Friday, 7 February 2014

पाकिस्तानी आक्रमकता के प्रेरणा पुरुष 1

पाकिस्तानी आक्रमकता के प्रेरणा पुरुष 1


पाकिस्तान का जन्म ही हिंदुओं से द्वेष, अलगत्व, विरोध, अविश्वास, असुरक्षा की भावना के चलते, ब्रिटिशों के राज्य से स्वतंत्र हो जाने के पश्चात आनेवाली नई राज्य व्यवस्था के कारण बहुसंख्य हिंदुओं द्वारा शासित हो जाने के भय से हुआ है। जन्म के पश्चात उसका एक मात्र कार्यक्रम भारत द्वेष, भारत का विरोध, रात-दिन उसे हानि पहुंचाने के प्रयत्न करते रहना, भारत से हजार साल तक लडते रहने का दम भरना रहा है। भारत से युद्ध करने की नीति में मुंह की खाने के पश्चात वर्तमान में उसकी नीति भारत को अस्थिर अवस्था में रखने, हानि पहुंचाने, असुरक्षा की भावना बढ़ाने के उद्देश्य से आतंकवाद को प्रोत्साहित करना है।


1965 के युद्ध के पूर्व भारत में पहले से ही घुसाए हुए गुरिल्लों की सहायता से तोडफोड मचाने और उनकी सहायता के लिए दस टुकडियां (प्रत्येक में 500 सैनिक) कश्मीर से लगे हुए क्षेत्र मूरी में तैनात की गई थी। उनके नाम खालिद (बिन वलीद), तारीक (बिन जायेद), मुहम्मद बिन कासिम, सलाहुद्दीन (अय्यूबी), महमूद (गजनवी), (अल्लाउद्दीन) खिलजी, और बाबर तथा अरब-तुर्क वीरों के नाम पर रखे गए थे। इस ऑपरेशन का सांकेतिक नाम था 'जिब्राल्टर"।


कश्मीर को भारत के कब्जे से छुडाने के लिए जनरल जिया के काल में कुछ कश्मीरी युवाओं को पाकिस्तान में सैनिक प्रशिक्षण जिन शिविरों में दिया गया था उनके नाम थे ः खालिद बिन वलिद, अल्‌ फारुक, और अबू जुंदाल। 1998 में ओसामा बिन लादेन ने अबू जुंदाल शिविर में एक पत्रकार परिषद को संबोधित भी किया था।


पाकिस्तान के इन प्रेरणा पुरुषों का परिचय संक्षेप में प्रस्तुत है जिससे हम जान सकेंगे कि पाकिस्तान इनसे किस प्रकार की प्रेरणा ग्रहण करता है और क्यों उसने इन नामों को अपने आक्रमणकारी, विध्वंसक कार्यों के लिए अपनाया। उपर्युक्त में से मुहम्मद बिन कासिम (सिंध विजेता), महमूद गजनवी, अलाउद्दीन खिलजी, मुहम्मद गोरी के बारे में लगभग सभी लोग जानते हैं इसलिए उन पर कोई भाष्य की आवश्यकता महसूस नहीं होती। आक्रमणकारी बाबर के संबंध में बहुतकर लोगों को केवल यही जानकारी होती है कि वह भारत में मुगलवंश का संस्थापक था। परंतु, अधिकांश लोगों को उसके 'बाबरनामा" के नाम संबंध में कोई जानकारी नहीं है। अतः 'बाबरनामा" के कुछ अंश जरुर यहां दिए हैं जिससे पाठक पाकिस्तान की असली मंशा को समझ सकें।


1. खलीद बिन वलीद - पैगंबर की पत्नी मैमूना की बहन का लडका होकर जब पैगंबर मक्का की यात्रा मुहीम पर आए थे तब वह, पैगंबर द्वारा मैमूना के साथ विवाह, जो मक्का के साथ नए संबंध प्रस्थापित करने की दृष्टि से किया गया था, के पश्चात अपनी मौसी व अपने मित्र अमर जो आगे चलकर महान सेनानी और इजिप्त का विजेता बना के साथ इस्लाम स्वीकार कर मदीना आ गया। पैगंबर की मृत्यु के पश्चात उनकी अंतिम इच्छा 'अरब भूमि में दो धर्म ना रहें" की पूर्ति के लिए पहले खलीफा अबू बकर ने जो 11 टुकडियां बनाई थी उनमें से एक का प्रमुख यह खलीद भी था। फिलीप हिट्टी की भाषा में कहें तो, ''अबू बकर के नेतृत्व में और खलीद की तलवार तले अरबभूमि में एकता साधी गई। सारी दुनिया को जीतने के पहले अरबभूमि को जीतना आवश्यक था।"" अब पैगंबर द्वारा 'अल्लाह की तलवार" की उपाधि प्राप्त पाकिस्तान के इस वीर प्रेरणा पुरुष की वीरता के कार्यों की झलक देखें-


इस्लाम त्याग और इस्लाम के विरुद्ध विद्रोह* करनेवाली टोलियों में से एक बनी तमीम के बंदोबस्त के दौरान उसके एक प्रमुख नेता मलिक बिन नुवैरा के पकडे जाने पर खलीद ने उसका सिर उडाने का दंड दे उसके सिर को बाद में अग्नि में डाल दिया था। उसके साथियों को भी मार डाला था और उसी रात खलीद ने मलिक की सुंदर पत्नी लैला से विवाह कर लिया। बचे हुए विद्रोहियों से इस्लाम स्वीकार करवाया। नकली पैगंबर मुसैलमा के साथ हुई लडाई में मुसैलमा मारा गया और उसके 20 से 21 हजार सैनिक मारे गए। तो, खलीद के कुल 1200। डॉ. इकबाल के अनुसार यह अनुपात 1ः20 था। इस्लाम के इतिहास में इस लडाई को 'बगीचे की लडाई" और बगीचे को 'मौत का बगीचा" कहते हैं।


*(पैगंबर की मृत्यु के बाद थोडे से ही समय में इस्लाम केवल मदीना शहर तक ही सीमित होकर रह गया था। पैगंबर की पत्नी आयशा के शब्दों में वहां की परिस्थिति बतलाएं तो, ''पैगंबर की मृत्यु हुई और अरबों ने इस्लाम धर्म को नकार दिया, यहूदी व ईसाइयों ने सिर उठा लिया, दांभिकों ने अपना दांभिकता का बुरका उतार दिया और मुस्लिमों की अवस्था ठंड से जम जानेवाली रात में असहाय रुप में भटकनेवाली बिना गडरियेवाले भेड-बकरियों के झुंड जैसी हो गई।"" इसका कारण बतलाते हुए विल ड्युरंट कहते हैं ः ''अरब टोलियों ने केवल अनिच्छा और ऊपरी तौर पर इस्लाम का स्वीकार किया था।"" असगर अली इंजीनिअर के अनुसार बहुसंख्य अरब टोलियों ने इस्लाम का स्वीकार उस पर गहरी श्रद्धा के कारण नहीं बल्कि उस क्षेत्र की बढ़ती हुई शक्ति के रुप में किया था।"")


कजिम की लडाई (मार्च 633) जो 'जंजीर की लडाई" की लडाई भी कहलाती है पर्शियन सेना के हजारों मारे गए और हजारों कैद किए गए। मजर की लडाई (अप्रैल 633) जो युफ्रातीस और तिग्रीस नदी के नहर के किनारे हुई थी। खलीद ने पर्शियन सेना को बुरी तरह पराजीत किया उनके तीनों सेनापति खेत रहे और 30000 पर्शियन सैनिक मारे गए। मुस्लिमों को भरपूर लूट मिली और स्त्रियों को बंदी बनाया गया। वलजा (अप्रैल 633) पर्शियनों को घांस की माफिक काट डाला। प्रचंड कत्लेआम हुआ। इस विजय के बाद खलीद ने अपने सैनिकों को कहा - ''...अल्लाह के कार्य* के लिए लडते समय इस उपजाऊ भूमि के लिए और अपनी दरिद्रता और चिंता हमेशा के लिए दूर करने के लिए अपन जिहाद करने के लिए बाध्य हैं। (*अल्लाह के कार्य के लिए यानी अल्लाह की इच्छा, ध्येय, संदेश, आज्ञा, योजना कार्यवाहीत करने के लिए किया जानेवाला कार्य। अल्लाह की इच्छा और ध्येय सभी मानव श्रद्धावान यानी मुसलमान बनें और अपनी कृपा के पात्र बनें यह है। इस कार्य के लिए ही अल्लाह ने देवदूत, पैगंबर, कुरान, ईशभय, कृपा, अवकृपा, बदला, दंड की योजना बनाई है। इस 'अल्लाह के कार्य" के लिए उपर्युक्त साधनों सहित यथासंभव, यथाशक्ति संघर्ष ही इस्लामप्रणीत 'जिहाद" है।)


उल्लैस की लडाई (मई 633) के दूसरे दिन खलीद ने प्रार्थना की थी - ''हे अल्लाह, अगर मुझे विजयी किया तो यह नदी रक्त से लाल होने तक मैं एक भी शत्रु को जीवित नहीं छोडूंगा।"" तीन दिन तक कत्लेआम चला, 70000 सैनिकों को कत्ल किया गया। नदी रक्त से लाल हो गई। खलीद की शपथ पूरी हुई बाद में उस नदी का नाम 'खून की नदी" पडा। डॉ. इकबाल कहते हैं ः ''इतनी बडी संख्या में प्राणहानि होना अटल था ... सुसंस्कृत देश भी दुश्मन को जिंदा नहीं छोडते ... पर्शियनों को सबक सीखाने में खलीद सफल रहा।""


सन्‌ 634 में दमास्कस को जीतने के लिए हुई लडाई में खलीद के सारे सैनिक 'अल्लाहो अकबर" की गर्जना करते हुए शहर में घुसे। खलीद ने गर्जना की ''अल्लाह के दुश्मनों को अब क्षमा नहीं।"" उन्होंने तत्काल दुश्मनों को कत्ल करना शुरु कर दिया। दमास्कस की सडकों पर खून के परनाले बह निकले। यह प्रचंड कत्लेआम देखकर खलीद की आंखों में भी आंसू भर आए। परंतु, इसकी अपेक्षा कर्तव्य श्रेष्ठ था। लोग 'दया करो, दया करो" चिल्लाने लगे परंतु, खलीद ने गर्जना की ''अल्लाह के दुश्मनों को माफी नहीं।""


इराक में मार्च 633 से जनवरी 634 इस ग्यारह महीने की अवधि में खलीद ने 16 लडाइयां जीतकर दिखलाई। जिनके वर्णन इतिहास में विस्तार से मिलते हैं। उनमें से चार लडाइयों में कुल 2 लाख 2 हजार शत्रु सैनिक मारे गए। पांच लडाइयों में दुश्मनों की मृत्यु का निश्चित आंकडा दिया हुआ नहीं है; परंतु, 'हजारों" या 'प्रचंड संख्या" में ऐसे शब्दों का प्रयोग हुआ है। बची हुई सात लडाइयों में मौतों की संख्या ग्रंथों में दी हुई मिलती नहीं है। इनके अलावा छोटी-मोटी मुठभेटें अलग हैं। लूट का तो कोई हिसाब ही नहीं है। सिवाय, कैदियों की संख्या, मिली हुई स्त्रियां अलग ही हैं। इतिहासकार इल्मसिन कहते हैं ः खलीद ने अनेक लडाइयां लडी, असंख्य श्रद्धाहीनों (यानी गैरमुस्लिमों) को कत्ल किया, और विजेता मुसलमानों ने अमर्यादित व अकूत युद्धलूट प्राप्त की।""


इस्लाम स्वीकार के बाद खलीद ने अल्लाह के कार्य के लिए 100 से अधिक लडाइयां लडी थी। उनमें 40 से अधिक लडाइयां महत्वपूर्ण थी। लडाई न हो तो वह बेचैन हो जाता था। लडाई न करते घर बैठना उसे समय का दुरुपयोग लगता था। उसका कहना था ''मेरी जबान को खून का स्वाद आनंददायी लगता है।"" पैगंबरकाल में उसने छः बार सेना का नेतृत्व किया था।


तारिक बिन जायेद - सन्‌ 711 ई. में अफ्रीका के गवर्नर मूसा ने अपने आजाद किए हुए बर्बर गुलाम तारिक के साथ सात हजार बर्बर सैनिकों के एक दल को स्पेन में घुसने का आदेश दिया। तारिक जबल तारिक (जिब्राल्टर-यह चट्टानी प्रायद्वीप है जो स्पेन के मूल स्थल से दक्षिण की ओर समुद्र में निकला हुआ है। इसका नाम इसी तारिक के नाम पर रखा गया है।) नामका एक कठिन पर्वत के पास उतरे जिसने उनके नाम को अमर कर दिया है। इसीने इस्लाम के लिए स्पेन को जीता था और विजीगाथ साम्राज्य को पूरा नष्ट कर दिया था।


लेकिन इन दोनो ही सेनापतियों का अंत बडा बुरा हुआ। पहले खलीफा अबूबकर की मृत्यु हुई, उमर दूसरा खलीफा बना और उसने खलीद को सेनापति पद से हटा दिया और कुछ समय बाद बरखास्त कर सार्वजनिक रुप से अपमानित व दंडित किया। उसकी सारी संपत्ति जब्त कर ली गई। इसके बाद उसके बडे बुरे दिन गुजरे। वह लोगों को सडकों पर भीख मांगते हुए दिखता था। इसी प्रकार से तारिक को भी अपने से वरिष्ठ सेनानी मूसा के हाथों जलील होना पडा। मूसा ने तारिक को कोडे लगवाए और जंजीरों से बंधवा दिया। उसकी गलती यह थी कि उसने प्रारंभिककाल में मूसा की आज्ञा से आगे बढ़ना बंद नहीं किया था। परंतु, इसी वर्ष खलीफा वलीद ने मूसा को दमिश्क बुला लिया। गलती वही थी जो मूसा ने बर्बर सहायक (तारिक) पर लगा कर उन्हें दंडित किया था। शायद इसीलिए इन चरित्रों को आदर्श माननेवाले पाकिस्तान में जिन्ना से लेकर आगे जो भी उनके नेता, सत्ताधारी हुए उन्हें भी इसी प्रकार से सार्वजनिक रुप से अपमानित होना पडा तो कुछ को दंड तक भुगतना पडा। ......

2 comments:

  1. बहुत ही जानकारी भरी पोस्ट कोई भी देश ईर्षा और द्वेष से नहीं चल सकता मुसलमानों कि पराजय का इतिहास शुरू हो चूका है अब उनका भी केवल इतिहास ही बनेगा-----!

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