Thursday, 16 January 2014

पैगम्बर की दयालुता !!

पैगम्बर की दयालुता !!


"No Civilized people of The world is so ignorant of Islamic History......as Hindus'' - M.N.Roy.


यह एक दु:खद कटु सत्य है। वह भी तब, जबकि इस्लाम का मुस्लिम समाज एक हजार से भी अधिक वर्षों से हमारे साथ रह रहा है। आज इस्लाम एक विश्वव्यापी समस्या का रूप धारण कर चुका है और उसका संत्रास तो हम हिंदुस्तान में उसके आगमन के समय से ही भुगत रहे हैं। दु:ख तो तब अधिक होता है जब अपने आपको बुद्धिजीवी, चिंतक, विचारक कहे जाने वाले, समझने वाले समाज के नेतृत्वकर्ता और स्वयं को प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडीया और उसके पत्रकार व्यवसायिकता की रौं मे ंबहकर अपने राजनैतिक और व्यवसायिक लाभ के लिए बिना किसी अध्ययन के जिनको विषय का कौडी का भी ज्ञान नहीं हो ऐसे विषयों में भी नि:संकोच विद्घता झाडने का दु:साहस करते हैं या बिना किसी जानकारी के या गंभीरता के उलजुलूल कथन करते हैं, प्रकाशित करते हैं, कर रहे हैं। यह अत्यंत पीडादायक है। इसी तरह के कुछ कथनों की बानगी प्रस्तुत है:


""जिसमें दया नहीं है, उसमें कोई सद्‌गुण नहीं है-हजरत मुहम्मद'' लीजिए पेश है हजरत मुहम्मद के दया वाले सद्‌गुण का एक नमूना:-

हजरत मुहम्मद ने अपने अपने जीवन के मदीनाकाल खंड के दस वर्ष के दौरान कुल 82 लड़ाइयां लड़ी, उन्हीं में से एक महत्वपूर्ण लड़ाई ''खंदक युद्ध'' के नाम से प्रसिद्ध है, जिसका 1400 वां (हिजरी) स्मृति दिन सन्‌ 1985 में धूमधाम से मनाया गया था। इस लड़ाई में मूर्तिपूजकों पर विजय संपादन के बाद पैगम्बर मुहम्मद ने अपनी 3000 की सेना के साथ यहूदियों की बनी कुरैजा टोली की बस्ती को घेर लिया। पैगम्बर मुहम्मद ने यहूदियों पर शत्रु पक्ष का साथ देने का आरोप लगाया। यहूदियों ने इससे इंकार किया। घेरा पच्चीस दिन चला। उस बस्ती के रहने वाले 2000 यहूदियों ने अंतत: शरणागति स्वीकार की। उन्होंने मदीना छोड़कर चले जाने की अनुमति मांगी परन्तु पैगम्बर मुहम्मद ने इस मांग को ठुकरा दिया और विकल्प सुझाया कि यहूदियों को दंड दिया जाए कि माफी इसका फैसला औस टोली का कोई व्यक्ति करेगा। ( औस टोली और बनी कुरैजा मित्र टोलियां थी, लेकिन अब औस टोली इस्लाम को स्वीकार कर मुस्लिम बन चुकी टोली थी।) बनी कुरैजा को यह विकल्प स्वीकारना पड़ा।


पैगम्बर मुहम्मद ने औस टोली के अपने कट्टर अनुयायी सद्‌ बिन मआज को न्यायाधीश नियुक्त किया। वे हाल ही में हुए खंदक युद्ध में तीर लगने से गंभीर रूप से जख्मी अवस्था में थे और उनका इलाज चल रहा था। सद ने अल्लाह से प्रार्थना की कि, सजा सुनाने तक उन्हें जीवित रहने दिया जाए। सद्‌ ने फैसला सुनाया ""इनके जो पुरूष लड़ने योग्य है, उन सबको कत्ल कर दिया जाए, इनकी औरतों और बच्चों को कैद कर लिया जाए और इनके माल बांट लिए जाएँ।"" इस पर पैगम्बर मुहम्मद ने फरमाया ''तुमने अल्लाह के आदेशानुकूल निर्णय लिया।'' (दअ्‌वतुल कुर्आन खंड 3 का भाष्य पृ. 1464) डॉ. रफीक जकरिया ने अपनी पुस्तक Mohammad and The Quran के पृ.36 पर मार डाले गए यहूदियों की संख्या 900 बताई है। सर विलयम मूर ने अपनी पुस्तक The Life of Mohammad के पृ. 318 पर इस घटना का वर्णन इस प्रकार किया है। ""इन सभी शवों को दफन किया जा सके इसके लिए बड़े गड्‌ढे पहले से ही रात में शहर से लगे हुए एक स्थान पर खोदे गए, दूसरे दिन सजा को अमल में लाया गया। उन्हें इन गड्‌ढों के किनारे पंक्तिबद्ध बैठाया गया। उसके बाद उनके सिर कलम कर शवों को गड्‌ढों में डालकर गड्‌ढों को भर दिया गया, मुहम्मद की देखरेख में ही यह कार्य चला दिन भर में भी कार्य समाप्त न होने के कारण प्रकाश की व्यवस्था कर रात भर यह कार्य चला।''


'' बदले की प्यास बुझा लेने के बाद (दयालु !) पैगंबर मुहम्मद ने इस वीभत्स कांड को भुलाने के लिए रेहाना के हुस्न की शरण ली। रेहाना के पति और अन्य रिश्तेदार अभी अभी नृशंस हत्याकांड में मर मिटे थे। उन्होंने रेहाना के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। उसने मना कर दिया। उसने बांदी अथवा रखैल बनना पंसद किया। (वस्तुत: शादी के लिए मना करने पर उसके लिए और कोई चारा भी नहीं था।) अपना धर्म बदलने से भी उसने इंकार कर दिया और अंत तक यहूदी बनी रही।'' (हदीस के माध्यम से इस्लाम का अध्ययन-रामस्वरूप पृष्ठ 121)


सर मूर ने पृ. 320 पर यह भी लिखा है कि ""घेरा डालने के पूर्व ही चार यहूदियों ने समझदारी दिखाते हुए इस्लाम को स्वीकार कर लिया और उन्हें क्षमा कर दिया गया।'' यदि बाकी के यहूदी भी इसी तरह की समझदारी दिखाते तो वे मारे न जाते निश्चय ही कोई चाहे तो इसे पैगम्बर मुहम्मद की दयालुता कह सकता है।
प्रसिद्ध मुस्लिम इतिहासकार इब्न हिशाम (पृ.834) के अलावा अन्य कई इतिहासकारों ने भी इस प्रसंग से संबंधित और भी कई घटनाओं का उल्लेख अपनी पुस्तकों में किया हुआ है। हदीस (पै. मुहम्मद की उक्तियां और कृतिया) वर्णन के अनुसार: ''युद्ध लूट का पांचवा हिस्सा पै. मुहम्मद ने रख लिया। उनके हिस्से में आई कुछ लड़कियों और औरतों को उन्होंने अपने मित्रों को भेंट के रूप में दिया और बची हुई नज्द क्षेत्र के लोगों को बेचकर उससे राज्य के लिए घोड़े और शस्त्र खरीद लिए। बची हुई लूट तीन हजार सैनिकों में नियमानुसार बांट दी गई।'' (मुस्लिम: 4370)
कुरान की सूर अल अहजाब की आयतें 26 और 27 में लड़ाई और न्याय का वर्णन इस प्रकार से आया हुआ है: ""और अहले किताब (यहूदी) में से जिन लोगों ने उन (हमलावर) गिरोहों की सहायता की थी अल्लाह ने उनके दिलों में ऐसा रोब डाल दिया कि एक गिरोह (पुरूषों) को तुम कत्ल करते रहे और दूसरे गिरोह (स्त्रियों व बच्चों) को तुमने कैद कर लिया और (अल्लाह ने) तुमकों उनकी जमीन, उनके घरों और उनके माल का वारिस बना दिया, और ऐसी(उपजाऊ) जमीन का भी जिस पर अभी तुमने कदम नहीं रखे। अल्लाह हर चीज पर सामर्थ्यवान है।"" अर्थात्‌ यह सब कुछ अल्लाह की मदद से और उसके मार्गदर्शनानुसार तथा इच्छानुसार ही हुआ है।


इस दंड के संबंध में न्यायाधीश सैयद अमीर अली ने 'The Spirit of Islam'  में लिखा है : ""थोड़ा सोचिए अगर अरबों की तलवार ने अपना काम अधिक दयालुता से किया होता तो हमारा (मुस्लिमों का) और आकाश तले के अन्य प्रत्येक देश का भविष्य आज क्या होता ? अरबों की तलवार ने, उनके रक्तांकित कृत्यों से संसार के हर कोने के पृथ्वी पर के सभी देशों के लिए दया लाने का काम (Work of Mercy) किया है।'' (पृ. 81,82) उनका अंतिम निष्कर्ष यह है कि: ''किसी भी भूमिका में से हो पूर्वाग्रह रहित मानस को ऐसा ही लगेगा कि, बनी कुरैजा को कत्ल किया था इसलिए पै. मुहम्मद को किसी भी तरह से दोषी ठहराना सम्मत नहीं।'' (पृ.82) हमें लगता है कि इसी दृष्टिकोण को नजर में रखते हुए पै. मुहम्मद और उनके अल्लाह की इसी दया से प्रभावित होकर यह कथन किया गया है कि ""जिसमें दया नहीं है उसमें कोई सदगुण नहीं है।''


इस कथन पर भी गौर कीजिए: "" हर मजहब में जितने संत हुए है उन सबका हृदय एक सा है, उनमें आपस में जो भेद दिखाई देते हैं, वे अन्य लोगों ने पैदा किए हैं, संतों ने नहीं।''- कुरान शरीफ।


यह कथन पूरी तरह मनगढ़ंत, झूठा और समाज को भ्रमित करने वाला है। इस तरह के झूठे, मनगढ़ंत भ्रम फैलाने वाले कथनों से शायद पत्रकारिता के तो नए आयाम स्थापित किए जा सकते हैं, परंतु इससे समाज का अहित ही होता हैं। यह भी शायद कम है इसीलिए तो इस्लाम के सत्य को उजागर करने वाले बुद्धिजीवियों, पत्रकारों को हेय दृष्टि से देखा जाता है, उनके लेखन का, कथनों का मजाक उड़ाया जाता है। परंतु ये तथाकथित बुद्धिजीवी स्वार्थवश इस बात को समझ ही नहीं पा रहे हैं कि वास्तविकता को छुपा कर और गलत बयानी के द्बारा वे समग्र समाज और राष्ट्र का कितना अहित कर रहे हैं।

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