालिदास ने अपने गं्रथों में चंदन की प्रशंसा श्रंगार सामग्री के रुप में की है। कालिदास की नायिकाएं शरीर पर चंदन का लेप करती हैं। पतंजलि ने भी चंदन के गुणों का वर्णन अपने ग्रंथ 'महाभाव्य" में किया है। कौटिल्य ने भी अपने 'अर्थशास्त्र" में इसके गुणों का बखान किया है। हितोपदेश में दुर्जन व दुर्गुण के संबंध में बतलाने के लिए चंदन का उल्लेख आया हुआ है। यह सुभाषित इस प्रकार से है - 

मूलं भुजंगैः, कुसुमानि भृङ्‌गैः, शाखाः प्लवंगै, शिखराणि भल्लैः। नास्ति एव तत्‌ चन्दनपादपस्य यत्‌ न आश्रितं दुष्टतरैः च हिंस्त्रैः। अर्थात्‌ (चंदन वृक्ष की) जडों में सर्प आश्रय लेते हैं, फूलों का आश्रय भंवरे लेते हैं, शाखाओं पर बंदर और शिखर पर भालू आश्रय लिए रहते हैं। चंदन वृक्ष के पास की एक भी चीज ऐसी नहीं कि जिसका आश्रय अत्यंत दुष्ट, हिंसक प्राणियों ने लिया हुआ न हो। यानी कि सज्जनों का आश्रय लेकर ही दुष्ट लोग अपने दुष्कृत्य करते रहते हैं। यह सुभाषित सर्वकालिक सत्य के दर्शन कराता है।

वसंत में चंदन के पेड पर अकसर कोयल कूकती दिखाई देती है। चंदन की पत्ती, फल, फूल आदि में कोई गंध नहीं होती। इसलिए यह समझना भूल ही है कि सुगंध के कारण चंदन के पेड पर सर्प लिपटे रहते हैं। वास्तव में जिन स्थानों पर चंदन उगता है वहां सांप अधिक पाए जाते हैं। यह तो चंदन की महत्ता है कि इसे काव्यों में स्थान में मिला। सर्प और चंदन के संबंध में रहीम का भी एक दोहा है - जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग। चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग।
    
इसके पेड विशेष रुप से दक्षिण भारत में मिलते हैं। मलयालम में इसे 'चंदन", तमिल में 'श्रीगंधम्‌", तेलगू में 'चंदनम्‌", मराठी में 'चंदन" तो, गुजराती में 'सुकेत" कहते हैं। विज्ञान की भाषा में इसे 'सैंटलम अल्बम" कहते हैं। यह मझौली ऊंचाई का बेहद धीमी बढ़वार वाला सदाबहार परजीवी पेड है। ये वन के पेडों के बीच इक्का-दुक्का ही उगते हैं इसीलिए तो 'चंदनम्‌ न वने वने" कहते हैं। दो वर्ष की आयु का होते ही इसकी जडें किसी पेड की जडों से चिपकर उसका भोजन-पानी सोखने लगती हैं। संभवतः इसीलिए इसके आस-पास कोई दूसरा पेड पनप नहीं पाता।

चंदन में सुगंध उसमें उपस्थित तेल के कारण होती है जिसे आसवन करके निकाला जाता है। इसकी लकडी में 6 से 10 तो जडों में 10 प्रतिशत से कम तेल नहीं मिलता। इसकी लकडी सजावटी चीजें तैयार करने के काम आती हैं। बुरादा सुगंधित होने के कारण हवन सामग्री में मिलाया जाता है। चंदन दुर्लभ एवं बहुमूल्य होने और इसके व्यापक व्यवसायिक उपयोग के कारण यह व्यापारियों के लालच का शिकार हो गया है। इसके कारण दुर्लभ से दुर्लभतम होता जा रहा है। चोरी-छिपे इसके वृक्षों की कटाई जारी होकर इसकी लकडी की तस्करी की जाती है।

हिंदुओं और पारसियों के धार्मिक अनुष्ठानों में भी इसे अच्छा-खासा महत्व प्राप्त है। इसी महत्व के कारण तुलसीदासजी ने भी अपने एक दोहे में चंदन का उल्लेख इस प्रकार से किया है - ''चित्रकूट के घाट पे, भई संतन की भीर, तुलसीदास चंदन घिसे, तिलक देत रघुवीर।"" 'चरक संहिता" एवं 'भाव प्रकाश" में चंदन के औषधीय गुणों का परिचय दिया हुआ है। औषधीय एवं श्रंगार प्रदान करनेवाला होने के कारण साधु-संत इसे सिर-माथे पर लगाते हैं। इसके औषधीय गुण इस प्रकार से हैं -  
   
गर्मी के दिनों में लू लगने पर ठंडे दूध में एक बूंद चंदन का तेल डालकर पीने से बहुत लाभ होता है। यह सुगंधित दूध गर्मी से उपजी घमौरियों, फुन्सियों को नष्ट करता है। इसके पाउडर से फेस-पैक भी बनाया जा सकता है। चंदन के तेल में मूत्र विरेचक गुण हैं। यह मूत्रकच्छ के उपचार में दिया जाता है। मूत्राशय की सूजन, सूजाक, खांसी में भी उपयोगी होता है। चंदन के बीज से निकलनेवाला तेल त्वचा रोगों के लिए लाभप्रद है। इसकी लकडी को पानी में घिस कर लेप को किसी भी अंग की सूजन, सिरदर्द और त्वचा रोगों में लगाया जा सकता है। इसका तेल इत्र, दवाइयां और साबुन आदि बनाने के काम आता है।