Thursday, 20 February 2014

भ्रष्टाचार के मायने

भ्रष्टाचार के मायने

भ्रष्टाचार शब्द सुनते या पढ़ते ही साधारणतया सभी के दिमाग में सबसे पहले रिश्वत, आर्थिक अनियमितता की बात ही कौंधती है, इसमें गलत कुछ भी नहीं है। क्योंकि, हमारे जीवन में अर्थ को ही सबसे बडा स्थान प्राप्त हो गया है। इस कारण हमारे मनोमस्तिष्क में उपर्युक्त अर्थ का उभर कर सामने आना स्वाभाविक ही है। परंतु, क्या भ्रष्टाचार का अर्थ इतना सीमित है।

भ्रष्टाचार का संधि-विच्छेद हुआ - भ्रष्ट+आचार = भ्रष्टाचार और जिसका आचार भ्रष्ट हो वह भ्रष्टाचारी। आचार के संबंध मंें यह वचन प्रसिद्ध है - 'आचारः प्रथमो धर्मः।" विचारों की अपेक्षा कृति-सदाचार का व्यवहार ही श्रेष्ठ और मुख्य है। अब इसको दृष्टिगत रख हम विचार करें और हमारे आस-पास क्या घटित हो रहा है इस पर दृष्टि डालें तो हमें क्या दृष्टिगोचर होता है। चारों ओर कदाचार ही कदाचार है और रही बात विचार एवं कृति की तो हम अपने आस-पास के दूषित वातावरण के प्रभाव से ऐसे हो गए हैं कि हम न तो सकारात्मक विचार कर पा रहे हैं ना ही कृति। या ऐसा भी कह सकते हैं कि, इसके लिए लगनेवाली इच्छाशक्ति ही हम  खो चूके हैं। हम दिन-ब-दिन विचारहीन और कृतिशून्य होते चले जा रहे हैं। हमारी कथनी और करनी में जमीन-आसमान का फर्क आ गया है। बस रात-दिन भ्रष्टाचार का रोना रोते रहते हैं। 

हम सभी यह भी कह रहते हैं कि भारत एक धर्मप्रधान देश है, हमारे देश के लोग बडे ही धार्मिक हैं। इसलिए मैंने भ्रष्टाचार क्या है को समझाने के लिए धर्म का आधार लेना उचित समझ महाभारत के एक श्लोक का संदर्भ दे रहा हूं। महाभारत में भीष्म पितामह युधिष्ठिर से कहते हैं - 'आगमानां हि सर्वेषां आचारः श्रेष्ठः उच्यते। आचारप्रभवो धर्मः, धर्मात्‌ आयुः विवर्धते। अर्थात्‌ सब शास्त्रों में आचार श्रेष्ठ है, ऐसा कहा जाता है। आचार ही धर्म का मूल, उत्पत्ति स्थान है। धर्म के आचरण से जीवन में बढ़ौत्री होती है।" अब  प्रश्न यह उठता है कि 'धर्म" क्या है? क्योंकि, धर्म शब्द का प्रयोग एवं उसकी व्याख्या अनेकों ने अनेकानेक प्रकार से की हुई है। महामहोपाध्याय श्री काणेजी के 'धर्मशास्त्र का इतिहास" में धर्म यानी 'निश्चित नियम" (व्यवस्था या सिद्धांत) या 'आचरण-नियम" है। (पृ. 5)

उपर्युक्त को दृष्टि में रख हम किस प्रकार का आचरण करते हैं इस पर यदि हम हमारी दैनंदिनी पर दृष्टि दौडाएं तो क्या दिख पडता है। हम में से अधिकांश यातायात के नियमों का पालन नहीं करते। चौराहों पर की लालबत्ती-पीलीबत्ती को नजरअंदाज करते हैं। एकांगी मार्गों का उल्लंघन करते हैं। अंधाधुंध गति से भीडभरी सडकों पर वाहन दौडाना अपनी शान समझते हैं। 'नो हॉर्न प्लीज" लिखा हो तो वहीं हम हॉर्न बजाते हैं। चौराहों पर लाल सिग्नल हरा हुआ ही नहीं पीले पर ही हम चल पडते हैं, जल्दी इतनी कि लाल बत्ती में ही जरा जगह मिली नहीं कि हम चल पडते हैं, जोर-जोर से हॉर्न बजाना, आवाजें कसना शुरु कर देते हैं। मानो आगेवाले  मूर्ख है कि जो समझते ही नहीं कि हरी बत्ती जलने पर उन्हें आगे बढ़ना है। चौडी सडकें इसलिए बनाई जाती हैं कि यातायात का दबाव कम हो, सुविधाजनक ढ़ंग से वाहन चलाए जा सकें, इसलिए तीन लेन में यातायात चलाया जाता है। परंतु, कई लोग चाहे जिस लेन में गाडी चलाते हैं, मुडना है दांई ओर और गाडी चला रहे हैं बांई लेन में। यदि सडक पर कोई दुर्घटना हो जाए तो मजमा लगा लेते हैं। परंतु, पीडित की सहायता करने कोई आगे नहीं आता, हां लड-झगडकर, भीड एकत्रित कर यातायात को अवश्य ही बाधित कर देते हैं।

स्वच्छता के संबंध में हमारा आचरण देखें तो, ऐसा लगता है मानोे सर्वत्र अस्वच्छता-गंदगी फैलाना हम हमारा जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। चाहे जहां थूकना, कचरा फैंकना, मल-मूत्र विसर्जित करना, फुटपाथ और सडकों पर खडे होकर या सडक पर चलते-चलते खाना तथा छिलके, दोने वहीं या सडक पर फैंक देना, यह तो हमारी आदतों में शुमार है। सरकारें शौचालयों को बनाने को प्रोत्साहन दे रही हैं, लोग शौचालय बना भी रहे हैं। परंतु, उनको अन्यान्य कामों में उपयोग में लाकर अभी भी गांवों के आस-पास गंदगी फैला रहे हैं।

फुटपाथ पैदल चलनेवालों के लिए होते हैं परंतु, उनका निर्माण चलनेवालों के लिए न होकर, दुकानदारों, ठेलेवालों के लिए किया गया है, ऐसा लगता है। सडकें वाहनों के चलने के लिए होती हैं। परंतु, सडकों पर बिना अनुमति विभिन्न कार्यक्रम बडी शान से संपादित कर लिए जाते हैं। बिजली की आपूर्ति तारों पर आंकडें फंसाकर कर ली जाती है। भले ही कितनी भी अव्यवस्था फैले, लोग परेशान हों, ट्रैफिक जाम हों। कोई विचार ही नहीं करता। नई की नई बनी सडकों पर गड्ढे खोदकर शामियाने लगा दिए जाते हैं। क्या ये या अन्य इसी प्रकार के सार्वजनिक सेवाओं को बाधित करनेवाले उपक्रम जिनसे लोग बेवजह परेशान होते हैं, कदाचरण या भ्रष्ट आचरण यानी कि भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं आते!
यदि इस प्रकार के कदाचरण या भ्रष्ट आचरण हम ढूंढने बैठें तो थोक  में मिल जाएंगे। और अधिकांश में किसी ना किसी प्रकार से हम भी या हमारे निकटस्थ, अपनेवाले भी संलग्न मिल जाएंगे। इसलिए हम इस प्रकार के आचरणों पर चुप्पी साधे रहते हैं, इन्हें भ्रष्टाचार मानने को तैयार ही नहीं होते। कडवा सच तो यह है कि हम स्वयं ही भ्रष्टाचार चाहते हैं, अपरोक्ष रुप से हमने भ्रष्टाचार को मान्यता दे रखी है। तभी तो हम यह जानते हुए भी यह व्यक्ति महाभ्रष्ट है उसका बहिष्कार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। बल्कि उससे संबंध बनाने को लालायित रहते हैं जिससे कि हमें भी कभी आवश्यकता पडे अपना काम उससे निकलवा सकें। और यह कहकर इतिश्री कर लेते हैं, अपना दामन बचा लेते हैं कि क्या करें आजकल तो भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार हो गया है। खुद रिश्वत देकर काम करवाते हैं और दूसरों को भ्रष्टाचारी कहते फिरते हैं। जबकि रिश्वत लेना और देना दोनो ही अपराध हैं। 

यदि भ्रष्टाचार को 'कम" करना है, नियंत्रण में रखना है तो हर एक को अपना स्वयं का आचरण सुधारना होगा। जब तक यह नहीं होता तब तक कुछ हो नहीं सकता। इसीलिए मैंने 'कम" शब्द का प्रयोग किया है समाप्त का नहीं। 

लेख का समापन मैं संस्कृत के इस सुभाषित से करता हूं, शायद हम सब भ्रष्टाचार से दुखी लोगों को यह मार्गदर्शन दे सके-श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वाचैवार्व धार्रयतम्‌। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्‌।। अर्थात्‌ संपूर्ण धर्म का सार सुनो और सुनकर उसको भली-भांति धारण करो। वह यह कि जिस व्यवहार को तुम स्वयं अपने साथ उचित नहीं समझते, वैसा व्यवहार कभी दूसरों के साथ भी न करो। और धर्म का सार इस श्लोक से जानिए - "धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः।' अर्थात्‌  वास्तव में धर्म का तत्त्व अत्यंत रहस्मय और गुप्त है। इसलिए महापुरुष जिस मार्ग पर चलते आए हैं उसीको धर्म का मार्ग समझना चाहिए है। 

धर्म कोई आकाश से अवतरित नहीं हुआ है। पृथ्वी पर बसनेवाले मनुष्यों ने ही आपस के व्यवहार सुखद हों, परस्पर के स्नेह के लिए और तत्त्वज्ञानानुसार अनुमानित अंतिम कल्याण के लिए कुछ नियम बनाएऔर उनके अनुसार मनुष्य व्यवहार करने लगा। वही आचरण। उन्हीं से धर्म के नियम बने और इस प्रकार से धर्म की चौखट खडी हुई। सनातन वैदिक धर्म की विशेषता यह है कि यह कोई एक व्यक्ति ने बतलाया हुआ धर्म नहीं है। ईश्वरी प्रतिभा से स्फुरित वेदों के अनुसार वह व्यक्त हुआ है। श्रिुतस्मृति ने उसकी राह बनाई। इसीलिए वह देवप्रणित धर्म और जगत्‌पालक विष्णु उसका प्रभु। परमेश्वर सभी सद्‌गुणों से सम्पन्न है। उसके धर्म का पालन करनेवाला मनुष्य भी वैसाही हो, सदाचारसम्पन्न हो ऐसी उचित अपेक्षा। सदाचार से शुद्ध होते-होते मनुष्य सच्चा धार्मिक होता है, यह धारणा इसके पीछे है। आचरण से ही मनुष्य की धार्मिकता के औचित्य को पहचानना चाहिए।''

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